परमपद प्राप्त करने हेतु हुकम की महानता व महत्ता-4 (वचनबद्धता)

साडा है सजन राम, राम है कुल जहान

अर्थात् ईश्वर हमारा मित्र/प्रियतम सर्वव्यापक है, उसी को जानो, मानो व वैसे ही गुण अपनाओ।

 

शब्द है गुरु, शरीर नहीं है,

अर्थात् ज्ञानी को नहीं ज्ञान को अपनाओ और निमित्त में नहीं नित्य में श्रद्धा बढ़ाओ।

 

इस पर सुदृढ़ता से डटे रह, इस अटल सत्य पर स्थिर बने रहो:-

ओ3म् अमर है आत्मा, आत्मा में है परमात्मा

 

गत सप्ताहों में सजनों हमने जाना कि हुकम अनुसार ही जीव में जीवन का संचार होता है तथा उसी के हुकम से ही समस्त प्राणी क्रियाशील होते हैं। इसी के साथ हमने यह भी जाना कि जब उस सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान व सर्वज्ञ परमेश्वर ने इस परिवर्तनशील सृष्टि को रचने उपरान्त मानव रूप जैसी उत्कृष्ट कृति को बनाया और उसमें जीवन का संचार किया तो उसे भौतिक जगत रूपी कर्म क्षेत्र में भेजने से पहले सदाचारिता परिपूर्ण मानवीय व्यक्तित्व के धर्म अनुकूल सत्यता व सुदृढ़ता से बने रहते हुए वैसा ही विवेकपूर्ण आचार-व्यवहार करने का आदेश भी दिया ताकि वह सदा आत्मतुष्ट रहे। इस प्रकार वह स्थिर बुद्धि, सदा मानसिक तौर पर निरोग अवस्था को प्राप्त रहे और उसके लिए ख़्याल ध्यान स्थिर रख, मन को प्रभु में लीन रखना सरल हो जाए। फलत: उसके लिए आत्मस्मृति में बने रह उसी के हुकम अनुसार, उसी के प्रति समर्पित भाव व सत्य-निष्ठा से अपने जीवन के सभी कर्त्तव्य अकर्त्ता भाव से धर्म संगत करते हुए यश-कीर्ति को प्राप्त होना व अपने सच्चे घर परमधाम लौट विश्राम को प्राप्त होना सहज हो जाए। इसी तथ्य के दृष्टिगत सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में कहा गया है:-

 

इको वचन इको दी पालना करो मजबूरी,

न होगी ओ पीरी न होगी वजीरी।।

इस प्रकार सजनों परमात्मा के हुकम अनुसार जीव ने रात्रि रूपी जीवन के पहले प्रहर में माँ के गर्भ में प्रवेश किया और आजीवन उसी के हुकम के अन्दर ही बने रहते हुए, उसकी यथा पालना के प्रति वचनबद्धता का आश्वासन दे, इस अनमोल मानव जीवन को धारण किया। इस संदर्भ में सजनों विडम्बना की बात यह है कि गर्भाकाल के दौरान तो जीव को इस तथ्य की याद रही परन्तु जन्मोपरांत, माया और माया के कार्यों से सम्बन्धित हो जाने पर वह अविद्या के कारण, अन्तर्यामी परमेश्वर, उसके परम आदेश व उसकी पालना के संदर्भ में स्वयं द्वारा दिए गए अनमोल वचन को भूल गया। इस प्रकार वह पंच तत्त्वों व मन-बुद्धि-चित्त-अहंकार व इन्द्रियों के सहयोग से निर्मित इस क्षणभंगुर शरीर को ही अपना वास्तविक स्वरूप समझकर उसी में आसक्त हो, परमार्थ के रास्ते पर बने रह परोपकार कमाने के स्थान पर, अविचारी इंसान की तरह नश्वर विषयों की प्राप्ति में जुट गया। ऐसा अनिष्ट होने पर विषयों की विकृतियों यानि काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार ने उसे घेर लिया और वह निजी आशा-तृष्णा की तृप्ति हेतु स्वार्थपरता को महत्त्व दे, नाना प्रकार के सकाम कर्म, कुकर्म व अधर्म करने लगा। जैसा कि सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में कहा भी गया है:-

 

मैं भेजया मृतलोक विच तैनूं, गर्भ विच तैं याद कीतोई बाहर याद न कीता तैं मैनूं।।

हौं मैं दा तैनूं रोग लगा हाई, मोह माया दी फाँसी।

गूढ़ी निद्रा विच तू सौं गयों, पंज चोर खड़े नी सिरांधी।।

जन्म दी मर्म न जानी, जन्म दी मर्म न जानी।।

 

स्पष्ट है सजनों ईश्वर के हुकम की अवहेलना कर, अनमोल मानव जन्म की मर्म यानि सार न जानने के कारण ही अविचारी जीव को कर्मफल के रूप में  सुख-दु:ख की पीड़ा भुगतनी पड़ती है जो अपने आप में विवेकशक्ति के क्षीण होने जैसी दुर्भाग्यपूर्ण बात होती है। तभी तो वह जीव शरीरधारी होकर दुर्बुद्धि गँवार इंसान की तरह नादानतापूर्ण इस संसार में इधर-उधर भटकने लगता है। इसी भटकाव के कारण जब उसके लिए ख़्याल ध्यान को स्थिर रख सत्य प्रकाश को ग्रहण करना कठिन हो जाता है तो वह झूठ आधारित जीवन व्यतीत कर अपने जन्म की बाजी हार जाता है। जैसा कि सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में परमेश्वर जीव को कहते भी हैं कि:-

 

मैं भेजया हाई तैनू सच वणजन नूं, झूठ दा कीता हेई व्यापार।

डरदा होया मेरे निकट न आवे, भुलिया फिरे गंवार।

ए जिन्दगी तेरी सदा नहीं रहनी, इस नूं लवीं संवार।

जन्म दी मौज न माणी, जन्म दी मौज न माणी।।

सजनों वेद शास्त्रों के अनुसार भी इस प्रकार ईश्वर के वचनों की पालना न करने वाला जीव, गुणों और कर्मों के अनुसार ऐसी अनेक अमंगलमय कर्मगतियों को, उनके फलों को प्राप्त होता है और यथार्थता आत्मरूप से एक होते हुए भी, अज्ञानियों की तरह विवश होकर, जन्म के बाद मृत्यु और मृत्यु के बाद जन्म को प्राप्त हो, अपनी प्रालब्ध अनुसार चौरासी लाख योनियों में भटकता रहता है। इसी को भयावह आवागमन का चक्र कहते हैं। उपरोक्त तथ्य को स्पष्ट करते हुए ही सजनों सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में कहा गया है:- 

असली स्वरूप नूं भुलिया, मन कई जूनां विच भटकावे।

बुद्धि होई ए करूर तेरी कई वेरी जम्मे ते मरदा राहवे।

कर्मा दे अनुसार जीव चौरासी भुगत भुगत के आवे।

भुलियां रैन विहाणी, भुलियां रैन विहाणी।।

यही नहीं सजनों उपरोक्त के संदर्भ में यदि हम ध्यानपूर्वक इतिहास के गर्भ में व युग पुरुषों के सम्पर्क में आने वाले संगी-साथियों के जीवन काल को भी देखें तो सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ के अनुसार हमें ज्ञात होता है कि द्वापर युग में भी श्री कृष्ण जी के मित्र सजन सुदामा ने वचनों की पालना न करने के कारण भीख माँगी और फिर उसे सही मार्गदर्शन प्राप्त करने हेतु सजन श्री कृष्ण जी के पास आना ही पड़ा। इसी तरह कलियुग में भी मर्दाने ने सजन श्री गुरु नानक जी के वचन न पाले। फिर उसको भी उनके पास आना पड़ा और उसने उनसे सब कुछ पाया। इस तरह ईश्वरीय वचनों की पालना कर वे दोनों ही स्वार्थ की तरफ से सुखी हो गये, और परमार्थ की तरफ से प्रभु से मेल खा गये। इसी संदर्भ में अब आगे सुनो:-

 

उपरोक्त विवेचना से सजनों ईश्वर के हुक्म के प्रति वचनबद्ध रह उस पर हर हाल में खरे उतरने का महत्त्व समझ में आता है और ज्ञात होता है कि शब्द ब्रह्म विचारों के रूप में वेद-शास्त्रों में कहे हुए ईश्वरीय वचनों को यथा अपने आचरण में उतार परस्पर तद्नुरूप उनका व्यवहार करने व जीवन की हर परिस्थिति में उन पर स्थिर बने रहने पर ही हम संतोषी व धीर बन सकते हैं और परिपूर्णतया समभाव में स्थित हो, निष्कामता से सच्चाई धर्म की राह पर चलते हुए सबके प्रति अपने कर्त्तव्यों का समुचित ढंग से निवर्हन करते हुए, ईश्वर के कर्त्तव्यपरायण परोपकारी सुपुत्र कहला सकते हैं व अपने जन्म की बाजी जीत सकते हैं। इसके विपरीत ईश्वरीय वचन पालना से पीछे हटना, अहंकार प्रवृत्ति में ढल, कर्त्तव्यविमुखता के कारण, फकीरी को प्राप्त हो, अनमोल मानव जीवन हारने की बात होती है। हमारे साथ ऐसा न हो इसलिए सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में कहा गया है":-

महाबीर जी दे वचनां ते चल के ते, अपना आप लवो पछान सजनों।

आप अमर इन्सान ओ अमर होवे, जेहड़ा वचन करे प्रवान सजनों।।

इसी आज्ञा पालन के संदर्भ में ही सजनों तीन प्रकार के इंसानों का जिक्र करते हुए सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में श्री साजन जी भी कहते हैं कि:-

तीन प्रकार के पुत्र होते हैं उत्तम, मध्यम, मन्द अधम।

उत्तम:- उत्तम पुत्र पिता का आज्ञाकारी होता है।

मध्यम:- मध्यम पुत्र गिर गिर कर फिर खड़ा होता है।

मन्द अधम:-- मन्द अधम पिता के वचनों के विरुद्ध चलता है।

उत्तम पुरुष महाराज जी को प्यारा है। इसलिये हमें चाहिए कि हम उत्तम सपुत्र बन के दिखाएं।

ऐसा सुपुत्र बनने हेतु सजनों सजन श्री शहनशाह हनुमान जी के वचनों की पालना करते हुए नाम, ध्यान और निष्काम रास्ते को पकड़ लो क्योंकि सतवस्तु का कुदरती ग्रन्थ कह रहा है कि ऐसा करने से सारे संकट दूर हो जाएंगे। परिणामत: आत्मानन्द की अनुभूति होगी जो अपने आप में जीत-जीत, फतह-फतह प्राप्ति का सूचक होगी।

 

नि:संदेह इसके लिए वचन पालना के प्रति सत्यता, ईमानदारी और मानसिक दृढ़ता का होना अनिवार्य है। ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि जो सत्य का धर्मसंगत निष्काम भाव से पालन करते हैं, वे कभी किसी प्रलोभन के वश हो अपने वचन से विचलित नहीं होते। इसी तरह ईश्वरीय वचनों का पालन करते समय मनुष्य को अनेक प्रकार की कठिनाईयाँ सहनी पड़ती हैं, त्याग करना पड़ता है। इस सबके लिये उसे कष्ट उठाना होता है। उस कष्ट को हँस कर सहने हेतु मानसिक दृढ़ता की आवश्यकता होती है। जिसमें दृढ़ता होती है, वह प्रकाशित बुद्धि सारी मुसीबतों का सामना करके भी हर हालत में वचन पालन करते हुए सुकर्म ही करता है। इस संदर्भ में सजनों रामचन्द्र जी का वचनपालन उदाहरण के रूप में हमारे समक्ष ही है जिन्होने ईश्वर का हुकम प्रवान करने हेतु राज्य का लोभ छोड़कर, दुर्गम वनों में जा कर वनवास के कष्ट भोगना उचित समझा। इस पर लक्ष्मण जी ने क्रोध भी किया और कहा कि भरत से राज्य ले लिया जाए, परन्तु श्री रामचन्द्र जी ने उत्तर दिया कि यह राज्य तो थोड़े दिनों का है, आखिर इसको तो एक दिन छोड़ना है, अगर हमने भरत के साथ विरोध किया तो दुनियां वाले कहेंगे कि श्री रामचन्द्र जी आत्मिक ज्ञान पाकर भी अपने स्वभावों पर स्थिर न रहे। इसलिए उन्होंने धर्म सच्चाई को न छोड़ा। इस तरह सजनों हुकम पर खड़े होने पर जब वह सुदृढ़ता से सच्चाई धर्म पर अटल हो परोपकार कमाने में सफल हो गए तो उन्हें फिर वह राज्य गद्दी मिल गई। सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ के अनुसार यह है सबसे उत्तम। उत्तम  का सीस ताज सुकर्म, उत्तम का अटल राज सुकर्म, सुकर्मों में उत्तम जकड़ता है। दु:ख कलेश कष्टों के आने पर भी सुकर्म नहीं छोड़ता अपितु सच का वर्त-वर्ताव करता है। सुकर्मों को धारण करके फिर वह किसी से नहीं डरता है। फिर वह किसके आगे मस्तक झुकाए। जो नाम है वही शब्द गुरु है तो फिर वह भेंटा किसको चढ़ाए। इस तरह त्रिकालदर्शी बन जाता है। इसी तथ्य के दृष्टिगत सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में कहा गया है:-

धर्म सच्चाई दे रस्ते ते चल गए, पिता जी दे वचन करन प्रवान।

श्री राम सेवा में सीता लक्ष्मण चल पड़े, पकड़ लिया शब्द विचार महान।

कोई विरला यत्न करे इन्सान, कोई विरला यत्न करे इन्सान।।

इस तथ्य को समझते हुए सजनों ईश्वर को दिए वचन अनुसार दुनियां में रह कर धर्म सच्चाई पकड़ो, यश लो अपयश न लो। याद रखो जो ऐसा नहीं करता यानि मानसिक सदृढ़ता के अभाव के कारण, ईश्वरीय हुकम की अवहेलना कर अपनी वचनबद्धता पर खरा नहीं उतरता वह आत्मविश्वास खो, जीवन में आने वाली कठिनाईयों का सामना नहीं कर पाता और वचन पालन से जी चुरा मनमत पर चलने लगता है। यही कारण है कि वह यदा-कदा स्वार्थ, भय व परिस्थितियों के वशीभूत हो परेशानियों के सामने झुक जाता है और वचनों के विरुद्ध कर्म करते हुए अपना नुकसान आप कर बैठता है। इस बात को समझते हुए ही सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में कहा गया है:-

कई विरले यत्न लड़ावनगे, पकड़न सतवस्तु दी चाल।

जैं शहनशाह दे वचन प्रवान कीते, ओ कदे न खासन हार।।

 

इस महत्ता के दृष्टिगत सजनों आप भी सजन श्री शहनशाह हनुमान जी के द्वारे पर होने के नाते अपने आपको वह सौभाग्यशाली विरला सजन मानो जो ईश्वरीय वचनों की पालना के लिए हर संभव यत्न कर पाने में सक्षम हो। इसलिए जाग्रति में आ, अंतिम श्वास तक वचन पालना के प्रति सचेतन रह जीवन की हारी बाजी जीत जाओ। ऐसा सुनिश्चित करने के लिए यदि वचनों की पालना करते हुए अपने प्राणों का भी त्याग करना पड़े तो किसी विध् भी मत घबराओ। इस परिप्रेक्ष्य में सदा स्मरण रहे कि वचनबद्ध व्यक्ति की समाज सदैव जय-जयकार करता रहा है। इसलिए मानो कि यश-कीर्ति को शाश्वत बनाये रखने के लिये वचनबद्धता आवश्यक है। यही नहीं वचनपालन मनुष्य की विश्वसनीयता में वृद्धि करके, उसके यश का विस्तार करके और उसे उसकी प्रतिष्ठता के प्रति सचेत करके उसके व्यक्तित्त्व का भी उद्धार करता है। फिर वह वचन पालक अपने वचन से इस प्रकार बँध जाता है कि वह चाहकर भी उसे नहीं छोड़ पाता और ईमानदारी एवं सत्यता से उसका पालन करते हुए सबसे बुद्धिमान कहलाता है। जानो वचनबद्ध लोग स्वभाव से ही धीर, उदार विषम परिस्थितियों में उचित निर्णय लेने वाले होते हैं तथा वचनपालना कर समाज में आदर्श जीवन मूल्यों की स्थापना करते हैं। इस तरह वचनबद्धता द्वारा वह सहज ही अन्य व्यक्तियों से भिन्न और समाज में विशिष्ट तथा सम्माननीय हो जाते हैं और अंत अपना जीवन सफल बना अपने सच्चे घर परमधाम को प्रस्थान कर जाते हैं।

 

इस संदर्भ में सजनों अगर हमें अपने जीवन से लेश मात्र भी प्यार है और हम हकीकत में सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में विदित आत्मिक ज्ञान की पढ़ाई को विधिवत्  अमल में ला, परमपद प्राप्त करना चाहते हैं और परमधाम का नज़ारा व चमत्कार देखना चाहते हैं तो हम मखट्टू पुत्रों को, इस महान व शुभ लक्ष्य की प्राप्ति हेतु परमार्थी पिता सजन श्री शहनशाह हनुमान जी, (जिनकी ताकत के आगे मौत भी काँपती है), की आज्ञाओं का पालन, उनके प्रति एक उत्तम सुपुत्र की तरह अटल विश्वास रखते हुए, निर्भयता से, बिना किसी तर्क-वितर्क के, समर्पित भाव से करना, आरम्भ करना ही होगा।

 

ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में श्री साजन परमेश्वर स्पष्टत: कह रहे हैं कि वेद शास्त्रों को बनाने व रचाने वाले पुकार-पुकार कर यानि बारम्बार हम सजनों को यह संकेत दे रहे हैं कि अब कलुकाल जाने वाला है और सतवस्तु आने वाली है इसलिए सजन श्री शहनशाह हनुमान जी की नाम-युक्ति के अनुशीलन द्वारा, उनका संग प्राप्त कर अपना इलाही स्वरूप पहचान लो अर्थात् सतवस्तु को धारण कर लो। इसी परिप्रेक्ष्य में सजन श्री शहनशाह हनुमान जी सभी सभासदों के समक्ष प्रचार करते हुए, सबको इस क्रिया में निपुण बनाने हेतु शब्द विचार पकड़ अपना जीवन बनाने का आदेश दे रहे हैं ताकि सब श्रेष्ठ मानव बन अपना आप पहचान जाएँ और उन्हें किसी विध् भी जन्म की बाजी हार पछताना न पड़े। यहाँ वह हम इन्सानों को बार-बार सचेत करते हुए कह रहे हैं कि वड-छोट, तेरी-मेरी अर्थात् द्वि-द्वेष का भाव त्याग कर इस विचार पर खड़े हो जाओ कि इस भूमंडल में सर्व-सर्व एक ही परमेश्वर व्याप्त है यानि दूसरा और कोई नहीं। इस बात को समझते हुए सजनों सजन भाव अपनाओ। इस तरह अपना जीवन बनाने के प्रति जागरुक रहते हुए सुनिश्चित रूप से सजन श्री शहनशाह हनुमान जी के वचन प्रवान कर, सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में वर्णित शब्द विचारों को पकड़ना प्रारम्भ कर दो और "विचार ईश्वर है अपना आप" के भाव पर स्थिरता से खड़े हो एक शक्तिशाली व बुद्धिमान इंसान की तरह विचारयुक्त सवलड़ा रास्ता अपना लो। यहाँ जानो कि विचारयुक्त रास्ते पर बेखौफा-बेखतरा निरंतर बने रहने हेतु हमें बाल अवस्था का भक्ति भाव छोड़, युवावस्था का भक्ति भाव अर्थात् समभाव समदृष्टि की युक्ति अनुरूप ढल सजनता का प्रतीक बनना होगा। सजनों एकता, एक अवस्था में आने के लिए ऐसा करना आवश्यक मानो।

 

इस विषय में सजनों अब अगर हकीकत में दिल में परमपद पाने की दिलचस्पी है तो सहर्ष स्वार्थपरता का अविचारयुक्त कठिनाईयों से भरा रास्ता छोड़ परमार्थ के रास्ते पर सुदृढ़ता से आगे बढ़ते हुए सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में वर्णित परमेश्वर के मुख की कुदरती वाणी अर्थात् शब्द ब्रह्म विचारों को दिलचस्पी से नियमपूर्वक पढ़ो-समझो व उन्हें ग्रहण कर अपने मन वचन कर्म को विशुद्धता में साधे रखो। नि:संदेह इस हेतु आपको मनमत का त्याग करना होगा और ईमानदारी और सत्यता से ईश्वरीय वचनों की पालना करनी होगी। चाहे पुराने बुरे भाव-स्वभाव जोर भी मारे पर फिर भी उनके काबू नहीं आना होगा। इस तरह गुरुमत अनुरूप जो भी बात किसी के साथ करो, विचार से करनी होगी और विचार से ही उत्तर देना होगा। इस प्रकार विचारवान सुपुत्र की तरह, कुल दुनियां में और जनचर, बनचर, जड़-चेतन में एक प्रकाश समझ कर, इस मन व जगत पर फ़तह पा जाओ तथा जगत विजयी हो परमपद पा यानि अपने वास्तविक स्थान परमधाम को पा जीवन बना लो। जानो सजनों इसी सर्वोच्च परमपद की ओर हमारे ख़्याल और ध्यान को आकर्षित करते हुए सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में परमेश्वर हमें कहते हैं:-

परमधाम है घर हमारा, परमधाम में हम रहते हैं।

कैसे प्रसन्नता में आए, कैसे ओ सुहाये ओ सुहाये।।

परमधाम दा नज़ारा हमें कैसा लगे प्यारा

रूप रंग न रेखा राहवे, बिन सूरजों उजियाला।

त्रिकालदर्शी ओ नाम कहलाते हैं, कहलाते हैं, कहलाते हैं।।

आहा ओ परमधाम, वाह वाह ओ परमधाम।।

 

सजनों परमधाम के सुन्दर नजारे को अभिव्यक्त करती हुई यह परम पवित्र वाणी सुनने/पढ़ने के पश्चात् यकीकन ही आपका मन भी उस रूप, रंग, रेखा रहित, जहाँ बिन सूरजों उजियारा है उस अपने वास्तविक अलौकिक घर परमधाम की ओर प्रस्थान करने के लिए लालायित हो उठा होगा। अगर ऐसा ही है और आप वाकई ही इसी जीवन में इस लक्ष्य को प्राप्त करना चाहते हो तो ऐसा सहजता व सरलता से कर पाने के लिए जिन वचनों की पालना करने का निर्देश, सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में दिया गया है वह इस प्रकार है:-

 

जानो श्री साजन परमेश्वर कह रहे हैं कि जो आज हम आत्मविस्मृति के कारण तीनों तापों से संतप्त हो अनेकों कष्ट सह रहे हैं उनसे रक्षित रह विश्राम पाने के लिए अविलम्ब सजन श्री शहनशाह हनुमान जी की चरण शरण में आ जाओ। यह शब्द विचार पकड़, तीनों तापों व सभी प्रकार के कर्मकांडों से मुक्त होने की अर्थात् संसारी फुरनों और संसारी बातों का कनरस छोड़ अपने ख़्याल ध्यान को प्रकाश में स्थिर रखते हुए, अपने इलाही स्वरूप में स्थित रहने की बात है। इस शुभ कारज की सिद्धि हेतु श्री साजन जी हमें इस तथ्य से अवगत कराते हुए कह रहे हैं कि याद रखो "जेहड़े पासे संकल्प उसे पासे दृष्टि"। इसलिए हमारे लिए बनता है कि हम जगत में विचरते हुए इस हितकारी क्रिया को सावधानी से करना सुनिश्चित करें यानि अन्दरूनी व बैहरूनी दोनों वृत्तियों में हमारा संकल्प हर घड़ी प्रभु को लोचे और दृष्टि उनका दर्शन हृदयांगम कर ले। सजनों यही तो ख़्याल ध्यान को अपने सच्चे घर में स्थिर रख एकरस विश्राम अवस्था में बने रहने जैसी उत्तम बात है जिसके लिए मुक्कमल तौर पर त्याग भावना से अपने अन्दर स्वाभाविक परिवर्तन लाना अनिवार्य है।

इस उत्तम अवस्था में निरंतर सुदृढ़ता से बने रहने के लिए सजनों वह परमेश्वर हमें मूलमंत्र आद् अक्षर पर पकड़ रखते हुए 'ये" को पा सर्व सर्व की जानने वाला बनने का आदेश दे रहे हैं ताकि अक्षर की एकरस  रटन लगाने से हमारा हृदय प्रकाशित हो जाए और ऐसा अद्भुत होने पर हम "विचार ईश्वर है अपना आप" पर सुदृढ़ता से खड़े हो अपनी भूल सुधार जीव, जगत और ब्रह्म के यथार्थ से परिचित हो जाएं। सजनों याद रखो जब "जो प्रकाश हमने  देखा है, वही चमत्कार असलियत मेरा अपना आप है" इस तथ्य को जान जाओगे तो जगत के सब कार्यव्यवहार करते हुए भी आपकी निगाह उस चमत्कार के साथ हमेशा जुड़ी रहेगी। इस अवस्था पर बने रहने पर स्वत: ही अनादि जोत की प्राप्ति हो जाएगी। ऐसी महान प्राप्ति के उपरांत आप ताकतवर होकर सहजता से अपने असली स्वरूप पर खड़े होकर युवावस्था को प्राप्त हो जाओगे। बस फिर तो युवावस्था का भक्ति भाव अपना जप-तप संयम से आजाद हो, आकाशों-आकाश, पातालों-पाताल, सप्तद्वीप-भूमंडल में प्रवेश करते हुए गगनमंडल में स्थिर हो जाओगे। सजनों जानो कि गगनमंडल में स्थिर होना सर्व-सर्व की जानने वाला बन अर्थात् त्रिकालदर्शी हो जगत में अकर्त्ता भाव से निष्कलंक विचरने की बात है। ऐसे पुरुषार्थी इंसान का तीनों तापों का घटता-बढ़ता टैम्प्रेचर समाप्त हो जाता है और उसकी जोत निर्वाण में जगमगा उठती है। तभी तो वह अपने जीवन काल में सर्गुण-निर्गुण के खेल खेलता हुआ, अंत रूप-रंग-रेखा से आजाद हो, परमधाम पहुँच विश्राम को पाता है। यह अपने आप में वज्र अवस्था को प्राप्त होने की बात होती है। इस वज्र अवस्था को प्राप्त करने के पश्चात् इंसान पर कोई र्इंट रोड़ा प्रहार नहीं कर सकता। तभी तो उस इंसान को सांसारिक कोई भी परिस्थिति प्रभावित नहीं कर पाती यानि ऐसा ताकतवर इंसान अफुर अवस्था में बने रह बिन खेचलों, बिन तकलीफों जन्म की बाजी जीत लेता है और ज्योति स्वरूप परब्रह्म परमेश्वर नाम कहाता है।

सजनों जानो कि द्वापर युग में इसी युक्ति पर चलकर ही यानि अंतर्मुखी हो परमेश्वर के वचन प्रवान कर, उस एक सर्वव्यापक चमत्कार के साथ निगाह जोड़ने पर ही सजन अर्जुन ने संसारी व परमार्थी दोनों राज्य प्राप्त कर लिए। अत: इस प्रसंग से शिक्षा ले सजनों मान लो कि आज के समयकाल में भी हम, आप व सब इन्हीं वचनों पर चलकर अपने आप की पहचान कर सकते हैं और अपने जन्म की बाजी जीत अपना जन्म सार्थक बना सकते हैं। इस महत्ता को समझते हुए सजनों सुदृढ़ता से परमेश्वर के वचनों की पालना करना सुनिचित करो और वचन पालना के संदर्भ में उपरोक्त समस्त युक्ति को दृष्टिगत रखते हुए व अपनी यथार्थता को स्वीकारते हुए मानो:-                                                                                      

 मैं ब्रह्म हूं

ओ3म अमर है आत्मा, आत्मा में है परमात्मा

एहो असलियत ब्रह्म स्वरूप प्रकाश है जे ओ मेरा अपना

हम ब्रह्म प्रकाश हम, हम ब्रह्म प्रकाश हां

हम हर अन्दर निवास हम, हम हर अन्दर निवास हां

हम हर अन्दर प्रवेश हम, हम हर अन्दर प्रवेश हां

हम हर अन्दर विशेष हम, हम हर अन्दर विशेष हां

हम ब्रह्म हम, हम ब्रह्म हां

 

अंत में सजनों पूर्ण सफलता प्राप्ति हेतु अपने इस यथार्थ को स्वीकार लो कि "मैं ब्रह्म हूँ"। इस तरह ब्रह्म के गुण व ब्रह्म का धर्म अपना कर, ब्रह्म भाव पर खड़े हो जाओ और ब्रह्म भाव अनुसार जगत में सब कुछ करने का पुरुषार्थ दिखा, अपना जीवन चरित्र परम पावन व सुन्दर बना, एक श्रेष्ठ मानव बन जाओ और ब्रह्म नाम कहाओ। आप सब ऐसा करने में कामयाब हो इन्ही शुभकामनाओं के साथ।