वृत्ति/स्मृति/बुद्धि-5

साडा है सजन राम, राम है कुल जहान

अर्थात् ईश्वर हमारा मित्र/प्रियतम सर्वव्यापक है, उसी को जानो, मानो व वैसे ही गुण अपनाओ।

 

शब्द है गुरु, शरीर नहीं है,

अर्थात् ज्ञानी को नहीं ज्ञान को अपनाओ और निमित्त में नहीं नित्य में श्रद्धा बढ़ाओ।

 

इस पर सुदृढ़ता से डटे रह, इस अटल सत्य पर स्थिर बने रहो:-

ओ3म् अमर है आत्मा, आत्मा में है परमात्मा

 

गत सप्ताहों में सजनों हमने वृत्ति-स्मृति व बुद्धि की निर्मलता का महत्त्व जाना। आओ सजनों आज इसी बात को सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में विदित कीर्तन "राम रटन ओथे लग रही" के माध्यम से जानते हैं:-

 

- शब्द -

राम रटन ओथे लग रही लगे सारे लोक।

लोक लगे परलोक लगे, रटन एहो श्लोक, ओ ओ ओ ओ ओ।।

हो गई बख्शीश उस दयालु बख्शन्द दी, हो गई बख्शीश।

हो गई असीस उस आनन्द कन्द दी,  आनन्द कन्द दी।।

शेष ते विराजमान, सैन करो विश्रामी पलंग।

निर्वाण दे अन्दर जोत ओ चमके, चमके सर्व ही अन्दर, चमके सर्व ही अन्दर।।

निर्मल तेरी जोत ओ साजन निर्मल ही निर्वाण हुआ।

निर्मल आद अन्त तूं भासे, निर्मल कुल जहान हुआ, निर्मल कुल जहान हुआ।।

निर्मल वृति, निर्मल स्मृति, जैं सूक्ष्म युक्ति वल ध्यान दिया।

निर्मल पा लिया बाणा उसने अपना आप पहचान किया, अपना आप पहचान किया।।

 

(श्री साजन जी कह रहे हैं)

इन्सानां विच वसदा दिसदा हां, खावां पीवां खिड़ खिड़ के पिया हसदा हां।

एहो मन विच करो विश्वास सजनों मेरी सुण लौ बात, सजनों मेरी सुण लौ बात।।

 

(श्री राम चन्द्र जी कह रहे हैं)

सतवस्तु दी निर्मल बुद्धि उच्च बुद्धि कहाई।

निर्मल बुद्धि, निर्मल बाणी, पवित्र रचना दिखाई, साजन जी पवित्र रचना दिखाई।।

सतवस्तु दा बगीचा देखो कैसी सुगन्धि आई।

चार वेद छ: शास्त्र समझ न सकन, कैसी पदवी पाई, साजन जी ने कैसी पदवी पाई।।

 

(श्री साजन जी कह रहे हैं)

जीव जन्तु में भासदा जापदा, एह मेरा समझो इतिहास।

जड़ चेतन में मेरा प्रकाश, सजनों मेरी सुण लौ बात, सजनों मेरी सुण लौ बात।।

 

ध्वनि:-

सजनों मेरी सुण लौ बात, दुनियां तों राहवो आज़ाद।।

 

सजनों हमें भी इस कीर्तन के भावार्थों अनुसार अपने आपको ढालना है। ऐसा करने पर ही हम इंसानियत में आ सकते हैं। अत: आओ अब इस कीर्तन के भावार्थों को समझते हैं:-

इस कीर्तन के अंतर्गत सजनों राम भक्त सजन श्री शहनशाह हनुमान जी, परमार्थ का रास्ता छोड़, संकल्प-विकल्पों से भरे स्वार्थपर अवलडे रास्ते पर चलने वाले कलुकालवासियों को, अपना जीवन उद्धार करने के प्रति सचेत करते हुए कह रहे हैं कि सर्वत्र रमण करने वाले परमात्म स्वरूप "राम" को अपने हृदय में धारण कर, सम्पूर्णता को प्राप्त करने हेतु, लोक-परलोक का हर प्राणी, इस संसार से विरक्त हो, भावयुक्त होकर, "राम" शब्द का बार-बार उच्चारण कर रहा है। वह आगे कहते हैं कि जानो वह सब ऐसा इसलिए कर रहे हैं क्योंकि उन्हें भली-भांति ज्ञात है कि "राम" नाम ही सत्य है यानि एक ईश्वर का नाम ही सच्चा है बाकी संसार असार और मिथ्या है अर्थात् संसार में सब नाम और रूप नाशवान हैं केवल परमात्मा ही अविनाशी है। स्पष्ट है सजनों कि वे समस्त प्राणी आत्मोद्धार हेतु, संसार के व्यर्थ शोरोगुल से बचे रह, अपने मन को परमेश्वर में लीन रखते हुए यानि उस ईश्वर के प्रति भक्ति-भाव से प्राप्त होने वाले सुखद आनन्द का रस लेते हुए, उन्ही के प्रति स्नेह व मित्रता बनाए रखने को आवश्यक व लाभकारी समझते हैं इसलिए वे सबमें रमने वाले राम शब्द की रटन लगा, राम होने की अवस्था यानि परमात्म स्वरूप में ही स्थित होना चाहते हैं। 

इस संदर्भ में सजनों इस कीर्तन में वर्णित उक्त पंक्तियों में लोक व परलोक दो शब्द आए हैं। जानो परलोक वह स्थान है जो शरीर छोड़ने पर आत्मा को प्राप्त होता है अर्थात् मृत्यु के उपरांत आत्मा की दूसरी स्थिति की प्राप्ति है तथा लोक वह स्थान है जिसका बोध प्राणी को होता है अथवा जिसकी उसने कल्पना की होती है। यह जन साधारण को विषयासक्ति द्वारा कष्ट पहुँचा और भयभीत कर उसके मन में संसार को स्थित कर उन्हें अपने वास्तविक स्वरूप के प्रति विस्मृत कर, कर्त्ता भाव से सब कुछ करने के लिए बाध्य करता है। यह अपने आप में धर्म के मार्ग से हटा अधर्म के रास्ते पर चढ़ाने की बात होती है। ज्ञात हो कि जो जीव इस तरह जगत के आकर्षण में बंधनमान हो, तद्नुरूप ही मिथ्या ज्ञान व गुणों को अपने स्वभाव के अंतर्गत कर लेता है, वह अपना यथार्थ रूप भूल जाता है और उसकी जीवन यात्रा भूमंडल और स्वर्ग तक ही सीमित रह जाती है यानि वह कदाचित् मोक्ष नहीं पा पाता। अन्य शब्दों में जब इंसान लोक-चरित्र अर्थात् संसार का ज्ञान व सार्वजनिक व्यावहारिक ढंग अपना लेता है तो वह ठग मनमत की मस्ती में होश-हवास खो, अंतर्जगत से अपना नाता तोड़ बैठता है और इस प्रकार लोकात्मा, परमात्मा को विस्मृत कर, अपनी अलग सत्ता बना बैठता है। तभी तो वह फिर इस संसार में जो भी करता है केवल अपने ही हित को ध्यान में रखकर करता है। इस तरह लोक पद्धति अपनाने वाला कामी, क्रोधी, लोभी, मोहयुक्त व अहंकारी हो जाता है और राजसिक व तामसिक गुण अपना, बड़े-छोटे का सवाल पैदा कर खुद गुरु बन बैठता है व औरों से अपनी पूजा-मानता करवाने में ही अपनी शान समझता है। यह होता है अहंवश अपनी विवेक बुद्धि व स्मृति का नाश कर अपना व सबका सर्वनाश कर बैठना ।

इस कीर्तन के अंतर्गत आगे सजन श्री शहनशाह हनुमान जी सच्चेपातशाह जी को कहते हैं कि आप अत्यन्त भाग्यशाली हैं इसलिए तो आपके निष्काम भक्ति-भाव से प्रसन्न होकर उस दयालु बख़्शंद ने आपको सब कुछ अर्थात् त्रिलोकी का राज प्रदान कर दिया है। तात्पर्य यह है कि इस बख़्शीश द्वारा उस परम आनन्द के दाता ने आपको अपना परम मंगलकारी आशीर्वाद प्रदान करने की अपार कृपा की है। इसलिए जब आप परमात्म स्वरूप को धारण कर व सर्वोच्च महान पद को प्राप्त कर असली खजाने के मालिक यानि परमेश्वर सम हो गए हो तो वह कहते हैं कि अब विश्रामी पलंग अर्थात् शेष शैय्या पर विराजमान यानि प्रकाशमान हो विश्राम को पाओ और जगत प्रकाशी नाम कहाओ। यह होती है सजनों निष्काम भाव से भक्ति करने का प्राप्ति।

इसी परिप्रेक्ष्य में सजनों, सजन श्री शहनशाह हनुमान जी आगे सच्चेपातशाह जी को कहते हैं कि हे परमेश्वर! आपकी ज्योति का प्रकाश अपने अत्यन्त विशुद्धतम रूप में है व मुक्ति धाम निर्वाण की निर्मलता का प्रतीक है। यही नहीं आप ही अपने निर्मल स्वरूप में आद्-अन्त, सर्व-सर्व अर्थात् समस्त ब्रह्मांड मे चमक रहे हो। पर आज के समयकाल में कोई विरला ही आपके इस पावन व सुन्दर स्वरूप को जान, अपने आप की पहचान कर पा रहा है। नि:संदेह वह विरला वही है जो आप द्वारा बताई हुई सूक्ष्म युक्ति पर ध्यान से बने रह, निर्मल शब्द ब्रह्म विचारों को धारण कर, निर्मल वृत्ति व निर्मल स्मृति हो निर्मल बाणा पहन रहा है और अपना आप पहचान कर अपना जीवन सफल बना रहा है।

 

आगे श्री साजन परमेश्वर कहते हैं कि मैं ही जड़ रूपों को चेतन कर, उनके हृदय में स्थाई रूप से रहते हुए, उन्हें जीवनयापन कर पाने योग्य बनाता हूँ अर्थात् मेरे निवास से ही हर इंसान का हृदय आबाद रहता है। वह कहते हैं कि जो भी व्यक्ति अपने मन में मेरे स्थित होने की वास्तविकता का अनुभव कर लेता है वही मेरा प्रियवर अपना ख़्याल ध्यान स्थिर रख मुझसे सब कुछ प्राप्त कर पाता है व भरपूरता का एहसास कर देवलोक की सुगंधि को मात कर देता है। इस तरह जब इस परिपूर्ण अवस्था को प्राप्त होने वाले उस सजन का मन संकल्प रहित/इच्छा मुक्त हो जाता है तो उस प्राणी को अपने ही मन मन्दिर में अपने वास्तविक परमात्म स्वरूप का साक्षात् इलाही दर्शन हो जाता है। परमेश्वर की कृपा से ऐसा अद्भुत होने पर वह इंसान "विचार ईश्वर है अपना आप" के भाव  पर स्थित हो जाता है और उसके खाने-पीने का ढंग अथवा आचार-विचार ईश्वर की रीति अनुसार सत्यतापूर्वक चलता है जो इस जगत से निराला होता है। कहने का आशय यह है कि वह खुद को सांसारिक परिवार से भिन्न, इलाही यानि ईश्वर के परिवार का सदस्य समझता है इसलिए ईश्वरनुकूल रैहणी-बैहणी व चाल-चलन का तरीका अपनाता है। वह आगे कहते हैं कि ए विध् जब वह अपना आप जान जाता है तो उसके चित्त को निरंतर प्रसन्नता रस प्राप्त होता रहता है और उसका हृदय कमल खिल जाता है जानो  यह अलौकिक खेल रचा "मैं" ही उसके हृदय में खिलखिलाता हुआ हँसता हूँ अर्थात् रमणीय लगता हूँ व उस इंसान को आत्मिक आनन्द से सराबोर कर हँसने में प्रवृत्त करता हूँ। इस महत्ता के दृष्टिगत सजनों श्री साजन परमेश्वर कलुकाल के हर जीव को सतवस्तु में आने हेतु, ध्यानपूर्वक अपनी बात सुनने का आवाहन देते हुए कहते हैं कि हे जीवो ! मेरी सर्वव्यापकता, सर्वज्ञता व सर्वशक्तिमानता के प्रति मन में सुदृढ़ विश्वास रखते हुए निर्मल आचार-व्यवहार अपनाओ और सतवस्तु में प्रवेश कर जाओ।

श्री साजन जी के ऐसे सुन्दर आवाहन को सुनकर आगे सजन दयालु श्री रामचन्द्र जी सभी कलुकालवासियों को सतवस्तु में प्रवेश करने के प्रति उत्साहित करते हुए इस सर्वविदित सत्य को जनाते हुए कहते हैं कि इस सृष्टि का आधार ब्रह्म ही सत् यानि नित्य, श्रेष्ठ, शुद्ध, पवित्र व सुन्दर है। उसी की ब्रह्म सत्ता यानि मूलमंत्र आद् अक्षर को ग्रहण करने पर ही इंसान, वस्तुत: तत्त्वज्ञानी बन, अपनी वास्तविकता की पहचान कर सकता है यानि नित्य भाव में स्थिर हो, पवित्रात्मा व श्रेष्ठ मानव कहला सकता है और मौत से भी निर्भय हो, आत्मतुष्टता व धीरता से इस जगत में आने का अपना प्रयोजन सिद्ध कर सकता है। इस प्रयोजन की सिद्धि हेतु ही वह सजनों को निर्मल बुद्धि, होने के प्रति उत्सहित करते हुए कहते हैं कि सतवस्तु के इंसानों की बुद्धि यानि सोचने-समझने और निश्चय करने की शक्ति निर्मल व उच्च होती है इसलिए वह श्रेष्ठ बुद्धि इंसान कहलाते हैं। हम सब भी ऐसे श्रेष्ठ बुद्धि इंसान बन सकें इसलिए तो सच्चेपातशाह जी ने कलुकाल में सबको निर्मल बुद्धि बन, निर्मल वाणी होने का पाठ पढ़ाने जैसी पवित्र रचना रचाई है। आगे वह सजनों को सतयुगी इंसान बनने के प्रति पुन: उत्साहित करते हुए कहते हैं कि घोर कलुकाल के अंधकारमय समय में भी सतवस्तु की मर्यादा अनुसार अनुशासनबद्ध रह व परमेश्वर नाम कहा श्री साजन जी ने जो अद्भुत सर्वोच्च श्रेष्ठ पद प्राप्त किया उस महान पद की शोभा  चार-वेद व छ: शास्त्र भी नहीं समझ सकते क्योंकि उस अनादि प्रमादि श्री साजन जी की महिमा अपरम्पार है।

अंतत: सजनों श्री साजन परमेश्वर सम्पूर्ण जगत को अपनी परिपूर्णता का परिचय देते हुए अपना इतिहास समझा रहे हैं और कह रहे हैं कि "मैं" ही हर जीव जन्तु में भासता हूँ यानि दीप्तिमान हूँ व "मैं" ही हर जीव जन्तु में जापदा हूँ अर्थात् दृष्टिगोचर हूँ। अत: सजनों मेरी बात अति ध्यानपूर्वक सुनो और जड़-चेतन में मेरा ही प्रकाश मानो व सत्यप्रकाशी हो जाओ। वह कहते हैं कि सतवस्तु में आने हेतु मेरी इस बात को सुन-समझ कर अपने हृदय में धारण करो और इस दुनियां में विशेष होते भी निर्लेप यानि आज़ाद रहकर जीना सुनिश्चित करो और इस प्रकार अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित रह जन्म की बाज़ी जीत जाओ।

सबकी जानकारी हेतु आगामी सप्ताह से हम सेवा के विषय में बात करेंगे।