प्रकाश-5

साडा है सजन राम, राम है कुल जहान

अर्थात् ईश्वर हमारा मित्र/प्रियतम सर्वव्यापक है, उसी को जानो, मानो वैसे ही गुण अपनाओ।

शब्द है गुरु, शरीर नहीं है,

अर्थात् ज्ञानी को नहीं ज्ञान को अपनाओ और निमित्त में नहीं नित्य में श्रद्धा बढ़ाओ।

इस पर सुदृढ़ता से डटे रह, इस अटल सत्य पर स्थिर बने रहो:-

3म् अमर है आत्मा, आत्मा में है परमात्मा

आओ सजनों आज समझते हैं कि हमने परमधाम पहुँच और अपने प्रकाश को पा किस तरह परमेश्वर नाम कहाना है। इस संदर्भ में इस महान प्राप्ति के लिए जो युक्ति सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में विदित है आओ उसको अब हर पहलू से समझते हैं। सब सजनों से प्रार्थना है कि उचित परिणाम प्राप्त करने हेतु, ध्यान स्थिर होकर सुनना समझना। इस संदर्भ में याद रखना कि जो ध्यान स्थिर होता है वह एकाग्रचित्त होता है और उसी का ख़्याल सत्य को धारण कर पाता है:-

(श्री साजन जी के मुख के शब्द)

भगवान, भगवान कुर्सी ते जब बैठ गये कृपानिधान।

संस्था हथ जोड़ करे चरण बन्दना, कोटि कोटि प्रणाम।।

परमधाम परमेश्वर राहवे, ईश्वर परमात्मा नाम कहावे।

है प्रकाश कैसा उजियाला, प्रकाश ही प्रकाश हर समय सुहावे समय सुहावे।।।

जब अन्दर बाहर परमेश्वर राहवे, बाहर जंगलों में ढूँढन किस तरह जावे।

जब पता है वस्तु है घर में, हीरे जैसा जन्म अमोलक मिलया।

फिर उस जन्म नूं क्यों वृथा गंवावे, वृथा गंवावे।।

कुटिया बना के लाये जंगलों में डेरे, असली राज नूं छड के कच दा राज खरीदे।

कोई लिटां वधा के भस्मां रमा के।

धूनियां लाके फुरना उठावे, फुरना उठावे।।

जेहड़ा सजन ईश्वर नूं मिलना चाहवे, अलफ़ है अक्षर ठीक चलावे।

ख़्याल महाबीर जी नाल जुड़या राहवे।

प्रकाश दी पहचान करदा राहवे, प्रकाश नूं पावे।।

एहो तरीका वर्ताव में लियाओ, फिर परमेश्वर नाल मेल खाओ।

ज्योति नाल मेल खाके, परमधाम दा नज़ारा पावे।

प्रकाश नाल प्रकाश होके रौशन नाम कहावे, रौशन नाम कहावे।।

शब्द:-

जेहड़ा परमधाम और अपने प्रकाश नूं पावे।

परमेश्वर नाम कहावे, परमेश्वर नाम कहावे।।

सजनों इस कीर्तन के माध्यम से भक्त वत्सल श्री साजन परमेश्वर उन भटके हुए कलुकालवासियों को, जो भगवान भक्त के वास्तविक सम्बन्ध से अपरिचित हो, विभिन्न प्रकार के प्रचलित आडम्बर युक्त भक्ति-भाव अपना कर अज्ञानमय अवस्था को प्राप्त हो चुके हैं, उन्हें यथार्थ रूप से भगवान के उपासक बनने के प्रति सचेत करते हुए भक्त-भगवान की अभेदता से परिचित करा, एक रूप मानने जानने के प्रति सुदृढ़ता से बने रहने हेतु कह रहे हैं कि समस्त पूर्व अवधारणों को त्याग कर, इस यथार्थ को स्वीकारो कि आप और कुछ नहीं अपितु परमात्मा की वह आत्मा हो, जो जीव रूप में शरीर धार कर आई है। अत: इस जगत में उन्हीं पर विश्वास रखते हुए, उन्ही के निर्देशन अनुसार, उन्ही के निमित्त सेवा करना आपका सर्वोच्च कर्त्तव्य अर्थात् धर्म है। वह कहते हैं कि अगर आप इसी भाव से अंतर्जगत को उसी प्रभु की पाठशाला समझ कर, अनुशासनबद्धता से, उन्ही के मुख से धर्म उपदेश अर्थात् शब्द ब्रह्म विचार सुनते हो उसका अनुशीलन करने को महत्ता दे, अपने स्वभाव के अंतर्गत कर लेते हो यानि अपनी वृति-स्मृति, बुद्धि भाव-स्वभाव रूपी ताना-बाणा निर्मल कर, कुशलता से उचित परिणाम प्राप्त करने के योग्य बन जाते हो तो ही आप यथार्थत: भक्त कहलाने के योग्य हो सकते हो और यथार्थता से जीवन जीते हुए अपने व्यक्तित्व को निखार सकते हो। यह उसी के साम्राज्य में बने रह उसी के हुक्म अनुसार सृष्टि चक्र को चलायमान रखने के लिए आवश्यक है। जानो जगत में रहते हुए भी अपने मन को जगतीय माया जाल से निर्लिप्त अप्रभावित रख, सदा प्रभु में लीन रखने वाला, अपने इरादों पर मजबूत बने रहने वाला, ऐसा निष्काम भक्त ही हकीकत में सच्चा भक्त कहलाता है। वह ही प्रकाशमय अवस्था में स्थिर बने रहते हुए, परमेश्वर के हुक्म अनुसार अकर्ता भाव से ब्रह्मा जी द्वारा रचित जड़ भांडों को क्रियाशील करने की सामथ्र्य प्राप्त कर पाता है।

 

आगे श्री साजन परमेश्वर कलुकालवासियों को अविचारयुक्त रास्ता छोड़, विचार में आने के लिए कहते हैं कि जब हर घट के अंदर यानि अंत:करण/हृदय में और बाहर, परम इष्ट, प्रियवर परमेश्वर यानि संसार तथा जगत के कर्ता तथा परिचालक सर्गुण ब्रह्म, श्री विष्णु भगवान रहते हैं और अंतध्र्यान होकर जिन्हें जाना जा सकता है तो फिर इंसान किस प्रभाव में आकर उसे बेगाना समझ कर या उससे अपरिचित होकर, बाहर-जंगलों में अर्थात् किसी दूसरी जगह उसे ढूँढने/खोजने जाता है? कहने का आशय यह है कि इस सर्वविदित सत्य को जानने के पश्चात् भी कि "परमात्मा का हर हृदय में निवास है", इंसान क्योंकर अपने मन को भटकाता है? क्यों नहीं हर परिस्थिति में उस हृदय स्थित परमेश्वर पर अटल विश्वास रख ख़्याल ध्यान वल ध्यान प्रकाश वल की युक्ति द्वारा अपने अंत:करण को सदा विशुद्ध रख उस सर्वव्याप्त दर्शन का साक्षात्कार करता?

इसी बात को और स्पष्टता से समझाते हुए सजनों श्री साजन जी कहते हैं कि जब हम इस रहस्य से परिचित हैं कि "वह परमात्मा हृदय में सुशोभित है और हमारी सुरत उन तक पहुँच, उनका परिचय संग प्राप्त कर, अपने मन-वचन-कर्म द्वारा उन्हें अभिव्यक्त करने में समर्थ है", तो फिर क्यों कर हमें उस सत्-वस्तु अर्थात् जगत के मूल कारण को इस घट से बाहर ढूँढने की आवश्यकता अनुभव होती है।

वह कहते हैं कि यह बात समझ में नहीं आती कि क्योंकर हीरे अर्थात् सर्वोत्कृष्ट बहुमूल्य मानव रूप, (जिसको शब्द ब्रह्म विचारों से तराशने पर इंसान सत्यनिष्ठ धर्मपरायण बने रह, वज्र अवस्था को प्राप्त हो, जन्म की बाजी जीतने की सामथ्र्य रखता है) को पाने के पश्चात् मानव, परमेश्वर को अपने से विलग समझ, एक अज्ञानी इंसान की तरह उसकी खोज कहीं बाहर करते हुए, अनमोल मानव जीवन व्यर्थ गँवाना, गँवारा समझता है?

सजनों श्री साजन परमेश्वर कहते हैं कि इसी अज्ञानतावश जीव, परमात्मा का अंश होते हुए भी, अपनी

अलौकिक शहनशाही से अपरिचित हो, अपने कुटम्ब-कबीले के प्रति अपने कर्तव्यों के निर्वहन की तरफ से पलायन कर, कुटिया बना कर जंगलों में डेरा जमाने को उचित मानता है। वह कहते हैं कि यह असली/ विशुद्ध राज अर्थात् परमात्मा का प्रभुत्व अस्वीकार, अपना मनगढ़ंत मिथ्या साम्राज्य स्थापित कर, अपना अलग अस्तित्व स्थापित करने जैसी कुटिलता भरी बात है। अन्य शब्दों में कह सकते हैं कि यह अपनी अजर-अमर अवस्था त्याग अचेतन अवस्था को प्राप्त हो, उत्साह और दृढ़ता के अभाव में, दु:खमय जीवन व्यतीत करना है क्योंकि यह अपने आप में बुद्धिबल से, अपने मन इन्द्रियों को वश में रखकर इस जगत में निर्लिप्तता से विचरने के स्थान पर मनुराज का आधिपत्य स्वीकारने जैसी आश्चर्यजनक बात है।

इसी संदर्भ में सजनों आगे परमेश्वर कहते हैं कि इस अव्यवस्थित परिस्थिति में फँसे होने के कारण ही कोई लिट्टें बढ़ाने मुख पर भस्में रमाने में ही अपना झूठा गौरव समझते हैं जबकि यह अपने आप में कुदरत प्रदत्त यथार्थ ओजस्वी तेजस्वी शारीरिक सुन्दरता के स्थान पर कुरुप होकर इसे जप-तप का नाम देकर इस जगत में अविचारपूर्ण रमण करने जैसी धर्मविरुद्ध बात है। इसलिए तो कहा गया है कि इस प्रकार की मन में उठने वाली तरंग के बहकावे में आकर इंसान क्यों कर धुनियाँ लगा, मन की बात को महत्त्व देते हुए खुद भटकते हुए, समस्त मानव जाति को भटकाने के अर्थ कष्ट सहना उचित समझते हैं।

सजनों ऐसे अज्ञानियों को सही अर्थों में पुन: परमार्थ के रास्ते पर लाने के लिए श्री साजन परमेश्वर कहते हैं कि जो भी सजन ईश्वर से मेल खाना चाहता है उसके लिए बनता है कि वह मूलमंत्र आद् अक्षर को युक्तिसंगत चलाना सुनिश्चित करे उस दौरान उसकी सुरत अर्थात् ख़्याल सजन श्री शहनशाह हनुमान जी संग संयुक्त रहे और वह आत्मप्रकाश के प्रभाव से अपने ज्ञान, गुण शक्ति स्वरूप को पहचान अपनी प्रकाशमय अवस्था को प्राप्त कर ले। अंत में वह सभी कलुकालवासियों को यही युक्ति वर्त-वर्ताव में लाकर परमेश्वर से मेल खाने का आवाहन देते हुए कह रहे हैं कि ज्योति नाल मेल खाकर अर्थात् परमात्मा नाम कहा के परमधाम का नजारा देख लो और प्रकाश नाल प्रकाश हो रोशन नाम कहाओ।  इसलिए जानो और मानो कि जो भी इंसानियत में बने रह परमधाम और अपने प्रकाश को पा लेता है वह ही परमेश्वर नाम कहाता है।

हम सब भी इस महान पद को प्राप्त कर सकें उसके लिए वह हमें इस सत्य से परिचित कराते हैं कि हम सर्व-सर्व प्रकाशित हैं पर हमारी सर्वव्यापकता का अनुभव कोई वह विरला ही कर सकता है जिसके अन्दर दर्शन की चाह होती है। वही हमारे इलाही दर्शन पा उस दर्शन के साथ दर्शन हो वास्तविक आनन्द को प्राप्त कर सकता है। इसके आगे और स्पष्ट करते हुए वह कहते हैं कि मैं सर्वव्यापक सर्वज्ञ भी हूँ इसलिए सर्वशक्तिमान कहलाता हूँ पर जगतवासियों में से कोई विरला ही मुझे देख समझ कर मुझ जैसा शक्तिमान बन सकता है। इसलिए श्री साजन परमेश्वर कहते हैं कि यह मानो जानो कि जो भी परमार्थ के रास्ते से भटका हुआ स्वार्थपर इंसान सजन श्री शहनशाह हनुमान जी की चरण-शरण में दृढ़ता से बना रह उन्हीं की युक्ति अनुसार "मैं" परमेश्वर का संग प्राप्त करना चाहता है उसके लिए ऐसा कर पाना कोई कठिन कार्य नहीं है। इसलिए सजनों इस सत्य कथन को समझो और पराक्रमी बन प्रकाश नाल प्रकाश हो रूप रंग रेखा से आजाद हो जाओ।

आपकी जानकारी हेतु प्रकाश के विषय में इससे आगे बातचीत आगामी सप्ताह करेंगे। तब तक उस अनडिठी चीज को देख परमपद पाने के प्रति अपने अन्दर भरपूर तड़फ पैदा करो। इस में एक दूसरे से आगे निकलने का यत्न करो और विजयी हो जाओ।