अपने जीवन वृत्तान्त को सुन्दर बनाने का आवाहन्

साडा है सजन राम, राम है कुल जहान

अर्थात् ईश्वर हमारा मित्र/प्रियतम सर्वव्यापक है, उसी को जानो, मानो व वैसे ही गुण अपनाओ।

 

शब्द है गुरु, शरीर नहीं है,

अर्थात् ज्ञानी को नहीं ज्ञान को अपनाओ और निमित्त में नहीं नित्य में श्रद्धा बढ़ाओ।

 

इस पर सुदृढ़ता से डटे रह, इस अटल सत्य पर स्थिर बने रहो:-

ओ3म् अमर है आत्मा, आत्मा में है परमात्मा

 

सजनों आओ आज जानते हैं कि जब सच्चेपातशाह जी ने हनुमान जी की युक्ति अपना कर व शांति शक्ति का हथियार धारण कर, जगत में रहते हुए व सब कुछ करते हुए, शारीरिक स्वभावों से ऊपर उठ व उन शहनशाह के इष्ट के गुणों को धारण कर यथा निर्भयता से व्यवहार में लाने का पुरुषार्थ दिखाया व परोपकार कमाया तो सजन श्री शहनशाह हनुमान जी किस प्रकार हर्षा उठे और उन्होंने उनके सुन्दर व परम पावन जीवन वृत्तान्त का वर्णन करते हुए क्या कहा............कृप्या ध्यान से सुनना और उस अद्भुत आत्म पदवी को पाने के प्रति तत्पर हो, अपना लोक व परलोक दोनों ही सुधार लेना:-

श्री हनुमान जी के मुख के शब्द

श्री रामचन्द्र जी अजब रचाई ने रचना, अजब पदवी रहे ने दिखा।

साजन जी दा सारा वृत्तान्त नगरी ऊपर खोल के रहे ने सुना, श्री रामचन्द्र जी।।

सिफती है मेरा साजना, सिफ़त रिहा है दिखा।

राम नाम दा शब्द बता के नगरी ऊपर रटन रहे ने करवा, श्री रामचन्द्र जी।।

रचना देख हैरान हुए, हैरान हुए परेशान हुए।

रचना रचावन वाले नू असां देख के परेशान हुए।।

जगदीश रहीश परमात्मा फिर आद मध्य अन्त तो ओही हुआ।

फिर एक दी जोत है जग ते निराली, चानणा प्रकाश तो ओही हुआ।।

सप्तद्वीप गगन मण्डल उसे दा ही निवास हुआ।

साजन जगदा आया और जगदा राहसी, फिर विश्वपति तो ओही हुआ।।

कई कई खेडां खेडन, साजन जी तुहाडे मिलने दी खातर।

वर्त ही नेम और साधना कर कर, हो हो कर के आतुर।।

कई तरह तरह दियां ओ अराधना कर के, कई तरह तरह दी साधना करके।

कई करन उपासना तुसां दी खातर, ओ वृत्ति जमा जमा कर।।

 

इस कीर्तन के अंतर्गत सजनों सजन श्री शहनशाह हनुमान जी कह रहे हैं कि सच्चेपातशाह जी के अनन्य प्रेम, श्रद्धा व निष्काम भक्ति भाव से प्रसन्न होकर, जैसे ही श्री रामचन्द्र जी ने अपनी कृपा से, उनके हृदय में अपने ज्ञान गुण स्वरूप को स्थित कर, उन्हें अपनी वास्तविक शक्ति से परिचित कराते हुए, अपने आप को सँवारने की प्रक्रिया में प्रवृत्त किया व अपने ही रंग में रंगने की आश्चर्यजनक रचना रचाई वैसे ही उन्हें अपने अदभुत् प्रतिष्ठासूचक आत्मपद का अनुभव हो गया। इस प्रकार सजनों उन्ही के मार्गदर्शन में समर्पित भाव से रहते हुए, जब सच्चेपातशाह जी ने कलियुग में मानव रूप में कदम-कदम पर विचार व विचार से ही प्यार रखते हुए अपना पुननिर्माण किया और परमेश्वरीय ज्ञान, गुण व शक्ति को धारण कर परमेश्वरमय हो गए तो सजन श्री शहनशाह हनुमान जी उन परमेश्वर रूप साजन जी का सारा वृत्तांत अर्थात् समाचार जगतवासियों को विस्तार सहित खोल कर बताने लगे।

 

वह कहने लगे कि सच्चेपातशाह जी का जीवन वृत्तांत्त हम सबके सामने आदर्श रूप में एक अनुकरणीय उदाहरण है। इस का अनुसरण कर हम कलुकाल के प्रभाव से हर प्रकार से पथभ्रष्ट इंसानों को शारीरिक भाव-स्वभाव के स्थान पर, ईश्वरीय ज्ञान व गुण से सम्पन्न हो, अंतर्निहित वास्तविक शक्ति को अनुभव करना है और अपना पुननिर्माण कर झूठ, चतुराई व छल-कपट का रास्ता छोड़ पुन: सत्य-धर्म के निष्काम रास्ते पर प्रशस्त रहने हेतु ध्यानपूर्वक साधना करनी है। नि:संदेह सजनों ऐसा करना इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि जब तक हम स्वार्थपर कामनायुक्त शारीरिक स्वभावों को कुर्बान करने में सक्षम नहीं हो जाते तब तक हम सत्य-धर्म के निष्काम रास्ते पर अग्रसर हो इस महान पद की प्राप्त नहीं कर सकते। अत: इस तथ्य के दृष्टिगत सजनों हम सबके लिए सजन श्री शहनशाह हनुमान जी की बात को विचार में ला, बिना किसी तर्क-वितर्क के उस पर अमल फरमाना बनता है।

 

सजनों हम-आप-सब भी सुनिश्चित रूप से ऐसा करने में कामयाब हो व हमारे मन में भी सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में विदित शब्द ब्रह्म विचारों को युक्तिसंगत आत्मसात् कर उस सर्वोत्तम पद को प्राप्त करने हेतु उमंग व उत्साह पैदा हो इस हेतु सजन श्री शहनशाह हनुमान जी श्री साजन जी की सिफ़त यानि सत्कार करते हुए व जगतवासियों को उनकी ज्ञान, गुण व अविनाशी स्वरूप की विशेषताएँ बताते हुए कहते हैं कि जानो श्री साजन परमेश्वर इस जगत में रहते हुए भी इससे निर्लेप हैं। वह ही अपनी मूल शक्ति का प्रयोग करते हुए, कलुकाल के स्वभावों में अटके हुए इंसानों को, यह जना रहे हैं कि "एक ईश्वर का नाम ही सच्चा है" और इसीलिए वह उनको सद्मार्ग पर लाने हेतु परमात्मा अर्थात् राम नाम का शब्द निरंतर जपते रहने के स्वभाव में प्रवृत्त कर, आत्मबोध करा रहे हैं और निष्काम भाव से अनथक परिश्रम द्वारा उन्हें परमात्मा सम बनाने की चेष्टा कर रहे हैं।

 

आगे सजन श्री शहनशाह हनुमान जी कहते हैं कि निष्काम पुरुषार्थ द्वारा नैतिक पतनता की गर्त में गए मानव समाज को पुन: अपनी वास्तविक रूप में खड़ा करने हेतु, उन द्वारा ध्यानपूर्वक युक्तिसंगत की गई इस क्रिया को देखकर हम हैरान हैं यानि जिस अदभुत् तरीके से वह सजनों को स्वार्थ के अविचारयुक्त कवलडे रास्ते से हटा, परमार्थ के विचारयुक्त सवलडे रास्ते पर चढ़ा रहे हैं, उस निराले ढंग को देखकर हम आश्चर्यवश हैरान-परेशान हैं। इस तरह सजनों इस कलियुग में मानव समाज को अपने यथार्थ परमात्म स्वरूप का दर्शन करा, उन्नति तथा सम्पन्नता के पथ पर प्रशस्त करने का उनका विशेष पराक्रम देख कर सजन श्री शहनशाह हनुमान जी आश्चर्य से स्तब्ध हो रहे हैं और कह रहे है कि श्री साजन जी ही जगदीश अर्थात् पारब्रह्म परमेश्वर हैं और वह ही आद्-मध्य-अंत यानि इस सृष्टि के मूल कारण, जगत के पालनहारे व संहार कत्र्ता हैं। उन्ही अनुपम, एकता के प्रतीक की निराली अर्थात् विलक्षण जोत यानि अविनाशी प्रकाश से ही यह जगत प्रकाशित है और वह ही इस जगत में सूर्य चाँद के प्रकाश का आधार रुाोत भी हैं। वह कहते हैं कि जीव और ब्रह्म में अभेद की कल्पना करने वाला जो भी इंसान समर्पित भाव से उनकी इस बात को सत्य मान सह्मदयता से स्वीकार लेता है वह आत्मज्ञानी ही वास्तविक रूप से ब्रह्मानंद को प्राप्त कर सकता है।

 

तत्पश्चात् वह कलुकालवासियों के मन में सर्वज्ञ श्री साजन परमेश्वर के प्रति दृढ़ विश्वास व श्रद्धा पैदा करने हेतु, उनकी सर्वव्यापकता का बखान करते हुए कहते हैं कि सप्तद्वीप, गगनमंडल में भी उन्हीं सर्वशक्तिमान परमेश्वर का ही निवास अर्थात् प्रकाश है। इस तरह वह बेअन्त साजन ही आद् से ब्राहृ सता के रूप में सर्व-सर्व एक समान जगमगा रहे हैं और सदा जगमगाते रहेंगे। वह कहते हैं कि सजनों इस विचार को धारण कर मानो कि वह ही समस्त ब्रह्माण्ड की सुरतों के पति व स्वामी हैं। इस तथ्य के दृष्टिगत सजनों हम सब सुरतों को भी इसी विचार को धारण कर सदा उन्ही में लीन रहते हुए, एकरस चेतन अवस्था में बने रहने के महत्त्व को समझना है और इस जगत में विचरते समय, किसी भी कारणवश विचलित हो, किसी अन्य संग नहीं जुड़ना। ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि यह संगी संकल्प को कुसंगी बनाने की व समूचित प्रतिष्ठा यानि यश-कीर्ति गँवा, झुखने-रोने के स्वभाव में फँसने की व अधर्म के रास्ते पर अग्रसर होने जैसी हानिकारक बात होगी। हमारे साथ ऐसा न हो इसलिए सजनों हम इंसानों के लिए बनता है कि हम अपने वास्तविक स्वरूप व शक्ति में स्थिर बने रहने हेतु सुरत-शब्द के योग को अखंडता से बनाए रखे और सदा एकता, एक अवस्था में बने रह सदाचारिता का चलन अपनाएं।

आगे सजनों सजन श्री शहनशाह हनुमान जी, श्री साजन जी को सम्बोधित करते हुए जगतवासियों द्वारा उनके प्रति अपनाए अनेक प्रकार के भक्ति-भावों का वर्णन करते हुए कहते हैं कि आज के समय काल में दुनियांवासी आपसे मिलने यानि मेल खाने की खातिर तरह-तरह के खेल, खेल रहे हैं और व्रत-नेम अर्थात् धार्मिक अनुष्ठान के निमित्त नियमपूर्वक उपवास करते हुए, अनेकानेक धार्मिक क्रियाओं का पालन कर रहे हैं। इस तरह अपने उद्देश्य की सिद्धि हेतु यानि आपका संग प्राप्त कर सुनिश्चित रूप से सफलता प्राप्त करने हेतु  वह साधना करने वाले आतुर यानि अधीर होकर कई प्रकार के पूजा-पाठ के ढंग अपना रहे हैं और ए विध् अपनी वृत्ति को सब तरफ से हटा कर, दृढ़ता पूर्वक आप में ध्यान इस्थर कर, ऐक्य भाव में आने का यत्न कर रहे हैं पर सफल नहीं हो पा रहे।

 

इस विवेचना से सजनों स्पष्ट होता है कि वर्तमान कलियुग में सजन, श्री साजन परमेश्वर से मेल खाने हेतु बाल-अवस्था के अविचारयुक्त नाना प्रकार के कर्मकांड व आडम्बरी भक्ति भावों में फँसे हुए है और शायद इसी लिए इस कीर्तन में उन द्वारा की गई साधना, आराधना व उपासना द्वारा किसी प्रकार का सफलता प्राप्त होने का जिक्र नहीं आया है। इस तथ्य के दृष्टिगत सजनों समझ आती है कि क्योंकर सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में बाल्य अवस्था के भक्ति भाव छोड़, युवावस्था का भक्ति भाव अर्थात् समभाव-समदृष्टि की युक्ति अपना कर, परस्पर सजन-भाव का वर्त-वर्ताव करते हुए सदा एकता, एक अवस्था में बने रहने का आवाहन दिया गया है।  हमें भी सजनों इस बात को और गहराई से समझना है और नि:संकोच समर्पित भाव से सजन श्री शहनशाह हनुमान जी की चरण-शरण में बने रह, सहर्ष युवावस्था का भक्ति भाव यथा अपना कर, सत्यनिष्ठ व धर्मपरायण बनना है। इस हेतु सजनों समर्पित भाव से अपना तन-मन-धन-सम्बन्ध व समय सब कुर्बान करने के लिए तत्पर रहना होगा और ए विध् में इंसानियत में आ अपना जीवन वृत्तांत्त सुन्दर बनाना होगा।

 

अंत में सजनों हम तो यही कहेंगे कि सजन श्री शहनशाह हनुमान जी के द्वारे पर होने के नाते हम सब अपने आप को सौभाग्यशाली समझें क्योंकि वह परमपिता सुनिश्चित रूप से परमपद प्राप्त कराने हेतु न केवल  हम सबका सही मार्गदर्शन करते हैं अपितु आवश्यक युक्ति भी प्रदान करते हैं। इसलिए हम सबके लिए बनता है कि अपने व सबके कल्याण हेतु अपना सर्वस्व न्योछावार करते हुए सजन श्री शहनशाह हनुमान जी के वचनों को प्रवान करने में ही अपनी शान समझें और इस हेतु अपने परमात्म स्वरूप अनुरूप अपना पुर्न निर्माण करने का तप पूरे दिलचस्पी में आकर तहे दिल व कर्मठता से करना आरम्भ कर दें और ऐक्य भाव में आ अपने जीवन का वृत्तान्त भी श्री साजन जी जैसा सुन्दर बना लें व इस तरह श्रेष्ठ मानव कहलाएं।