आत्मविजय-1

साडा है सजन राम, राम है कुल जहान

अर्थात् ईश्वर हमारा मित्र/प्रियतम सर्वव्यापक है, उसी को जानो, मानो व वैसे ही गुण अपनाओ।

 

शब्द है गुरु, शरीर नहीं है,

अर्थात् ज्ञानी को नहीं ज्ञान को अपनाओ और निमित्त में नहीं नित्य में श्रद्धा बढ़ाओ।

 

इस पर सुदृढ़ता से डटे रह, इस अटल सत्य पर स्थिर बने रहो:-

ओ3म् अमर है आत्मा, आत्मा में है परमात्मा

सजनों जैसा कि हम सभी जानते हैं कि इस संसार में सत् और असत् दोनों विद्यमान हैं। यहाँ सत् से तात्पर्य सर्वोच्च आत्मा, ब्रह्म से है जो धारण कर्ता को नित्य भाव में स्थिर रख व ह्रदय को पवित्र रख, उसे आत्मज्ञानी व सजन पुरुष बना, धीरता से श्रेष्ठ पद प्राप्त करने के योग्य बनाता है। इसी तरह असत् से आशय मिथ्यात्व व शरीर से है, जो सत्ताहीन होने के कारण इंसान की बुद्धि को भ्रमित कर, उसके मन को अस्थिर व चंचल कर, इस तरह खोटा बना देता है कि वह सदाचार के विरुद्ध दुराचरण करने के लिए बाध्य हो जाता है। इससे सजनों स्पष्ट हो जाता है कि इंसान के लिए सत् आत्मा के प्रति अपने ख़्याल को ध्यान स्थिर कर यानि मूलमंत्र आद् अक्षर के अजपा जाप द्वारा, सर्वव्याप्त ब्रह्म सत्ता को ग्रहण कर, ब्रह्म भाव को धारण करना व ब्रह्मवृत्ति होकर इस मिथ्या मायावी जगत में विचरना ही श्रेयस्कर है। 

इसी तथ्य को यदि वर्तमान परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो वर्तमान युग में सत् की तुलना में असत् की मात्रा अधिक है। इसी कारण सजन पुरुष तो दो-चार ही हैं, पर दुर्जनों की भारी भीड़ चारों ओर जमा है। यही स्थिति सजनों मनोराज्य की भी है। इसमें सद्-वृत्तियाँ, सद्-इच्छाएँ, सत्-संकल्प और सद्-भावनाएँ कम हैं और दुष्प्रवृत्तियाँ, बुरी/नीच इच्छाएँ, विषय-वासनाएँ, दुर्जनता एवं दुर्भावनाएँ बहुत हैं। इनके बहुलांश अर्थात् अत्याधिक मात्रा में विद्यमान होने के कारण ही बुराईयों पर फतह पा, आत्मविजय प्राप्त करना कठिन प्रतीत होता है । आशय यह है कि ये आत्मविजय की साधना के पथ के तीखे और कठोर शूल हैं जिन्हें भेद कर आगे बढ़ना नामुमकिन सा प्रतीत होता है। इस संदर्भ में सजनों हम मानते हैं कि इन बाधाओं से घिरा साधना पथ दुर्गम अवश्य है परन्तु अगम यानि दुर्बोध नहीं। तात्पर्य यह है कि सजन श्री शहनशाह हनुमान जी के द्वारे पर होने के नाते व सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ के पास होने के बावजूद हमारे लिए पथ के इन तीखे और  कठोर शूलों अर्थात् नकारात्मकता को भेद कर आत्मविजय प्राप्त करना कदाचित् असंभव नहीं। नि:संदेह सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में विदित शब्द ब्रह्म विचार को धारण करने से व सजन श्री शहनशाह हनुमान जी द्वारा प्रदत्त समभाव-समदृष्टि की युक्ति को प्रवान करने से, हम अवश्य ही मन की इन तमाम दुष्प्रवृत्तियों पर एक-एक करके नियन्त्रण स्थापित करते हुए आत्मसुधार के पथ पर सहजता से सतत् रूप से अग्रसर हो सकते हैं और ऐसा सुनिश्चित कर अन्य इंसानियत के प्रतीक युग पुरुषों की तरह आत्मविजय पा सकते हैं। इसी संदर्भ में आओ आज जानते हैं कि आत्मविजय से क्या अभिप्राय है व यह कार्य हमने कैसे सिद्ध करना है?

आत्मविजय

आत्मविजय शब्द का मुख्य अर्थ है अपने पर विजय अर्थात् अपने मन, अपनी इन्द्रियों, अपनी इच्छाओं-कामनाओं-संकल्पों, शारीरिक स्वभावों व मृतलोक पर फ़तह। आत्मविजय मन, इन्द्रिय, कर्म आदि समस्त विषयों में आत्मा की विजय दर्शाता है। इस तरह आत्मविजयी जितेन्द्रिय होने के कारण मन की तमाम विकारी स्थितियों यथा काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, ममता, संकल्पों, शारीरिक स्वभावों आदि पर तो फतह प्राप्त करता ही है, साथ ही वह समवृत्ति एक दर्शन में स्थित हो शांत भी हो जाता है। ऐसा होने पर उस इनसान के अन्दर किसी प्रकार की कोई इच्छा ही नहीं रहती और न ही फिर वह किसी से कोई अपेक्षा, गिला शिकवा या शिकायत करता है। इस तरह समस्त कामनाओं व संकल्पों पर फ़तह पा वह  मृतलोक को जीत परमेश्वर नाम कहाता है।

सजनों व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक हित के दृष्टिगत मानव-मन की समस्त हानिप्रद दुष्प्रवृत्तियों पर पूर्ण नियन्त्रण स्थापित कर, संकल्प कुसंगी पर विजय पाना अनिवार्य है। इसी अनिवार्यता की पूर्ति सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में विदित युवावस्था की भक्ति यानि समभाव-समदृष्टि की युक्ति अनुसार, सजन-भाव के वर्त-वर्ताव द्वारा, मृतलोक पर फ़तह पाने से सहज ही हो सकती है। जैसा कि कहा भी गया है:-

सजनों सजन शब्द चलाओ जित्तो मृतलोक नूं, सजनों जित्तो मृतलोक नूं।

सबकी जानकारी हेतु यहाँ मृतलोक को जीतने से तात्पर्य सतयुगवासियों की भांति शारीरिक स्वभावों पर (संकल्प के स्वभावों पर) फतह पा, जन्म-मरण यानि आवागमन से निज़ात पाने से है। इस हेतु बस जिह्वा से सबको सजन बुलाते हुए, अपनी जिह्वा को स्वतन्त्र, संकल्प को स्वच्छ व सबके प्रति एक निगाह एक दृष्टि रखते हुए काम, क्रोध, लोभ, मोह के कुसंग से बचे रहना होता है और स्वभावों में सजनता अपना, एक परिपूर्ण इंसान की तरह आपस में सजनता अनुरूप ही वर्त-वर्ताओ करना होता है। इस प्रकार अपने आपको पकड़ते हुए खालस सोना होते जाना होता है और अपने प्रकाश को पाना होता है। ऐसा करने से जीवन का हर कदम विचार से उठता है और बुद्धि विचार प्रबलता धारण करती है जिससे दिव्य दृष्टि हो जाती है। दिव्य दृष्टि होने पर सारा ब्रह्माण्ड एक निगाह आता है और मौत का भय भी नहीं रहता। इस तरह सजन शब्द बुलाने से बाकी कोई संकल्प नहीं रहता और जीव एक आत्मा होकर परमात्मा से मेल खाकर ज्योति स्वरूप जो अपना आप है, उसकी पहचान कर, रौशन हो जाता है। यह होती है सजनों सर्वोत्तम आत्मविजय, जिसके परिणामस्वरूप इंसान नकारात्मक अथवा ध्वंसात्मक स्थितियों से बच, पापकर्मों में लिप्तता के प्रहार से बच पाता है और उसकी जीवन की दिशा सदैव सकारात्मक और रचनात्मक बनी रहती है, जिसके फलस्वरूप वह परोपकारी नाम कहाता है।

याद रखो सजनो ऐसा आत्मविजयी बनने हेतु मन में आत्मोद्धार की प्रबल इच्छा का होना अनिवार्य है। जब तक मन में आत्मकल्याण करने का तीव्र भाव उदय नहीं होगा तब तक न तो इस दिशा में चिन्तन यानि सोच-विचार व मनन कर पाओगे और न ही आत्मविजय की ओर प्रवृत्त हो पाओगे। सजनों यह अपने आप में जीवन व्यर्थ गँवाने की बात होगी। इसके विपरीत आत्मकल्याण की इच्छा जाग्रत होने पर जब नाना प्रकार की कामनाओं व उसके कारण हर पल-हर क्षण मन में उठने वाले संकल्प-विकल्पों व प्रलोभनों का प्रतिरोध कर, बुराईयों से बचने का भरसक प्रयत्न करोगे तो पाप कर्मों में लिप्त होने की सम्भावना क्षीण होती जाएगी। इस प्रकार क्षण-प्रतिक्षण इस प्रयत्न की पुष्टि के साथ-साथ प्रत्येक पल एक महान विजय हासिल करोगे और एक दिन आत्मविजय के अभियान में सफल हो, जन्म की बाज़ी जीत लोगे। याद रखो सजनों एक बार यह विजय हासिल करने के बाद फिर दोबारा आवागमन के चक्कर में फँस, जन्म-मरण की पीड़ा नहीं भुगतनी पड़ती। इस जीत के प्रति उत्साहित करते हुए ही सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में कहा गया है:-

अपनी किस्मत जितनी जे, हिम्मत इंसानों हारो न, अपनी किस्मत जितनी जे।

हनुमान जी दे वचनां दी पालना करो, दिलबर नूं दिलों विसारो न।।

दिलबर नूं दिलों विसारो न, अपनी किस्मत जितनी जे।

हिम्मत इंसानों हारो न, अपनी किस्मत जितनी जे।।

इक वारी बाज़ी जित लई अपनी, फिर जित सदा ही तुम्हारी है।

फिर जित सदा ही तुम्हारी है, फिर जित सदा ही तुम्हारी है।।

क्या दुनियां क्या नगर निवासी, क्या कर सके मौत विचारी है।

क्या कर सके मौत विचारी है, क्या कर सके मौत विचारी है।।

इस संदर्भ में सजनों यदि हम हकीकत में आत्मविजयी होना चाहते हैं तो हमें मानना होगा कि मनुष्य अपनी किस्मत बनाने व बिगाड़ने वाला ख़ुद है यानि अपने भले-बुरे का स्वामी आप है दूसरा कोई भी नहीं। आशय यह है कि मायावी पदार्थों के सम्पर्क में आने पर, उसके मन में उठने वाले भाव ही, उसके अच्छे/बुरे आचरण का मूल व भाग्य निर्माता होते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि भाव ही भावना में, भावना ही संकल्प यानि
निश्‍चित मत/विचार में, निश्‍चित मत/विचार ही करनी में, करनी ही प्रकृति यानि स्वभाव में, प्रकृति यानि स्वभाव ही चरित्र में और चरित्र ही उसकी किस्मत/प्रारब्ध में रूपांतरित होता है। भाव के रूप-स्वरूप के आधार पर ही मनुष्य चरित्रवान या दुश्‍चरित्रबनता है।

इस संदर्भ में यदि मानव का भाव, विशुद्ध व सात्विक होता है तो उसका ख्याल व ध्यान निरन्तर आत्मा की चेतनाशक्ति के सम्पर्क में बना रहता है। फलत: उसके मन का आशय यानि नीयत, नेक व स्पष्ट बनी रहती है व उसके विचार उच्च व उदार होते हैं। उसका संकल्प स्वच्छ व दृष्टिकोण सकारात्मक बना रहता है तथा ह्मदय संतोष व धैर्य जैसे महान सद्गुणों से भरपूर रहता है। तभी तो ऐसे मानव की बुद्धि उच्च, स्वतन्त्र, प्रकाशित व स्थिर हो जाती है और धीरे-धीरे वह समबुद्धि जगत के पदार्थों की आकर्षण शक्ति से कदाचित् विचलित नहीं होता और सुख-दु:ख, रोग-सोग, खुशी-गमी, मान-अपमान, अमीरी-गरीबी आदि में समभाव से रहते हुए अपने यथार्थ स्वरूप में स्थित रहता है। जानो यह अपने आप में ख़्याल ध्यान वल, ध्यान प्रकाश वल रखते हुए, सच्चाई-धर्म पर एकरसता से सुदृढ़ बने रह, यथार्थता अनुरूप जीवन जीने की बात होती है। यहाँ यथार्थता अनुरूप जीवन जीने से अभिप्राय, शरीर के स्वामित्व यानि अहं भाव से मुक्त हो सदा संकल्प रहित अवस्था में स्थिर बने रहने से है। जान लो इस संकल्प रहित अवस्था में स्थिर बने रहने वाला भाव विकार के चक्रव्यूह से स्वतंत्र हो  रूप, रंग, रेखा से आजाद हो जाता है यानि अपनी किस्मत आप जीत आवागमन से मुक्त हो सकता है। यह होती है सजनों पूर्ण आत्मविजय जिसके विषय में सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में कहा गया है:-

किस्मत मुकी किस्मत झुकी, किस्मत दा विस्तार गया, किस्मत दा विस्तार गया।

ओ उदर विच न आवे किस्मत लिखी न जावे, किस्मत दा भान्डा फोड़ दिया।

किस्मत दा भान्डा फोड़ दिया,  किस्मत दा भान्डा फोड़ दिया।।

सजनों यह जानने के पश्चात् क्या आप भी किस्मत का भान्डा फोड़ जगत से आजाद हो पूर्ण आत्मविजय प्राप्त करना चाहते हो?

हाँ जी।

तो याद रखो विषयों में कोई सुख निहित नहीं है अपितु विषय ही हमारे मन में नाना प्रकार की कामनाओं व संकल्पों-विकल्पों को उपजाने का व तदुपरांत भोग इच्छा के कारण जन्म-जन्मांतरों तक इस मृतलोक में फँसे रह, दु:खों को प्राप्त होने का व संसार सागर में गोते खाने का कारण हैं। अत: विषयों के प्रति आसक्ति त्याग कर, विषयों की प्राप्ति के लिए तरह-तरह से छल-कपट, झूठ-चोरी-ठगियाँ, रिश्वतखोरियाँ, प्रतिद्वन्द्व, प्रतिस्पर्धा आदि करना छोड़ दो। इस तरह दुराचरण और दुश्चिंतन के प्रभावी होने के लिए उपयुक्त कुअवसर आने पर भी मन और भावनाओं को वश में रखते हुए, मन-वचन-कर्म से उसमें प्रवृत्त न होवो। तात्पर्य यह है कि जो विषय-विकार, जगत के माध्यम से आपके मन के अन्दर घर कर गए हैं और वासनाओं के रूप में बार-बार उपज कर आपको परेशान कर रहे हैं, उनके साथ युद्ध करो और सजन श्री शहनशाह हनुमान जी की युक्ति अनुसार सम, सन्तोष, धैर्य, सच्चाई, धर्म, अपनी समस्त पाँचों शक्तियाँ लगाकर, उन्हें मार मुकाओ। मत भूलो किसी दुर्भाव विशेष को आवेशित करने वाली स्थिति ही आत्मविजय की कसौटी है, अत: किसी भी परिस्थिति को अपने विवेक पर हावी मत होने दो अन्यथा आप की प्रगति रुक जाएगी और आप अपना घर कभी भी सतयुग नहीं बना पाओगे।

इस सन्दर्भ में यह भी जानो कि कुसंग और कुमति विजय पथ की बड़ी बाधाएँ हैं। अत: संकल्प कुसंगी और बुरे दोस्तो से सदा दूर रहो और समभाव-समदृष्टि की युक्ति अनुसार, ब्राहृ भाव अपना कर भावों को निरंतर विशुद्ध रखने की कला सीखो और आत्मविजयी होने की तरफ अपना कदम बढ़ाओ। घबराओ नहीं अपितु आत्मनिरीक्षण द्वारा अपने दोषों को  पहचान कर, खुद पर आत्मनियन्त्रण रखते हुए उन पर विजय पाने का युक्तिसंगत भरसक प्रयास करो। याद रखो जो इस तरह कदम-कदम पर अपने आप को यानि अपने स्वभावों को विचार से पकड़ते हुए, उन्हे जीत लेता है वही सच्चा विजेता कहलाता है। अत: आपको-हमको भी नित्य अपने अंतर में अपने आपको जीतने का प्रयास तब तक करते रहना है जब तक पूर्ण विजय यानि दुर्लभ अमर पद प्राप्त नहीं हो जाता।

सबकी जानकारी हेतु आत्मविजय के विषय में इससे आगे बातचीत अगले सप्ताह होगी।