प्रकाश

साडा है सजन राम, राम है कुल जहान

अर्थात् ईश्वर हमारा मित्र/प्रियतम सर्वव्यापक है, उसी को जानो, मानो व वैसे ही गुण अपनाओ।

 

शब्द है गुरु, शरीर नहीं है,

अर्थात् ज्ञानी को नहीं ज्ञान को अपनाओ और निमित्त में नहीं नित्य में श्रद्धा बढ़ाओ।

 

इस पर सुदृढ़ता से डटे रह, इस अटल सत्य पर स्थिर बने रहो:-

3म् अमर है आत्मा, आत्मा में है परमात्मा

 

सजनों सतवस्तु का कुदरती ग्रन्थ शरीरधारी जीव को अपने वास्तविक ज्योति स्वरूप को जान-पहचान व उसी में स्थिरता से स्थित बने रह, अपने ओज व तेज प्रताप का नीतिसंगत प्रयोग करते हुए, इस जगत में ब्रह्ममय होकर, अशरीरी भाव से संकल्प रहित सत्य पथ पर बने रह, पुन: धर्म का झंडा बुलंद करने का आवाहन इस प्रकार दे रहा है:-

 

हे इन्सान ! अपने इस यथार्थ को सहर्ष स्वीकार कि "मैं" नश्वर शरीर नहीं वरन् "ओ3म अमर आत्मा" हूँ। जान कि ओ3म परब्रह्मवाचक शब्द है जिसको ग्रहण करने से इन्सान के हृदय में इस जगत का रचनाकार ब्रह्म स्वत: प्रकाशित हो जाता है और शब्द ब्रह्म विचार प्राप्त रहने पर वह सहजता से अपने ज्योति स्वरूप को पहचान लेता है। ऐसा सकारात्मक घटित होते ही इन्सान ब्रह्म भाव अपना जगत में अधम अवस्था को प्राप्त हुए अज्ञानियों को आत्मबोध करवाने हेतु ब्रह्म के ही गुण/धर्म यानि ब्रह्म शब्द विचारों का निष्काम भाव से प्रसार करने में प्रवृत्त हो जाता है और परोपकारी नाम कहाता है। सजनों जो अपना असलियत स्वरूप ब्रह्म जान जाता है जानो उस प्रतापी इन्सान की चेत पर परमेश्वर द्वारा रचित यह जगतीय माया का भी आकर्षण किसी प्रकार से प्रभाव डाल उसके ख़्याल को अपने साथ नहीं जोड़ सकता। इस प्रकार उस विवेकशील ब्रह्म भाव पर स्थित इंसान को शाररिक अहं नहीं सताता। परिणामत: उस परमार्थी के लिए सुकर्मों के रास्ते पर निषंग बने रह निर्विकारतापूर्ण जीवन जीते हुए श्रेष्ठ परम पद को प्राप्त करना सहज हो जाता है।

 

सजनों यह जानने के पश्चात् हम भ्रमित बुद्धि इन्सानों के लिए भी बनता है कि पुन: सुमति में आने हेतु, हम "ओ3म अमर है आत्मा, आत्मा में है परमात्मा" इस सत्य को धारण कर एक विवेकशील बुद्धिमान इन्सान की तरह भ्रमरहित यथार्थतापूर्ण जीवन जीना आरम्भ करें। याद रखो ऐसा सुनिश्चित करने पर ही हमारी चित्त वृत्तियाँ निर्मल होगी और मन:शांति के प्रभाव से हमारा ख़्याल ध्यान स्थिरता से परमात्मा संग जुड़ा रह स्वच्छता को प्राप्त रहेगा। इसी तरह हमारी जिह्वा स्वतन्त्र, संकल्प स्वच्छ व दृष्टि कंचन बनी रहेगी और हमारे कर्मों में सकारात्मकता व निष्कामता पनपेगी जो अपने आप में कर्म गति से बचे रहने का सूचक होगा। सजनों हम सब प्रकाशित बुद्धि हो ऐसा पुरूषार्थ दिखाने में व एक श्रेष्ठ इंसान की तरह इस जगत में विचरने के योग्य हो जाए इस हेतु आओ अब भरपूर उत्साह व उंमग में आकर शांत मन से ब्रह्म भाव को धारण करने हेतु अत्यन्त समझदारी के साथ अभ्यास करते हैं:-

मानो मैं ब्रह्म हूँ

और परब्रह्मवाचक शब्द ओ3म मेरी अमर आत्मा है।

इसलिए स्वीकारो कि मेरी अमर आत्मा में परमात्मा समाहित है।

अब इस सत्य का अनुभव करते हुए

मानो कि यही असलियत ब्रह्म स्वरूप प्रकाश ही

मेरा अपना प्रकाश है।

अब ख़्याल द्वारा एकरस मूलमंत्र आद् अक्षर का जाप आरम्भ कर दो।

और अनुभव करो कि इस क्रिया द्वारा ज्यों-ज्यों आत्मप्रकाश से आपका हृदय प्रकाशित हो रहा है

वैसे-वैसे अंधकारमय वातावरण छँट रहा है और सत्य प्रकट हो रहा है।

अब अत्यन्त समझदारी से जो लुप्त हो रहा है उसे छोड़ते जाओ और

जो प्रकट हो रहा है उसे धारते जाओ।

अब यह आत्मनिरीक्षण करते हुए अक्षर को एक रस चलाने में प्रयासरत रहो

कि कहीं कोई सांसारिक फुरना, अक्षर के एकरस चलने में विघ्न तो नहीं डाल रहा।

अगर कुछ ऐसा प्रतीत हो रहा हो तो अक्षर चलाने की क्रिया पर ध्यान का पहरा रखो

और अफुरता से अक्षर चलाना सुनिश्चित कर अपने हृदय को परिपूर्णता प्रकाशित कर

व अपन सुरत को शब्द संग जोड़े रख आत्मबोध करने की चेष्टा करो

याद रखो इतनी सी सावधानी व मेहनत से जो सत्य रूपी अमृतत्व प्राप्त होता है

उसके सेवन से ही इन्सान के मन में परिपूर्ण तृप्ति का एहसास रहता है और

ए विध् जब वह शांत हो जाता है तो इन्सान के लिए आत्मभाव में बने रह

इस जगत में रहते हुए भी इस जगत से निर्लेप अपने वास्तविक पर ब्रह्म स्वरूप में यथा बने रहना सहज हो जाता है और वह जगत विजयी एक रूप हो कह उठता है

हम ब्रह्म प्रकाश

हम

हम ब्रह्म प्रकाश

हां

हम हर अन्दर निवास

हम

हम हर अन्दर निवास

हां

हम हर अन्दर प्रवेश

हम

हम हर अन्दर प्रवेश

हां

हम हर अन्दर विशेष

हम

हम हर अन्दर विशेष

हां

हम ब्रह्म हम

हम ब्रह्म हां

यह है अपने घर परमधाम पहुँच विश्राम को पाना।

 

जानो इस क्रिया द्वारा आत्मप्रकाश के तेज से सब विकार ध्वस्त हो जाते हैं और इस प्रकार इन्सान के लिए एक तो विकारों पर विजय पा आत्मियता का चलन अपनाना सहज हो जाता है, दूसरा पूर्व जन्मों के संस्कारों के प्रभाव से भी मुक्ति मिलती है। इस तरह निश्चिन्तता व सर्वसम्पन्नता के भाव से प्रकाशित बुद्धि इन्सान चेतन अवस्था में बने रह व सब कुछ प्रभु के निमित्त समर्पित भाव से करते हुए अपना जीवन सफल बना लेता है और परम पवित्र चरित्र वाला कहलाता है।

 

अत: हमें समझना है कि जैसे सजन श्री शहनशाह हनुमान जी की युक्ति अपना सच्चेपातशाह ने अपने हृदय से अज्ञान के बादल को हटा अपने निर्विकारी स्वरूप  को प्रकट कर लिया और फिर यथा उसी स्वरूप में बने रह हम कलुकालवासियों को कुरस्ता छोड़ रास्ते पर लाने के लिए सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ की रचना कर दी वैसे ही हमें भी सर्व महान बन एक रूप हो जाना है।