हुक्म की महानता व महत्ता-3

साडा है सजन राम, राम है कुल जहान

अर्थात् ईश्वर हमारा मित्र/प्रियतम सर्वव्यापक है, उसी को जानो, मानो व वैसे ही गुण अपनाओ।

 

शब्द है गुरु, शरीर नहीं है,

अर्थात् ज्ञानी को नहीं ज्ञान को अपनाओ और निमित्त में नहीं नित्य में श्रद्धा बढ़ाओ।

 

इस पर सुदृढ़ता से डटे रह, इस अटल सत्य पर स्थिर बने रहो:-

ओ3म् अमर है आत्मा, आत्मा में है परमात्मा

 

गत सप्ताह सजनों हमने जाना कि हुकम का व्यावहारिक रूप क्या है। आओ आज सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ से उद्धृत कीर्तन "हुकम बड़ा बलवान" के माध्यम से जानें कि हुकम के इस व्यावहारिक रूप को आत्मसात् करने वालों ने कैसे अपने जीवन का वास्तविक प्रयोजन सहजता से समयबद्ध सिद्ध कर, परमेश्वर के हुकम की महिमा गाते हुए, अंत अमरकीर्ति को प्राप्त किया:-

हुकम की महिमा और हुकम पर चलने वालों की जीत

सजन दयालु श्री रामचन्द्र जी के मुख के शब्द

 

हुकम बड़ा बलवान सब कुछ हुकम करदा, हुकम बड़ा महान, सब कुछ हुकम करदा।।

हाँ हाँ सब कुछ हुकम करदा, वाह वाह सब कुछ हुकम करदा।

हुकम बड़ा बलवान सब कुछ हुकम करदा, हुकम बड़ा महान, सब कुछ हुकम करदा।।

अर्थात् परमेश्वर का हुकम यानि विधि का विधान बहुत बलवान व सर्वमहान है। आदि से लेकर अंत तक, इस सृष्टि में सब कुछ प्रभु के हुकम अनुसार ही होता है। अत: इस सत्य को मानो और जन्म-मरण, रोग-सोग, ख़ुशी-गमी, मान-अपमान, अमीरी-गरीबी, हानि-लाभ, संयोग-वियोग, दु:ख-सुख, आदि अवस्थाओं में हर्ष-शोक न करते हुए, समचित्त बने रहो। जानो इस प्रकार परमेश्वर के हुकम या आज्ञा का धर्मशास्त्र आदि में बतलाई हुई विधि के अनुसार पालन करने पर ही मानव शक्तिशाली होकर इस जगत में निर्लिप्तता से विचरने में समर्थवान हो सकता है व उचित ढंग से जगत के कल्याण के निमित्त सब कुछ सहजता से कर सकता है। इस तथ्य के दृष्टिगत सजनों कुदरती वेद शास्त्रों में वर्णित परमेश्वर के हुकम रूपी शब्द विचारों को धारण कर वर्त-वर्ताव में लाना सुनिश्चित करो और अपने जीवन में जो कुछ भी करो तद्नुसार ही करो। जानो ऐसा आचरण अपनाना, अपने अंत:करण को विशुद्ध रखते हुए, निष्पाप जीवन जीते हुए, परमात्म स्वरूप हो जाने की बात है।

हुकम सुजाने हुकम पछाने, हुक्म बड़ा प्रधान, सब कुछ हुकम करदा।

ओ3म हुकम बड़ा प्रधान ए, हुकम बड़ा प्रधान, सब कुछ हुकम करदा।।

सजनों परमेश्वर कहते हैं कि जो भी उनके हुकम अर्थात् शब्द विचारों के भावार्थों की परख करने की योग्यता रखता है केवल वह समझदार यानि सुजान ही हुकम रूपी उन शब्द विचारों को सर्वोच्च मानते हुए, ईश्वरमय होकर इस जगत में निषंग विचरता है। अत: हे परमात्म स्वरूप इंसानों ! शास्त्रों में वर्णित हमारे आदेशों को ही श्रेष्ठ मानो व केवल उन्हीं को धारण कर, इस जगत में सब कुछ मेरे हुकम अनुसार ही करो। आगे सजनों हुकम विरुद्ध चलने वाले कलुकालवासियों को पुन: सही मार्ग पर लाने हेतु वह कहते हैं कि यह बात तो सर्व विदित है कि सृष्टि के आरम्भ से लेकर आज तक जिस मानव ने ही अपने जीवन काल में ईश्वर/परमेश्वर के प्रति अपने वचन पालना का कौल (कथन) एक आज्ञाकारी सपुत्र की तरह, समझदारी से सहर्ष निभाने का पराक्रम दिखाया केवल वह ही श्रेष्ठ युग पुरुष कहलाया। इस संदर्भ में कुछ ऐसे ही बलवान सजनों का उदाहरण देते हुए वह हमें परमेश्वर के हुकम को मुख्य मानते हुए, उन्हीं की भांति निष्कलंक जीवन जीने के लिए कुछ इस प्रकार प्रेरित कर रहे हैं:-

1                                   ध्रुव जी जंगलां विच जा के हुकम लवे पछान रामा हुकम लवे पछान।

दर्शन देखे श्री राम जी दा, अपना आप लवे पछान।।

सब कुछ हुकम करदा, हां हां सब कुछ हुकम करदा।

वाह वाह सब कुछ हुकम करदा, अपना आप लवे पछान सब कुछ हुकम करदा।।

हुकम मन्ने ध्रुवराज, दर्शन दित्ता है महाराज सब कुछ हुकम करदा।

हां हां सब कुछ हुकम करदा, वाह वाह सब कुछ हुकम करदा ।

दर्शन दित्ता है महाराज सब कुछ हुकम करदा।।

अर्थात् जब धुव्र जी ने जंगलों में जाकर, प्रभु उपासना के दौरान, अपने जीवन काल में प्रभु के हुकम अनुसार क्या-क्या करना है और कैसे करना है, इस रमज़ को पहचान, वैसा ही करना सुनिश्चित कर लिया तो परमेश्वर ने उसके इस दृढ़ संकल्प से प्रसन्न होकर, उसे अपना दर्शन दे अर्थात् साक्षात्कार करा तत्त्वज्ञानी बना दिया ताकि वह हुकम पर अटल बने रह सब कुछ उचित ढंग से करने में समर्थ हो जाए और जगत में अपना नाम रोशन कर ले।

 

2                            

हिरण्यकश्यप प्रहलाद नूं जपन ना देवे राम नाम, रामा जपन ना देवे राम नाम।

मनयां हुकम प्रहलाद ने, थम्ब फोड़ निकले श्री राम सब कुछ हुकम करदा।।

हां हां सब कुछ हुकम करदा, वाह वाह सब कुछ हुकम करदा ।

थम्ब फोड़ निकले श्री राम सब कुछ हुकम करदा।।

हुकम मन्ने प्रहलाद राज, हिरण्यकश्यप नूं मार।

प्रहलाद नू दित्ता राज सब कुछ हुकम करदा।।

हां हां सब कुछ हुकम करदा, वाह वाह सब कुछ हुकम करदा ।

प्रहलाद नू दित्ता राज सब कुछ हुकम करदा।।

अर्थात् अपनी पूजा-मानता कराने वाला अहंकारी राजा हिरण्यकश्यप अपने ही बेटे को राम-नाम जपने से रोकता रहा। पर फिर भी राम भक्त प्रहलाद हुकम अनुसार उनके प्रति भक्ति भाव में रत रहे। इस अवज्ञा पर जब हिरण्यकश्यप ने भक्त प्रहलाद को दंडित करने का स्वांग रचा तो उसकी रक्षार्थ थम्ब फोड़ श्री भगवान नरसिंह रूप धार प्रकट हो गए और हिरण्यकश्यप का वध कर हर हाल में हुकम पर स्थिर रहने वाले अपने भक्त को राजपाट सौंप दिया।

 

3

विश्वामित्र हुकम नूं धार के, जंगल तपस्या करन नूं जावे, रामा तपस्या करन नूं जावे।

अस्त्र शस्त्र नूं जित के ब्रह्म रूप हो जावे, सब कुछ हुकम करदा।।

हां हां सब कुछ हुकम करदा, वाह वाह सब कुछ हुकम करदा ।

ब्रह्म रूप हो जावे, सब कुछ हुकम करदा।।

हुकम मनयां विश्वामित्र राज, जित लवे ओ बाजी सोहणा पावे साज, सब कुछ हुकम करदा।

हां हां सब कुछ हुकम करदा, वाह वाह सब कुछ हुकम करदा ।।

जित लवे ओ बाजी सोहणा पावे साज, सब कुछ हुकम करदा।

हां हां सब कुछ हुकम करदा, वाह वाह सब कुछ हुकम करदा ।।

अर्थात् जब विश्वामित्र जी ने हुकम अनुसार परमेश्वर के विचारों/निर्देशों को धारण कर, जंगलों में तपस्या करने जाना स्वीकार लिया तो हुकम की पालना करने के परिणामस्वरूप वह अस्त्र-शस्त्र को जीत कर ब्रह्मरूप हो गए। इस तरह हुकम की मननकारी से विश्वामित्र जी ने अपने जन्म की बाज़ी जीत ली और सुन्दर व अलौकिक स्वाभाविक साज धारण कर लोक-परलोक में यश प्राप्ति के अधिकारी बनें।

 

हुकम नाल करे जनक प्रतिज्ञा, हुकम स्वयम्बर दित्ता है रचा, रामा स्वयम्बर दित्ता है रचा।

हुकम धनुष नूं तोडि़या, सीता दा राम नाल कीता विवाह, सब कुछ हुकम करदा।

हां हां सब कुछ हुकम करदा, वाह वाह सब कुछ हुकम करदा।

सीता दा राम नाल कीता विवाह, सब कुछ हुकम करदा।।

हुकम पाया सीता ने साज, राम ने असली दित्ता ए राज सब कुछ हुकम करदा।

हां हां सब कुछ हुकम करदा, वाह वाह सब कुछ हुकम करदा ।

राम ने दित्ता ए असली राज सब कुछ हुकम करदा।।

यानि परमेश्वर के हुकम अनुसार राजा जनक ने भी अपनी बेटी सीता के विवाह हेतु, शिव धनुष को तोड़ने वाले के साथ स्वयम्बर रचाने की प्रतिज्ञा की और अपनी सौगंध पर खरे उतरने के लिए स्वयम्बर रचा दिया। उधर से जब श्री रामचन्द्र जी ने उस समय के खेल को समझते हुए, परमेश्वर के हुकम अनुसार मर्यादित ढंग से आगे बढ़ धनुष को तोड़ दिया तो राजा जनक ने सीता का विवाह उनके साथ कर दिया। इसके पश्चात् जब सीता ने श्री रामचन्द्र जी के आचार, विचार व व्यवहार को अपने स्वभाव के अंतर्गत कर, ख़ुद को ठीक वैसा ही ढाल लिया तो रामचन्द्र जी ने प्रसन्न होकर हुकम पर चलने वाली सीता को असली राज प्रदान कर दिया।              

 

5             

शिवरी कष्ट उठाये अति भारी, गुरू जी दे वचन कीते प्रवान रामा वचन कीते प्रवान।

चौदहां साल हुकम ते राहवे, प्रेम दे बेर खाधे श्री राम, सब कुछ हुकम करदा।।

हां हां सब कुछ हुकम करदा, वाह वाह सब कुछ हुकम करदा।

प्रेम दे बेर खाधे श्री राम, सब कुछ हुकम करदा।।

शिवरी कीता राम नूं याद, राम जी ने पाया शिवरी नूं साज।

हां हां सब कुछ हुकम करदा, वाह वाह सब कुछ हुकम करदा।

राम जी ने पाया शिवरी नूं साज सब कुछ हुकम करदा।।

जैसा कि विदित ही है कि शिवरी ने अपने जीवनकाल में बहुत कष्ट उठाए और अपने गुरु जी के वचन प्रवान कर चौदहां साल अविचलित उन कष्टों को प्रभु का हुकम मान, समर्पित भाव से स्वीकारा तथा अपने ख़्याल को प्रभु के प्रति ध्यान स्थिर रखा। इसी निष्काम तपस्या से प्रसन्न होकर श्री रामचन्द्र जी वनवास के दौरान उसकी कुटिया में गए और उसके प्रेम भरे जूठे बेर प्रसन्नता से खाए। फिर जब शिवरी ने श्री रामचन्द्र जी की छवि को अपनी स्मृति में ले लिया तो उन्होंने हुकम पर स्थिर बनी रहने वाली उस शिवरी को परमात्म स्वरूप से अलंकृत कर उसे महान पद प्रदान कर दिया।

 

6

राम नाम रटदियां हुकम मनयां हनुमान रामा हुकम मनयां हनुमान।

भक्ति शक्ति नूं धारण कर के आ मिले श्री राम, सब कुछ हुकम करदा।

हां हां सब कुछ हुकम करदा, वाह वाह सब कुछ हुकम करदा।

आ मिले श्री राम, सब कुछ हुकम करदा।।

हुकम मनया हनुमान राज सांवले चरणां दा दित्ता ने राज, सब कुछ हुकम करदा।

हां हां सब कुछ हुकम करदा, वाह वाह सब कुछ हुकम करदा।

सांवले चरणां दा दित्ता ने राज, सब कुछ हुकम करदा।।

अर्थात् अपने प्रभु का हुकम मान जब हनुमान जी ने राम-नाम रटते हुए भक्ति-शक्ति को धारण कर लिया तो श्री रामचन्द्र जी से उनका मिलन अर्थात् संयोग हुआ और उन्होने अपनी अपार कृपा दर्शाते हुए उन्हें अपने सांवले चरणों का राज दे दिया। तभी तो वह अमर शहनशाह आज भी सबसे श्रेष्ठ, विद्वान, गुणवान, बलवान, धनवान, बुद्धिमान व ज्ञानवान माने जाते हैं।

 

7

बाली सुग्रीव नूं मारया, हुकम भटकावे कुल जहान रामा भटकावे कुल जहान।

हुकम राम मिलांवदा, बाली मार सुग्रीव नूं राज देवन श्री राम, सब कुछ हुकम करदा।

हां हां सब कुछ हुकम करदा, वाह वाह सब कुछ हुकम करदा।

बाली मार सुग्रीव नूं राज देवन श्री राम, सब कुछ हुकम करदा।।

हुकम मनया सुग्रीव राज, किष्किन्धा दा दित्ता हिने राज, सब कुछ हुकम करदा।

हां हां सब कुछ हुकम करदा, वाह वाह सब कुछ हुकम करदा।

यानि जब अहंकारी बाली ने किष्किन्धा का पूरा साम्राज्य हड़पने के लिए सुग्रीव को मार भगाया तो उस होनी को प्रभु का हुकम मान, सुग्रीव कुल जहान में भटकता रहा पर कदाचित् निराश नहीं हुआ। उसके इस प्रभु हुकम पालन पर अटल बने रहने के फलस्वरूप, कुदरत ने उसे श्री रामचन्द्र जी से मिला दिया और श्री रामचन्द्र जी ने बाली को मार किÏष्कधा का राज सुग्रीव को पुन: सौंप दिया।

 

8

रावण अधर्मी दा संग छोड़ के, विभीषण हुकम लवे पछाण, रामा हुकम लवे पछाण।

सांवले चरणां ते करे नमस्कार, सोने दी लंका बक्षन श्री राम, सब कुछ हुकम करदा।।

हां हां सब कुछ हुकम करदा, वाह वाह सब कुछ हुकम करदा।

सोने दी लंका बक्षन श्री राम, सब कुछ हुकम करदा।।

हुकम मन्ने विभीषण राज, लंका दा दित्ता ने राज, सब कुछ हुकम करदा।

हां हां सब कुछ हुकम करदा, वाह वाह सब कुछ हुकम करदा।

लंका दा दित्ता ने राज, सब कुछ हुकम करदा।।

अर्थात् राम-रावण के युद्ध के समय, जब विभीषण परमेश्वर का हुकम पहचान गया यानि यह भाँप गया कि उन परिस्थितियों में उसके लिए क्या करना यथोचित है, तो वह रावण अधर्मी का संग छोड़ कर श्री रामचन्द्र जी की चरण-शरण में सच्चे दिल से नतमस्तक हो गया। परिणामत: श्री राम जी ने सोने की लंका पर विजय प्राप्त करने के उपरांत, लोक-लाज की परवाह किए बगैर, हर हाल में परमेश्वर के हुकम पर स्थिर बने रहने वाले विभीषण को, सहर्ष लंका का राज बख़्श दिया।

 

9

सुदामा चावलां दी पोटली बांध के हुकम से मित्र मिलया कृष्ण मुरार, रामा मित्र मिलया कृष्ण मुरार।

कृष्ण प्रेम नाल चरणां नूं धोंवदा, टोरे चार पदार्थां नाल सब कुछ हुकम करदा।

हां हां सब कुछ हुकम करदा, वाह वाह सब कुछ हुकम करदा।

टोरे चार पदार्थां नाल सब कुछ हुकम करदा।।

हुकम मनया सुदामे राज, पिंघूडि़यां दे विच झूटे खावे, असली पावे साज।

असली पावे साज सब कुछ हुकम करदा।

हां हां सब कुछ हुकम करदा, वाह वाह सब कुछ हुकम करदा।

असली पाया साज सब कुछ हुकम करदा।।

यानि जब सुदामा अपनी दीन-हीन अवस्था को दृष्टिगत रखते हुए, चावलों की पोटली बाँध कर, हुकम अनुसार अपने मित्र कृष्ण मुरार के दर पर पहुँचा तो सुदामा के आने के भाव व मित्रता की मर्यादा को दृष्टिगत रखते हुए भगवान श्री कृष्ण ने सिंघासन छोड़ उसे द्वार पर ख़ुद ही जा मिलना उचित समझा। तत्पश्चात् अपने मित्र के प्रेमवश, कृष्ण जी ने स्वयं सुदामा के चरणों को धोया और उसे हुक्मानुसार चार पदार्थ देकर वापिस भेजने का प्रबन्ध किया। इस प्रकार जीवन की हर परिस्थिति में हुक्म पर स्थिर बने रहने वाले सुदामा को कृष्ण जी ने आत्मबोध करा दिया। इस पर सुदामा ने प्रसन्न होकर पंघूड़ों में झूटे खाए और अलौकिक आनन्द का अनुभव करते हुए अपने वास्तविक स्थान को प्राप्त कर लिया।

 

10

हुकम राम जी आप ही मनया, रावण दा कीता ने संहार, रामा रावण दा कीता ने संहार।

सुखी वसे सारी नगरी त्रिलोकी दा पाया सिरताज सब कुछ हुकम करदा।

हां हां सब कुछ हुकम करदा, वाह वाह सब कुछ हुकम करदा।

त्रिलोकी दा पाया सिरताज सब कुछ हुकम करदा।।

इसी प्रकार परमात्म स्वरूप श्री रामचन्द्र जी ने ख़ुद भी शब्द ब्रह्म विचारों अनुसार हुकम को मान न्याय की मर्यादा को दृष्टिगत रखते हुए सारे जगत के सुख के निमित्त रावण अधर्मी का संहार किया और इस प्रकार त्रिलोकी का सिरताज पा त्रिलोकीनाथ कहलाए।

 

अंत में सजनों युग-युगान्तरों से, शब्द ब्रह्म विचार के रूप में, कुदरती वेद-शास्त्रों में विदित, परब्रह्म परमेश्वर के हुकम को पहचान कर, उस हुकम पर स्थिरता से बने रहने वालों को परमपद जैसी सर्वोत्तम उपलब्धि प्राप्त होते देख श्री रामचन्द्र जी कलुकालवासियों को वैसा ही निष्कपट व विचारयुक्त जीवन जीने के प्रति जागरूक करते हुए कहते हैं कि:-

हुकमे अन्दर हुकमे बाहर, हुकम नाल करे प्यार रामा हुकम नाल करे प्यार।

हुकमे मौजां माणियां, हुकम ही चले नाल, सब कुछ हुकम करदा।।

हाँ हाँ सब कुछ हुकम करदा, वाह वाह सब कुछ हुकम करदा,

हुकम ही चले नाल, सब कुछ हुकम करदा।

हुकम ते जेहड़े चल बसे, ओ बाज़ी लवण जित्त, रामा बाजी लवण ओ जीत।

ओ हार कदे नहीं खांवदे, उन्हां दी जित जित ही जित, सब कुछ हुकम करदा।

यानि अंत: व बाह्य जगत में विचरते समय जो प्रभु के हुकम रूप शब्द ब्रह्म विचारों को धारण कर स्नेहपूर्वक अपने मन-वचन-कर्म द्वारा यथा प्रदर्शित करता है केवल वही मानव ही इस जगत में मौजें मानता है। इस प्रकार परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करते हुए अंत वह अपने सच्चे घर पहुँच विश्राम को पाता है। इस संदर्भ में याद रखो कि जिन्होंने भी जीवन की प्रत्येक अच्छी-बुरी परिस्थिति में समरस रह, प्रभु हुकम पालना पर सुदृढ़ता से बने रहने का पुरुषार्थ दिखाया, केवल उन्होंने ही अपने जन्म की बाज़ी जीती और इस प्रकार कभी भी जीवन में हार का सामना न करते हुए सदा हर क्षेत्र में विजय ही विजय प्राप्त की।

 

हुकमे सुणो ते हुकमे मन्नो, हुकम करो प्रवान, रामा हुकम करो प्रवान।

हुकम संग ही चलना, हुकम है श्री राम सब कुछ हुकम करदा।

हाँ हाँ सब कुछ हुकम करदा, वाह वाह सब कुछ हुकम करदा।

हुकम है श्री राम सब कुछ हुकम करदा।

अत: वह सबको इस मंगलकारी चलन अपनाने के प्रति प्रेरित करते हुए कहते हैं कि परमेश्वर के हुकम को ध्यान से सुनो तथा उनको यथा मान, प्रवानगी द्वारा अपने स्वभाव के अंतर्गत कर लो। इस प्रकार इस मिथ्या जगत में प्रभु के शास्त्र विदित वचनानुसार यथा चलते हुए हुकम की रमज़ पहचान लो अर्थात् आत्मबोध कर लो। ऐसा कर पाना सुनिश्चित करने के लिए वह कहते हैं:-

वाद विवाद किसे नाल न कीजे, जिह्वा राम नाम रस पीजे।

अर्थात् किसी के भी साथ वाद-विवाद अर्थात् तर्क वितर्क मत करो अपितु हर समय परमेश्वर के ही हुकम पर स्थिर बने रह उन्हीं के ही गुण गाओ और जीवन का आनन्द उठाओ।

ऊपरवर्णित विवेचना से सजनों स्पष्ट होता है कि जिन्होंने भी आत्मनिष्ठा से हुकम की पालना करी, प्रभु ने उन्हीं को पूर्ण बना कर उनका जीवन संवार दिया व अपने में मिला लिया। इस महत्ता के दृष्टिगत सजनों आप भी हुकम की पालना के प्रति कटिबद्ध यानि उद्यत हो जाओ और इस प्रकार जन्म से पूर्व जो परमात्मा को वचन दिया है, उस पर खरे उतर यश कीर्ति कमाओ।

आप सबकी जानकारी हेतु अगले सप्ताह हम इसी वचनबद्धता के विषय में बातचीत करेंगे।