आशा-तृष्णा

साडा है सजन राम, राम है कुल जहान

अर्थात् ईश्वर हमारा मित्र/प्रियतम सर्वव्यापक है, उसी को जानो, मानो व वैसे ही गुण अपनाओ।

 

शब्द है गुरु, शरीर नहीं है,

अर्थात् ज्ञानी को नहीं ज्ञान को अपनाओ और निमित्त में नहीं नित्य में श्रद्धा बढ़ाओ।

 

इस पर सुदृढ़ता से डटे रह, इस अटल सत्य पर स्थिर बने रहो:-

ओ3म् अमर है आत्मा, आत्मा में है परमात्मा

सजनों इस संसार में जितने प्राणी हैं, वे सब सुख पाना चाहते हैं। सुख मिल जाए इसलिए अधिक से अधिक  सुख की सामग्री इकट्ठी करते हैं। इस संदर्भ में जितना ही उन्हें बाहरी जगतीय वस्तुओं व इन्द्रिय विषयों में सुख दिखता है, उतना ही उनका लोभ-लालच बढ़ता है और जितना लालच बढ़ता है उतना ही मन का विक्षेप यानि इधर-उधर भटकन व भोग प्रवृत्ति बढ़ती है। इसलिए तो वर्तमान में उपलब्ध सुख-संसाधन उन्हें सुखी नहीं बना पाते तथा और... और..  और.. प्राप्ति की आकांक्षा यानि आशा-तृष्णा उन्हें और दु:खी बना देती है। परिणामत: अज्ञानी मानव क्षण-प्रतिक्षण यानि बात-बात में हर्ष-सोग का अनुभव कर अपने को कभी सुखी तो कभी दु:खी समझने लगते हैं और आजीवन इसी सुख-दु:ख की पीड़ा से त्रस्त हो, अंत अनमोल मानव जीवन पा कर भी मोक्ष प्राप्ति जैसी उत्तम उपलब्धि से वंचित रह जाते हैं। सजनों सजन श्री शहनशाह महाबीर जी के द्वारे पर होने के नाते व सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ के पास होते हमारे साथ ऐसा न हो इस हेतु आओ आज जाने कि यह आशा-तृष्णा क्या है और इससे छुटकारा पाने का अमोघ साधन क्या है?

 

आशा-तृष्णा

इस संदर्भ में सर्वप्रथम सूक्ष्मतया जानो कि जो चीज़ नहीं मिलती उसको प्राप्त करने की इच्छा का नाम आशा है और उन आशाओं को बढ़ाने वाली तृष्णा है।

 

अब आशा-तृष्णा को विस्तार से समझते हैं:-

आशा

अभीष्ट पदार्थ, पद, अधिकार आदि को प्राप्त करने की कामना को आशा कहा जाता है। यह आशा कभी मरती नहीं यानि एक आशा के न रहने पर या नष्ट हो जाने पर दूसरी का उदय होता है। आशा सदा वर्तमान में रखी जाती है तथा उसकी पूर्णता भविष्य में ही होती है। यह सफलता सम्भावित होती है। सफलता मिल भी सकती है और नहीं भी।

भोग इच्छा के कारण यह आशा सुखद प्रतीत होती है। जब किसी वस्तु के प्रति आशा जगती है तो लोभ का भाव अपने आप जाग्रत हो जाता है। इसके कारण आशा कभी सुखद और कभी दु:खद होती है। इस संदर्भ में मनचाहा फल प्राप्त होने पर जहाँ आशा सुखद लगती है वहीं अभिलाषित वस्तु के अप्राप्त होने पर दु:खद बन जाती है और निराशा को जन्म देती है।

आशा मनुष्य को कामान्ध बना देती है। धनवान, विद्वान, रूपवान आदि बनने की आशा मनुष्य को गलत राह पर ले जाती है व चरित्रहीन बना, अपराध करा दंड़ भोग का अधिकारी बना देती है। आशाधारी जीव की यह दशा होती है कि जब तक वह जीवित रहता है तब तक आशा के पीछे यातना भोगता रहता है। इसीलिए आशा का पर्यवसान यानि अंत दु:खमय होता है।

 

तृष्णा

नश्वर जगत के सन्निकर्ष/संपर्क में आने पर, सजनों इन्द्रियों के माध्यम से जो इंसान के मन में विषयों की प्राप्ति व भोग की इच्छा या प्रबल वासना उठती है उसे ही तृष्णा कहते हैं। तृष्णा अर्थात् कोई वस्तु पाने के लिए आकुल करने वाली इच्छा या विषय प्राप्ति की निरंतर बढ़ती कामना। कभी न मिटने के कारण इस तृष्णा को कभी न बुझने वाली प्यास कहते हैं। जानो विषय-भोग की यह प्यास यानि तृष्णा कभी भी मिटती नहीं अपितु आजीवन कुंडल मार कर बैठी हुई काली सर्पणी की तरह फुकारें मारती है और ज़हर खिलारती है। तभी तो सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में कहा गया है:-

तृष्णा पयी सतावे, सर्पनी जलावे, रही ए फुकारे मार।

 

यह तृष्णा काम तृष्णा होती है जो नाना प्रकार के विषयों की कामना करती है। भवतृष्णा होती है जो संसार की सत्ता बनाए रखती है। विभव तृष्णा होती है जो संसार के वैभव की इच्छा करती है। तृष्णा की धाराएँ प्राणियों को बड़ी प्रिय और मनोहर लगती हैं। सुख के फेर में पड़ प्राणी उसकी धारा में बहते हैं और यह भूल जाते हैं कि विषय सुख के भोग से इन्द्रियों की तृप्ति नहीं होती बल्कि इससे तो राग-क्लेश उत्पन्न होता है और उनमें जो रुकावटें आती हैं उनसे द्वेष-क्लेश उत्पन्न होता है।

 

कहने का आशय यह है कि ज्यों-ज्यों भोग का अभ्यास बढ़ता है, त्यों-त्यों तृष्णा भी बलवती होती जाती है। विषय कामना, विषयों के उपभोग से कभी शांत नहीं होती अपितु और भड़कती है। इस प्रकार विषय सुख के भोगों में रत व्यक्ति, शांति की प्राप्ति हेतु, उनके पीछे भागता है, परन्तु विषय सुख की कामना कभी शांत नहीं होती, अपितु और बढ़ती ही जाती है। तभी तो किसी ने ठीक ही कहा है:-

जैसे-जैसे मनुष्य की कामनाएँ पूर्ण होती जाती हैं, वैसे-वैसे तृष्णा की लपटें और धधकती जाती हैं। उसे किसी तरह भी बढ़ने से रोका नहीं जा सकता।

 

इसी तथ्य के दृष्टिगत सजनों सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में भी कहा गया है:-

तृष्णा दी सब को आग लगी है, नाम दा मींह बरसाये महाबीर जी आये।।

तृष्णा दा रोग है भारी महाबीर जी आप करेसन कारी।

इस तरह सजनों विषयों के भोग से इन्द्रियाँ दुर्बल हो जाती है। अंत में इन्द्रियों में विषय-भोग की क्षमता बिल्कुल नहीं रहती पर तृष्णा फिर भी सताती रहती है। तभी तो कहा गया है कि शरीर कमज़ोर हो गया, सिर के बाल सफेद हो गये, मुँह में दाँत नहीं रहे, आँख और कान जीर्ण हो गए, मनुष्य बूढ़ा हो गया और छड़ी के सहारे चलने लगा फिर भी आशा-तृष्णा पिंड नही छोड़ती यानि सदा नयी की नयी बनी रहती है तथा और तरुणी झ्र्जवानट होती रहती है। इस परिप्रेक्ष्य में जानो कि:-

जैसे बारहसिंगे के सींग शरीर बढ़ने के साथ-साथ बढ़ते हैं, वैसे ही आशा की वृद्धि के साथ-साथ तृष्णा भी बढ़ती है।

बढ़ते-बढ़ते सजनों जब यह तृष्णा व्यक्ति के मन पर हावी हो, सिर पर सवार हो जाती है तो व्यक्ति सोते-जागते, उठते-बैठते, खाते-पीते यानि प्रत्येक काम करते हुए इससे संतप्त रहता है यानि एक क्षण के लिए भी इससे छुटकारा पा विश्राम नहीं पा सकता। तभी तो सतवस्तु का कुदरती ग्रन्थ इस संदर्भ में कह रहा है:-

खावन पीवन विच तृष्णा सतावे, घर घर दे विच झगड़ा पवावे

साथ ही इस संदर्भ को स्पष्ट करते हुए वह यह भी बता रहा है:-

तृष्णा भैणां नूं पई सतावे, दिने आराम रातीं नींद न आवे

जानो सजनों धर्म ग्रन्थों के अनुसार जैसे सुन्दर सारंगी को चूहा काट डालता है, वैसे ही तृष्णा, संतोष, धैर्य, सत्य, धर्म व शांति आदि गुणों को नष्ट कर डालती है। इस प्रकार इस तृष्णा के कारण ही मन में सतत रूप से संकल्प-विकल्प उपजते रहते हैं। परिणामत: चित्त एकाग्र व ध्यान स्थिर नहीं हो पाता और आत्मज्ञान प्राप्ति दुष्कर हो जाती है यानि सारा जीवन बेसुरा और आनन्दविहिन हो जाता है। इसलिए तो किसी ने ठीक कहा है कि :

जब तक अंत:करण में आशा तृष्णा है तब तक आत्मज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता।

इस प्रकार सजनों तृष्णा आनन्दपूर्ण एवं शांत जीवन को संशय, क्रोध, हताशा, तनाव, चिंता, व्याकुलता, अधीरता और आपाधापी यानि खीचांतानी से भर देती है। इसके रहते आत्मपद की प्राप्ति कदाचित् नहीं हो सकती। इस परिप्रेक्ष्य में किसी विद्वान ने कहा भी है:-

सबसे उत्कृष्ट परमपद पर विराजने का मैं यत्न करता हूँ, पर तृष्णा मुझे विराजने नहीं देती।

 

अर्थात् तृष्णा ने मेरे आत्मबल को क्षीण कर दिया है। परिणामस्वरूप मैं आत्मबोध कर आत्मपद पर आसीन होने ने के योग्य ही नहीं रहा हूँ।

याद रखो सजनों संगी-साथी, घर-परिवार, पद-प्रतिष्ठा, लोकसंग्रह, स्वास्थ्य, धन आदि सब परिस्थिति विशेष में छूट जाते हैं लेकिन तृष्णा ऐसी है कि कभी नहीं छूटती यानि मन का पिंड नहीं छोड़ती। कहने का आशय यह है कि विषयों की पूर्त्ति आज तक संसार में किसी को सर्वांश में नहीं हो पाई। विषयों का चिन्तन करते-करते विषयों में आसक्ति हो जाती है। कामना से वासना और वासना पूर्त्ति हेतु पुन: - पुन: जन्म होता है। जैसा कि कहा भी गया है:-

एह वाशना किसे पासे न जावे, वाशना न जावे ते तृष्णा ना सतावे।

इस प्रकार सजनों तृष्णा ग्रस्त विषयी प्राणी सोचता है कि हमने भोग्य-विषयों को भोग लिया पर वास्तव में विषय-विषयी प्राणी को भोग लेते हैं। इस प्रकार यह तृष्णा बार-बार प्राणियों को उत्पन्न करती है। इसी संदर्भ में कहा गया है:-

संसार में जितने दु:ख हैं उन सबमें तृष्णा ही अत्यन्त दु:खदाई है।

अंतत: सजनों जानो कि तृष्णा का कहीं ओर छोर नहीं। उसका पेट भरना कठिन है। यह ही समस्त रोगों या दु:खों का, अधर्मो व जन्म-मरण का कारण है। अत: सब प्रकार की तृष्णाओं का त्याग करना ही सम्पूर्ण दु:खों का नाश कर जीवन के वास्तविक आनन्द का अनुभव करते हुए अंत मोक्ष को पाना है।

 

इस तथ्य के दृष्टिगत सजनों जगत के पदार्थों की तृष्णा मत करो। तृष्णा को संतोष से मिटाओ। संतोष का सवाल हल करने की युक्ति सतवस्तु के कुदरती में वर्णित बोर्डों के अंतर्गत लिखी हुई है। इस प्रकार यथा प्राप्त में संतोष और आत्मस्वरूप में स्थिति को ही कल्याण का मार्ग समझो। इस तरह आशा-तृष्णा को त्याग कर आत्मसुख में विश्रांति पाओ। याद रखो आशा-तृष्णा का क्षय तभी होता है जब समता का अभ्यास बढ़ता है। अत: समभाव-समदृष्टि की युक्ति का अनुशीलन कर अपने अन्दर-बाहर समता का प्रसार करो। इसी अभ्यास द्वारा आशा-तृष्णा समाप्त हो जाएगी और संकल्प-विकल्पों का विलय हो जाएगा। अंतत: याद रखो:-

तृष्णा जहाँ होवे, वहाँ ही जान ले संसार है।

होवे नहीं तृष्णा जहाँ, संसार से सो पार है।।

इस महत्ता के दृष्टिगत सजनों सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ के इस संदेश को मान लो:-

आशा तजो तृष्णा तजो, भैणां दिल तो तजों अभिमान।

इको रूप पछान लवो, बली पूरण कर देसन काम।।

यह कार्य सजनों कैसे सिद्ध करना है इस संदर्भ में आगामी सप्ताह हम वितृष्णा के विषय में बातचीत करेंगे ताकि तृष्णा की जड़ का ही आपके मन से उन्मूलन हो जाए।