वृत्ति/स्मृति/बुद्धि-4

साडा है सजन राम, राम है कुल जहान

अर्थात् ईश्वर हमारा मित्र/प्रियतम सर्वव्यापक है, उसी को जानो, मानो व वैसे ही गुण अपनाओ।

 

शब्द है गुरु, शरीर नहीं है,

अर्थात् ज्ञानी को नहीं ज्ञान को अपनाओ और निमित्त में नहीं नित्य में श्रद्धा बढ़ाओ।

 

इस पर सुदृढ़ता से डटे रह, इस अटल सत्य पर स्थिर बने रहो:-

ओ3म् अमर है आत्मा, आत्मा में है परमात्मा

 

याद रखो इन विचारों को पकड़ने से वृति-स्मृति बिना किसी प्रयत्न के स्वत: निर्मल हो जाती है।

सजनों वृति-स्मृति की निर्मलता के विषय में जानने के पश्चात् आओ आज बुद्धि की निर्मलता के बारे में जानते हैं। सजनों जैसा कि हम सब जानते ही हैं कि बुद्धि ही सोचने-समझने और निश्चय करने की शक्ति है। बुद्धि द्वारा ही पदार्थों का बोध होता है और सब कुछ समझा व जाना जा सकता है। अन्य शब्दों में किसी भी कर्म क्रिया, कार्य को करने से पहले जिसके द्वारा धर्म-अधर्म, लाभ-हानि, करणीय-अकरणीय आदि का निश्चय लिया जाता है उसे सद्-असद् विवेक बुद्धि कहते हैं।

विवेक बुद्धि मानव के समस्त कलाकृतियों में सर्वश्रेष्ठ होने की विशिष्ट पहचान है क्योंकि इसी के द्वारा मानव  भले-बुरे व सत्य-असत्य की पहचान कर किसी भी वस्तु व पदार्थ के यथार्थ व सत्य को परख सकता है और ए विध् सत्यज्ञान यानि प्रकृति और पुरुष की विभिन्नता का ज्ञान प्राप्त कर आत्मस्वरूप का साक्षात्कार कर सकता है। इसके विपरीत जो ईश्वर प्रदत्त विवेकबुद्धि खो बैठता है वह पतित हो नीच बुद्धि बन जाता है। अत: संसार में इस विवेक बुद्धि से महत्त्वपूर्ण कुछ भी नहीं। यकीन मानो यदि मानव आत्मिक ज्ञान प्राप्त कर अपनी इस विवेकपरक बुद्धि का विकास करे तो सुनिश्चित रूप से उसके व्यक्तित्व एवं समष्टि का उच्चतम विकास हो जाता है और इंसान उच्च बुद्धि हो समबुद्धि कहलाता है। ऐसे समबुद्धि को फिर जीवन की कोई भी परिस्थिति यानि ऊँच-नीच प्रभावित नहीं कर पाती यानि वह हर अवस्था में समचित्त बना रह पाता है और आत्मचिंतन व सुविचारों से हर कठिन परिस्थिति से सहज ही उबर जाता है। इस महत्ता के दृष्टिगत सजनों वर्तमान परिवेश में अभिभावकों के लिए अपने बच्चों को ऐसा ही विवेकशील बनाना आवश्यक है।

 

आगे जानो कि बुद्धि मुख्यत: दो प्रकार की मानी जाती है यथा सुबुद्धि तथा दुर्बुद्धि। सुबुद्धि जिसे सुमति भी कहते हैं, सजन व्यक्तियों में पाई जाती है तथा निर्मल, सात्विक व प्रकाशित बुद्धि कहलाती है। ऐसी बुद्धि विवेकपरक होने के कारण प्रवृत्ति (बन्ध), निवृत्ति (मोक्ष), कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य, भय-अभय को जानती है तथा सदा जागरूक व निश्चयात्मक होने के कारण निद्र्वन्द्व व मौत के भय से निर्भय रहती है। इस बुद्धि कौशल से अलंकृत व्यक्ति सुजान यानि विचारशील कहलाता है। इसके विपरीत दुर्बुद्धि जिसे कुमति/जड़मति भी कहते हैं, दुष्ट प्रवृत्ति के व्यक्तियों में पाई जाती है व संकीर्ण, ध्वंसक व सब बातों को उल्टा समझने के कारण, वास्तविकता के विपरीत धर्म को अधर्म, कर्त्तव्य को अकर्त्तव्य समझने की भूल कर बैठती है।

 

इस परिप्रेक्ष्य में हम सब भली-भांति जानते ही हैं कि अपकारी होने के कारण दुर्बुद्धि त्याजय है तथा सर्व हितकारी होने के नाते सुबुद्धि यानि सद्बुद्धि जिसकी विशेषता निर्मलता व विवेकशीलता है, विधिपरक एवं ग्राह्य है। सात्विक आहार-विचार, जप-तप-संयम, भक्ति-ध्यान, सत्संग, अभ्यास आदि सब निर्मल व सात्विक बुद्धि के विकास के साधन हैं। चूंकि सजनों बुद्धि आत्मिक ज्ञान के प्रवाह द्वारा निर्मल व प्रकाशित होती है इसलिए सतवस्तु का कुदरती ग्रन्थ इन साधनों के प्रयोग द्वारा प्रत्येक इंसान को अपनी बुद्धि निर्मल बना उच्च बुद्धि होने का निर्देश दे रहा है।

यहाँ स्पष्टत: जान लो कि निर्मल बुद्धि ही उच्च बुद्धि कहला सकती है। ऐसी बुद्धि उसी की ही हो सकती है जिसकी वृत्ति-स्मृति निर्मल होती है अर्थात् वृत्ति-स्मृति निर्मल होने पर ही बुद्धि निर्मल हो जाती है और उच्च बुद्धि यानि उन्नत व श्रेष्ठ कहलाती है। जानो उच्च बुद्धि वाले का ही उच्च ख़्याल होता है। इस संदर्भ में आप भी उच्च बुद्धि हो बुद्धिमान इंसान बनने हेतु, आत्मिक ज्ञान प्राप्त कर, उसे अमल में लाओ और ए विध् आत्मबोध कर आत्मिक उन्नति करो। इस हेतु वृत्ति-स्मृति की निर्मलता व संकल्प को स्वच्छ रखने या मन को संकल्प रहित रखने की महत्ता को समझो और खुद पर आत्मनियन्त्रण रखते हुए अपनी बुद्धि को इस तरह निश्चयात्मक बना लो कि किसी बात व वस्तु की यथार्थता समझने में आपसे भूल न हो जाए। जानो ऐसा सुनिश्चित करने पर जीवन में जो निर्णय भी आप लोगे उसका परिणाम सदा कल्याणकारी ही होगा।

 

यहाँ निश्चयात्मक बुद्धि के संदर्भ में जान लो कि निश्चयात्मक बुद्धि असंदिग्ध होने के कारण पूर्णत: दृढ़ व स्थिर होती है। ऐसी बुद्धि वाले इंसान के अन्दर ही संकल्प-विकल्प नहीं उठते। इसलिए ऐसा इंसान आत्मविश्वास के साथ इस जगत में विचरता है और उसका आत्मिक बल ताकतवर होता है। ऐसा होने पर आत्मिक ज्ञान प्राप्त कर आत्मज्ञानी बनना कोई कठिन कार्य नहीं रहता यानि परमार्थ के रास्ते पर बने रहना सहज हो जाता है। याद रखो आत्मिक ज्ञान के मनन व उचित ढंग से न्यायसंगत प्रयोग करने पर ही इंसान मिथ्या ज्ञान अपनाने से बचा रहता है और इस प्रकार जगत विजयी हो अपना नाम रोशन कर सकता है।

 

यहाँ मनन को स्पष्ट करते हुए बता दें कि मनन भली भांति समझ कर किया जाने वाला अध्ययन या विचार है यानि सुने हुए वाक्यों पर बार-बार विचार करना तथा शंका, समाधान द्वारा उसका निश्चय करना है। निश्चयात्मक बुद्धि वाला इंसान बनने हेतु मननशील बनना अनिवार्य है। इस मनन में भी बुद्धि से काम लेना जरूरी है यानि मनमत/स्वेच्छा आड़े नहीं आनी चाहिए। ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि अगर एक बार मनमुखी बन गए तो बुद्धि के स्थान पर मन में सोची या विचारी हुई मनोप्रिय बात को सिद्ध करने हेतु, स्वेच्छाचारिता के व्यवहार में ढल जाओगे और अहंकारी बन जाओगे यानि इंसानियत में नहीं बने रह पाओगे। फिर इस निजी अहं भाव में ढलने पर जो भी करोगे वह केवल मन को प्रसन्न करने के लिए स्वार्थपरता/ कामना के भाव से ही करोगे जो कामुकता अपनाने की बात होगी। इस तरह कामना का बोलबाला हो जाएगा और निष्काम भाव समाप्त हो जाएगा क्योंकि दिल और दिमाग दोनों ही नश्वर समृद्धि के संग्रह में उलझ भवचक्र में फँस जाएगा। इस तरह निष्काम भाव गया तो ठीक से मनन नहीं कर पाओगे। मनन नहीं करोगे तो वृत्तियाँ तो दूषित होंगी ही होंगी साथ ही स्मृति में आया हुआ भी मिट जाएगा। इस तरह याददाशत कमजोर हो जाएगी और हम शारीरिक-मानसिक रूप से दुर्बल हो जाएंगे। सजनों ऐसी दयनीय अवस्था को प्राप्त होने पर हम अपने जीवन का प्रयोजन सिद्ध करने में किसी विध् भी काबिल नहीं रहेंगे जो अपने आप में जन्म की बाजी हारने की बात होगी।

 

हमारे साथ ऐसा न हो इसलिए कह रहे हैं कि बुद्धि की निर्मलता का महत्त्व समझो और निर्मल बुद्धि हो जाओ। जानो कि निर्मल बुद्धि वाला इंसान ही अपनी धारणा शक्ति का मन-वचन-कर्म द्वारा यथोचित प्रयोग करते हुए सार्थक परिणाम प्राप्त कर अपना जीवन उन्नतिशील व समृद्धशाली बना सकता है। इसके विपरीत जिसकी बुद्धि संकल्प विकल्पों में फँस कर भ्रमित अवस्था को प्राप्त हो जाती है उसके लिए यथार्थ परख कर सही निर्णय लेना कठिन हो जाता है। फिर बुद्धि निज अनुभव द्वारा जो समझ पाती है उसी अनुसार वस्तु या विषय का अज्ञान धार बैठती है। परिणामस्वरूप इंसान आत्मविश्वास खो व पराश्रित हो अविचारी चलन अपना कर तद्नुरूप कुकर्म अधर्म करता है और उसके आचार-व्यवहार में भ्रष्टता आ जाती है।

 

सजनों हम हौं-मैं के अधीन हो ऐसे अहंकारी व भ्रष्टाचारी न बने इस हेतु समझो कि जगत में विचरते समय अच्छी-बुरी दोनों तरह की परिस्थितियाँ आती हैं। विषम परिस्थितियों में ही इंसान की धीरता व बुद्धिमत्ता की परीक्षा होती है यानि जो  साहसी हर अवस्था में निष्कामता से अविचल व निद्र्वन्द्व बना रह, ईश्वर के विधान पर विश्वास रखते हुए सत्य-धर्म पर डटा रह पाता है, वही स्थिर बुद्धि ही सम अवस्था में बने रह, अपनी वृत्ति, स्मृति व बुद्धि को निर्मल रख पाता है और अपने समस्त कर्त्तव्यों का निर्वाह कुशलता से करते हुए आत्मविजयी हो जाता है।

 

आपको भी सजनों ऐसा ही आत्मविजयी बनना है और इस हेतु अपना हर कर्म परमेश्वर के निमित्त सेवा भाव से करते हुए जगत हितकारी बनना है। इस संदर्भ में कोई भूल न हो जाए इस हेतु सदा याद रखना है कि "मैं" यानि उस परमपिता परमात्मा की आत्मा रूप में उन्हीं का ही अंश, इस कारण जगत में, परमेश्वर के निमित्त ही सब कुछ करने के लिए बना हूँ यानि फुरने के माता-पिता ने मेरा सृजन नहीं किया है अपितु इलाही परमपिता परमात्मा ने आत्मा रूप में मुझे इस जगत में अपना प्रतिनिधि बना कर भेजा है। अत: उस इलाही वंश का अंशज होने के नाते मुझे मन में अपने आधारस्वरूप परमेश्वर के प्रति दृढ़ विश्वास रखते हुए केवल वही करना है जो वह कहें यानि जो उनके हुक्म के अधीन हो तथा वही व्यवहार दर्शाना है जो आत्मीयता के अनुकूल हो। इस तरह पूरा यकीन रखना है कि वह अच्छाई के भंडार मुझ से जो कुछ भी करवाएंगे वह अच्छा ही करवांएगे। इस विश्वास के साथ अकर्त्ता भाव में रहते हुए सजनों अपनी हर कृति को निर्मल करते जाना है। जानो यही हकीकत में सच्ची सेवा है। इससे भाव-स्वभाव रूपी ताना-बाना ठीक वैसे ही निर्मल व उज्जवल हो जाएगा जैसे सतयुगवासियों का होता है। जानो वृत्ति-स्मृति, बुद्धि व इस भाव-स्वभाव रूपी ताने बाणे के निर्मल होने के ही कारण सजनों उनके अन्दर-बाहर परमेश्वर सदा प्रकाशित रहते हैं और कुदरती कला से सारे कार्य सम्पन्न होते हैं। इस तरह समभाव स्थापित हो जाता है और सजन भाव व्यवहार में आ जाता है। यह सारा खेल कैसे चलता है आगामी सप्ताह हम इसी बात को सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में विदित कीर्तन "राम रटन ओथे लग रही" के माध्यम से समझेंगे। तब तक आज की बात पर भली भांति मनन कर उसको अमल में लाना।