प्रकाश-4

साडा है सजन राम, राम है कुल जहान

अर्थात् ईश्वर हमारा मित्र/प्रियतम सर्वव्यापक है, उसी को जानो, मानो वैसे ही गुण अपनाओ।

 

शब्द है गुरु, शरीर नहीं है,

अर्थात् ज्ञानी को नहीं ज्ञान को अपनाओ और निमित्त में नहीं नित्य में श्रद्धा बढ़ाओ।

 

इस पर सुदृढ़ता से डटे रह, इस अटल सत्य पर स्थिर बने रहो:-

3म् अमर है आत्मा, आत्मा में है परमात्मा

सजनों कैसी विडम्बना है कि सजन श्री शहनशाह हनुमान जी द्वारा बताए हुए नीति-नियमों से परिचित होते हुए भी, हम सब स्वभाववश या परिस्थितियों के वशीभूत हो उन पर स्थिरता/परिपक्वता से बने रहने में अपने आप को असमर्थ पाते हैं। हमारी यही असमर्थता ख़्याल को ध्यान वल ध्यान को प्रकाश वल रख, अपने हृदय को निरंतर प्रकाशवान रखते हुए, अपने ख़्याल में वास्तविकता ग्रहण कर सदा यथार्थता में बने रहने के स्थान पर, अज्ञानमय अवस्था को प्राप्त हो, इस मिथ्या जगत संग नाता जोड़ने का प्रतीक होती है और इसी कारणवश हम जगत के ही होकर रह जाते हैं और हमारे स्वभावों का टैम्प्रेचर जीवन की विभिन्न  अवस्थाओं में घटता-बढ़ता रहता है।

इस संदर्भ में सजनों याद रखो कि सजन श्री शहनशाह हनुमान जी द्वारा निर्धारित नीतियों पर अटलता से बने रहने पर ही यानि समयबद्ध उनकी युक्ति अनुसार सब कुछ करने पर ही हम उनके इष्ट का संग प्राप्त करने के उचित पात्र बन सकते हैं और अपने प्रकाश को पा सकते हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में सजनों जानो कि यह कार्य कोई कठिन कार्य नहीं है। सच्चेपातशाह जी ने उन परमपिता की नीतियों की पालना द्वारा, जगत के समस्त कार्य व्यवहार कर्ता भाव से करते हुए ऐसा सहजता से सिद्ध कर दिखलाया और परम पुरुषार्थ द्वारा अपने हृदय को प्रकाशित कर भरपूर आत्मतुष्ट हो गए। इस प्रकार "जो प्रकाश है मन मन्दिर, ओही प्रकाश है जग अन्दर" का अनुभव कर वह प्रकाश नाल प्रकाश हो गए।

सजनों कलियुग में उन द्वारा ऐसा अद्भुत पराक्रम कर दिखाने पर सजन दयालु श्री रामचन्द्र जी महाराज हर्षित हो उठे और उनकी इस अपार महिमा का तीनों लोकों में प्रचार करने हेतु दरबार लगाया गया। जब दरबार पूरी तरह से सज गया पर दरबार में जाने के लिए सच्चेपातशाह जी किसी कारणवश वक्त से नहीं पहुँचे तो सजन दयालु श्री रामचन्द्र जी उनसे इस देरी का कारण यह कहकर पूछने लगे कि

"मुश्किल नाल पहुंचे हो देरी क्यों लगाई साजन जी देरी क्यों लगाई है।

देरी क्यों लगाई साजन जी देरी क्यों लगाई है।।"

 

कोई उत्तर आने पर वह आगे फिर उन्हें कहने लगे कि शीघ्र ही दरबार जाना है क्योंकि वहाँ दूर-दूर से यानि तीनों लोकों से ऐसी मंडलियाँ आई हुई हैं जिनका आपस में प्रेम-प्यार देखते ही बनता है। अपने इन शब्दों को उन्होंने सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ के माध्यम से कुछ ऐसे व्यक्त किया:-

"जल्दी जाना है दरबार ओथे हो रिहा प्रचार।

देरी क्यों लगाई साजन जी देरी क्यों लगाई है।।

दूरों दूरों मण्डलियाँ आवन कैसा आपस विच प्रेम प्यार।

देरी क्यों लगाई साजन जी देरी क्यों लगाई है।।"

सजनों इस कीर्तन को आगे समझने से पहले "देरी" से सजन दयालु श्री रामचन्द्र जी का क्या अभिप्राय है, इस तथ्य को समझना अनिवार्य है। इस संदर्भ में जानो सच्चेपातशाह जी इस द्वारे की नीति-नियम अनुसार नियम से अनुशासनबद्ध होकर तीन वक्त का अखंड पाठ करते हथ कार वल चित्त यार वल रखते हुए निष्कामता से सदा अपना ख़्याल ध्यान प्रभु चरणों में जोड़े रखते। इस अनुशासनबद्धता द्वारा सजनों केवल उनका ख़्याल अंतर्मुखी होकर ध्यान स्थिर हो गया अपितु वृत्ति, स्मृति, बुद्धि भाव-स्वभाव रूपी बाणा भी निर्मल हो कंचन हो गया और वह अन्दरूनी वृत्ति में सर्गुण-निर्गुण के नजारे देखते हुए, निर्वाण-परमधाम की मौजें मानणे लगे और दुनियां में चानणा लाने के लिए आपस में (सजन दयालु श्री रामचन्द्र जी सजन दयालु श्री हनुमान जी के साथ) बातचीत करके, (जिसका वर्णन सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में विदित भजनों/कीर्तनों में किया गया है), भूले हुए जीवों को अपने घर की राह दिखाने लगे। नि:संदेह सजनों इस हेतु उन्हें दैनिक क्रियाक्लाप ठीक से करते हुए अपनी व्यस्त दिनचर्या में से आवश्यक समय भी निकालना पड़ता परन्तु संसार परमार्थ दोनों में समुचित तादात्म्य बनाए रखने हेतु वह प्रत्येक कार्य निर्धारित समय में उचित नीति रीति से ही करते। आशय यह है कि जिस तरह सांसारिक समस्त कार्यों का समय था उसी तरह परमार्थ में भी वह निश्चित समय पर अन्दरूनी वृत्ति में हो जाते और दरबार लगा कर, रचनाएँ रचा कर कुदरती साईन्स के तजरबे कर करके दुनियां वालों को आत्मपद प्राप्त करने की युक्ति उसको वर्ताव में लाकर विचार पर खड़े होने के तरीके बताते।

 

इसी संदर्भ में सजनों जब एक दिन किसी कारणवश वह विलम्ब से पाठ पर बैठे यानि अन्दरूनी वृत्ति में सही समय पर दरबार में हाजिर होने के लिए सजन दयालु श्री रामचन्द्र जी के पास पहुँच पाए तो रामचन्द्र जी ने यह कहकर "मुश्किल नाल पहुंचे हो देरी क्यों लगाई साजन जी देरी क्यों लगाई है" एक तो उन्हें समय पर दरबार में आने के प्रति सतर्क किया दूसरा यह कहकर कि "दूर-दूर से यानि तीनों लोकों से प्रेम से भरपूर मंडलियाँ आकर आपकी प्रतीक्षा कर रही है" आगे से कदाचित् किसी भी कारणवश परमार्थ/परोपकार के लिए निर्धारित अपने समय को अन्य किसी कार्यों में व्यतीत करने का संदेश भी दिया।

इस तथ्य से हमें समझना है कि जिस तरह समयानुसार सजन श्री शहनशाह हनुमान जी द्वारा प्रदत्त नाम अक्षर आदि द्वारा अफुरता से ख़्याल को ध्यानपूर्वक अपने इष्ट की ओर नीतिसंगत साधे रख आत्मबोध करने की रीति है, उसे दिलचस्पी में आकर बिलकुल ठीक वैसे ही अपना कर, अपने स्वभाव के अंतर्गत करने पर ही हम अपना अभिप्राय समय पर सिद्ध कर परोपकार कमाने के योग्य बन सकते हैं। अत: सजनों मानो कि विध् परमात्मा के हुक्म नीतियों की पालना द्वारा भक्ति भाव पर स्थिरता से बने रहने वाला सजन ही इस क्रिया द्वारा अपने वास्तविक ज्ञान, गुण शक्ति का एहसास कर निपुणता निर्भयता से  परमात्म स्वरूप होकर इस जगत में विचरते हुए भी इस जगत से आजाद रह सकता है। हम भी ऐसा कर सकें उसके लिए हमें मानना होगा कि समय अनुसार नीतियों का पालन करना अपने आप में आत्मिक ज्ञान प्राप्त कर मिथ्या ज्ञान से छुटकारा पा उच्च बुद्धि, उच्च ख़्याल होने अपने सुन्दर स्वरूप को पाने की बात है।

आओ सजनों अब इस प्रसंग से शिक्षा ले आगे जानते हैं कि जब परम पुरुषार्थ को सिद्ध कर सच्चेपातशाह जी लोक कल्याणार्थ निष्कामता से परोपकार के कार्यों में जुट गए तो सजन दयालु श्री रामचन्द्र जी ने सबके सामने सच्चेपातशाह जी को सम्बोधित करते हुए यानि तीनों लोकों में उनकी सामथ्र्य यश-कीर्ति की महिमा गाते हुए क्या कहा, ध्यान से सुनो:-

- कवित्त -

आप दी लाईट जावे कुल संसार अन्दर लाईट आप दा है प्रकाश साजन।

आप दी लाईट सूरज चांद देवे, ते रोशनी लाईट दा है चमत्कार साजन।।

आप दी लाईट सप्तद्वीप गगन मण्डल, लाईट आप दी सारा विस्तार साजन।

आप दी लाईट आद जुगाद दिस्से, लाईट आप दी अपर अपार साजन।।

ब्रह्मा जी कच्चे भाण्डे घड़े, लाईट आप दी नाल भाण्डा खड़ खड़ करे।

लाईट आप दी करे कार विहार साजन, लाईट आप दी नाल करे, विहार साजन।।

आप दी लाईट जगे आद अन्त साजन, लाईट आप दी आकाश पाताल साजन।

आप दी लाईट विशाल जगे मन मन्दिर, ते लाईट आप दी करे सिंगार साजन।।

आप दी लाईट संख चक्र गदा पद्यम् धारे, लाईट आप दी है मालो माल साजन।

आप दी लाईट जगत निर्लेप दिस्से, लाईट आप दी ओंकार इक ओंकार साजन।।

आप दी लाईट सर्व सर्वत्र दिस्से, लाईट आप दी हर प्रकार साजन।

आप दी लाईट त्रिलोकी विच डिस्से चानणा, लाईट आप दी बिन सूरजों चमत्कार साजन।।

 

भावार्थ

इस कीर्तन के अंतर्गत सजनों सजन दयालु श्री रामचन्द्र जी समस्त सभा के समक्ष ब्रह्माण्ड अर्थात् सम्पूर्ण विश्व, जिसके भीतर अनंत लोक हैं, की ओर इंगित करते हुए श्री साजन जी को कह रहे हैं कि हे सर्वव्यापक परमेश्वर ! देखो आपकी लाईट समग्र संसार में रमण कर रही है। यह लाईट और कुछ नहीं अपितु आपका ही प्रकाश है अर्थात् वह शक्ति अथवा तत्त्व है जिसके योग से वस्तुओं का रूप आँखों को दिखाई देता है और इंसान उन वस्तुओं का बोध कर स्पष्टता से उनका ज्ञान प्राप्त करता है। यही नहीं सूरज यानि इस ब्रह्माण्ड का सबसे बड़ा और ज्वलन्त पिंड चाँद यानि चन्द्रमा भी आप की ही इसी लाईट को ग्रहण कर आगे इस सौर जगत के समस्त ग्रहों को गर्मी, प्रकाश और शीतलता प्रदान कर रहे हैं। इस तरह सर्व आपकी ही इस लाईट अर्थात् आश्चर्यजनक रोशनी का चमत्कार यानि करामात परलक्षित हो रही है।

सजनों आगे वह दयालु कलाधारी श्री साजन जी को कहते हैं कि हे सर्वज्ञ परमेश्वर ! सप्तद्वीप गगनमंडल  भी आपकी लाईट से ही प्रकाशित हो रहे हैं। चारों दिशाओं, सर्व मण्डलों, द्वीपों आदि में इसी का विस्तार नज़र रहा है यानि आपकी लाईट से ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के विस्तारण की क्रिया चल रही है। इस प्रकार आद्-जुगाद, अपर-अपार आपकी ही लाईट नज़र रही है। आशय यह है कि आपकी लाईट ही इस ब्रह्माण्ड का मूल कारण है युग-युगान्तरों तक फैली होने के नाते दर्शनीय है। नि:संदेह इसका पारावार कोई नहीं पा सकता।

फिर सजनों सृष्टि चक्र का अद्भुत खेल बताते हुए श्री रामचन्द्र जी कहते हैं कि हे लीलाधारी साजन ! सृष्टि कर्ता ब्रह्मा जी, जो विद्याता के नाम से जाने जाते हैं वह तो केवल अपरिपुष्ट यानि माट्टी के बिना पके कमजोर भांडे अर्थात् भिन्न-भिन्न प्रकार के वस्तुओं/शरीर के रूप ही बना सकते हैं। हकीकत में तो वह वस्तु/भांडा आपकी लाईट प्राप्त होने पर ही पकता है और खड़-खड़ करने लगता है यानि चेतनायुक्त हो क्रियाशील हो उठता है और आपकी लाईट का उपयोग कर जगत के सब कार्यव्यवहार करने लगता है। स्पष्ट  है सजनों, श्री साजन जी की ही लाईट से चेतन शरीर के समस्त व्यापार होते हैं।

इसी संदर्भ में सजनों सजन दयालु श्री रामचन्द्र जी सर्वशक्तिमान श्री साजन जी को यह भी कहते हैं कि हे परमेश्वर ! आपकी लाईट ही आद्-अंत से सृष्टि में जग रही है यानि आरम्भ से लेकर समाप्ति तक और आकाश से लेकर पाताल तक चमक रही है। आपकी सुन्दर भव्य लाईट ही विस्तृत हो हर किसी के मन-मन्दिर में जग रही है और वही आपकी लाईट ही हर वस्तु का सिंगार है अर्थात् हर वस्तु उसी लाईट से ही शोभायमान है।

आगे सजनों वह श्री साजन जी की महिमा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि आप की लाईट ही शंख, चक्र,गदा पदम् धारती है और आपकी लाईट ही मालो माल है अर्थात् अपने आप में इस सृष्टि की पालना हेतु परिपूर्ण है। इसी परिप्रेक्ष्य में सजनों स्पष्ट कर दें कि चूंकि सच्चेपातशाह जी प्रकाशमय अवस्था को प्राप्त हो प्रकाश आत्मा हुए इसलिए उन्हे शंख, चक्र, गदा, पद्मधार श्री विष्णु भगवान के नाम से सम्बोधित किया गया और उन्हें ही प्रकाश के धर्म अनुसार इस सृष्टि को प्रकाशित रखने की कला में परिपूर्णता पारंगत माना गया।

आगे यह अद्भुत बताते हुए श्री रामचन्द्र जी कहते हैं कि हे मेरे साजन ! आपकी लाईट प्रकाश का धर्म निभाते हुए भी जगतीय विषयों आदि से निर्लेप दिखती है। इसलिए मानो कि आपकी लाईट ही इक ओंकार यानि परमात्मा का सूचक ओं3 शब्द अर्थात् प्रणव मंत्र है और आप वह अनुपम परमात्मा सम वह हस्ती हो जिसे परब्रह्म परमेश्वर कहते हैं। वह कहते हैं कि इस महिमावान पद को पाने के कारण ही आप की लाईट सर्व-सर्वत्र अर्थात् सब जगह दिख रही है और सभी दिशाओं में एक समान भासित हो रही है। अंत में वह कहते हैं कि हे श्री साजन, आपकी लाईट का ही कुल त्रिलोकी में चानणा दृश्यमान है और यह आपकी अद्भुत लाईट ही बिन सूरजों यानि बिना किसी रुाोत के अपने आप चमक रही है।

नि:संदेह सजनों यह सब सुनने-समझने के पश्चात् आपके अन्दर भी अपना ख़्याल ध्यान वल ध्यान प्रकाश वल रखने के प्रति कुछ मजबूती अवश्य आई होगी। यदि ऐसा ही तो सजनों जान लो कि जो इस सर्वश्रेष्ठ अवस्था को प्राप्त कर लेता है वह ही विश्वपति कहलाता है। कहने का आशय यह है कि वह आत्मा और परमात्मा के स्वरूप को जानने वाला जितेन्द्रिय मानव, आत्मस्वरूप में स्थित रह, स्वतन्त्र बुद्धि होकर, हर परिस्थिति में एक निश्चित प्रकार का यानि निष्काम भाव से सत्य-धर्म पर सुदृढ़, बना रहता है अद्वितीय कहलाता है। तभी तो उसके मन को संतोष आनन्द प्राप्त रहता है। जानो एक संतोषी व्यक्ति ही परोपकार के निमित्त अपने हित का विचार छोड़ सबका मंगल कर सकता है सबसे ऊँचे आध्यात्मिक लक्ष्य को पाने के लिए अपनी इच्छाओं और सांसारिक स्वार्थों का त्याग  सहजता से कर सकता है। अंतत: जानो कि वह ब्रह्मज्ञानी आत्मा का अस्तित्व या उसे सर्वत्र व्याप्त मानने का सिद्धान्त अपना विचार, सत्-जबान, एक दृष्टि, एकता और एक अवस्था में सुदृढ़ बना रह अपने जन्म की बाजी जीत लेता है। सजनों अगर हम भी आत्मविजयी होना चाहते हैं तो हमें भी आत्मविद्या अनुरूप आत्मविचारों पर हर हाल में समर्पित भाव से डटे रहना होगा। तभी हम प्रकाश नाल प्रकाश हो रोशन नाम कहा सकेंगे।

सजनों आज के समय काल में क्योंकर हम अपने प्रकाशित स्वरूप को भूल अंधकारमय वातावरण में भटक विवेकहीन हो चुके हैं, उसके कारण उनसे उबर कर हमें किस प्रकार विवेकशीलता से अपने बुद्धिबल द्वारा इस जगत रूपी विराट् दर्शन का यथार्थ समझना है और अपने प्रकाश को पा परमेश्वर नाम कहाना है, इसके विषय में हम आगामी सप्ताह बात करेंगे।