अमरपद प्राप्ति हेतु सजन दयालु श्री रामचन्द्र जी के आगे प्रार्थना

साडा है सजन राम, राम है कुल जहान

अर्थात् ईश्वर हमारा मित्र/प्रियतम सर्वव्यापक है, उसी को जानो, मानो व वैसे ही गुण अपनाओ।

शब्द है गुरु, शरीर नहीं है,

अर्थात् ज्ञानी को नहीं ज्ञान को अपनाओ और निमित्त में नहीं नित्य में श्रद्धा बढ़ाओ।

इस पर सुदृढ़ता से डटे रह, इस अटल सत्य पर स्थिर बने रहो:-

ॐ अमर है आत्मा, आत्मा में है परमात्मा

सजनों गत सप्ताह सजन श्री शहनशाह हनुमान जी के गुणों के संदर्भ में जो भी बातचीत हुई, उस सब पर गंभीर रूप से मनन व चिंतन करने के उपरांत क्या आपके दिल में भी वैसा ही गुणी व सुमतिवान बनने की इच्छा जाग्रत हुई है?

हाँ जी।

तो फिर आपको भी चाहिए कि जैसे सजन श्री शहनशाह हनुमान जी ने अपने इष्ट सजन दयालु श्री रामचन्द्र जी के प्रति समर्पित भाव रखते हुए, उन के गुणों को धारण कर, युक्तिसंगत व्यवहार में ला अमर पद पाने का अदम्य पुरुषार्थ दिखाया और फिर उन्ही गुणों के प्रयोग द्वारा, समस्त संसार के ताप-संताप हरने में सक्षम बन,  बलधारी, ब्रह्मचारी, असुर सिंघारी, तेजधारी, जगत हितकारी, पर उपकारी, न्यायकारी नाम कहाया, वैसे ही हम भी उन द्वारा प्रदत्त समभाव-समदृष्टि की युक्ति प्रवान कर, आत्मपद की प्रतीति करें और कर्तव्य परायणता की भावना से ओत-प्रोत हो निष्काम भाव से परोपकार कमाने का अद्भुत साहस दर्शाए।

इस संदर्भ में सजनों आओ, आज सजन दयालु श्री रामचन्द्र महाराज जी के अजर-अमर, नित्य, परम स्वतंत्र, निरन्जन, परमात्म स्वरूप का अपने हृदय में अनुभव करने हेतु विशुद्ध भावना से, नतमस्तक होकर उनको कोटि-कोटि प्रणाम करते हुए, उनकी प्रार्थना करें:-

आद् पुरुष, निरंकार, ज्योति स्वरूप, पारब्रह्म परमेश्वर भक्त वत्सल श्री रघुनाथ जी महाराज दोनों भुजा पसार कर धरूँ चरणों पर सीस मेरी कोट कोट प्रणाम।

सजनों अब इस प्रार्थना में वर्णित सजन दयालु श्री रामचन्द्र महाराज जी की प्रमुख विशेषताओं को अर्थ सहित समझो और जानो कि इस के माध्यम से, सतवस्तु का कुदरती ग्रन्थ आपको, किस प्रकार, अपनी भावात्मक व स्वाभाविक चारित्रिक छवि को बल, शील, संतोष, क्षमा, त्याग आदि जैसे सद्गुणों से सम्पन्न बना, सर्वश्रेष्ठ मानव बनने का निर्देश दे रहा है:-

आद् पुरुष अर्थात् अकर्त्ता तथा असंग चेतन पदार्थ जो प्रकृति से भिन्न तथा उसका पूरक अंग माना गया है।  वे ही इस कारण जगत के मूल आधार तथा आदि कर्त्ता परमेश्वर हैं और आदि पुरुष यानि शंख, चक्र, गदा, पद्मधारी - विष्णु रूपी परमशक्ति के रूप में, इस जगत की सर्वरूपेण पालना करते हैं। वे ही परमधाम के मूल निवासी हैं तथा अपनी इसी परिपूर्ण विशेषता व विराटता के कारण सर्व दर्शनीय हैं। इस आधार पर सजनों हम कह सकते हैं कि वे बेअन्त ही हकीकत में सबके श्रद्धेय व सर्वप्रथम सम्मान प्राप्त करने के अधिकारी हैं और उनके ही ज्ञान और गुणों को धारण कर धर्म-कर्म द्वारा व्यवहार में लाना अनिवार्य हैं। इस संदर्भ में सजनों सतवस्तु का कुदरती ग्रन्थ कह रहा है:-

जीव जन्तु प्रभु जी तेरे उपजाए, फुरने दे स्त्री पुरुष नज़र आए

सब स्त्रियाँ इक पुरुष हर थार्इं बेअन्त बेअन्त बेअन्त गुसांई

अर्थात् नज़र आ रहे स्त्री-पुरुष सब फुरने के आकार हैं। हकीकत में तो सर्व एक ही आद् पुरुष की सत्ता है बाकी तो सब उसका प्रतिबिम्ब हैं यानि स्त्री रूप में उनकी सुरते हैं, जिन्हें अपने इस कारण जगत में आने का प्रयोजन सिद्ध कर, भिन्न-भिन्न मिथ्या आकारों की फिर-फिर प्राप्ति से छुटकारा पा व अपने सच्चे घर पहुँच विश्राम प्राप्त करना होता है। यही जगत में आने के पश्चात् इंसान का सर्वप्रथम पालनीय कर्तव्य होता है।

सजनों उस परम पिता परमेश्वर की सर्वोत्कृष्ट कृति होने के नाते, हम सब भी अपने मन को परमेश्वर में लीन रखते हुए एकरस सचेतन अवस्था में बने रह, इस उद्देश्य की पूर्त्ति कर सकें, इस हेतु हम मानवों के लिए बनता है कि हम उस आद् पुरुष परमात्मा के गुणों को समझें, परखें और उसके हुक्म अनुसार उनका प्रयोग करते हुए चरित्रवान बनें। इस तरह अपने असलियत ज्ञान स्वरूप का बोध रखते हुए, हम अपने आचार-विचार व व्यवहार द्वारा, अंतर्निहित दिव्य गुणों को अमल में लाने का अदम्य पुरुषार्थ दिखा, उन का अलौकिक दर्शन सब को कराएं। सजनों याद रखो ऐसा करने पर ही हम मानव शारीरिक स्वभावों में उलझने के स्थान पर, विचारयुक्त हो, अपने हदय को प्रकाशित रख सकते हैं व निष्कामता से अपने मिथ्या शरीर रूपी यंत्र सहित इस जगत की पालना कर, सर्वहितकारी नाम कहा सकते हैं। इसी तरह सजनों हमारी वृत्ति-स्मृति व भाव-स्वभाव रूपी बाणा निर्विकारता से, निर्मलता में सधा रह सकता है और हम उच्च बुद्धि, उच्च ख़्याल हो, उस परमेष्ट की मायावी शक्ति को पहचान, उससे निर्लिप्त रहते हुए, उसे प्रयोग करने की कला में निपुण बन, अपने नित्य परमात्मस्वरूप में बने रह सकते हैं। कहने का आशय यह है कि कर्त्ता होते हुए भी अकर्त्ता भाव से इस जगत में विचरते हुए, आत्मीयता के अनुकूल परस्पर सजनता से परिपूर्ण व्यवहार दर्शा सकते हैं और निर्वैर, निरासक्त व निर्दोष बने रह, सहजता से अपने जीवन का मुख्य प्रयोजन सिद्ध करने का पराक्रम दिखा सकते हैं। सजनों यह अधमता व मंद अधमता के भाव से उबर कर, उत्तम पुरुष बनने की बात है क्योंकि जो इंसान इस प्रकार का उत्तम चाल-चलन दर्शाता है उसके मन को कुबेर का धन व कामदेव का काम भी भरमा कर, सत्य धर्म के रास्ते से विचलित नहीं कर सकता। अन्य शब्दों में कोई भी धन-प्रलोभन में फंसा कर उससे कोई अधर्म नहीं करवा सकता। अत: सजनों आप भी ऐसे ही विचार ईश्वर आप नूं मान, सत्य धर्म के निष्काम साधक बनकर, श्रेष्ठ सदाचारी मानव बनने का साहस दिखाओ।

निरंकार अर्थात् जिसका कोई आकार या शक्ल सूरत नहीं है यानि जो रूप रंग, रेखा से रहित है व जो जगत से आज़ाद सर्वव्यापी व सर्वशक्तिमान परमात्मा है। सजनों तभी तो सतवस्तु का कुदरती ग्रन्थ कह रहा है:-

संसार है ओ आत्मा परमात्मा आधार है,

निराकार आकार न कोई है ओ अपरम्पार है

अर्थात् जगत आधार वह आदि पुरुष, आत्मा रूप में, हर प्राणी के हृदय आकाश में व्याप्त रहता है और इस तरह जगत में विशेष होते हुए भी उससे सदा निर्लेप बना रहता है। सजनों आप भी अन्दरूनी व बैहरूनी वृत्तियों में समभाव-समदृष्टि की युक्ति अनुसार, सबके हृदय में व्याप्त उस निराकार निर्गुण परमेश्वर का बोध करते हुए, अपने उस असलियत प्रकाश में ठहरे रहो और इस प्रकार आत्मतुष्टि द्वारा मन में संतोष प्राप्त कर व संकल्प रहित बने रह इस जगत में निष्कामता से विचरने के योग्य बनो।

ज्योति स्वरूप अर्थात् आत्मिक ज्ञान, गुण व शक्ति धारण कर आत्मा में विद्यमान अपने परमात्म स्वरूप को पहचानो। याद रखो जो अपने इस समरूप परमात्म स्वरूप को पहचानता है, वही उस शाश्वत स्वरूप का भाव या धर्म जानते हुए "विचार ईश्वर है अपना आप" के ब्रह्म भाव अनुसार निर्वैर, निर्भय, निरासक्त, निर्विकार व निष्पाप जीवन जी सकता है। इस संदर्भ में सजनों जानो कि वह अगम-अगोचर, ज्योति स्वरूप परमात्मा ही हर जीव को अपनी ब्रह्म सत्ता से सचेतन कर व इस जगत में विचरने के काबिल बना, अपने यथार्थ गुणों पर बने रहने के लिए विवेकशक्ति प्रदान करते हैं ताकि वह सदा उपयोगी व अपनी यथार्थ सुन्दरता में बनी रहे। इसीलिए तो ख़्याल में इस यथार्थता का निरंतर बोध रहना कि  "मैं  वह वस्तु हूँ  जिसे हथियार काट नहीं सकता, अग्नि जला नहीं सकती, पवन उड़ा नहीं सकती व पानी बहा या गला नहीं सकता, मैं अजर-अमर हूँ'', आवश्यक माना गया है। इसी के साथ सुन्दरता के प्रतीक अंतर्निहित, आत्मीय दिव्य गुण को पहचानने व ग्रहण करने हेतु विधिवत् आत्मिक ज्ञान प्राप्त करने का विधान भी है। अत: आप भी इस विधान अनुरूप अपनी वास्तविक स्वाभाविक शक्तियों तथा गुणों से युक्त हो, अपना हृदय सचखंड बनाओ।

पारब्रह्म परमेश्वर अर्थात् निर्गुण और निरूपाधि ब्रह्म जो सर्वश्रेष्ठ है, जगत से परे है व सत्-चित्त-आनन्द स्वरूप है। उसके आगे व अधिक सजनों कुछ और नहीं। सजनों जो भी अक्लमंद इंसान उस ब्रह्म की सत्ता को ग्रहण कर, उसकी आज्ञाओं को परम व अंतिम मान, उसमें किसी प्रकार का परिवर्तन किए बगैर यानि यथा ईमानदारी से पालन करता है, वह ही उस मूलतत्व से अपने ख़्याल को जोड़े रख, सही ढंग से अपना सर्वांगीण विकास कर पाता है। इस तरह वह ही, हाँ केवल वह उत्तम भाव वाला परोपकारी ही, परमार्थता से भरपूर हो, परमपद यानि मोक्ष जैसे सर्वोत्तम पद को प्राप्त करने का अधिकारी सिद्ध होता है। सजनो आपको भी निष्कामता से भावयुक्त होकर इस सर्वोतम पद को प्राप्त करने का अधिकारी बनना है।

भक्त वत्सल अर्थात् सबके प्रति सजनता का भाव संजोए रख, परस्पर प्रीतिपूर्वक विचरो। सजनों अपने अन्दर इस गुण का विकास करने हेतु "सजन सदो सजन सदाओ, सजन ही पहरेवा पाओ, सजन करो वर्त-वर्ताव" अर्थात् जिह्वा से सबको सजन बुलाओ और अपने आप को पाओ। याद रखो सजन शब्द बुलाने से सारा ब्राहृाण्ड एक सजन हो जाएगा और मौत का भय नहीं रहेगा। सजन शब्द बुलाने से बाकी कोई संकल्प नहीं रहेगा। एक निगाह एक दृष्टि होकर, दिव्य दृष्टि हो जाएगी और एक आत्मा होकर परमात्मा से मेल खाकर ज्योति स्वरूप जो अपना आप है उसकी पहचान कर सकेंगे और रौशन हो जाएँगे। अत: स्मरण रहे "सजन है कुल चानणा, सजन है कुल दीपक''। इस तरह सजनों सत्य धर्म का निष्काम भक्ति भाव, आप अपना कर, अन्य जो भी आपके संगी साथी हैं, उनको भी जीवन उद्धार हेतु इस नेकी की राह पर चलने के लिए प्रेरित कर परोपकार कमाओ।

सजनों अब जब समझ में आ गया है कि प्रतिदिन सजन श्री रघुनाथ जी की प्रार्थना को करने का भावाशय क्या है, तो यह जानने के पश्चात् हमारे लिए बनता है कि हम भवसागर से पार उतरने हेतु एक निगाह एक दृष्टि द्वारा सर्गुण-निर्गुण के खेल को समझते हुए, एक दर्शन में स्थित हो, परमपद रूपी ऊँची पदवी पाने के लिए दृढ़ संकल्प लें।

तो क्या सब ऐसा करने हेतु तत्पर हो जी ?

हाँ जी

तो फिर आज के कलुषित समय काल को दृष्टिगत रखते हुए, आपको ऐसा उत्तम या श्रेष्ठ इंसान बनने हेतु, सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में, श्री साजन परमेश्वर द्वारा दर्शाए चाल-चलन व नीति नियमों का अनुसरण कर, आत्मीयता से परिपूर्ण चाल-चलन अपनाने की सामर्थय दर्शानी होगी। क्या ऐसा करने के लिए भी तैयार हो जी।

हाँ जी।

सजनों अगर दिल से ऐसा साहस दिखाने की चाहना है तो फिर तहे दिल से सजन श्री शहनशाह हनुमान जी की युक्ति अपनाने के प्रति दृढ़ संकल्पी हो, उनकी चरण-शरण में आ जाओ और मिलकर बोलो:-

 

चरण-शरण सजन श्री शहनशाह हनुमान जी दी वन्दना करां बारंबार, दास सीस धरे चरणां उत्ते सजन त्रिभुवनपति रघुनाथ।

सजनों तहे दिल से सजन श्री शहनशाह हनुमान जी की चरण-शरण में आने के पश्चात् अब अपने आप से वायदा करो कि मैं अपने परमपिता के वचनानुसार सर्वव्यापक श्री साजन परमेश्वर को ही अपना मित्र/प्रियतम  जान, उन्हीं को ही अपना जीवन आधार मानूँगा, जानूँगा और उन्ही के ही गुण अपनाऊँगा।

मैं अपने परमपिता के वचनानुसार शब्द को ही गुरु मानूँगा और तद्नुसार ज्ञानी को नहीं ज्ञान को अपनाऊँगा  यानि निमित्त में नहीं नित्य में श्रद्धा बढ़ाऊँगा।

मैं अपने परमपिता के वचनानुसार मूलमंत्र के अजपा जाप द्वारा आत्मिक ज्ञान प्राप्त कर अपने ह्रदय को प्रकाशित करूँगा और "ॐ अमर है मेरी आत्मा आत्मा में है परमात्मा" का सत्य बोध कर आत्मज्ञानियों की तरह इस जगत में निर्दोष, निर्विकार, निरासक्त, निर्भय जीवन व्यतीत करूँगा।

यकीन मानो यदि मात्र इतना कर लिया तो सरलता से अपने संतोष-धैर्य के बलबूते पर अपने मन को इच्छा रहित रखते हुए व सच्चाई-धर्म के निष्काम रास्ते पर निष्कामता से चलते हुए, अपनी जीवन यात्रा निर्विघ्न सम्पन्न कर, अपने सच्चे घर परमधाम पहुँच विश्राम पाने का पराक्रम दिखाने में सफल हो जाओगे यानि अमरता की प्रतीति कर अमर हो जाओगे।     

आप सबकी जानकारी हेतु सजनों आगामी कक्षा में आपको यह बताया जाएगा कि जब सच्चेपातशाह जी ने हनुमान जी की युक्ति अपना कर व शांति शक्ति का हथियार धारण कर, जगत में रहते हुए व सब कुछ करते हुए, शारीरिक स्वभावों से ऊपर उठ व उन शहनशाह के इष्ट के गुणों को धारण कर यथा निर्भयता से व्यवहार में लाने का पुरुषार्थ दिखाया तो सजन श्री शहनशाह हनुमान जी किस प्रकार हर्षा उठे और उन्होंने उनके सुन्दर व परम पावन जीवन वृत्तान्त का वर्णन करते हुए क्या कहा? उनके निर्मल जीवन वृत्तान्त को जानने हेतु सजनों सब अत्यन्त प्रेम व उत्साह से आना और हुई सारी बातचीत को मनन द्वारा अमल में ला अपना जीवन सफल बनाना।