आओ युक्तिसंगत बढ़ें विजय-पथ की ओर.......

सजनों आज की कक्षा आरम्भ करने से पूर्व हम आप सबको स्पष्ट करना चाहते हैं कि अब से सबको अनुशासनबद्ध होना पड़ेगा। इस अनुशासनबद्धता का सर्वप्रथम नियम है कि पढ़ाई के समय आपका ख़्याल व ध्यान जो कहा जा रहा है उसको ग्रहण कर धारण करने में रत हो जाये अर्थात् ख़्याल इधर-उधर किसी सोच में न जाये अपितु ध्यान स्थिर हो जाये। इस नियम का पालन करने पर ही सजनों विधिवत् आत्मिक ज्ञान प्राप्त कर विजयी हो पाओगे और कह पाओगे:-

"जीतेंगे जीतेंगे, हम जन्म की बाजी जीतेंगे।

हनुमान जी दे वचनां ते चल चल के;

हम जन्म की बाजी जीतेंगे।"

 

सजनों आपकी यह कथनी करनी में तबदील हो जाये उसके लिये आपको सावधान होकर आगे बढ़ना होगा यानि स्वार्थ का रास्ता छोड़ परमार्थ के रास्ते पर हर कदम सुदृढ़ता से विचार संगत आगे बढ़ाना होगा, तभी सफलता को प्राप्त कर पाओगे। इसी संकल्प को लेकर आओ अब आगे बढ़ते हैं:-

साडा है सजन राम, राम है कुल जहान

अर्थात् ईश्वर हमारा मित्र/प्रियतम सर्वव्यापक है, उसी को जानो, मानो व वैसे ही गुण अपनाओ।

 

शब्द है गुरु, शरीर नहीं है,

अर्थात् ज्ञानी को नहीं ज्ञान को अपनाओ और निमित्त में नहीं नित्य में श्रद्धा बढ़ाओ।

 

इस पर सुदृढ़ता से डटे रह, इस अटल सत्य पर स्थिर बने रहो:-

ओ3म् अमर है आत्मा, आत्मा में है परमात्मा

 

सजनों परमेश्वर कहते हैं:-

"परमधाम है घर हमारा, हम परमधाम में रहते हैं"

सजनों अगर आत्मस्मृति में बने रह व मन पर अंकुश रखते हुए यानि संकल्प रहित अवस्था को धारण कर, प्रसन्नचित्तता से निर्वैर, निर्दोष, निर्विकार, निरासक्त, निष्कलंक व निर्भय यथार्थतापूर्ण धर्मसंगत जीवन जीने के योग्य बन, परमधाम का नजारा देखना चाहते हो तो सुनिश्चित रूप से ऐसा श्रेष्ठ मानव बनने हेतु सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में विहित् --- ग्रहण करने योग्य शब्द ब्रह्म विचारों को, अविलम्ब धारण करने का पराक्रम दिखा विचारशील बन जाओ। यह अविचारयुक्त स्वार्थपरता का रास्ता छोड़ विचारयुक्त सवलड़े रास्ते पर चढ़ने की बात है जिसके लिये समस्त दूषणाओं के त्याग की आवश्यकता है। जो यह त्याग दिखाने की हिम्मत दिखा पायेगा वह ही शारीरिक, मानसिक रूप से स्वस्थ हो "विचार ईश्वर है अपना आप" युक्त ब्रह्म भाव अपनाकर जगत से पार उतर पायेगा।

 

इस महत्ता के दृष्टिगत सजनों इन ब्रह्म विचारों को धारण कर निर्बाध वैसे ही विचारयुक्त आचरण पर स्थिरता से बने रहने के लिए अब तक बैहरुनी वृत्ति में अपनाये सांसारिक अविचारयुक्त दूषित भाव-स्वभाव को नि:संकोच होकर सहर्ष त्याग दो यानि यकदम ख़्याल का मुख संसार की तरफ से पलट परमात्मा की ओर कर दो। इस तरह इस विशुद्धिकरण यानि जिह्वा स्वतन्त्र, संकल्प स्वच्छ व दृष्टि कंचन करने की प्रक्रिया को सुचारू ढंग से सम्पन्न कर, इसी जीवनकाल में ही वांछित शुभ परिणाम प्राप्त करो अर्थात् अपने जीवन चरित्र को परम पावन व पवित्र बना, अपने सच्चे घर परमधाम पहुँच, अपने असलियत ज्योति स्वरूप को पा ब्रह्म नाम कहाओ।

 

इस संदर्भ में सजनों जानो व मानो कि जैसे संतुलित व पौष्टिक सात्विक आहार, जीवनदायक होने के कारण  शारीरिक स्वस्थता का रक्षक व आवश्यक रूप से ग्रहण करने योग्य होता है तथा असंतुलित, अपौष्टिक, चरपरा, तीक्ष्ण राजसिक व तामसिक आहार, शारीरिक स्वस्थता का भक्षक व आधि-व्याधि का हेतु होने के कारण त्याज्य होता है, वैसे ही अध्ययन द्वारा सार्थक व सात्विक शब्द ब्रह्म विचारों का ग्रहण मन की शांति, स्थिरता व मानसिक स्वस्थता के लिए नितांत आवश्यक होता है तथा इसी सात्विक खुराक के द्वारा बुद्धि अर्थात् सोचने समझने की शक्ति सदा निर्मल व विवेकशील बनी रहती है और किसी प्रकार का भ्रम या कामना अन्दर जाग्रत नहीं होती। आशय यह है कि ऐसे विशुद्ध अंत:करण वाले मानव के हृदय में सदा सत्य प्रकट रहता है और उसके लिए सत्यपरायणता से जीवन जीना सहज हो जाता है।

 

इस महत्ता के दृष्टिगत सजनों सुनिश्चित रूप से अपने मन को सदा एकरस शांत अर्थात् संकल्प रहित अवस्था में साधे रखने के लिए, राजसिक व तामसिक दूषित भाव से युक्त, किसी प्रकार का भी मनगढ़ंत सांसारिक ज्ञान प्राप्त कर, अपने मन को मलिन व बुद्धि को भ्रष्ट करने वाले झूठ, चतुराईयों भरे छल-कपट युक्त विनाशकारी स्वार्थपर मार्ग पर चलने की भूल कदापि न करो।

 

यकीन मानो सजनों कि सत्यता से अपनी इस मूल वृत्ति अर्थात् धर्म/स्वभाव पर समान रूप से स्थिर बने रहने का अदम्य पुरुषार्थ दिखाने पर सहज ही नित्य पारलौकिक सुख की प्राप्ति कर सकते हो और एक विवेकशील व निपुण इंसान की तरह अपने जीवन के सब कार्य व्यवहार अर्थात् कर्त्तव्य आत्मनिर्भर होकर, समयबद्ध उचित ढंग से करते हुए, अपनी व समाज की सुख शांति में वृद्धि करने का उद्यम दिखा, अंत उत्तम गति को प्राप्त हो सकते हो। सजनों जानो यही अपने आप में उचित-अनुचित का विचार करने वाली चित्तवृत्ति के प्रयोग द्वारा सदाचारी बन, सत्य-धर्म के निष्काम रास्ते पर अटलता से बने रह, सुकर्म करते हुए धर्म कमाने की बात है।

 

इस संदर्भ में सजनों आप सभी अपने आप को सौभाग्यशाली मानो क्योंकि आपको वर्तमान कलियुग के घोर अंधकारमय वातावरण में, सत्य को धारण कर, सक्षमता से सत्य पथ पर निष्कंटक बने रहने के योग्य बनने हेतु सजन श्री शहनशाह हनुमान जी का द्वारा मिला है। अत: हे खुशनसीबो ! चौरासी लाख योनियों की त्रास भुगतने के पश्चात् अब तो समुचित पुरुषार्थ द्वारा सुरत का शब्द संग अटूट रिश्ता स्थापित कर यानि मन को सदा एकरस परमात्मा में लीन रख, अटल सुहागन बनने का साहस दर्शाओ और उस परमात्मा के दिव्य वैभव यानि ऐश्वर्य को मानते हुए, आनन्द अवस्था को प्राप्त हो जाओ यानि अपने यथार्थ इलाही स्वरूप को जान, अपना सोया भाग्य जगा खुशहाल हो जाओ। सजनों क्या आप सब इस युक्ति को अपना कर इस प्रकार खुशहाल होना चाहते हो?

हाँ जी।

तो फिर समझो कि आत्मोद्धार हेतु आपके जीवन का अब अच्छा समय आ गया है। अत: इस सुअवसर को कदापि व्यर्थ मत जाने देना ताकि आपकी यह कथनी "जीतेंगे जीतेंगे, हम जन्म की बाजी जीतेंगे, हनुमान जी दे वचनां ते चल चल कर, हम जन्म की बाजी जीतेंगे" हकीकत में करनी में परिवर्तित हो जाए और आप अखंड यश-कीर्ति को प्राप्त कर इस जगत में अपना नाम रोशन कर लो। यहाँ प्रश्न यह उठता है कि ऐसा सहजता से करना यानि आज के कलुषित वातावरण में यकदम भाव-स्वाभाविक परिवर्तन दर्शाना हमारे लिए कैसे संभव हो पाएगा?

इस विषय में जानो कि यथार्थ रूप में ऐसा कर पाने हेतु हमारे पास सतवस्तु का कुदरती ग्रन्थ है। अत: यह याद रखते हुए कि मानव शरीर सहित इस भौतिक जगत की रचना, ईश्वरीय मायावी शक्ति, कुदरत ने ही की है, दिलचस्पी में आकर इस सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ का गहनता से अध्ययन करो। जानो जब तक हम इस सतवस्तु के शास्त्र में वर्णित कुदरती ज्ञान का ए विध् गहनता से अध्ययन कर, उसे चिंतन व मनन द्वारा, समुचित ढंग से आत्मसात् करने का पुरुषार्थ नहीं दिखाते तब तक हम कुदरत की रमज नहीं जान सकते यानि इस भ्रमित माया जाल को तोड़, अपने मूल स्वाभाविक गुण पर स्थिरता से बने रह, किसी विध् भी अपना व जगत का कल्याण नहीं कर सकते। तात्पर्य यह है कि फिर परोपकारी बन ब्रह्म नाम नहीं कहा सकते जो अपने आप में जन्म की बाजी हारने की बात है।

 

इस बात को समझते हुए सजनों समभाव नजरों में कर, सजन वृत्ति पकड़ो यानि आत्मा और परमात्मा की शाश्वतता, शाश्वत जीवन और शाश्वत मूल्यों में विश्वास रखते हुए व नैतिक व्यवस्था को भौतिक व्यवस्था से उच्चतर मानते हुए, तद्नुरूप आचार-व्यवहार अपनाने का साहस दर्शाओ व ए विध् एक परोपकारी, क्षमाशील व जितेन्द्रिय सजन पुरुष की भांति, मानव धर्म के सिद्धान्तों और नियमों पर स्थिरता से सुदृढ़ बने रह  सहजता से सत्कर्म करने में सफल हो जाओ व जन्म की बाजी जीत बुद्धिमान नाम कहाओ। स्पष्ट है कि जहाँ विवेकशीलता से इस जीवन-पथ पर अग्रसर होना पुण्य पथ पर अग्रसर होने की बात है, वहीं मनोभावों के अनुसार इस जीवन मार्ग पर बढ़ना पापयुक्त रास्ता अपनाने की बात है। ऐसा न हो इस हेतु सजनों गुरुमत की अपेक्षा मनमत को महत्त्व मत दो यानि मनमत की परवाह न करो। याद रखो इस नीति पर स्थिर बने रह जितनी इसकी अवहेलना करोगे उतना ही मन शान्त होता जायेगा और धीरे-धीरे स्वत: ही संकल्प-रहित हो जायेगा अन्यथा जितना इसको महत्त्व दोगे उतना ही अधिक यह अन्दर शोर करेगा व उत्पात मचायेगा और संकल्प-विकल्प के चक्रव्यूह में फँसाकर बुद्धि को भरमा देगा। यहाँ सजनों हमें आत्मनियन्त्रण रखते हुए हर पल सजग व सावधान बने रहने की महत्ता को समझना होगा ताकि हम किसी भी क्षणभंगुर प्रलोभन या सुख के वशीभूत हो, अपने तन-मन से हारने की भूल न कर बैठें और ए विध् धर्म भ्रष्ट हो, अधर्म का पापयुक्त रास्ता न अपना बैठें।

 

इस भूल से बचने हेतु ही सजनों कह रहे हैं कि नियमित रूप व समुचित ढंग से सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ का समझदारी से अध्ययन करो। इस प्रकार इस क्रिया को अपनी दिनचर्या का अभिन्न अंग बना अपने स्वभाव के अंतर्गत कर लो और ए विध् धर्म सम्बन्धी सिद्धान्तों, नियमों व उनके अनुसार व्यवहार करने के योग्य बन जाओ। जानो इस अदम्य प्रयास द्वारा जब वास्तविक रूप से अपने धर्म को जान जाओगे तो आपके मन में धर्मज्ञ होने का भाव उत्पन्न होगा और आप सहजता से न्यायसंगत जीवन जीते हुए एक सजन पुरुष की भांति सदा निर्दोष बने रहोगे।

 

कहने का तात्पर्य यह है कि इस प्रयत्न द्वारा एक तो आप खुद निष्काम भाव से हर कर्म शास्त्र अनुकूल धर्मसंगत करने में सक्षम हो जाओगे, दूसरा अपने बच्चों व समाज को भी धर्म के रास्ते पर प्रशस्त करने में इस तरह दक्ष हो जाओगे कि वे धर्म का आडम्बरयुक्त स्वार्थपर रास्ता छोड़, सहर्ष जीवनदायक परमार्थ के रास्ते पर ईमानदारी से बने रहने में ही अपनी शान समझेंगे। स्पष्ट है सजनों ऐसा होने पर ही वे धर्मबुद्धि यानि धर्म और अधर्म का विवेक यानि अच्छे बुरे का विचार रखने वाले विचारशील धर्मपरायण इंसान बन पाएंगे। सजनों यह अपने आप में एक सत्-वादी व नेक इंसान की तरह धर्म का स्वरूप जान, धर्म पर धीरता से स्थिर बने रहने की बात है। 

 

इस संदर्भ में सजनों किसी भी कारणवश या प्रभाव में आकर हम धार्मिक नियम या मर्यादा का उल्लंघन न कर बैठें इस हेतु हमें सदा यानि जीवन की हर परिस्थिति व अवस्था में अपने वास्तविक धर्म अनुसार धर्मार्थ आचरण करना सुनिश्चित करना होगा और पुण्य कर्म करते हुए धर्मशील बने रहना होगा। स्मरण रहे ऐसा करने पर ही हम अपने अंतर्मन से मैं-मेरी, तेरी-मेरी, द्वि-द्वेष, वैर-विरोध का भाव मिटा और एक निगाह एक दृष्टि द्वारा सर्व एकात्मा का भाव अपना एकता एक अवस्था में आ पाएंगे और सजनता के प्रतीक बन श्रेष्ठ मानव बन जाएंगे और सजन श्री शहनशाह हनुमान जी का संग प्राप्त कर लेंगे। कहने का आशय यह है कि इस प्रयास में पूर्णरूपेण कामयाब होने हेतु हमें स्वार्थपूर्ण  अविचारयुक्त अधर्म का मार्ग त्यागना ही होगा व विचारयुक्त सवलड़ा रास्ता अपना कर परमार्थ दृष्टि (जिसके बारे में गत दो सप्ताहों में भली-भांति परिचित कराया जा चुका है) हो जाना होगा। इस तरह देखने का नज़रिया बदल कुदरत प्रदत्त विवेकशक्ति का समुचित प्रयोग कर हमें विचारशील बनना होगा और एक अकलमंद इन्सान की तरह आत्मनिर्भरता और निर्भयता से आत्मविश्वास के साथ अपने जीवन का महान कारज सिद्ध कर, श्रेष्ठ मानव बनना होगा। जानो सजनों यह अपने आप में आत्मतुष्ट यानि संतुष्ट होने की बात होगी।

 

सारत: सजनों अब जब इसी जीवन में परम पद प्राप्त करने के विषय में ठान ही लिया है तो मन में भरपूर उमंग व उत्साह रखते हुए अपनी मंजिल की ओर समझदारी से प्रशस्त होवो और ए विध् आत्मिक ज्ञान प्राप्त कर आत्मोद्धार करो। इस संदर्भ में सजनो मन में संतोष व धैर्य धारण कर, निष्कलंकता से आत्मविश्वास के साथ निरंतर आगे बढ़ने का साहस यानि हिम्मत दर्शा, सुनिश्चित रूप से विजय प्राप्त करने हेतु निम्नलिखित विधि अपनाओ:-

1 सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ के प्रथम सोपान से प्रारंभ करके, प्रति सप्ताह क्रमवार चार भजन/कीर्तन नियमित रूप से एकांत में बैठ कर पढ़ने का नियम बनाओ।

2 इन भजनों/कीर्तनों को पढ़ने के साथ-साथ, जो भी उन में ग्रहण करने योग्य विचार/भाव/स्वभाव विदित हैं और जो-जो भी सांसारिक भाव-स्वभाव त्यागने का आदेश है उनको अलग-अलग लिखो।

3 इस संदर्भ में पहले निर्विकार अवस्था में सुनिश्चित रूप से बने रहने के लिए जिन धारने योग्य शब्द ब्रह्म विचारों का चयन किया है उनके अर्थों को युक्तिसंगत समझने हेतु शब्द कोश में से उनके भावार्थों व लक्षणों को समझो व अलग से नोट कर लो।

4 फिर चरित्र पर दुष्प्रभाव डालने वाले जिन त्याज्य विकारयुक्त सांसारिक भाव-स्वभावों का चयन किया है उनके अर्थों व लक्षणों को शब्दकोश में से समझो व अलग से नोट कर लो।

5 तत्पश्चात् भजनों/कीर्तनों में विहित् ग्राह्र/त्याज्य शब्दों के भाव आशयों को इस तरह स्मृति में लो कि समय पड़ने पर आप अपनी बुद्धि द्वारा आवश्यकता अनुसार उनका प्रयोग करने में सक्षम हो पाओ व इस तरह जीवन की ऊँच-नीच में सम अवस्था में बने रहो।

6 इसके पश्चात् चिंतन व मनन द्वारा सम्बन्धित अर्थों व लक्षणों के आधार पर, अंतर्मन में, आत्मनिरीक्षण करो और विवेक बुद्धि द्वारा अपने हिताहित की परख कर, दोषयुक्त लक्षणों का निवारण कर दोषमुक्त अवस्था में आने का भरसक प्रयास करो यानि देखो कि जैसा मैं पढ़ या लिख रहा हूँ, कहीं वैसे विपरीत लक्षण मेरे अन्दर तो नहीं? ऐसा करने से आपको अपने अन्दर व्यापक दुर्भावों का बोध होना शुरु हो जायेगा अर्थात् आप खुद को खुद ही पकड़कर उन दुर्भावों का त्याग करने में सक्षम हो जाओगे। इसी तरह आपको अपने अन्दर जिन सद्भावों के लक्षण दिखायी देंगे आप उनका विकास करने में समर्थ हो जाओगे। कहने का आशय यह है कि इस तरह जो नकारात्मक त्यागना है उसे त्यागकर व जो सकारात्मक धारणा है उसे धारण कर सीढ़ी दर सीढ़ी ऊपर चढ़ते हुए सचेतन अवस्था में आते जाओगे।

इस सन्दर्भ में मत भूलो कि एक भजन/कीर्तन में मुश्किल से आपको दो/तीन या चार शब्द ही त्यागने या धारणे योग्य मिलेंगे। इसका एक फायदा यह भी होगा कि इस प्रयास द्वारा परमार्थी शब्दकोष आपके अन्दर ही बनता जायेगा। फिर जब भी कहीं कोई उस परमार्थी शब्द का इस्तेमाल करेगा, वह आपको स्पष्टता  समझ आ जायेगा यानि आपको कोई भरमा नहीं सकेगा। इस तरह इतने से प्रयत्न द्वारा आप जीवन का कितना बड़ा कार्य सहजता से सिद्ध कर एक ज्ञानवान इंसान की तरह यश-कीर्ति प्राप्त करने के अधिकारी बनोगे। यही नहीं खुद पर पकड़ रखने के इसी प्रयास द्वारा आपकी वृत्ति-स्मृति, बुद्धि व भाव स्वभाव रूपी बाणा निर्मल हो पाएगा और आप एक निरोगी व सदाचारी इंसान बन सजन पुरुष कहलाओगे। यह अपने आप में जीवन पथ पर चलते हुए जो कदम-कदम पर इम्तिहान होते हैं उन इम्तिहानों में विजयी हो यथार्थतापूर्ण जीवन जी पाने के योग्य बनने के प्रति अद्वितीय पराक्रम दर्शाने की बात होगी।

7 इस महत्ता के दृष्टिगत सजनों अविलम्ब पढ़े हुए भजन/कीर्तन में विदित शब्द ब्रह्म विचारों की पालना कर, तद्नुरूप अपने आचार-विचार व व्यवहार को ढालने में किंचित् मात्र भी विलम्ब न दर्शाओ और ए विध् निर्विकारी बनते जाओ, बनते जाओ व अपना जीवन सफल बनाओ।

 

सारत: सजनों यह सब जानने के पश्चात् अगर आपके अन्दर अनुशासनबद्ध होकर दिल से इस क्रिया में सम्मिलित हो परमपद पाने की उमंग जाग्रत हुई है तो तत्क्षण ही इस शुभ कार्य की सिद्धि हेतु तत्पर हो जाओ और दिलचस्पी में आकर अपने सच्चे घर की ओर प्रस्थान करो। इस हेतु सजनों जो भी आप में से ऐसा करना चाहता है वह सहर्ष अपना नाम आज ही लिखवा देना ताकि आगामी कक्षा से आपके  बैठने की व्यवस्था के संदर्भ में तद्नुरूप प्रबंध किया जा सके। आशय यह है कि सजनों अब आगे हम आपको और समय नहीं दे सकते। अब तो जो सीधी चाल चलेगा वही संग रहेगा।

 

इस संदर्भ में सजनों आप सब यह जीवनदायक कार्य सफलता से करने में सक्षम हो जाओ, उसके लिए उदाहरण रूप में आगामी सप्ताह हम आपको सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में सर्वप्रथम विदित कीर्तन "भारे वाले कुएँ ते लगा बगीचा" से ग्राह्र व त्याज्य शब्दों/भावों को पढ़ने-समझने का सही तरीका बताएंगे। अत: आप भी इस विषय में घर से पूरी तरह तैयार होकर आना। इस तैयारी के अन्तर्गत आपको अपने मन को संसार से हटाकर आद् अक्षर की रटन द्वारा प्रभु में इस तरह लीन रखना पड़ेगा कि वहाँ से शब्द ब्रह्म विचार ग्रहण कर पूरे संसार पर राज्य कर सको। याद रखो यदि मन परमात्मा में लीन हो जाता है तो आत्म-स्मृति हो जाती है और हमारी सुरत परमात्मा में लय होनी आरम्भ हो जाती है। इस तरह धीरे-धीरे लय होते-होते वह उसी की ही होकर रह जाती है और अति आनन्द का अनुभव करते हुए उस परमात्मा को रिझा लेती है। रीझने पर परमात्मा उस पर प्रसन्न हो जाते हैं और उस सुरत को अपना लेते हैं। जब ऐसा हो जाता है तो फिर परमात्मा भी उसमें लीन हो जाते हैं। आशय यह है कि जब ऐसा अद्भुत हो जाता है यानि तूं-मैं का भेद समाप्त हो जाता है तो इंसान परमात्म-स्वरूप होकर इस जगत में निर्भयता से विचरता है। इस सन्दर्भ में सच्चेपातशाह जी का उदाहरण हमारे सामने ही हैं जिन्होंने सजन श्री शहनशाह हनुमान जी के प्रति अटूट समर्पित भाव रखते हुए व उनके वचनों की पालना करते हुए उनसे सब कुछ प्राप्त किया। नतीज़ा उनकी सुरत परमात्मा में लीन हो गई, "तूं-मैं" का भेद समाप्त हो गया और वह परमात्म-स्वरूप होकर निर्विकारता से इस जगत में विचर पाये। ऐसा होने पर सजन श्री शहनशाह हनुमान जी सहसा ही कह उठे:-

(सजन श्री शहनशाह हनुमान जी के मुख के शब्द)

मग्न हुए श्री साजन जी, श्री राम रमणे वाले दे विच।

श्री राम रमणे वाले दयालु, मग्न हुए श्री साजन जी दे विच।।

फिर दु:ख में सजनों सुख मनाइये, तां शौह अपने दा दर्शन पाइये।

जैंदे महाराज दे नैनां नाल नैन मग्न हुए, ओ सजन चरणों में रैहंदा अस्थित।

उस सजन दी सब तरह से होसी फतह और जित्त।।

ए ग्रन्थ कुदरती सतवस्तु दा आ रिहा, तूं मैं किसे दा सवाल नहीं।

ए ग्रन्थ सब दा है ओ सांझा, ऐथे वड छोट दा कोई प्रभाव नहीं।

वड छोट दा कोई प्रभाव नहीं।।

सतवस्तु दी सजनों चाल चलो, सतवस्तु दे वचन इस्तेमाल करो।

सतवस्तु दे असूलां नूं फड़ो सजनों सत सत वचनां नाल प्यार करो।

सत सत वचनां नाल प्यार करो।।

ओथे संयोग कहाँ और वियोग कहाँ, ओथे रोग कहाँ और सोग कहाँ।

जेहड़े मन मन्दिर प्रकाश करैंदे ने, ओथे खुशी कहाँ और ग़मी कहाँ।

ओथे खुशी कहाँ और ग़मी कहाँ।।

जैं सतवस्तु दा ग्रन्थ पहचान लिया, ओ सुच्चा भांडा खोट न ओहदे है बदन में।

ओ चमके सारे जग अन्दर, ओ चमके सारे जगत में।

ओ चमके सारे जगत में।।

ओ ही तो हुआ सारे जगत तों न्यारा, ओ ही तो हुआ जगत ते सारा।

ओही ईश्वर पारब्रह्म परमेश्वर हुआ, ओही तो हुआ रग-रग में।

ओही बेअन्त है सारा सर्वज्ञ में।।

शब्द:-

इक पासे प्यारे दे श्री रामचन्द्र जी, दूजे पासे रैहंदे हिन शहनशाह हनुमान।

दु:ख नूं ओ सुख किवें न मनावे, जैंदे संग रैहंदे खुद आप भगवान।।

श्री राम मग्न कोई विरला सजन हो गया, जेहड़ा पकड़े आप नूं नित्तो नित।

ओ खालस सोना हो गया, जैंदा खोट न रिहा इस बदन दे विच।।

 

स्पष्ट है सजनों परमात्म-स्वरूप होने पर सच्चेपातशाह जी ने सतवस्तु पहचान ली और कुदरत की रमज़ समझ सत्य का व्यवहार करने में निपुण हो गये। तभी तो  कुल दुनियां के उद्धार के निमित्त सतवस्तु का कुदरती ग्रन्थ आ गया। सजनों इस कीर्तन में इसी तथ्य का वर्णन है। सजनों अब तो आपको समझ आ गया होगा कि जब सुरत शब्द में और शब्द सुरत में लय हो जाती है तो एक-अवस्था आ जाती है। इस एक-अवस्था में सुरत जो शब्द ब्रह्म यानि परमात्मा है उसके ज्ञान, गुण व शक्ति को धारण कर लेती है यानि जो परमात्मा के पास है वह उसका हो जाता है और इन्सान चैतन्य व शक्तिशाली हो जाता है। फिर वह परमात्म-सम ज्ञान, गुण और शक्ति को धारण कर एक आत्मज्ञानी की तरह इस जगत में भ्रम रहित आत्मतुष्ट होकर निषंग विचरता है। यह होता है मन को सन्तोष प्राप्त होना यानि सन्तोष अपने आप उसके स्वभावों का श्रृंगार बन जाता है। सन्तोष के पश्चात् उसको सुदृढ़ता व स्थिरता प्रदान करने हेतु उसमें धैर्य आता है और इन्सान के लिये सत्य-धर्म का निष्काम रास्ता अपनाकर परोपकार करना सहज हो जाता है। इस तरह स्वभावों की पोशाक ही बदल जाती है जिसका आधार उस परमात्मा का ज्ञान, गुण व शक्ति होती है। फिर सजनों उस परमात्मा के ज्ञान, गुण व शक्ति का प्रयोग आरम्भ होता है। इस प्रयोग के दौरान सजनों "मैं-भाव" को पनपने से रोकना होता है और याद रखना होता है कि मैं कुछ नहीं बना अपितु लीन होने पर उस परमात्मा ने मुझे अपना सब कछ दे दिया। इस तरह झुकाव-भाव में रहते हुए उन्ही के वचनों की ही पालना करनी होती है। आपने भी सजनों यही करना है।

 

अंत में सभी सजनों से प्रार्थना है कि अगर आप में से किसी के पास इस क्रिया को और बेहतर बनाने के लिए कोई सुझाव है तो सहर्ष उसका सुझाव आमंत्रित है।