प्रकाश (त्रिकालदर्शी-2)

साडा है सजन राम, राम है कुल जहान

अर्थात् ईश्वर हमारा मित्र/प्रियतम सर्वव्यापक है, उसी को जानो, मानो व वैसे ही गुण अपनाओ।

 

शब्द है गुरु, शरीर नहीं है,

अर्थात् ज्ञानी को नहीं ज्ञान को अपनाओ और निमित्त में नहीं नित्य में श्रद्धा बढ़ाओ।

 

इस पर सुदृढ़ता से डटे रह, इस अटल सत्य पर स्थिर बने रहो:-

3म् अमर है आत्मा, आत्मा में है परमात्मा

 

सजनों गत सप्ताह हमने जाना कि त्रिकालदर्शी बनने या त्रिकालदर्शी की समीपता प्राप्त करने के लिए हमें अनथक परिश्रम करते हुए जाग्रति में आना होगा ताकि हमारा हृदय सदा आद्-जुगाद-प्रमाद के सत्य से एकरस प्रकाशित रहे और यह फुरने की सृष्टि अपने मायावी प्रभाव से, हमारे ध्यान को अस्थिर कर, ख़्याल को इधर-उधर भटका, अपने यथार्थ स्वरूप की विस्मृति करा व अपने में उलझा मिथ्यावादी न बना दे। सजनों जानो कि ऐसा पुरुषार्थ दिखाने पर ही हम सत्य रूपी दिव्य अस्त्र धार इस ब्रह्मांडीय मायावी शक्ति के प्रहार से रक्षित रह सकते हैं क्योंकि उस दिव्य दृष्टि पर माया या मायाजनित हर वस्तु का प्रभाव निष्फल हो जाता है। इसलिए तो सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में कहा गया है:-

 

जेहड़ा सच वर्ते सच वर्त वर्तावे, ओ मेल महाराज जी नाल खाता है।

तिनां कालां दी पहचान ओ करके, त्रिकालदर्शी हो जाता है, त्रिकालदर्शी हो जाता है।।

 

उपरोक्त पंक्तियों द्वारा सजनों यह स्पष्ट हो जाता है कि सत्य को धारण करने वाला सत्य का पारखी ही व उसको आचरण द्वारा व्यवहार में लाने वाला सत्यवादी ही त्रिकालदर्शी हो सकता है। इसके विपरीत सत्य आचरण के विरुद्ध आचार-विचार व व्यवहार अपनाने व दर्शाने वाला चाहे अपने आप को कितना ही बड़ा ज्योतिषी या कालज्ञ क्यों न मान ले वह त्रिकालदर्शी नहीं हो सकता। वर्तमान युग में ऐसे ही बढ़ते हुए मिथ्याचारी सजनों की संख्या को दृष्टिगत रखते हुए सतवस्तु का कुदरती ग्रन्थ हमें सावधान कर रहा है कि:-

कलुकाल विच ज्योतिषी बन बैठे, ज्योतिषी बन बैठे भिखारी।

त्रिकालदर्शी है ज्योतिषियां दा ज्योतिषी अजकल दे ज्योतिषी।

समय अनुसार बात दे न सकन ओ सारी, बात दे न सकन ओ सारी।।

पढ़ गये ज्योतिषी गुढ़न दी जाच न आवे, इन्सान बैठे ने हिम्मत हारी।

तिन कालां दी बात किस तरह बतावन, किस तरह बतावन ओ सारी, किस तरह बतावन ओ सारी।।

 

नि:संदेह इन पंक्तियों के माध्यम से सतवस्तु का ग्रन्थ हमें आजकल के ज्योतिषियों के दुष्प्रभाव से बचे रहने का निर्देश दे रहा है। साथ ही वह ज्योतिषियों के ज्योतिषी, त्रिकालदर्शी सजन श्री शहनशाह हनुमान जी की चरण शरण में निष्काम भाव से बने रह, उनका हर वचन पालने के प्रति सदा तत्पर रहने का सुझाव दे रहा है। इस हेतु वह आत्मज्ञानी बनने का पराक्रम दिखा, सजनता का प्रतीक बनने के प्रति कुछ इस प्रकार प्रेरित कर रहा है:-

संत साध पण्डित ज्योतिषी, जेहड़ा तिनां कालां नूं लवे पहचान।

उसे नूं ज्योतिषी मान, उसे नूं ज्योतिषी मान।।

इन्सान होके न होवो नादान, त्रिकालदर्शी दी करो पहचान।

ओहदे निकट होवो इन्सान, उसे नूं ज्योतिषी मान, उसे नूं ज्योतिषी मान।।

पढ़ तो गये कई विरले इन्सान, जो तिनां कालां नूं लवे पहचान।

ओहदे निकट जावो इन्सान, उसे नूं ज्योतिषी मान।।

 

सजनों सतवस्तु का कुदरती ग्रन्थ हमें असली ज्योतिषी की परख करने के प्रति ही नहीं अपितु वह तो हमें वर्तमान युग में अपने आप को सर्वज्ञ भगवान कहलवाने वाले शारीरिक गुरुओं के चंगुल में फँसने से भी बचाने हेतु स्पष्टत: कह रहा है कि:-

 

"जिस प्रकार आप साजन शब्द से परत गये हैं उसी प्रकार अब शरीरों के ध्यान से भी परत जावें

क्योंकि

जो शरीर दा ध्यान लगावेगा, ओ जन्म मरन दे चक्कर दे विच राहवेगा।

इलाही सूरत महाराज जी दी, जेहड़ा ओ दर्शन पावेगा।

ओ त्रिकालदर्शी कहावेगा, ओ त्रिकालदर्शी कहावेगा सजन।।

इसलिए तो वह कह रहा है कि

जो नाम वही ध्यान में जब लग्न लग जायेगी तो फिर आप ज्योति में जोत हो सकते हैं। त्रिकालदर्शी भी हो सकते हैं और अलौकिक छवि के दर्शन भी पा सकेंगे।

अर्थात्

जेहड़े सजन कोलूं नाम ते ध्यान और भक्ति शक्ति होसी।

फिर तिनां कालां दी उस सजन नूं सजनों किवें न पहचान होसी।।

 

इस प्रकार सजनों समय की चाल को समझते हुए सतवस्तु का कुदरती ग्रन्थ हमें बार-बार कलुकाल के इस अंतिम चरण में परमेश्वर पर विश्वास रखते हुए आत्मविश्वासी बनने का और सत्य-धर्म के निष्काम रास्ते पर स्थिरता से एकरस बने रहने का पुरुषार्थ दिखाने के लिए प्रेरित कर रहा है ताकि निश्चित समय में ही हम समभाव-समदृष्टि की युक्ति को आत्मसात् कर अपनी भक्ति प्रबल व शक्ति ताकतवर कर सकें और अपने जीवन का परम प्रयोजन सिद्ध कर त्रिकालदर्शी नाम कहा सकें। सजनों यह समय के साथ चलने की बात है जैसा की कहा भी गया है कि गुजरा समय फिर हाथ नहीं आता। अत: समय रहते ही उचित पुरुषार्थ दर्शाओ।

 

याद रखो सजनों यह कोई कठिन कार्य नहीं है। अत: यह सोचकर मत बैठे रहो अपितु इसे सरल जान कर करने में जुट जाओ। जानो कि सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ के अनुसार हर युग में, युग पुरुषों ने आत्मिक ज्ञान प्राप्त कर त्रिकालदर्शी नाम कहाया, तभी तो कहा गया:-

हनुमान जी तिन काल पहचाने, तिन काल श्री रामचन्द्र जाने।

त्रिकालदर्शी होये कृष्ण मुरारी, दसपातशाह होये जगत हितकारी।

ओन्हां दा संग करो इन्सान, ओन्हां दा संग करो इन्सान।।

जैं पा लिया आत्मिक ज्ञान, त्रिकालदर्शी उसे नूं जान।

पारब्रह्म परमेश्वर ओही भगवान, सजनों उसे दा लावो ध्यान।।

इसी प्रकार सजनों सतवस्तु का कुदरती ग्रन्थ जिसके अंतर्गत, जो गुजर गई जो इस वक्त और जो आने वाली तीनों कालों की बात का यथातथ्य उल्लेख है, अपने आप में सच्चेपातशाह जी के भी त्रिकालदर्शी होने का साक्षात् प्रमाण है। इस संदर्भ में सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में कहा भी गया है:-

साजन जी परमधाम में रैहंदे हिन, शक्तिवान दा बेटा ओ त्रिकालदर्शी नाम कहावे।

त्रिकालदर्शी परमधाम दा नज़ारा ओ पावे, बिन सूरजों प्रकाश हर अन्दर सुहावे।

है ओ ताकतवर, ताकतवर नाम कहावे।।

 

अत: सजनों इन युग पुरुषों के जीवनकाल से प्रेरणा ले हमने भी इस हेतु फुरने की सृष्टि से आज़ाद होकर यानि अहं भाव त्याग व परमार्थ के रास्ते पर दृढ़ता से स्थिर बने रहते हुए, नम्रता से प्रभु चरणों में सीस अर्पण करते हुए सच्चे दिल से प्रार्थना करनी है,.............. क्या?

तिन काल असां लऊं पहचान।

ओ जेहड़ी गुज़र गई, जेहड़ी इस वक्त, जेहड़ी आने वाली,

बात लऊं असां जान भगवान, भगवान।

बक्ष लवो मेरे बक्षण हारे, बक्षंद है  तुहाडा नाम, भगवान, भगवान।।

 

इस प्रकार ईश्वर से बल, बुद्धि प्राप्त कर अपने वास्तविक ज्योति स्वरूप को पहचानना है। जानो फिर उस पहचान को धारण कर उस रूहानी व नूरानी स्वरूप में ख़्याल ध्यान स्थिर रखते हुए अर्थात् एकाग्रचित्तता से जो एक होकर मन मन्दिर में व्याप्त है वह महान अनेक होकर जगत जहान में कैसे प्रकाशित तथा शोभायमान है, उस सत्य को जानना है तथा फिर उस पर अटलता से बने रह इस यथार्थ को स्वीकार "विचार ईश्वर है अपना आप" के ऐक्य भाव पर खड़े हो जाना है। इस अनुपम अवस्था में एकरस बने रहने हेतु समभाव-समदृष्टि का सबक़ आत्मसात् कर, जगत में विचरते समय ठीक वैसी ही रीति-नीति अनुसार, आचार-व्यवहार अपना कर समबुद्धि होने का परिचय देना है। ऐसा सुनिश्चित करने पर जैसे ही आपका ख़्याल ध्यान स्थिर हो हृदयगत प्रकाशमय वातावरण में रम जाएगा तो अक्षर चलाने की आवश्यकता नहीं रहेगी अपितु वह तो स्वयंमेव अजपा चलने लगेगा। परिणामस्वरूप स्वत: ही निर्वाण की प्राप्ति होगी और समय आपका साथी बन जाएगा। समय जब साथी बन गया तो जीवन में न कभी अच्छा समय आएगा न बुरा अपितु सब समरस चलेगा और आनन्द की अनुभूति होगी। ऐसा अद्भुत होने पर आप आद् से लेकर अंत तक अर्थात् जो सृष्टि में हो चुका है, हो रहा है व आगे होने वाला है ठीक वैसा ही आवश्यकता अनुसार जान भी सकोगे और सारे ब्रह्मांड के समक्ष उसका बखान भी कर सकोगे यानि सारे किवाड़ खुल जाएंगे और आप परोपकारी प्रवृत्ति में ढ़ल जाओगे। जैसा कि कहा भी गया है:-

जिन चरणों में फुरने दी सृष्टि झुके, झुके तां अपना आप लवे पहचान जिऊ।

त्रिकालदर्शी ओ हो गया, ओहदी जोत जगे निर्वाण जिऊ।।

 

इस महत्ता के दृष्टिगत सजनों सोचों में मत बैठे रहो अपितु अपने मन को शांत करो। याद रखो सोचों में वही जाता है जो मनुराज के पंजें में फँसकर अंधकार में चला जाता है। इसके विपरीत जो हिम्मत दिखाता है वह प्रकाश में रम जाता है। अत: हिम्मत लड़ाओ, हिम्मत लड़ाओ, हिम्मत लड़ाओ और विचार में आ आत्मिक ज्ञान प्राप्ति में जुट जाओ क्योंकि सतवस्तु का कुदरती ग्रन्थ कह रहा है:-

हिम्मत है जे जैंदे पास, हिम्मत है जे ओ अपना आप प्रकाश।

ओ प्रकाश दिखाई ओ जावो, त्रिकालदर्शी नाम कहाई ओ जावो।।

                               

इस हेतु याद रखो .....क्या.?

कोई विरला गोता लावे - कोई विरला, हीरे दी सार ओ पावे - कोई विरला।

हीरे नाल हीरा हो जावे - कोई विरला, त्रिकालदर्शी हो जावे - कोई विरला।।

 

इसी विरले हिम्मतवान के बारे में कहा गया है..............

परमधाम प्रकाशे ओही, परमधाम प्रकाशे ओही।

सर्व सर्व प्रकाश रिहा, त्रिकालदर्शी नाम कहावे सोई।।

 

याद रखो सजनों आप सब ऐसा करने में सक्षम हो। आवश्यकता केवल पुरुषार्थ दिखाकर ऐक्य भाव में आने की है।

 

अंत में इसी सर्वोच्च उपलब्धि के दृष्टिगत सजनों परमे·ार संस्था को कह रहे हैं:-

ये देखो जी परमधाम है, परमधाम दे नज़ारे नूं पाइये।

सर्व व्यापी नाम कहाइये, त्रिकालदर्शी नाम कहाइये।

आद अन्त प्रकाश रहा हूं, प्रकाश नाम कहाइये।।

 

अत: हम सबके लिए बनता है कि कलुकाल से छुटकारा पा सतवस्तु में आने हेतु सजन श्री शहनशाह हनुमान जी की युक्तियों की विधिवत् पालना करते हुए किसी प्रकार से भी इस फुरने की सृष्टि के साथ नाता न जोड़ें। इस प्रकार जगत से आजाद रह सदा अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित रहें और अपने असली प्रकाश नूं पा प्रकाश नाल प्रकाश हो जाएँ और त्रिकालदर्शी हो ब्रह्म नाल ब्रह्म हो जाएं।

 

सबकी जानकारी हेतु आगामी सप्ताह सजनों अब तक हमने प्रकाश के विषय में जो भी पढ़ा समझा है उस पर अभ्यास करेंगे। तब तक अपने ख़्याल को प्रकाश में रखने की आदत डालो ताकि आत्मज्ञान प्राप्त कर सको। याद रखो यदि इसके विपरीत आपके ख़्याल ने शरीर के साथ अपना सम्बन्ध बना लिया तो सारा काम खराब हो जाएगा और आप निकृष्टता को प्राप्त हो जाओगे। कहने का आशय यह है कि शरीर के प्रति सचेत अवश्य रहो यानि अपने आहार व विचार को सात्विक रखते हुए शरीर के साथ-साथ अपनी मानसिकता को भी अवश्य ही स्वस्थ रखो परन्तु इनसे नाता मत जोड़ो। याद रखो यदि मात्र इतनी सी सावधानी ले ली तो आपका निरंकुश ख़्याल सध जाएगा और सहजता से शरीर की बजाय आत्मा में जो है परमात्मा उस संग जा जुड़ेगा। इस तरह परमार्थ अर्जना सहज हो जाएगी और जीवन बनाना कोई दुष्कर कार्य नहीं रहेगा। सजनों मात्र इतनी सी बात समझो और अपना जीवन सफल बनाओ।