आत्मविजय

साडा है सजन राम, राम है कुल जहान

अर्थात् ईश्वर  हमारा मित्र/प्रियतम सर्वव्यापक है, उसी को जानो, मानो व वैसे ही गुण अपनाओ।

 

शब्द है गुरु, शरीर नहीं है,

अर्थात् ज्ञानी को नहीं ज्ञान को अपनाओ और निमित्त में नहीं नित्य में श्रद्धा बढ़ाओ।

 

इस पर सुदृढ़ता से डटे रह, इस अटल सत्य पर स्थिर बने रहो:-

3म् अमर है आत्मा, आत्मा में है परमात्मा

 

कहते हैं सजनों मन ही बंधन का कारण है और मन ही मुक्ति का कारण है यानि यह मन नियन्त्रित रहने पर आपको अच्छा भी बना सकता है और अनियन्त्रित होने पर बुरा भी बना सकता है। यह बुद्धि को सचेत रहने में सहयोग भी दे सकता है और मनमानी का स्वभाव अपना अचेत भी बना सकता है। इस तरह इस को वश में रखने पर आप अपने स्वतन्त्र स्वरूप में स्थित भी रह सकते हो और इसके बेकाबू हो जाने पर मोह-बन्धन में भी फँस सकते हो। इस संदर्भ में सजनों जानो कि जिस इंसान के ख़्याल में ब्रह्म शब्द रम जाता है और उसके मन को शब्द ब्रह्म विचार प्राप्त रहते हैं वह निश्चित रूप से बुद्धि द्वारा उनका इस्तेमाल कर मुक्ति को प्राप्त कर लेता है क्योंकि उसका मन शान्त हो जाता है। इसके विपरीत जिस इंसान का ख़्याल काल्पनिक जगत के विषयों में रम यथार्थता से भटक जाता है  उसका अशान्त मन उसके लिए बंधन का हेतु बन जाता है। इस तरह मुक्ति या बन्धन प्राप्ति, यह इन्सान के व्यक्तिगत चयन पर निर्भर करता है। नि:सन्देह यदि वह जगतीय ज्ञान अनुसार भ्रमित बुद्धि हो मन में नकारात्मक भावों को धारण कर इस जगत में विचरता है तो वह बन्धनमान हो जाता है और यदि वह ब्राहृ-ज्ञान अनुसार जीवनयापन करता है तो मोक्ष प्राप्त कर लेता है।

 

वर्तमान परिस्थितियों के दृष्टिगत सजनों आज जगत में बंधनमान मनुष्यों के मनों में चंचलता के भाव के बढ़ने के कारण, मन द्वारा जनित तमाम कामनायुक्त बंधनों से मुक्त होकर, ख़ुद को निष्कामता से आत्मोन्नति के मार्ग पर प्रशस्त करना परम पुरुषार्थ का विषय बन गया है। आशय यह है कि मन से ऐक्य भाव के छूटने के कारण मानव मन में नाना प्रकार की इच्छाएँ, कुप्रवृत्तियाँ, द्वि-द्वेष, उन्मत्तता, खिन्नता, दुराव, वैर-विरोध, आसक्ति, अनुराग, घृणा, दु:ख, उदासी, अप्रसन्नता, असंतुष्टि, तिरस्कार आदि जैसे विकार पनप चुके हैं जिसके परिणामस्वरूप मानव को आधि-व्याधि के रूप में अनेकानेक दु:खों व कष्टों का सामना करना पड़ रहा है।

 

स्पष्ट है सजनों मन जब प्रभु में लीन रहने के स्वभाव में स्थिर बने रहने के स्थान पर, ख़्याल को मनमत अनुसार जगत में इधर-उधर भटकाता है तो इंसान बुराई को धारण कर बौद्धिक रूप से अधम अवस्था को प्राप्त हो जाता है और खुद पर नियन्त्रण रखने में कमजोर पड़ जाता है। इसी कारणवश मनमत का अनुसरण करने वाला इंसान इन्द्रिय सुखों की ज्वलन्त विषयाग्नि में निरंतर जलता है यानि विषयों को भोग कर भी कभी तृप्त नहीं हो पाता। कहने का तात्पर्य यह है कि कुछ और पाने या करने की अनुचित कामना उसे सदा सताती रहती है जिससे उसके मन में मिथ्या विचार धारण करने के प्रति रुचि पनपती है। ऐसा होने पर इन्सान को किसी की बात सुनना, किसी से बात करना अच्छा नहीं लगता। यहाँ तक कि कोई उसे समझाये तो भी उसे खलता है। इस तरह इंसान का कमजोर मन व इन्द्रियाँ उसे घसीटकर उस अधोपतन के मार्ग पर ले जाती हैं, जहाँ सारे कुल की इज्ज़त मिट्टी में मिल जाती है। हम कह सकते हैं कि यह अविचार धारणा इंसान के ख़्याल व दृष्टि को अस्वच्छ बना वासनाओं के दुष्चक्रव्यूह में फँसा देती है। परिणामत: वह कामनायुक्त इंसान शारीरिक-मानसिक रूप से सुख-दु:ख भोगता हुआ सदा व्याकुल रहता है व इधर-उधर भटकता हुआ विषयों को प्राप्त करने के लिए आतुर रहता है। इस प्रकार उसके लिए जीवन की किसी भी परिस्थिति में सम अवस्था में बने रहना असंभव हो जाता है। इस तथ्य के ही दृष्टिगत सजनों  सच्चेपातशाह जी ने सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में कहा है -

"ख़बरदार अक्ल ते राहवीं बुरा संग कर अक्ल अपनी न गवाँवीं।"

याद रखो सजनों यदि ऐसा सुनिश्चित न किया तो यह स्थिति इंसान की विवेकशक्ति के कमजोर होने का सूचक होती है जिसके फलस्वरूप इंसान के लिए भले-बुरे, सत्य-असत्य की परख कर, यथोचित ढंग से कुछ भी धारण करना सहज नहीं रहता। इसी अज्ञान के कारण मन, मस्त हाथी की तरह इंसान की सुरत को चारों दिशाओं में घुमाता है और जन्म-जन्मांतरों के प्रभाव से उत्पन्न संस्कार उसकी स्मृति में घर कर उसे इस तरह मोह-माया की नींद में सुला देते हैं कि सारी उमर उसके मन में आत्मबोध करने की उमंग ही नहीं उठती यानि आत्मज्ञान प्राप्ति के प्रति रुचि ही नहीं पनपती। यह अपने आप में उस इंसान के मोक्ष प्राप्त करने के स्थान पर नारकीय दु:खों को प्राप्त करने की बात होती है। इस तथ्य के दृष्टिगत ही सजनों सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में कहा गया है:-

"मन मस्त हाथी चारों पासे फिराया, वाशना इस नूं घियो पिलाया

इसी संदर्भ में फिर आगे भी कहा गया है

मोह माया दी निद्रा विच सोई, सारी उमर बिना नाम दे खोई"

सजनों अब तो आप अच्छी तरह समझ गए होगे कि यथार्थ से भटके हुए इंसान का मन, तृष्णाग्नि को कदाचित् शांत नहीं होने देता और जीव को परमार्थ का रास्ता भुला संसार की तरफ ले जाता है यानि स्वार्थपर रास्ते पर चढ़ा उसका सब सुख-चैन छीन लेता है। ऐसा इंसान फिर किसी ओर को भी सुख-शांति से नहीं जीने देता। इसलिए सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में इस मन को मद मस्त हाथी की संज्ञा दी गई है जो अनियन्त्रित होकर कुमार्ग पर दौड़ता हुआ स्वयं की और सवार की हानि करता है और प्राणों को संकट में डाल देता है। अत: अपने चंचल मन को विचार शब्द द्वारा नियन्त्रित कर शांत रखना अनिवार्य है। इसका सजनों एक ही तरीका है कि मन से सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ का नियमबद्ध अध्ययन करते हुए, उसमें विदित विचारों के मनन के प्रति रुचि पैदा कर, उसकी दिशा ही बदल दी जाए अर्थात् जिस मन ने विषयों में आसक्ति द्वारा विकार अपना कर, इंसान को अधर्म के रास्ते पर चलने के लिए मजबूर कर दिया है, उसे सद्-विचारों द्वारा परमपद की ओर मोड़ने का पुरुषार्थ दिखा, धर्मसंगत जीवन जीने का मार्ग सुगम बना लिया जाए। इस परिप्रेक्ष्य में सजनों घबराओ नहीं क्योंकि यह कार्य सिद्ध हो सकता है। ईश्वर ने हर मानव को ऐसा करने की सक्षमता प्रदान की है। इस हेतु आवश्यकता केवल सद्ज्ञान प्राप्ति की है। सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ के रूप में सजनों वह ज्ञान भी आपको प्राप्त है। अतैव यदि आप मन से न हारो तो आप इस द्वारा दर्शाए मार्ग का अनुसरण कर अवश्य ही परमपद प्राप्त कर सकते हो। इस हेतु सजनों सतवस्तु का कुदरती ग्रन्थ कह भी रहा है:-

"मन मजूर किस ने बनाया, किसने इस नूं रथ ते बिठाया

किस ने इस नूं राज दिवाया, किस ने इस नूं राज दिवाया

जैं मन बनाया ओ नादान मालका, तेरी जोति हिम कुल जहान मालका

रथ उत्ते तेरी जोत नज़र आई, जैंदी त्रिलोकी दे विच रौशनाई

मन मिटया ते होया है आनंद मालका, तेरी जोति हिम कुल जहान मालका"

अर्थात्

इससे स्पष्ट होता है कि जो प्रकाश है मन मन्दिर, वही प्रकाश है जग अन्दर।

इस विचार पर खड़े होने से मन मिट सकता है और प्राणी आनन्द का अनुभव कर सकता है।

 

                  इसलिए हमें सावधान रहना है कि किसी कारण भी हमारा:-

मन शहर पर शहर न जावे, सांवले चरणां दे विच राहवे

उमरां चरणां विच बितावे, चरणां नाल चरण हो जावे

अर्थात् परमात्मा के संग रहते-रहते व उनकी चाले पकड़ते हुए परमात्म स्वरूप हो जाओ।

 

उपरोक्त तरीके के अनुसार सजनों मन को सत्य-धर्म के निष्काम भक्ति भाव द्वारा,   ईश्वर  में अनुरक्त करके अधिकाधिक शुद्ध किया जा सकता है और आसानी से सब कुछ सेवा भाव से प्रभु के निमित्त अकर्ता भाव से करने के स्वभाव में ढ़ाल सफलता प्राप्त की जा सकती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जब मन में   ईश्वर के प्रति श्रद्धाविश्वास , विशुद्ध प्रेम व अनुराग पैदा होता है और वह पूर्ण सत्यनिष्ठा से उसी पर केन्द्रित रहते हुए उसी में रमे रह चारों पहर आनन्दित रहना पसंद करता है तो फिर उसे संसारी तुच्छ भोगों में कोई सुखानन्द प्रतीत नहीं होता। चूंकि सजनों उस आनन्द को हमने कभी अनुभव नहीं किया इसलिए हम तुच्छ संसारी सुख-भोगों में उलझ जाते है। कहने का आशय यह है कि सत्त्व के प्रकाश से जब इन्सान सत्-वादी बन जाता है तो रजोगुण और तमोगुण से उत्पन्न हुए मन के तमाम खोट स्वरूप दोष यथा काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, ईष्र्या, घृणा, क्रोध, भय, राग, द्वैष, निकृष्ट वृत्तियाँ, स्मृतियाँ व वासनाएँ आदि क्षय होते-होते स्वत: नष्ट हो जाते हैं और प्रशान्त मन सात्विकता से भरपूर हो मन्दिर की भांति पवित्र व निर्मल हो जाता है। ऐसे उज्ज्वल और प्रकाशित वातावरण में ही इन्सान को  अपने सत्यमेव आत्मस्वरूप व स्वधर्म की प्रतीति होती है और वह भीतरी समता का बोध कर "मैं" और "मेरा" के मिथ्या ज्ञान/धारणा से ऊपर उठ, आत्मा में व्याप्त परमात्म तत्त्व से एकत्व की अनुभूति करता हुआ उसी में लय हो जाता है। याद रखो सजनों जब मन विषयों से हट नियन्त्रित व स्थिर हो जाता है तो इन्द्रियाँ भी मन की नकल कर विषयों से हट नियन्त्रित व अपने धर्म में स्थिर हो जाती है। फिर मन व इन्द्रियों को स्थिर करने के लिए किसी ब्रह्म नियन्त्रण की आवश्यकता नहीं रहती। हम सब ऐसा करने में कामयाब हो इसलिए तो सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में कहा गया है:-

"इन्साना विच वसदा दिसदा हां, खावां पीवां खिड़ खिड़ के पिया हसदा हां

एहो मन विच करो विश्वास सजनो मेरी सुन लो बात, सजनो मेरी सुन लो बात

जीव जन्तु में भासदा जापदा  एह मेरा समझो इतिहास जड़ चेतन में मेरा प्रकाश

सजनो मेरी सुन लो बात, सजनो मेरी सुन लो बात"

स्पष्ट है सजनों मन एक स्याही सोखने वाले कागज की तरह होता है, जिस रंग से भी उसे छुआया जाये उसी रंग का वह हो जाता है। अधिकांश लोगों के मन अपने परिवेश के रंग में रंगे जाते हैं इसलिए मैले हो जाते है। पर आवश्यकता तो मीरा बाई, ध्रुव प्रह्लाद, हनुमान जी, धन्ने जट आदि की तरह अपने मन को उस परम तत्त्व पर केन्द्रित कर ब्राहृ विचारो में रंगने की होती है जो न केवल अपने आप में विशुद्ध हो अपितु अपनी शक्ति से मन को भी शुद्ध कर दे। इस उपलब्धि के दृष्टिगत नियमित अभ्यास द्वारा धीरे धीरे मन को   ईश्वर पर केन्द्रित करो। उस पर ध्यान का तीक्ष्ण पहरा रखो ताकि उसमें कोई फुरना यानि अवांछनीय विचार आकर विक्षेप या अवरोध न उत्पन्न करे। जब भी ऐसा हो तो नाम-अक्षर चलाने की गति तेज कर, मन को पुन:   ईश्वर की ओर फेर दो और ह्मदय से भावपूर्ण होकर उनकी कृपा प्राप्ति व सहायता प्रदान करने की याचना/प्रार्थना आकुल भाव से करो ताकि कोई भी प्रलोभन आपके मन को हर के न ले जाए। इस तरह प्रलोभनों की माँगों को अस्वीकारते हुए ख़्याल व दृष्टि प्रभु पर सतत रूप से टिकाए रखो। याद रखो इस तरह जब पूर्ण निष्ठा और प्रेम से यानि सच्चे दिल से प्रभु को पुकारोगे तो प्रत्येक श्वास ही पुकार बन जाएगी और एक पुकार दूसरी पुकार को जन्म देगी। इस प्रकार बीच में कोई छिद्र नहीं रह जाएगा जिसमें से होकर विरोधी विचार या फुरना मन में उठ आपको अपने अधिकार में ले सके। अत: यह थोड़ी सी सावधानी रखना आवश्यक मानो और मन को अफुरता से एकरस प्रभु में लीन रखते हुए अपने यथार्थ स्वरूप में बने रहने हेतु सफलता प्राप्त करो।

इस संदर्भ में सजनों सच्चेपातशाह जी ने अपने मन को उपशम करने हेतु किस प्रकार अपने चंचल, बली व हठी मन को निग्रहित कर उस पर पूर्ण विजय प्राप्त की उसके बारे में आगामी सप्ताह आपको बताया जाएगा। तब तक सजनों "कल्पना छोड़ जगत दी सारी", अपने ख़्याल को परमेश्वर संग जोड़, मन को शांत कर लेना। आओ अब अपने मन को शांत रखने हेतु अभ्यास करते हैं:-

1 सर्वप्रथम सब सजन आत्म मंगल हेतु अपने मन को शांत रखने की आवश्यकता को समझो और इस हेतु आँखें बंद करके अपने शरीर व मन को स्थिर कर लो और ख़्याल ध्यान स्थिर हो जाए।

2 अगर यहाँ बैठे हुए भी अपने जीवन लक्ष्य को प्राप्त कर पाने के प्रति किसी प्रकार का भय, चिंता या दु:ख-सुख का उद्वेग सता रहा हो तो संकल्प-विकल्पों के हो-हल्ले में, भ्रम अवस्था में बने रहने के स्थान पर, एकाग्रचित्त होकर ओ3म आद् अक्षर का अंतर्मन में युक्तिसंगत जाप करना आरम्भ का दो।

3 ए विध् एक कुशल इंसान की तरह अपनी सुरत के तार अपने अन्दर ग्रहण की हुई ब्रह्म सत्ता में ध्वनित ब्रह्म शब्द के तार के साथ जोड़, अजपा जाप में परिणत करो।

4 इस तरह अपने अन्दर स्वयं ब्रह्म होने का अनुभव करो और उसका अनुमोदन/समर्थन करते हुए "विचार ईश्वर  है अपना आप" के भाव को आत्मसात् करने के प्रति तत्पर हो जाओ।

5 जानो ऐसा पुरुषार्थ दिखाने पर मन स्वत: ही राग आदि से रहित होकर स्वस्थता को प्राप्त होगा और ऐसा अद्भुत होने पर आपको अवश्यमेव ही मन में शांति का अनुभव होने लगेगा।

6  मन में शांति का अनुभव करने से आपको जो प्रसन्नता प्राप्त होगी उसके परिणामस्वरूप आपके अन्दर भक्तिभाव से शांत अवस्था में बने रहने की प्रबल रुचि पैदा होगी और ऐसा आत्मबल जाग्रत होगा कि आप अपने विस्मृत वास्तविक स्वरूप को पुन: स्मृति में ले लोगे।

7 फिर ज्यों-ज्यों इस क्रिया के अभ्यस्त होते जाओगे त्यों-त्यों मन में शांति स्थापित होती जाएगी।

8 याद रखो कि मन में शांति स्थापित होते ही सतत् रूप से शांति पथ पर बने रहना सहज हो जाएगा और  अंतर्निहित अलौकिक शक्तियाँ जाग्रत हो जाएगी।

9 यकीन मानो इस प्रकार जब आपका मन अर्थात् शांति का पात्र पूर्ण शांति से भर जाएगा तो चित्त सुनिश्चित रूप से स्वस्थ व स्थिर हो जाएगा।

10 ऐसा शुभ होने पर आत्मिक ज्ञान की अनुभूति स्वयंमेव आरम्भ हो जाएगी और आप आत्मज्ञानी बन ब्रह्म, जीव और जगत के खेल की रमज को जान परमार्थ अर्थात् स्वधर्म पर सत्यता से स्थिर बने रहने के लिए सहजता से, त्याग भावना से उस पर अपना तन-मन-धन न्योछावर कर पाओगे और इस तरह सदा सम अवस्था में बने रहोगे।

11 मानो सजनों ऐसा पुरुषार्थ दिखाने पर ही आप इस जगत में निर्भयता से निषंग सत्य-धर्म के रास्ते पर स्थिर बने रह सकोगे और निष्काम कर्म करते हुए परोपकार कमा सकोगे।

अंतत: सजनों अपने मन को शांत रखने के प्रति आप के अन्दर वांछित उत्साह बना रहे और आप इस मकसद में सुनिश्चित रूप से कामयाब हो श्रेष्ठ मानव बन सकें, इस हेतु सजनों अब जो बुलेगा, सारे भावयुक्त होकर वह बोलना और विवेकबुद्धि द्वारा सत्य को धारण कर, एक संतोषी व धीर इंसान की तरह, निर्विकारता से सत्य-धर्म के निष्काम रास्ते पर चलते हुए व निर्भयता से इस जीवन में सत्-कर्म करते हुए, परउपकार कमा अपने जीवन का उद्धार करने का दृढ़ संकल्प लेना।

 

मन अपना सब शांत रखो ।

मस्तिष्क भी सब शांत रखो ।।

सोचने समझने की शक्ति को ।

बुद्धि बल से बलवान रखो।।

 

बुद्धि निश्चय करने की शक्ति है।

भले-बुरे का ज्ञान कराती है ।।

सत्य है क्या असत्य है क्या।

विवेक द्वारा यह जनाती है ।।

मन अपना सब शांत रखो।

मस्तिष्क भी सब शांत रखो ।।

 

धैर्य स्थिर रखता है चित्त को।

हर कामना रुकती संतोष द्वारा।।

निर्विकार चित्त प्रसन्न है रहता।

धैर्य संतोष के गुणों द्वारा।।

मन अपना सब शांत रखो।

मस्तिष्क भी सब शांत रखो।।

 

आचार-विचार सत्य आधारित हैं होते।

व्यवहार में पनपती है समता।।

सच्चिदानंद का अनुभव है होता।

सुख-शांति में होती है वृद्धि।।

मन अपना सब शांत रखो।

मस्तिष्क भी सब शांत रखो।।

 

भाव-स्वभाव धर्म-परायण है होता।

सजन परउपकार में है जुटता।।

तभी जीव सत् कर्म है करता।

निर्भय हो है जग में विचरता।।

मन अपना सब शांत रखो।

मस्तिष्क भी सब शांत रखो।