हुक्म की महानता व महत्ता-2

साडा है सजन राम, राम है कुल जहान

अर्थात् ईश्वर हमारा मित्र/प्रियतम सर्वव्यापक है, उसी को जानो, मानो व वैसे ही गुण अपनाओ।

 

शब्द है गुरु, शरीर नहीं है,

अर्थात् ज्ञानी को नहीं ज्ञान को अपनाओ और निमित्त में नहीं नित्य में श्रद्धा बढ़ाओ।

 

इस पर सुदृढ़ता से डटे रह, इस अटल सत्य पर स्थिर बने रहो:-

ओ3म् अमर है आत्मा, आत्मा में है परमात्मा

 

गत सप्ताह सजनों हमने जाना कि दृश्य-अदृश्य जगत में प्रत्येक पदार्थ का आवागमन हुकम के अंतर्गत है यानि विश्व के सभी रूप-आकार उसी परमेश्वर के हुकम द्वारा सर्जित हैं। जीव का आना भी हुकम में है और उसका नष्ट होना भी हुकम के अन्तर्गत ही है। हुकम से ही वह सांसारिक कार्य कलापों में संलग्न होता है और हुकम से ही वह श्रद्धा एवं प्रेम से संयुक्त होकर भक्ति भाव अपनाकर कर्मठ व शक्तिवान भक्त बनता है।

 

इस प्रकार सजनों उस ईश्वर के हुकम से बाहर कुछ भी नहीं है। इस संदर्भ में जो उस हुकमी यानि परमेश्वर की रमज़ को जान उसे अपने हृदय में बसा लेता है वह उसकी कृपा का विशेष पात्र बन आवागमन से मुक्त हो जाता है। इस विषय में नानक कहते हैं जिस पर उस (प्रभु) की रज़ा (हुक्म) के अन्तर्गत कृपा होती है वही गुरुमुखी व्यक्ति उस हुक्म की गति का रहस्य जान सकता है। उनके अनुसार हुकम अनंत विस्मय का बोध है अर्थात् अपार आश्चर्य स्वरूप है। जो इसको पहचान लेता है वही जीने की वास्तविक कला और सत्य की पहचान करने में सक्षम हो जाता है। पहचान से यहाँ तात्पर्य अपने कार्यकलापों में कर्त्तापन का अभिमान न करने अर्थात् अहंकार का नाश करने से है। उनके अनुसार इस हुकम को पहचान कर अंगीकार करने वाला ही निजी अहम् का नाश कर निर्मल हो पाता है और हुकम की रज़ा से सचिहार बन सच्चा योगी कहलाता है। आओ सजनों अब आज आगे जाने कि इस हुकम का व्यावहारिक रूप क्या है?

 

इस परिप्रेक्ष्य में जानो कि उस विधाता ने जब यह ब्रह्मांड रचा, तो इसकी शासन व्यवस्था को समुचित ढंग से चलायमान रखने के लिए, कुदरती संविधान रचा। संविधान अर्थात् "सम" अ "विधान"। "सम" यहाँ पर सद्गुणसम्पन्न, संपूर्ण, यथार्थ व समान परमेश्वर का प्रतीक है तथा "विधान" शब्द से आशय नियम, नीति, कानून, व्याख्या, व्यवस्था, कार्य करने की रीति, विधि व प्रणाली से है। इस प्रकार "संविधान" शब्द का अर्थ उस परमेश्वर द्वारा निर्मित सदाचार के नियमों और नीतियों के समूह, उनकी व्याख्या, व्यवस्था व उनके अनुरूप कार्य करने की रीति, विधि व प्रणाली से है।

 

सजनों कुल मानव जाति को सत्य-धर्म के निष्काम मार्ग पर प्रशस्त कर, जीवन अर्थ को सिद्ध करने की सुमति प्रदान करने हेतु, परमेश्वर ने इस संविधान का वर्णन, न केवल बैहरुनी वृत्ति के अंतर्गत, वेद-शास्त्रों, धर्म-ग्रन्थों आदि में, शब्द ब्रह्म विचारों के रूप में किया अपितु अन्दरुनी वृत्ति में भी, प्रत्येक मानव के हृदय व रोम-रोम में, आत्मिक ज्ञान के रूप में, इसे गुप्त निधि के रूप में, रक्षित कर दिया ताकि हर मानव के मन में सत्य सदा प्रकाशित रहे और वह मायावी जगत के प्रभाव से चलायमान हो इस विधान के विपरीत मानव धर्म का उल्लंघन न कर बैठे। जैसा कि सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में भी सजन श्री शहनशाह हनुमान जी कह रहे  हैं:-

चार वेद फुर्तीले जे, चार वेद रसीले जे।

इन्हां वेदां दा प्रचार हुआ चार वेद फुर्तीले जे।।

चौंह वेदां विच्चों जैं पहचान किया।

ओ सच्ची सरकार हुआ, ओ सच्ची सरकार हुआ।।

चार वेद विदित चार वेद गुपट, इन्हां वेदां दा जैं सार लिया।

ऋग, साम, यजुर और अथर्व वेद, इन्हां चों आद अक्षर जैं पहचान किया।।

चार वेद हैन ओ हृदय, छ: शास्त्र ही शरीर सार हुआ।

दयालु हैन ओ वेद प्रकाशी, प्रकाश जैंदा कुल जहान हुआ।।

चार वेद ग्रन्थ है ओ हृदय, छ: शास्त्र तो रोमावली हुआ।

रोम रोम विच वेद ही लिखित है, अंग अंग विच एही तो रंगावली हुआ।।

ग्रन्थ वेदों दा जैं जान लिया, चार वेदां नूं जैं पहचान लिया।

जैं जीवन बना लिया नगरी ऊपर, उस रौशन अपना नाम किया।।

चार वेद हसन्त छ: शास्त्र फुलन्त हुआ, जैं वेदां चों जीवन बना ही लिया।

प्रकाश हुआ सारी नगरी ऊपर, ओ कई कई खेड खिडन्तर हुआ।।

आगे श्री रामचन्द्र जी कहते हैं

ध्वनि:- हम हैं वेद प्रकाशी, हम हैं जगत निवासी।।

 

इस प्रकार सजनों अन्दरुनी व बैहरुनी दोनों वृत्तियों में परमेश्वर ने इस संविधान के माध्यम से, नश्वर शरीर, ब्रह्म, जीव व जगत के सार का वर्णन करते हुए, जीवात्मा के हित और अनुशासन का विधान यानि करणीय व अकरणीय निषेधात्मक कर्त्तव्य कर्मों की जानकारी दे, उसका पालन करने का हुकम दिया और कहा कि जो भी परम पुरुषार्थ द्वारा यह ब्रह्मकोश यानि समस्त वेद राशि प्राप्त कर, अपने हृदय व कुल ब्रह्मांड में सर्वव्यापक नित्य परमात्मा की अभिव्यक्ति कर आत्मस्वरूप में स्थित हो जाएगा, वही वीर ईश्वर का सुपुत्र बन  इस जीवन का परिपूर्ण आनन्द उठा, अंत अपने सच्चे घर परमधाम पहुँच विश्राम को पाएगा और रोशन हो जाएगा।

 

अन्य शब्दों में सजनों यदि हम उपरोक्त बात को ध्यान से समझें तो ज्ञात होता है कि सृष्टि के आरंभिक काल से, इस ब्रह्मांड के शासक ईश्वर के हुकम अनुसार, मानव को समभाव आधारित संविधान के अनुकूल, यथार्थ आत्मिक ज्ञान प्राप्त कर, एकरस आचार-विचार अपनाने का व परस्पर सजन भाव अनुकूल व्यवहार करने का हुकम यानि आदेश दिया गया है। अत: इस कुदरती विधान अनुरूप परमेश्वर के हर हुकम को मानना प्रत्येक मानव का सर्वोपरि कर्त्तव्य बनता है। इस कर्त्तव्य का कुशलता से पालन करने पर ही अर्थात् समभाव आधारित विधि के इस विधान को नियमानुसार खुद पर, परिवार पर व कुल समाज पर लागू कर उसको व्यवहार में लाने से ही मानव का मन-चित्त स्वत: एकाग्र हो सकता है और बुद्धि की विवेकशीलता द्वारा मानसिक संतुलन बना रह सकता है। फलस्वरूप जिह्वा स्वतन्त्र, संकल्प स्वच्छ व दृष्टि कंचन होने पर सर्वत्र शांति व्यवस्था कायम रह सकती है और मानव हर प्रकार के मानसिक तनाव से मुक्ति पा सदा आनंदित व अहंकार रहित बना रह सकता है।

 

इस संदर्भ में सजनों सर्वोत्कृष्ट आदिकालीन नैतिक संस्कृति का उदाहरण हमारे सामने ही है जिन्होंने ईश्वरीय हुकम की पालना करते हुए, व्यक्तिगत व सामाजिक रूप से इस सम्-विधान को अपनाया और सर्व एकात्मा के सत्य को अपने भाव व दृष्टि में एकरस प्रकाशित रख, तद्नुकूल आचार-विचार व व्यवहार दर्शाया। नि:संदेह तभी वह समयकाल सतयुग यानि स्वर्ण युग कहलाया और तत्कालीन संस्कृति युगों-युगांतरों तक ज्ञान-विज्ञान व नैतिक उत्कृष्टता के साथ-साथ सर्वांगीण स्वस्थता, सुख-समृद्धि, शांति, एकता व एक अवस्था की सर्वश्रेष्ठ मिसाल कायम रख पाई और आज भी हमें पुन: वही समभाव आधारित संविधान अपनाकर सर्वोत्कृष्टता के उच्चतम शिखर पर पहुँचने के लिए प्रेरित कर रही है।

 

इस तथ्य से स्पष्ट होता है कि ईश्वरीय हुकम अनुसार सम्-विधान का पालन करने पर ही यानि सदा अपने मन को सम में स्थित रख, समदृष्टि होने पर ही एक मानव सुशिक्षित और सज्जन पुरुष बन व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक, राजनैतिक व वैज्ञानिक दृष्टि से पर्याप्त उन्नत अवस्था को प्राप्त कर सकता है और सबके प्रति समान भाव रखते हुए निष्कामता से सच्चाई-धर्म की राह पर चलता हुआ, परोपकार जैसा महान पराक्रम दिखाने के योग्य बन जाता है। देखा जाए तो सजनों यही हकीकत में सर्वोच्च आज्ञा यानि ईश्वरीय हुकम का सर्वश्रेष्ठ व्यावहारिक रूप है जो हमें समुचित पुरुषार्थ द्वारा आजीवन आत्मप्रकृति अनुसार अपने आचार-विचार व व्यवहार को साधे रख, मन-वचन-कर्म द्वारा हर परिस्थिति व अवस्था में सदा सत्य-धर्म पर अडिग डटे रहने का निर्देश देता है।

 

इस संदर्भ में सजनों यदि आप भी चाहते हो कि आप भी परमेश्वर की इस सर्वोच्च आज्ञा का पालन कर, अपनी बनत के अनुरूप अपनी सर्वोत्कृष्टता को सिद्ध करने के योग्य बनो तो फिर युक्तिसंगत प्रणव मंत्र यानि मूल मंत्र आद् अक्षर के अजपा जाप द्वारा, मस्तक की ताकी खोल, अंतर्निहित इन गुप्त वेदों के ज्ञान प्रकाश को ग्रहण कर, "आत्मा में जो है परमात्मा", उसको जानने का परम पुरुषार्थ दिखाओ और इस प्रकार शरीरस्थ छ: शास्त्रों के भाव या धर्म को अपना कर, ईश्वरीय आज्ञाओं का पालन करने में समर्थ हो जाओ।

 

यहाँ याद रखो कि जो भी इस प्रकार अपने मन को अफुरता से उस परमेश्वर में लीन रखने में समर्थ हो जाता है, उसी निर्मल वृत्ति के समक्ष आत्मीयता से भरपूर यह हृदयस्थ गुप्त वैदिक ज्ञान स्वत: प्रकाशित यानि प्रकट हो जाता है। फिर वह इस सत्यज्ञान को वर्ताव में ला सत्यनिष्ठा व धर्मपरायणता से जीवनयापन करता है यानि कदाचित् मनमत व शारीरिक स्वभावों के अधीन होकर, जीवन में कोई भी कार्य ईश्वर की आज्ञा या धर्म-शास्त्रों के विरुद्ध नहीं करता।

 

उपरोक्त तथ्य के विषय में सजनों यद्यपि हम मानते हैं कि ईश्वरीय हुकम के तहत्, वर्तमान कलुषित युग के भ्रमित बुद्धि इंसानों के लिए, अंत:स्थित, आत्मिक ज्ञान के गूढ़ अभिप्राय को समझ, उस कुदरती संविधान को चरितार्थ करना दुष्कर है तथापि वे बैहरुनी वृत्ति में एकाग्रचित्तता से, वेद-शास्त्रों व धर्म-ग्रन्थों के अध्ययन व मनन द्वारा, उनमें विदित शब्द ब्रह्म विचारों को आत्मसात् कर, कार्यरूप में परिणित अवश्य कर सकते हैं। इस प्रकार ईश्वरीय हुक्म की पालना पर खरे उतर, वे समभाव-समदृष्टि के सबक़ अनुसार, संतोष-धैर्य का श्रृंगार पहन, सत्य-धर्म के निष्काम रास्ते पर चलते हुए, सजन वृत्ति पकड़ सकते हैं और एक अक्लमंद विवेकशील इंसान की तरह, परिपूर्णत: आत्मीयता के उसूलों पर खरे उतर, उन्हें अपने आचार-विचार व व्यवहार द्वारा प्रतिष्ठित कर समबुद्धि होने का परिचय भी दे सकते हैं।

 

यदि चाहते हो ऐसा ही हो तो ईश्वरीय हुकम की पालना करते हुए एकाग्रचित्तता द्वारा, ख़्याल को ध्यान वल और ध्यान को प्रकाश वल रखते हुए, इस वैदिक/आत्मिक ज्ञान अर्थात् शब्द ब्रह्म विचारों को अंगीकार करते हुए अपने स्वभाव/प्रकृति के अंतर्गत करने की सामर्थ्य दिखाओ। याद रखो यदि ऐसा कर दिखलाया तो अंग-अंग आत्मीयता के भाव से सराबोर हो जाएगा और स्वत: ही समभाव नज़रों में हो जाएगा। फिर सच्चाई-धर्म के निष्काम रास्ते पर अग्रसर रहते हुए, परोपकार प्रवृत्ति में ढलना कोई कठिन कार्य नहीं रहेगा। कहने का तात्पर्य यह है कि फिर अपने अंग-अंग को उसी रंगत में साधे रख शास्त्रविहित प्रकृति में परिपूर्णता ढल वेद प्रकाशी बनना यानि ज्योति स्वरूप में स्थित हो जाना सहज हो जाएगा।

 

अंत में सजनों याद रखो, जानो कि ईश्वर के हुकम की पालना, अनुशासित व मर्यादित बनाती है व अनुचित धर्म विरुद्ध कार्य करने से रोकती है। जो व्यक्ति वर्तमान में आज्ञापालन को अपने आचार-व्यवहार का अभिन्न अंग बना लेता है वह आत्मसंयमी मनमत पर विजय पा जितेन्द्रिय हो जाता है। ऐसा व्यक्ति सहजता से अपने अहं का विसर्जन कर देता है। अहं से मुक्ति उसके व्यक्तित्व को इतना सरल और मृदुल बना देती है कि वह सबका प्रीति-पात्र बन जाता है। यह सामाजिक स्वीकृति उसके आत्मविश्वास में वृद्धि करती है और फिर आत्मविश्वास के कारण उसके व्यक्तित्व में ऐसा निखार आता है जो उसे अद्वितीय छवि प्रदान करता है। ऐसा ही व्यक्ति जननायक बन निष्कामता से समाज के उन्नयन में सहायक सिद्ध हो उसे सार्थक दिशा देता है और इस प्रकार अमरकीर्ति का अधिकारी बनता है।

हुकम की पालना कर सजनों कैसे ऐसे जननायकों ने अमरकीर्ति प्राप्त करी उसका वर्णन हम आगामी कक्षा में सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ से उद्धृत कीर्तन "हुकम बड़ा बलवान" के माध्यम से करेंगे। तब तक जो आज बताया है ठीक वैसे ही ईश्वर की आज्ञा का पालन करने का अभ्यास करो। इस हेतु खुद को खुद समझाओ  और असंयम को विपत्ति का मार्ग जान उसे त्याग दो तथा मन व इन्द्रियों पर संयम स्थापित करने में रत हो जाओ। माना की ऐसा करने पर दुनियावी बातें, इन्द्रिय-विषय चेष्टाएँ जोर मारेंगी परन्तु आपको खुद पर उनको हावी नहीं होने देना अपितु आत्म-नियन्त्रण रखना होगा ताकि कहीं आप उनमें पुन: न उलझ जाओ। इस संदर्भ में सजनों अपने अन्दर ईश्वर मिलन की चाहना पैदा करो। याद रखो चाहना करने वालों को राह अवश्य मिल जाती है। आपकी सच्ची चाहना अवश्य ही आपको इस मृतलोक से उस परमधाम तक पहुँचाने की राह दर्शा आपका जीवन सफल बना देगी।