विवेक सम्पन्न होकर जीवन पथ पर प्रशस्त होने का प्रोत्साहन

साडा है सजन राम, राम है कुल जहान

अर्थात् ईश्वर हमारा मित्र/प्रियतम सर्वव्यापक है, उसी को जानो, मानो व वैसे ही गुण अपनाओ।

 

शब्द है गुरु, शरीर नहीं है,

अर्थात् ज्ञानी को नहीं ज्ञान को अपनाओ और निमित्त में नहीं नित्य में श्रद्धा बढ़ाओ।

 

इस पर सुदृढ़ता से डटे रह, इस अटल सत्य पर स्थिर बने रहो:-

ओ3म् अमर है आत्मा, आत्मा में है परमात्मा

सजनों अभी तक हमने इस समभाव-समदृष्टि के स्कूल में जो भी जाना उससे स्पष्टत: ज्ञात होता है कि जीवन के दो रास्ते हैं। एक अविचारयुक्त अविवेक का मार्ग है, दूसरा विचारयुक्त विवेक सम्पन्न मार्ग है। एक सच-झूठ की परख किए बगैर ही मनमत अनुसार अपनी धारणा निर्मित कर यानि दुर्बुद्धि बन संसार में फँसने का मार्ग है, दूसरा स्थिर बुद्धि द्वारा संसार से छूटने का मार्ग है। एक कवलड़ा यानि कठिनाईयों व ठोकरों भरा रास्ता है, दूसरा सवलड़ा व सुखदायक विजय पथ है। एक क्रिया कारक और भूल का मार्ग है जो नरक की ओर जाता है और दूसरा स्वत: सिद्ध निज परमात्म स्वरूप के यथार्थ ज्ञान का मार्ग है जो सीधा परमधाम की ओर जाता है। इस तरह दोनों मार्ग परस्पर जुदा हैं तथा इनमें से उत्तम विचारयुक्त विवेक सम्पन्न मार्ग पर चलने वाला ही आत्मस्वरूप हो अपने मन सहित इस जगत पर विजय प्राप्त कर पाता है जैसा कि सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में भी कहा गया है:-

अव विचार जेहड़ा चलदा है सजन, चार चुफेर हार ओ खांदा है।

विचार है जित तुम्हारी ओ सजनों, हर पासियों ओ जितदा रैहंदा है।

अव विचार है जे कवलड़ा रस्ता, हर पासियों ओ ठोकरां खांदा है।

विचार है जे सवलड़ा रस्ता, सदा ही ओ जितदा रैहंदा है।

 

इस विचारयुक्त मार्ग पर निर्विघ्नता से प्रशस्त होने के संदर्भ में नि:संदेह सजनों हम मानते हैं कि हम सबको उस समय काल में यह अनमोल मानव चोला मिला है जबकि इस संसार में चहुं ओर कलियुग के दुष्प्रभाववश घोर अज्ञान व अंधकार का कलुषित वातावरण फैला हुआ है। पर यहाँ समझने की बात यह भी है कि जहाँ एक तरफ इस संसार के रंगारंग नानाविध् प्रलोभनों की प्राप्ति के प्रति इंसान के ख़्याल व ध्यान को आकृष्ट कर उसे भ्रष्टाचारी, दुराचारी, अत्याचारी व व्यभिचारी बनाने हेतु स्वार्थपरता का बोलबाला है वहीं दूसरी ओर परम पिता परमात्मा की अपार कृपा के तहत्, इन प्रलोभनों के दुष्प्रभाव से विमुक्त रह उसे सदाचारी बनाने हेतु, शब्द ब्रह्म विचारों के रूप में समस्त वेद-शास्त्रों में विदित सज्ञान भी तो उसके पास उपलब्ध है। वह क्यों नहीं इस उपलब्ध ज्ञान का सदुपयोग कर अपने आप को सद्‌मार्ग पर यानि विचारयुक्त सवलड़े रास्ते पर चलने के लिए बाध्य करता? क्या इसका कारण जानते हो?

मौन।

इसका कारण एक ही है कि वह भले-बुरे, सत्य-असत्य का ज्ञान प्रदान कराने वाली, ईश्वर प्रदत्त अपनी विशिष्ट शक्ति यानि विवेकशक्ति के इस्तेमाल के प्रति पूर्णता अनभिज्ञ होता है इसलिए वह क्या गलत यानि अहितकारी है व क्या सही यानि हितकारी है, उस चयन प्रक्रिया के दौरान धोखा खा जाता है और असत्य को ही सत्य मानकर तद्नुरूप जीवन शैली अपना बैठता है। ऐसे में सजनों चूंकि माता-पिता, समाज, स्कूल-कालेज, वर्तमान शिक्षण प्रणाली भी उसको इसके प्रति सचेतन नहीं करती इसलिए उसका उत्तरोत्तर नैतिक पतन होता जाता है और अच्छा होते हुए भी वह बुरा बन जाता है। 

उपरोक्त तथ्य से सजनों इंसान के जीवन में विवेकशक्ति की महत्ता स्पष्ट होती है और ज्ञात होता है कि एक इंसान विवेकशक्ति के बलबूते पर ही इस दृश्यमान जगत तथा अदृश्य आत्मा में भेद कर, मायावी यानि बाह्र रूप से वास्तविकता को पृथक कर, सत्यज्ञान प्राप्त कर सकता है। अन्य शब्दों में इसी शक्ति के प्रयोग द्वारा ही वह सत् और असत् का ठीक और स्पष्ट ज्ञान प्राप्त कर इस विषयी जगत के नकारात्मक दुष्प्रभावों से विमुक्त रह सकता है और वेद शास्त्रों में विदित ब्रह्म विचारों को धारण कर, एक विचारवान, न्यायशील  व आत्मविश्वासी इंसान की तरह, निरासक्त जीवन जीने के योग्य बन, अपने जीवन का हर धर्म-कर्म अकर्त्ता भाव से सम्पन्न करते हुए कर्मगति से मुक्त रह सकता है और मानव रूप में अपनी सर्वोत्कृष्टता सिद्ध कर सकता है।

इस बात के दृष्टिगत सजनों हमें समझना है कि आज के इस अज्ञानमय कलुषित वातावरण में समाज में दूषित व भ्रष्ट आचार-विचार-आहार व व्यवहार के रूप में जितनी भी अविचारयुक्त जीवन शैली प्रचलित है, उस  नकारात्मकता को हमने बिना परखे नहीं ग्रहण करते जाना अपितु उसे ग्रहण/धारण करने से पूर्व, वेद-शास्त्रों में विदित ब्रह्म विचारों के सुदृढ़ आधार पर व अपनी विवेकशक्ति के प्रयोग द्वारा सर्वप्रथम हमने यह जानना है

कि उसमें से क्या ग्रहण/धारण करने योग्य है व क्या नहीं। याद रखो इस प्रकार अपने विवेक द्वारा विधि/नियम/रीति के रूप में माने जाने योग्य भाव/वस्तु/ज्ञान को ग्रहण/धारण करने वाला ही विचारवान व गुणशील माना जाता है। ऐसे विचारवान गुणशील व्यक्ति में ही सद्गुणों को ग्रहण कर सदाचारी बनने की प्रवृत्ति लक्षित होती है इसके विपरीत दोषपूर्ण व्यक्ति में दोषों को ग्रहण कर दुराचारी बनने की प्रवृत्ति लक्षित होती है। कहने का आशय यह है कि अपना जीवन चरित्र उज्ज्वल व परम पवित्र बनाने हेतु हमें कुछ भी ग्रहण/धारण करने से पूर्व उसकी सकारात्मकता व नकारात्मकता को परख सदा सत्य धारणा ही सुनिश्चित करनी है। मात्र इतनी सी सावधानी लेने से वृत्ति-स्मृति-बुद्धि व भाव-स्वभाव रूपी बाणा निर्मल हो जाएगा व हम सत्-वस्तु धारण कर सचखंड बसने वाले परमेश्वर से नाता जोड़ने में सफल हो जाएंगे। इस तरह सत्-वादी बन सबके कल्याण के निमित्त निष्काम भाव से परोपकार के काम करेंगे और हमारे लिए जीवन लक्ष्य प्राप्ति का कार्य सहज हो जाएगा।

यह बात जानने समझने के पश्चात् सजनों अब आप भी ऐसा ही गुणवान व सदाचारी इंसान बनने हेतु अंतर्निहित उस विशिष्ट विवेकशक्ति के आधार पर यह जाँचना करके बताओ कि इन्सान होने के नाते क्या आपके लिए:-

1 आलस्य या प्रमादग्रस्त हो जीवन का अनमोल समय व्यर्थ गँवाना उचित है या जीवन के परम पुरुषार्थों की सिद्धि के निमित्त उद्यम दिखा अपना जीवन बनाना उचित है?

2 अपने जीवन के महान प्रयोजन की सिद्धि हेतु कवलड़े व ठोकरों भरे स्वार्थपर अविचार युक्त रास्ते पर चलना उचित है या फिर परमार्थ के सवलड़े विचार युक्त मार्ग पर चलना उचित है ?

3 भौतिकवादी संस्कृति का समर्थन कर व जगतीय विषयों का रसिया बन यानि बहिर्मुखी होकर, अंधाधुंध प्रतिस्पर्धा व प्रतिद्वंद्वता की होड़ में परस्पर लड़ते-झगड़ते हुए द्वि-द्वैत, वैर-विरोध, तेरी-मेरी, ईर्ष्या -द्वेष, घृणा-हिंसा जैसे दानवीय/शारीरिक भाव-स्वभाव अपनाने उचित हैं या फिर अंतर्मुखी होकर विरासत में मिली आत्मिक ज्ञान की संपदा का प्रयोग करते हुए अपने अजर, अमर, अविनाशी स्वरूप में स्थित रह, आत्मीयता युक्त भाव-स्वभाव अपनाने उचित हैं?

4 मनमत के वशीभूत हो, संकल्प-विकल्प की दासता स्वीकार यानि पराश्रित हो, झुखते-रोते हुए जीवनयापन करना उचित है या फिर गुरुमत यानि ईश्वरीय हुक्म की पालना द्वारा, संकल्प कुसंगी पर फतह पा, स्वतन्त्रता से सदा अपना संचालन आप करते हुए सदा प्रसन्नचित्त बने रहना उचित है?

5 शारीरिक स्वस्थता के दृष्टिगत जिह्वा के स्वादवश, राजसिक व तामसिक आहार से युक्त असंतुलित, अपौष्टिक आहार व माँसाहारी व नशीले पदार्थों का सेवन करना उचित है या फिर शरीर को बलिष्ठ करने वाले संतुलित, पौष्टिक सात्विक आहार का सेवन करना उचित है?

6 मानसिक स्वस्थता को ध्यान में रखते हुए सारा दिन व्यर्थ की सोचों व नकारात्मक बातों में बिताना उचित है या फिर मूलमंत्र आद् अक्षर यानि प्रणव के अजपा जाप द्वारा प्राप्त हुए शब्द ब्रह्म विचारों का सेवन करना उचित है?

7 दूसरों को दु:ख पहुँचाने वाले कटु, अहितकारी, असत्य वचन बोलना व निंदा चुगली करना उचित है या फिर अपनी जिह्वा को इन सबसे स्वतन्त्र रखते हुए मधुर, हितकारी, सत्य सार्थक वचन बोलना उचित है?

8 स्वार्थपरता के नियम अनुसार, अपने मन की तुच्छ इच्छाओं व कामनाओं का गुलाम हो, असंतोषी व अधीर बन, छल-कपट-चातुर्य युक्त मिथ्या आचरण करते हुए, विषय विकारी बनना उचित है या फिर एक निष्कामी की भांति, कामनाओं और इच्छाओं में फर्क कर, जितना कुशलता से जीवनयापन हेतु आवश्यक है उसकी प्राप्ति हेतु यत्नशील हो संतोषी व निर्विकारी बने रहना उचित है?

9 जीवन की कठिनाईयों और कठोर परीक्षाओं से हतोत्साहित हो, कायर व डरपोक इंसान की तरह कुकर्म-अधर्म का रास्ता अपनाना उचित है या फिर एक धीर, वीर व साहसी आत्मविश्वासी इंसान की तरह बुद्धिमत्ता से इनका सामना करते हुए सच्चाई-धर्म के निष्काम रास्ते पर डटे रहना उचित है?

10 सर्व प्रचलित अलगाववाद व स्वार्थपरता के प्रतीक मनगढ़ंत, कर्मकांड व आडम्बरयुक्त भक्ति भावों में फँस कर तूं-मैं का, बड़े-छोडे का, मत-मतांतरों का, धर्मों-पंथों की भिन्नता का सवाल खड़ा कर दंगे-फसाद करवाना उचित है या फिर समभाव-समदृष्टि के सबक़ अनुसार सबको एक समान समझते हुए व एक ही नज़र से देखते हुए, मानवता अनुरूप परस्पर सजन भाव का व्यवहार करना उचित है?

11 पाश्चात्यवादी आधुनिक संस्कृति का समर्थन करते हुए व नास्तिकवादी भौतिक प्रवृत्ति का अनुकरण करते हुए, वाद-विवाद, तर्क-वितर्क में उलझ दुराचारी इंसान बनना उचित है या फिर आत्मा और परमात्मा की शाश्वतता, शाश्वत जीवन और शाश्वत मूल्यों में विश्वास, नैतिक व्यवस्था को भौतिक व्यवस्था से उच्चतर मानने में विश्वास तथा इन विश्वासों के अनुसार आचार-व्यवहार करते हुए सदाचारी इंसान बनना उचित है?

सजनों उपरोक्त समस्त बिन्दुओं पर सूक्ष्मतया अपनी जाँचना करने से ज्ञात होता है कि दो तरह के इंसान होते हैं, एक अच्छा व दूसरा बुरा। दोनों का अपना-अपना स्वाभाविक रूप होता है। इस संदर्भ में आत्मनिरीक्षण कर अपने आप को परखना है कि अभी तक हम किस तरह के इंसान बन चुके हैं ...अच्छे या बुरे? यदि लगे कि बुरे इन्सान बन चुके हैं तो स्वयं में स्वाभाविक परिवर्तन लाकर अच्छा इंसान बनना अनिवार्य है। अन्य शब्दों में एक मानव होने के नाते हमारे लिए हर हाल में ईश्वर प्रदत्त विवेकशक्ति का इस्तेमाल करते हुए संतोष, धैर्य जैसे दिव्य गुण अपनाकर, सच्चाई-धर्म के निष्काम रास्ते पर सुदृढ़ता से डटे रहते हुए, परोपकार कमाना ही उचित है। सजनों यदि हम सुनिश्चित रूप से इस प्रयोजन में सफल होना चाहते हैं तो जानते हो इसके लिए विशेषत: हमें क्या करना होगा?

मौन।

इस हेतु हमें नकारात्मक सोचना, नकारात्मक बोलना व नकारात्मक कर्म करना बंद करना होगा व सकारात्मक यानि अच्छा-अच्छा सोचना, अच्छा-अच्छा बोलना व अच्छा-अच्छा ही करना शुरु करना होगा।  यहाँ स्पष्ट कर दें कि नकारात्मक चलन को मानव-धर्म के विपरीत होने के कारण, अधर्म युक्त, अविचारी,  विष तुल्य व सामाजिक रूप से अस्वीकार्य (यानि न मानने योग्य) तथा निंदनीय माना जाता है। इसके विपरीत सकारात्मक चलन को मानव धर्म के अनुकूल होने के कारण, विचार व धर्म युक्त अमृत तुल्य व सर्व सामान्य रूप से स्वीकार्य और यश कीर्ति का प्रतीक माना जाता है। जानो जहाँ नकारात्मक चलन आत्म विस्मृति का सूचक है वहीं सकारात्मक चलन आत्म स्मृति में बने रहने का द्योतक है। अत: केवल सकारात्मक चलन को अपना कर ही इंसान स्थिर बुद्धि बना रह सकता है और विवेकशक्ति के प्रयोग द्वारा अपना जीवन सहजता से सकारा कर, इस जगत में अपना नाम रोशन कर सकता है।

इस तथ्य के दृष्टिगत सजनों हमारे लिए बनता है कि हम आज तक स्वयं द्वारा अपनाई गई विचार प्रक्रिया का गहराई से विश्लेषण करें। फिर यदि लगे कि हम किसी कारणवश नकारात्मकता अपना चुके हैं तो अविलम्ब अपने ख़्याल को इस विष तुल्य चलन से उबार कर सकारात्मक विचारों पर केन्द्रित करें। ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि इंसान जिस प्रकार की विचार प्रक्रिया अपनाता है उसका ख़्याल वहीं केन्द्रित हो जाता है और तद्नुरूप ही उसकी अच्छी या बुरी स्वाभाविक बनत बनती है। कहने का आशय यह है कि यदि अच्छा सोचोगे व अच्छों का संग करोगे तो अच्छे बनोगे तथा यदि बुरा सोचोगे व बुरों का संग करोगे तो बुरे ही बनोगे। इस तरह अच्छा या बुरा बनना यह स्वयं आप द्वारा चयन की गई विचार प्रक्रिया पर ही निर्भर करता है।

इस संदर्भ में सजनों अंतत: हम तो यही कहेंगे कि अगर सत्य-धर्म के पथ पर निष्काम भाव से स्थिर बने रह परोपकार प्रवृत्ति में ढल, श्रेष्ठ मानव बनने का निश्चय लिया है तो बिना किसी तर्क के सकारात्मकता को अपना लेना। यह सकारात्मकता आपको प्रणव मंत्र यानि मूलमंत्र आद् अक्षर के साथ अजपा जुड़ने पर अंतरात्मा से प्राप्त होगी जिसके लिए अपने ख़्याल को आत्म यथार्थ में ठहराना होगा यानि ध्यान स्थिर करना होगा। यही नहीं यह सकारात्मकता ही शब्द ब्रह्म विचारों के रूप में समस्त वेद शास्त्रों में  व सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में विदित है। अतैव अध्ययन द्वारा अपने मन में उन परम श्रेष्ठ विचारों को ग्रहण कर उनमें मनन करने की दिलचस्पी पैदा कर, आत्मसात् करो और उसके आधार पर ईश्वर प्रदत्त विवेकशक्ति का उचित ढंग से प्रयोग करने की कला में प्रवीण बनो। निश्चित ही सजनों यदि यह कर लिया तो जो भी धारोगे केवल सत्य ही धारोगे व सदा विचारवान व सत्यवान बने रहोगे। इस तरह अपने यथार्थ की स्मृति बनी रहेगी और आपके लिए इस मिथ्या जगत में मनुष्यता अनुरूप धर्मसंगत शास्त्रविहित कर्म करते हुए सत्य को प्रतिष्ठित करना सहज हो जाएगा और परमेश्वर के सपुत्र कहला परमधाम के अधिकारी बनोगे। ऐसे बनो हाँ ऐसे बनो और ऐसे बनकर रौशन अपना नाम करो।