वृत्ति/स्मृति/बुद्धि-3

साडा है सजन राम, राम है कुल जहान

अर्थात् ईश्वर हमारा मित्र/प्रियतम सर्वव्यापक है, उसी को जानो, मानो व वैसे ही गुण अपनाओ।

 

शब्द है गुरु, शरीर नहीं है,

अर्थात् ज्ञानी को नहीं ज्ञान को अपनाओ और निमित्त में नहीं नित्य में श्रद्धा बढ़ाओ।

 

इस पर सुदृढ़ता से डटे रह, इस अटल सत्य पर स्थिर बने रहो:-

ओ3म् अमर है आत्मा, आत्मा में है परमात्मा

 

गत सप्ताह सजनों हमने जाना कि समुचित ढंग से सारे कार्य सम्पन्न करने हेतु एक इंसान की वृत्ति, स्मृति व बुद्धि सब निर्मल होनी चाहिए। इस विषय में अभी तक हम अन्दरूनी व बैहरूनी दोनों वृत्तियों की निर्मलता और उनके महत्त्व के विषय में अच्छी तरह समझ चुके हैं और यह भी जान चुके हैं कि वृत्ति निर्मल होने से स्मृति अपने आप निर्मल हो जाती है। आओ आज जाने कि वृत्ति से स्मृति की निर्मलता कैसे जुड़ी हुई है?

 

इस परिप्रेक्ष्य में सजनों जानो कि स्मृति और कुछ भी नहीं अपितु वह ज्ञान है जो स्मरण शक्ति के द्वारा प्राप्त होता है। अन्य शब्दों में यह ज्ञात विषय का ज्ञान है जिसे संस्कारजन्य ज्ञान भी कहते हैं। यह एक जटिल मानसिक प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत सीखना, धारण करना प्रत्यभिज्ञान (यानि पहचान या वर्तमान में किसी वस्तु को देखने पर पहले देखे हुए पदार्थ विशेष का स्मरण होकर "यह वही है" इस प्रकार का ज्ञान)  तथा पुन: स्मरण सम्मिलित है।

 

इस जटिल प्रक्रिया को जानने हेतु ध्यान से समझो कि जब ख़्याल बहिर्मुखी हो, ध्यान स्थिरता द्वारा नश्वर जगत/भौतिक वस्तुओं का बहिर्बोध करता है तो असत्य----मिथ्या धारणा द्वारा उसकी वृत्ति-स्मृति में उतरता जाता है। परिणामत: उसकी बुद्धि व भाव स्वभाव रूपी बाणा अस्वच्छ हो जाता है यानि उनका रूप-स्वरूप बिगड़ने लगता है और उसका आभा वृत्त मलिन हो जाता है। निज स्वरूप, ज्ञान, गुण व शक्ति के प्रति उसकी यही अचेतन/अवचेतन अवस्था ही आत्मविस्मृति का कारण बनती है।

 

इस आत्मविस्मृति के बाद, पुन: सत्-शास्त्र का विचार करने पर व सजन श्री शहनशाह हनुमान जी की युक्ति प्रवान करने पर जब इंसान को अपने वास्तविक स्वरूप की स्मृति आती है तो उसका ख़्याल अंतर्मुखी हो, ध्यान स्थिरता द्वारा अजर-अमर आत्मा के ज्ञान स्वरूप से परिचित हो, अंतर्बोध कर लेता है। ऐसा होने पर  सत्य धारणा द्वारा उसकी वृत्ति-स्मृति में उतर जाता है और "ईश्वर है अपना आप" का विचार उसकी स्मृति में ठहर जाता है। इस विचार के स्मृति में ठहरने का अर्थ, निज ज्ञान, गुण व शक्ति स्वरूप से परिचित हो पूर्णत: चैतन्य होने की बात होती है जिसके परिणामत: उसका आभा वृत्त निर्मल हो जाता है और वह इंसान सजन दयालु श्री रामचन्द्र जी की तरह पुरुषोत्तम कहलाता है। उसमें किसी प्रकार का मल या दोष नहीं होता और वह अपने आप में निर्दोष, निर्विकार, निष्कलंक, निर्भय, निर्वैर, निरासक्त अर्थात् पवित्रता से परिपूर्ण सदाबहार धर्मसंगत मर्यादित जीवन जीते हुए, सत्य को कुशलता से प्रतिष्ठित कर सकता है। इस तरह जीवन जीने की कला में पारंगत हो वह कलाधारी बन जाता है

 

ऐसी अद्भुत अवस्था में सजनों इंसान की बुद्धि में विशुद्धता से परिपूर्ण ब्रह्म शब्द विचारों अर्थात् आत्मिक ज्ञान के रूप में सद्-विचारों का अविरल प्रवाह बहता रहता है जिससे मन सदा शांत रहता है और चित्त में एकरस प्रसन्नता व आनन्द का अनुभव होता रहता है। परिणामत: उस आत्मिक ज्ञान को आत्मसात् कर चित्त वृत्तियाँ स्वत: ही बिना किसी यत्न के निर्मल रहती हैं और उस निर्मल वृत्ति व स्मृति इंसान का हृदय सदा आद् जोत के निर्मल प्रकाश से प्रकाशित रहता हुआ असीम शीतलता का अनुभव करता है। ऐसी स्थिति में उस आत्मज्ञानी के लिए निर्बाध अपना ख़्याल ध्यान वल व ध्यान प्रकाश वल रखना सहज हो जाता है तो मन मन्दिर में सुशोभित परमात्मा सदा दृष्टिगोचर रहता है। वह दृष्टिगोचर रहता है तो निज परमात्म स्वरूप के प्रति फिर कोई भ्रांति पैदा नहीं होती और न ही उसकी खोज में इधर-उधर भटकना पड़ता है। इस प्रकार इंसान जो सतवस्तु उसके पास है उसके स्वरूप व गुणों को धारण कर आत्मशक्ति स्वरूप को निहारता है और उसके समीप हो जाता है। इस अवस्था में स्थिरता से बने रहने पर जब दृष्टिगोचर अपने असली सत्य स्वरूप की पहचान हो जाती है तो स्वत: ही उस सजन के संतोष, धैर्य, सच्चाई, धर्म के सवाल हल हो जाते हैं और उस अपने असली सत्य स्वरूप की पहचान रखने वाले सत्-वादी के लिए सम का कोई सवाल नहीं रहता क्योंकि वह जान जाता है कि "जेहड़ा मन मन्दिर प्रकाश है, ओही असलीयत ज्योति स्वरूप मेरा अपना आप है"। इस प्रकार एक निगाह एक दृष्टि पर ख़ड़े होने पर वह दिव्य दृष्टि के सबक़ अनुसार एक दर्शन में स्थित हो जाता है। ऐसा होने पर उस जितेन्द्रिय व निष्कामी के लिए इस मायावी जगत में शारीरिक व जगतीय बंधनों से मुक्त होकर निर्लिप्तता से अपने जीवन का कारज सिद्ध करना सहज हो जाता है। तभी तो उस आत्मतृप्त इंसान के मन में काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार जैसे विषय-विकार नही पनपते और वासना नहीं सताती। इस अवस्था में वह अपनी विवेकशक्ति का कुशलता से प्रयोग करते हुए इस मायावी जगत के भ्रमजाल में नहीं फँसता और सदा एकरस यथार्थ अवस्था में बना रहता है। बस फिर तो मौजां ही मौजां क्योंकि उसके लिए समभाव-समदृष्टि के सबक़ अनुसार परस्पर सजन भाव का वर्ताव करना सहज हो जाता है। इस प्रकार वह सत्य-धर्म के निष्काम भक्ति भाव पर अटलता से बने रह उच्च बुद्धि, उच्च ख़्याल कहलाता है। तभी तो वह अपने अलौकिक स्वरूप में स्थित रह, शक्तिशाली होकर ईश्वर की आज्ञाओं का पालन करने में सदा तत्पर रहता है और उस निर्मल वृत्ति/स्मृति  की हर कृति निर्मल व सबके लिए मंगलमय होती है। यह अपने आप में जगत कल्याण हेतु परमार्थ के रास्ते पर बने रह परोपकार कमाने की बात होती है। इस अवस्था में मन पूर्णत: संकल्प रहित हो जाता है और ख़्याल ध्यान स्थिर हो मन मन्दिर में सुशोभित परमेश्वर में अखंडता से लीन रहता है। मन प्रभु में लीन रहता है तो इंसान की सुरत को एकान्त यानि निर्गुण में बने रहना भाता है यानि फिर संसारी बातों का कनरस नहीं सताता। तभी तो ऐसा इंसान न किसी की कोई ऐसी वैसी बात सुनता हे न सुनाता है यानि गुण-अवगुणों में नहीं फँसता अपितु निर्गुण स्वरूप में स्थित बना रहता है। इस प्रकार सुरत का निर्गुण में बने रहना जब उसके स्वभाव के अंतर्गत हो जाता है तो वह निर्बाध व निर्भयता से सहज ही निर्वाण पद प्राप्त कर लेती है यहाँ रूप, रंग, रेखा समाप्त हो जाती है। इस प्रकार परिपूर्णता को प्राप्त होते ही जब वह ख़ुद को भरा हुआ पाती है तो उसे अपना जीवन निर्वाह करने हेतु किसी अन्य पर निर्भर रहते हुए, अभागों की तरह तिरस्कार पूर्ण जीवन जीने की आवश्यकता नहीं रहती अपितु वह तो अति उमंग व उत्साह के साथ अपने स्वार्थ व परमार्थ के कर्त्तव्य सहर्ष निभाते हुए सदा आनन्द को प्राप्त रहती है।

 

उपरोक्त विवेचना से सजनों वृत्ति के साथ-साथ स्मृति के निर्मल होने की प्रक्रिया व महत्ता स्पष्ट होती है परन्तु इस संदर्भ में यह जानना भी अनिवार्य है कि भूली हुई बात/तथ्य/स्वरूप के स्मरण में आने से उसकी वास्तविकता का अनुभव तो हो सकता है पर उसका बोध नहीं हो सकता यानि वह हमें प्राप्त नहीं हो सकती। आत्मस्वरूप के परिप्रेक्ष्य में उसका बोध करने के लिए हमें उसके मूल आधार स्वरूप परमेश्वर का सतत् संग करने की आवश्यकता होती है। अफुरता से परमेश्वर के संग रहने पर हम उस द्वारा प्रदत्त शब्द ब्रह्म विचारों को आत्मसात् कर तद्नुरूप अपना आचार-व्यवहार ढाल सकते हैं और ईश्वर सम बन सकते हैं।

 

यहाँ हम समझते हैं कि आप सब भी स्वीकारोगे कि अपने अनादि स्वरूप की स्मृति आने पर यदि हम केवल उसको याद ही करते रहें या उसके गुण ही गाते रहें और उसे अपने हृदय रूपी घर में बुला उसका साक्षात्कार कर उससे बातचीत न करें तो उस संग स्नेह नहीं पनप सकता। स्नेह नहीं पनपता तो कैसे हम उसके ज्ञानयुक्त विचारों व दिव्य गुणों को जान, उन जीवनदायक विचारों व दिव्य गुणों को उचित ढंग से अपनाने की युक्ति समझ सकते हैं? ऐसे में उन्नति कैसे कर सकते हैं? याद रखो संग रहने पर ही स्नेह पनपता है। स्नेह से ही समीपता बनती है यानि दिल और दिमाग एक हो, इको दिल हो जाते है। समीपता से ही मन-मस्तिष्क में नित्य अविनाशी स्वरूप की स्थिति बनी रहती है। यही स्थिति सुरत के अखंड सुहागन होने का प्रतीक होती है। जानो अटल सुहागन निर्विकारी सुरत ही इस संसार में विशेष रुप से रहते हुए भी, सबसे न्यारा जीवन जीती है। कहने का आशय यह है कि परमेश्वर संग रहते हुए, उस प्रभु के रंग में रंगने हेतु, सुरत के लिए ध्यान स्थिर होकर, उस परमपिता परमेश्वर के ज्ञान व गुण ग्रहण करना आवश्यक होता है और फिर उन सम ज्ञानी व गुणी बन उन्हीं की तरह शक्तिशाली होकर निर्भयता व निर्लिप्तता से अकर्त्ता भाव से जीवन जीने की कला सीखनी होती है।

 

इस संदर्भ में इस संसार में विचरते हुए उस जीव को सदा यह याद रखना होता है कि वह जगत में परमेश्वर की आज्ञा अनुसार किसी विशेष प्रयोजन की सिद्धि हेतु भेजा गया है और वह उस कार्य को उन्हीं के निर्देशन में बने रहने पर ही, समयबद्ध सफलता से सिद्ध कर, उनका आज्ञाकारी सपुत्र कहला सकता है और उनकी कृपा प्राप्त करने का पात्र बन सकता है। इस बात को समझते हुए सजनों हमारे लिए भी बनता है कि हम भी इस दिशा में लगन से व तेजी से आगे बढ़ें यानि सजन श्री शहनशाह हनुमान जी के निर्देशन में स्थिरता से बने रह उनकी हर बात व विचार को भली-भांति समझ कर अपनाने की रीति अपने स्वभाव के अंतर्गत कर लें यानि हाँ जी करना सीखे। याद रखो जो भी पुरुषार्थी इंसान इस ढंग से इस जगत में विचरता है केवल वह ही सभी मायावी बन्धनों से मुक्त रह अपनी यथार्थ अवस्था में बना रह पाता है और सुनिश्चित रूप से अपने मन सहित इस जगत पर फतह पा लेता है।

 

अंतत: सजनों जानो कि परमात्म स्वरूप ही सदा स्मरणीय है। इसको स्मृति में रखने से किसी प्रकार के वियोग की संभावना नहीं रहती और विरह की पीड़ा नहीं भुगतनी पड़ती अपितु सदा विचार, सत्-ज़बान, एक दृष्टि, एकता और एक अवस्था बनी  रहती है। इसके विपरीत किसी देखी, सुनी अथवा बीती हुई बात को स्मृति में रखने से मन में कल्पना उठती है और संकल्प झुखता है व इंसान रोता है। इस कल्पना व झुखने-रोने से बचाने हेतु ही सच्चेपातशाह जी कहते हैं:-

कल्पना छोड़ जगत दी सारी ख़्याल कृष्ण जी नाल जोड़ लवो

ओही हिन साडे ओ साथी मुख जगत वल्लों मोड़ लवो

 

इस संदर्भ में याद रखो जो भूतकाल की बातों/सुखों को याद कर सदा झुखता-रोता रहता है यानि उदास व मायूस रहता है, उसका ऐसे स्वभाव में ढलना काम युक्तता का परिचय देता है। इसके विपरीत जो पिछली बातों (जिनसे काम उत्तेजित हो व मोह बंधन उत्पन्न होने की आशंका हो) को भूलने में ही भलाई समझता है वह समझदार कहलाता है और अपने स्वरूप में यथा बना रह, सत्य अनुरूप धर्मसंगत आचार-व्यवहार करने में सक्षम हो पाता है।

 

आप सब भी सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ के अनुसार अपनी वृत्ति-स्मृति व बुद्धि को निर्मल रखने वाले ऐसे समझदार इंसान बन सको इस हेतु आगामी सप्ताह आपको बुद्धि की निर्मलता की महत्ता जनाएँगे।