प्रकाश-3

साडा है सजन राम, राम है कुल जहान

अर्थात् ईश्वर हमारा मित्र/प्रियतम सर्वव्यापक है, उसी को जानो, मानो व वैसे ही गुण अपनाओ।

 

शब्द है गुरु, शरीर नहीं है,

अर्थात् ज्ञानी को नहीं ज्ञान को अपनाओ और निमित्त में नहीं नित्य में श्रद्धा बढ़ाओ।

 

इस पर सुदृढ़ता से डटे रह, इस अटल सत्य पर स्थिर बने रहो:-

3म् अमर है आत्मा, आत्मा में है परमात्मा

 

सजनों हम सब सजन परमानन्द प्राप्त कर परमधाम में विश्राम पाएं उसके लिए श्री साजन परमेश्वर हम कलुकालवासियो पर अपनी विशेष कृपा दृष्टि रखते हुए अपने यथार्थ से व जीव, जगत व ब्रह्म के खेल से परिचित कराने हेतु क्या कहते हैं, अति ध्यानपूर्वक सतर्कता से सुनो:-

 

1 सब सजन आँखे बंद कर लो और ख़्याल द्वारा आद् अक्षर का अफुरता से युक्तिसंगत जाप करते हुए हृदय में आत्मप्रकाश का अनुभव करते हुए ए विध् ब्रह्मसत्ता को ग्रहण करो कि आपका ख़्याल ध्यान स्थिर हो अजपा जाप अवस्था को प्राप्त कर शांत और मौन हो जाए और हृदय स्थित सत्य प्रकाशित हो उठे। इस हेतु अपने मन पर अंकुश रखते हुए सचेतन बने रहो।

 

2 सजनों हृदय स्थित सत्य के प्रकाशित होने का अर्थ होगा कि ब्रह्मसत्ता ग्रहण करने की क्रिया आरम्भ हो गई। सजनों जब यह क्रिया आरम्भ हो जाए तो इस प्रकार अपने ध्यान को स्थिर कर लो कि किसी प्रकार का कोई फुरना या सोच आपके मार्ग में अवरोध उत्पन्न न कर सके। अब ख़्याल को शब्द ब्रह्म के साथ जोड़ो और उसे जानने का प्रयास करो।

3 तत्पश्चात् नाम का अफुरता से विधिवत् जाप करते हुए आत्मप्रकाश में निहित निज परमात्म स्वरूप का अनुभव करो। इस संदर्भ में याद रखो कि श्री साजन परमेश्वर कहते हैं कि हम ही बिन सूरजों प्रकाशित, ज्योति स्वरूप परब्रह्म परमेश्वर सिरजनहारा हैं और हमारा कोई रूप, रंग, रेखा नहीं है। सजनों इस सत्य का बोध कर सब भ्रमों से आजाद हो जाओ।

 

4 अब परमेश्वर का जो प्रकाश मन मन्दिर में देखा है, जग अन्दर उसी प्रकाश के होने का अनुभव करो और इस अनुभव द्वारा ईश्वर के विराट् दर्शन यानि सर्वव्यापकता को समझो।

 

5 इस तरह बोध करो कि:-

जनचर, बनचर, जड़-चेतन सब में ज्योति स्वरूप एक वही प्रकाश है।

कोना-कोना, डाली-डाली, अन्दर-बाहर, घट-घट में, हद-हद में पब-पब में, आद्-अन्त, अनंत-बेअन्त, आदि-अनादि-प्रमादि, विराट् नगरी, कुल दुनियां अन्दर वही प्रकाश ही प्रकाश है।

सर्व-सर्व यानि धरती-आकाश, सूरज-चाँद, सितारे, जल-थल, पवन और पानी सप्तद्वीप, भूमंडल,

गगनमंडल, नौखंड सारा ब्रह्माण्ड, सब उसी प्रकाश से प्रकाशित है।

अर्थात्

सर्गुण, निर्गुण, निर्वाण, परमधाम बिन सूरजों उसी का चमत्कार है।

 

इस सत्य को सजनों स्वीकारो। ऐसा करने से सजनों स्वत: ही "जो प्रकाश मन मन्दिर में देखा है, उसी प्रकाश के जग अन्दर व्याप्त होने का यथार्थ समझ में आ जाएगा यानि सत्य बोध हो जाएगा। जब ऐसा हो जाए तो इस सत्य को धारण करो और समभाव समदृष्टि के सबक़ अनुसार सबसे सजनता का व्यवहार करते हुए विचार, सत्-ज़बान, एक दृष्टि, एकता एक अवस्था में स्थित हो जाओ। याद रखो ऐसा करने से ही परमधाम पहुँच विश्राम को पा सकोगे।

 

6 इतनी उपलब्धि के दृष्टिगत सजनों मानो कि यह कोई कठिन कार्य नहीं है अपितु अभ्यास द्वारा इस कार्य की सहजता से सिद्धि हो सकती है यानि यह आपके स्वभाव के अंतर्गत हो सकता है। स्वभाव के अंतर्गत होने का अर्थ है कि फिर दैनिक कार्य व्यवहार करते हुए आप अपने स्वरूप में स्थित बने रह सकते हो। अत: मजबूती में आओ, मजबूती में आओ, मजबूती में आओ।

 

7 आप सब ऐसा करने में कामयाब हो सको इस हेतु जानो कि, जैसे सूर्य के प्रकाश के ग्रहण द्वारा यह प्राणी जगत दृष्टिगोचर हो जाता है, ठीक वैसे ही बिन सूरजों प्रकाशित, प्रकाश के उस परम रुाोत यानि परमेश्वर के प्रकाश को ग्रहण करने पर ही हम अंतर्जगत की वास्तविकता से परिचित हो सकते हैं अर्थात् आत्मिक सत्ता, आत्मिक गुणों व आत्मिक बल/शक्ति को पहचान "विचार ईश्वर है अपना आप" इस तथ्य का सत्य बोध कर सकते हैं। इस महत्ता के दृष्टिगत ही सजनों सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में भी कहा गया है:-

"मूल मंत्र है शब्द गुरु, मूल मंत्र है शब्द गुरु सजन श्री शहनशाह हनुमान जी ने मूल मंत्र शब्द को गुरु बताया और कहा कि हे इन्सान यह तेरी ही ब्रह्म सत्ता है। अगर तूं इस महान सत्ता को ग्रहण कर ले तो तू खुद ही भगवान है और साथ यह वर्ताव बताया कि शब्द में जुड़कर सजन भाव और गृहस्थ धर्म के वचनों पर परिपक्व हो, फिर जो प्रकाश तुम ने मन मन्दिर में देखा है वही प्रकाश सारे जग में दिखाई देगा। उस प्रकाश में अटल होकर हर हालत में एक रस रहो क्योंकि तू अजन्मा है, तेरी आत्मा अमर है। एक आत्मा होकर तू देखेगा कि सर्व सर्व वही ब्रह्म ही ब्रह्म है। फिर ब्रह्म विशेष भी है निर्लेप भी है और रूप रंग रेखा से बाहर है।"

इस तथ्य को समझते हुए सजनों मूलमंत्र आद् अक्षर के अजपा जाप द्वारा सर्वव्याप्त अपनी ब्रह्म सत्ता को ग्रहण करने के स्वभाव में ढलो और ए विध् अपने हृदय को सदा एकरस प्रकाशित रखो।

 

8 इस संदर्भ में यह भी जानो कि, उस परमेश्वर के प्रकाश को ग्रहण कर जैसे यह सूरज, अपनी प्रकाशित किरणों के तेज व बल से, इस धरती की ऊसरता/बंजरता को नष्ट कर इसे उपजाऊ बनाना अपना धर्म समझता है, जैसे उस सूरज के प्रकाश को ग्रहण कर, यह धरती जगत कल्याण हेतु, आहार रूप में प्राणी जगत का समुचित पालन-पोषण करने के लिए, अनेक प्रकार के रसीले फल, फूल, शाक, अन्न आदि उपजाना निज धर्म समझती है, ठीक वैसे ही हमें भी मूलमंत्र आद्-अक्षर के रूप में सर्वव्याप्त अपनी ब्रह्म सत्ता को ग्रहण कर, अपना व कुल समाज का समुचित ढंग से पालन पोषण करना निज धर्म समझना है। यह निष्कामता से परोपकार कमाने की बात है।

 

9 इस हेतु अपने मन में विचार करो कि जब सूरज, धरती यानि ईश्वर की सारी बनत परमेश्वर के प्रकाश से प्रकाशित हो, उसी के हुक्म अनुसार, सर्वहित हेतु अपने कर्तव्यों का पालन, धर्मसंगत निष्कामता से निभाने में ही अपना गौरव व कल्याण समझती है तो हम मानव, परमेश्वर की सर्वश्रेष्ठ कलाकृति क्यों कर, तन-मन-धन के प्रभाव में आकर, ईश्वरीय हुक्म की अवेहलना कर निज धर्म हार बैठते हैं और अधर्म का रास्ता अपनाने जैसा विनाशकारी कृत्य करने की भूल कर बैठते हैं? जानो सजनों यही कारण है कि फिर अमरधर्मा मानव होने के बावजूद हम आवागमन के चक्रव्यूह में फँस, बारम्बार जन्म-मरण की पीड़ा भोगते हैं। सजनों हमारे साथ अब फिर से ऐसा न हो इस हेतु इस तथ्य को गहनता से समझो और ईश्वर की अन्य कल्याणकारी बनत यथा सूरज, चाँद, तारे, धरती आदि के समरूप ही, निष्काम भाव से सत्य धर्म पर डटे रह अपने कर्त्तव्य समयबद्ध पूरा करने में ही अपनी शान समझो।

 

अंतत: सजनों मानो कि प्रकाश ही जीवन है। अत: जगत के समस्त कार्यव्यवहार करते हुए इसी प्रकाश में ही अपने ख़्याल को ध्यान स्थिर रखो ताकि आप अपने यथार्थ में बने रह व यथार्थता से जीवन जीते हुए अपना जीवन चरित्र सुन्दर व परम पवित्र बना सको।

 

इस परिप्रेक्ष्य में मत भूलना कि प्रकाश का निरर्थक क्रियाओं में प्रयोग करना नुकसानदायक है। इससे शारीरिक, मानसिक बल तो दुर्बल होता ही है साथ ही आत्मिक शक्ति भी क्षीण हो जाती है। फलत: मानव अपने ज्ञान व गुणों दोनों से ही अपरिचित हो, जगतीय ज्ञान व गुणों को अपनाकर मिथ्याचारी बन जाता है। ऐसा न हो इसलिए आप अपने ख़्याल को ध्यान वल व ध्यान को प्रकाश वल रखने वाले, अलौकिक शक्ति के प्रतीक बनो और अपने ह्मदय को सदा प्रकाशित रखते हुए आत्मिक ज्ञान का युक्तिसंगत प्रयोग करते हुए गुणवान व बुद्धिमान कहलाओ।

 

याद रखो आत्मिक ज्ञान एवं बुद्धि दोनों ही सुषुम्ना नाड़ी के बीचों-बीच दोनों भौंवों के मध्य दो दल के कमल के आकार के माने हुए पदम्-कार चक्र के रूप में स्थित हैं। इस केन्द्र बिन्दु पर स्थित रहने से ही आत्मिक ज्ञान के रूप में ईश्वर की आज्ञाएँ/उपदेश बुद्धि को प्राप्त होती हैं। तदुपरांत इन आज्ञाओं को अमल में लाने वाला इंसान ईश्वर के निमित्त ही समर्पित भाव से निष्कामता से सब कुछ करता हुआ परमेश्वर का कर्त्तव्यपरायण भक्त/सपुत्र कहलाता है और ए विध् कर्म फल से मुक्त बना रहता है और ब्रह्म नाल ब्रह्म हो अपना जीवन सफ़ल बनाता है।

 

सबकी जानकारी हेतु आगामी सप्ताह इसी प्रकाश की सर्व सर्व फैली हुई रोशनी/लाईट के चमत्कार के विषय में जानेंगे।