अमरपद प्राप्ति हेतु सजन श्री शहनशाह हनुमान जी के आगे प्रार्थना

साडा है सजन राम, राम है कुल जहान

अर्थात् ईश्वर हमारा मित्र/प्रियतम सर्वव्यापक है, उसी को जानो, मानो व वैसे ही गुण अपनाओ।

 

शब्द है गुरु, शरीर नहीं है,

अर्थात् ज्ञानी को नहीं ज्ञान को अपनाओ और निमित्त में नहीं नित्य में श्रद्धा बढ़ाओ।

 

इस पर सुदृढ़ता से डटे रह, इस अटल सत्य पर स्थिर बने रहो:-

ओ3म् अमर है आत्मा, आत्मा में है परमात्मा

 

जैसा कि यह सत्य सर्वविदित ही है कि सजन श्री शहनशाह हनुमान जी ही सबसे श्रेष्ठ, सबसे विद्वान, सबसे गुणवान, सबसे बलवान, सबसे धनवान, सबसे बुद्धिमान व सारी दुनियां विचों ज्ञानवान हैं। वह ही चार वेद, छ: शास्त्रों के महरम व कुदरती सार्इंस के श्रेष्ठतम सांईसदान हैं तथा युग-युग में प्रभावी होने वाली धर्मनाशक शक्तियों का अपने बल, बुद्धि एवं पराक्रम द्वारा विनाश कर, पुन: धर्म की स्थापना करने वाले हैं। इतना ही नहीं सजनों वह ही समभाव-समदृष्टि की सूक्ष्म युक्ति व शब्द गुरु का मंत्र बताकर, ख़्याल का सम्पर्क सीधा नित्य के साथ जोड़ने वाले हैं और इस तरह विभिन्न निमित्त रूपों व सेवक-स्वामी, भक्त-भगवान व गुरु-चेले वाले बाल-अवस्था के द्वि-भाव युक्त भक्ति-भावों के बंधन से मुक्त करा, निष्कामता से अपने असली घर परमधाम पहुँचने का सुगम मार्ग दर्शाने वाले हैं। सजनों उन अजर-अमर हस्ती द्वारा बक्षा हुआ नाम-ध्यान, युक्ति व विचार अतुलनीय है क्योंकि इसी के द्वारा वह अपने प्यारों को प्रतिबिम्ब का नज़ारा दिखा, अजर-अमर बनाने वाले हैं व उनका जन्म-मरण मिटा मौत के भय से मुक्त कराने वाले हैं।

 

सजनों हम यह भी जानते हैं कि सर्वमहान वैद्यों के वैद्य सजन श्री शहनशाह हनुमान जी ही मनमत से बचा गुरमत की खैर पा, घर-घर में लगी तृष्णा की आग को नाम रूपी वर्षा द्वारा बुझा, पाँचों विषय-विकारों से छुटकारा दिला, हौं-मैं का रोग हटा, संकल्प-विकल्प से छुटकारा दिला, तीनों तापों को मिटा, कर्म-बन्धनों को काटने वाले हैं तथा वह ही सबकी आस पुजा, तमाम संशय-भ्रम मिटा, चिर स्थाई शान्ति प्रदान कर जीवन मुक्त बना, भव-सागर से पार लगाने वाले हैं। यही नहीं वह उच्च सुमति वाले यानि मति और बुद्धि के भण्डार ही, सबकी मति, बुद्धि और प्रेरणा को सावधान बना, सुमति बक्षने वाले हैं और अज्ञान का बादल हटा शब्द-सुरति का मेल कराने वाले हैं। इस तरह वह पातशाहवाँ दे शाह ही, रोते हुओं को हंसा, उजड़े हुओं को बसा, गिरते हुओं को उठा, सोए हुओं को जगा व कुरस्ते पड़े हुओं को रास्ते पर ला, उनकी लाज बचाने वाले हैं यानि बिगड़ी सँवारने वाले हैं। 

 

स्पष्ट है सजनों वह दु:ख भंजन परमपिता ही अपनी सूझ-बूझ से सभी उलझनों व संकटों को मिटा, तमाम विपत्तियों का हरण कर, झगड़े मिटाने वाले हैं व गुप्त प्रकट होकर अकत्र्ता रूप में जगत के सारे कारज सिद्ध करने वाले हैं। यह जानते समझते हुए सजनों हमारे लिए बनता है कि जो अजीत, रणधीर, जगदीश, रहीश, प्रतिपालों के प्रतिपाल व भक्ति एवं शक्ति के राजे हैं व जिनके बल और तेज के सामने सारी सृष्टि काँपती है और जिनकी लीला का अंत शेष गणेष भी नहीं पा सकते, उन बलधारी, ब्राहृचारी, संकटटारी, असुरसिंहारी, जगत भंडारी, भक्त हितकारी, परोपकारी, गदाधारी, तेजधारी, न्यायकारी, शहनशाहों के शाह को प्रसन्न कर, तदनुकूल ढलने के लिए, प्रतिदिन उनके प्रति अपनी श्रद्धा, सम्मान, विनय आदि प्रकट करने का कृत्य नतमस्तक हो पूर्णत: समर्पित भाव से  झुकाव में आकर करें। आओ अपने आराध्य तुल्य बन, अपना परमार्थ व स्वार्थ दोनों ही सँवारने हेतु प्रतिदिन हमने यह क्रिया कैसे सम्पन्न करनी है, इसकी विधि जानते हैं:-

 

सब सजन शांत हो जाओ और सजन श्री शहनशाह हनुमान जी का संग प्राप्त करने हेतु, सर्वप्रथम सजन श्री शहनशाह हनुमान जी की परम पावन, सुन्दरता से परिपूर्ण सशक्त चारित्रिक छवि का अपने ह्मदय में अनुभव करते हुए उनके आगे नतमस्तक हो करबद्ध प्रार्थना करो:-

धन मेरे सजन श्री शहनशाह हनुमान जी महाराज सब तों श्रेष्ठ, सब तों विद्वान, सब तों गुणवान, सब तों बलवान, सब तों धनवान, सब तों बुद्धिमान, सारी दुनियां विचों ज्ञानवान सजन श्री शहनशाह हनुमान जी महाराज दोनों भुजा पसार कर धरूँ चरणों पर सीस मेरी कोट कोट प्रणाम।

सजनों इस प्रार्थना में वर्णित सजन श्री शहनशाह हनुमान जी की प्रमुख विशेषताओं को अर्थ सहित समझो और जानो कि इस के माध्यम से, सतवस्तु का कुदरती ग्रन्थ आपको किस प्रकार उस सर्व महान तेजस्वी की ही तरह, अपनी भावात्मक व स्वाभाविक चारित्रिक छवि को उज्ज्वल, निर्मल, ओजस्वी व असीम सुन्दर बनाने का निर्देश दे रहा है:-

 

श्रेष्ठ अर्थात् निज ब्रह्म सत्ता को ग्रहण कर, अंतर्निहित सर्वोत्तम विष्णु स्वरूप को उजागर करने हेतु आप अपने अन्दर उत्तमता यानि सजनता का भाव विकसित कर सर्व कल्याणकारी बनो व इस तरह सजन युग की बुनियाद पक्की कर दो।

 

विद्वान अर्थात् आत्मा का स्वरूप जान, आप परमात्मा की सर्वज्ञता का बोध करने वाले बनो व इस तरह तदनुरूप यथार्थता से विचारयुक्त जीवन जीना सुनिश्चित करो।

 

गुणवान अर्थात् अपनी यथार्थ पहचान करने हेतु आप गुण और दोष का विचार करते हुए, अंतर्विद्यमान गुणों को जान-परख कर, एक सजन पुरुष की तरह, अच्छे स्वभावों में ढलते हुए, उन सद्गुणों का प्रयोग करने की कला में पारंगत बनो व इस तरह यश-कीर्ति प्राप्त करो। इस प्रकार प्रकृति के सत्व, रज और तम इन तीनों गुणों पर प्रभुत्व रखते हुए परमात्मा की तरह निर्वैर, निर्भय, निरासक्त, निर्विकार, निष्कलंक जीवन जीने के योग्य बनो।

 

बलवान अर्थात् ताकतवर बन आप शंख चक्र गदा पद्मधारी श्री विष्णु भगवान की तरह  दृढ़ता व निर्भयता से हर कार्य सिद्ध करने में समर्थ बनो।  इस प्रकार एक कर्तव्यपरायण इंसान की तरह अपना सबके प्रति फ़र्ज़ अदा हँस कर करते हुए अपना घर सतयुग बना लो।

 

धनवान अर्थात् शब्द ब्रह्म विचारों के ग्रहण द्वारा परमार्थी धन से सम्पन्न हो आप संतोषी इंसान की तरह, धीरता से सत्य-धर्म के निष्काम भक्ति भाव पर निषंग बने रहने में समर्थ बनो व इस तरह हर प्रकार की कामना व लालसा से मुक्त रह सदा प्रसन्नचित्त व शांत बने रहो।

 

बुद्धिमान अर्थात् एक समझदार इंसान की तरह आप चेतनायुक्त जीवन जीते हुए, एकता व एक अवस्था में आजीवन स्थिर बने रहो व इस तरह विषयमुक्त हो, हर प्रकार के बुद्धिभ्रम व बुद्धिभ्रंशता से छुटकारा पा, आनन्द से अपनी जीवन यात्रा सम्पन्न करो यानि परमधाम पहुँच विश्राम को पा लो।

 

ज्ञानवान अर्थात् एक आत्मज्ञानी की तरह, आप अपने मन या विवेक में ब्राहृ, आत्मा और ईश्वर आदि के सम्बन्ध आदि के सच्चे और यथार्थ ज्ञान का बोध रखते हुए, ब्रह्मज्ञानी बनो  व इस तरह आत्मविश्वास के साथ दिव्य दृष्टि का सबक प्राप्त कर आवागमन से मुक्त हो जाने का पराक्रम  दिखाओ।

सजनों अब जब हमें यह समझ में आ गया है कि प्रतिदिन सजन श्री शहनशाह हनुमान जी की प्रार्थना को करने का भावाशय क्या है, तो यह जानने के पश्चात् हमारे लिए बनता है कि हम अर्थों सहित उनके इन विशेष गुणों को, अन्दरूनी वृत्ति में ग्रहण करें व इस तरह युक्ति अनुसार उन जैसे ही सदाचारिता के प्रतीक भाव-स्वभाव अपना कर, अपनी बैहरूनी वृत्ति अर्थात् मन-वचन-कर्म द्वारा, उन गुणों को अपने व्यवहारिक रूप में, यथा प्रकट करने का दृढ़ संकल्प लें।

जान लो यदि एक दृढ़ निश्चयी की भांति सुदृढ़ बने रह, इस संकल्प पर पूरी तरह से खरे उतरें तो मन में किसी प्रकार का यानि आध्यात्मिक, आधिदैविक व आधिभौतिक ताप यानि दु:ख नहीं उपजेगा। फलत: आधि-व्याधि से स्वतन्त्र रह आजीवन तन्दुरूस्त, निरोगी व सशक्त बने रह, एक अवस्था में सधे रहोगे। आशय यह है कि  फिर अखंडता से अपनी सुरत यानि ख़्याल को शब्द अर्थात् परमतत्त्व के संग जोड़े रख, सचेतन बने रहोगे और अपने वास्तविक स्वरूप, ज्ञान व शक्ति का अनुभव कर पाओगे। इस तरह फिर अपने परमार्थिक दिव्य स्वरूप का अनुभव करने पर हमारे अन्दर दैविक व भौतिक शक्तियों की शरणागत हो, तदनुसार जीवन जीने का तौर-तरीका अपनाने की कामना जाग्रत नहीं होती और हम "विचार ईश्वर है अपना आप" के भाव पर स्थिरता से बने रह, आत्मोद्धार करने हेतु, सत्य-धर्म का निष्काम रास्ता अपनाने में सफल हो जाएंगे। फलत:  मन सदा तुष्ट व शांत रहेगा और हम समबुद्धि हो अपनी विवेकशक्ति का सही अर्थों में इस्तेमाल करते हुए निर्बाध अपने जीवन का प्रयोजन सिद्ध कर लेंगे।

इसी उपलब्धि के दृष्टिगत सजनों सच्चेपातशाह जी सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ के माध्यम से सजन श्री शहनशाह हनुमान जी की उपमा करते हुए कह रहे हैं:-

उपमा कही न जाए महाबीर जी दी उपमा कही न जाए,

उपमा कही न जाए, उपमा कही न जाए।।

अंजनी माता पई हर्षावे, जिस लाल महाबीर पाये,

महाबीर जी दी उपमा कही न जाए, महाबीर जी दी उपमा कही न जाए।।

राम लक्ष्मण को मिलने आये,  ब्राह्मण रूप बनाये,

महाबीर जी दी उपमा कही न जाए, महाबीर जी दी उपमा कही न जाए।।

राम लक्ष्मण नूं मोंढियां ते चाके, सुग्रीव नूं जाके मिलाये,

महाबीर जी दी उपमा कही न जाए, महाबीर जी दी उपमा कही न जाए।।

लंघ समुद्र लंका नूं जावन, विभीषण नूं मन्त्र सिखाये,

महाबीर जी दी उपमा कही न जाए, महाबीर जी दी उपमा कही न जाए।।

सीता माता पई घबरावे, मुन्दरी जाए दिखाए,

महाबीर जी दी उपमा कही न जाए, महाबीर जी दी उपमा कही न जाए।।

बाग उजाड़ लंका नूं साड़यो, राक्षस मार गिराए,

महाबीर जी दी उपमा कही न जाए, महाबीर जी दी उपमा कही न जाए।।

माता जी दा चूड़ामणि लिया के, रघुनाथ जी नूं सन्देशा पहुंचाये,

महाबीर जी दी उपमा कही न जाए, महाबीर जी दी उपमा कही न जाए।।

ऋषि मुनि उपमा कर नहीं सकदे, रघुनाथ जी वी दिल में हर्षाये,

महाबीर जी दी उपमा कही न जाए, महाबीर जी दी उपमा कही न जाए।।

मैं दासी तुहाडे चरणां दी चाकर, ऋषि मुनि गुण गाये,

महाबीर जी दी उपमा कही न जाए, महाबीर जी दी उपमा कही न जाए।।