परमार्थ दृष्टि-2

साडा है सजन राम, राम है कुल जहान

अर्थात् ईश्वर हमारा मित्र/प्रियतम सर्वव्यापक है, उसी को जानो, मानो व वैसे ही गुण अपनाओ।

 

शब्द है गुरु, शरीर नहीं है,

अर्थात् ज्ञानी को नहीं ज्ञान को अपनाओ और निमित्त में नहीं नित्य में श्रद्धा बढ़ाओ।

 

इस पर सुदृढ़ता से डटे रह, इस अटल सत्य पर स्थिर बने रहो:-

ओ3म् अमर है आत्मा, आत्मा में है परमात्मा

 

गत सप्ताह सजनों हमने जाना कि परमार्थ दृष्टि वह चिन्तन-धारा है जिसमें हम व्यक्त और गोचर जगत के हित-चिन्तन से भी आगे अव्यक्त और अगोचर शक्ति/सत्ता में आस्था रखकर, तद्नुसार श्रेयस्कर, कल्याणकारी आचरण व ध्यान में लीन रहते हैं। इस प्रकार इस उपक्रम के अंतर्गत हम संसार को क्षणभंगुर व बहिर्गत मानकर, मर्यादित संयमित व्यवहार द्वारा सब कार्यव्यवहार अकर्ता भाव से करते हुए, जगत से निर्लिप्त रहते हैं और समभाव-समदृष्टि की युक्ति अनुसार सर्व में ही आत्मेश्वर का दर्शन कर परस्पर सजन भाव का व्यवहार करते हुए, परोपकार कमाते हैं।

 

इस संदर्भ में सजनों अब आगे जानो कि परमार्थ से बढ़कर कोई धर्म नहीं है। इस संसार में "स्व" और "पर" का विभेद ही सांसारिक माया है। आशय यह है कि हम अधिकांश कार्य स्वार्थ भावना से ओत-प्रोत हो, अपने हितार्थ करते हैं किन्तु "स्व" की संकुचित सीमा से निकलकर "पर" के लिये निष्काम भाव से अपना सर्वस्व बलिदान करना ही सच्ची मानवता है। यही धर्म है और यही पुण्य है। आत्मिक सुख और जीवन की शान्ति के लिये इसी प्रकार की परमार्थ दृष्टि का होना परम आवश्यक है।

 

यदि ध्यान से देखों तो "परमार्थ-दृष्टि" शब्द विन्यास से यह स्पष्ट भी होता है कि "पर" उपसर्ग में "अर्थ" प्रत्यय लगने से "परार्थ" और संस्कृत स्वरूप प्रदान करके "परमार्थ" शब्द का सृजन हुआ है जिससे "परहित" या "लोकहित" शब्दार्थ निरुपित होता है एवं इस प्रकार की विचारधारा से अलंकृत स्वरूप संयोजन से जो "दृष्टि" बनती है वह "परमार्थ-दृष्टि" कहलाती है।

 

कहने का आशय यह है कि मनुष्य की दो वृत्तियाँ होती हैं यथा स्वार्थ वृत्ति और परमार्थ वृत्ति। स्वार्थ से पृथक यह परमार्थ या परहित वृत्ति ही उसकी परोपकारी दृष्टि का निर्माण करती है। इसमें अपने सिवाय दूसरों के हित को ध्यान में रखकर, सबके कल्याणार्थ तन-मन-धन से अपना सहयोग दिया जाता है। देखा जाए तो मानवता का उद्देश्य और मानव जीवन की सार्थकता भी इसी में है कि वह अपने कल्याण के साथ दूसरों के कल्याण की भी सोचे यानि उसका कर्त्तव्य है कि स्वयं उठे और दूसरों को भी उठाये और इस प्रकार अपने धर्म या कर्त्तव्य का निष्ठापूर्वक पालन करे।

 

उपरोक्त तथ्य से सजनों स्पष्ट होता है कि मनुष्य जीवन का उद्देश्य केवल यही नहीं कि वह अपने आप को विषय-वासनाओं में व्यस्त कर भोग विलास का साधन बना दे अपितु उसका प्रयोजन तो निष्काम व निष्कपट भाव से परमार्थ कमाने से सिद्ध होता है। ऐसा इसलिए भी कह रहे हैं क्योंकि जीवन के जितने भी कृत्य एक मानव करता है जैसे कि भोजन, शयन, मैथुन आदि उन्हें पशु भी बड़ी तल्लीनता से करते हैं। मानव की गृहस्थी भी बढ़ती है और उसकी भी। वे भी अपने हित-अहित से परिचित होते हैं और मानव भी। इस संदर्भ में मनुष्य और पशु में यदि कोई अन्तर है तो यही है कि पशु परमार्थ दृष्टि नहीं रखते। इसलिए पशु के जितने भी कार्य होते हैं सब के सब स्वयं तक सीमित होते हैं। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए सजनों इस बात पर गहनता से विचार करो कि यदि मनुष्य भी स्वार्थी होकर दूसरे मनुष्य के साथ ऐसा ही व्यवहार करने लगे यानि उसके सुख-दु:ख को अपना सुख-दु:ख न समझे तो फिर मनुष्य और पशु में अन्तर ही क्या रहेगा?

 

यह सारी बात आपको समझाने का अर्थ यह है कि पशुवत् श्रेणी से ऊपर उठने के लिए परमार्थ दृष्टि से युक्त होकर, अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के उपरान्त अपनी अतिरिक्त सम्पदा और क्षमता का, अभावग्रस्तों का दु:ख-दर्द दूर करने में इस्तेमाल करो। ए विध् निजी सामर्थ्य अनुसार पतितों को शारीरिक-मानसिक व आत्मिक रूप से ऊपर उठाओ। ऐसा करने पर ही पशुबुद्धि एवं आसुरी भाव से ऊपर उठकर, सच्ची मनुजता यानि मनुष्यत्व प्राप्त कर पाओगे।

 

इस परिप्रेक्ष्य में हम मानते हैं कि आज अधिकतर मनुष्यों के संकुचित स्वार्थ ने उन्हें अन्धा कर दिया है और वे ये भूल गए हैं कि उनका जन्म क्यों हुआ है? यानि अधिकाधिक धन कमाने व संचय करने की कामना/ लालसा ने उन्हें मोहग्रस्त कर क्रोधी, कृपण व लोभी बना दिया है और वे मानवता को विस्मृत कर, निजी इच्छाओं की पूर्ति में ही रत हो, मानव धर्म से गिर अहंकारी बन गए हैं। यही कारण है कि परमार्थ जैसे शब्दों को समझना उनकी समझ से बाहर हो गया है और वे केवल अपने ही हित के विषय में सोचते हैं। पर सजनों हमें देखा देखी, उन जैसा नहीं बनना है अपितु हमें तो अपने परमपिता सजन श्री शहनशाह हनुमान जी की निष्काम व परोपकारी प्रवृत्ति का अनुकरण कर, उन जैसा उदार हृदय व परोपकारी बनना है जिसके निमित्त  तमाम भौतिक आकर्षणों व लाभों की संकीर्णता से उबर कर परमार्थ दृष्टि से ओतप्रोत होना अनिवार्य है।

 

इस विषय में सदा याद रखना कि परमार्थ से आत्मबल बढ़ता है और चारित्रिक निखार आता है। परमार्थ में अहंकार का कोई स्थान नहीं होता और न ही यह कोई घाटे का सौदा होता है अपितु इस परमार्थ दृष्टि से अभीभूत जीवन ही सर्वोत्तम माना जाता है क्योंकि विश्व रूप में प्रकट ईश्वर की नि:स्वार्थ सेवा ही कल्याण का परम साधन है। यही भक्ति का सर्वश्रेष्ठ स्वरूप है। कहने का आशय यह है कि मानव मात्र की सेवा-सहायता, निखिल मानवता से अपनत्व का भाव तथा सबका स्वामी उस एक ईश्वर को ही मानना, परमार्थ दृष्टि की विस्तारक मानसिकता है जिसके द्वारा अहं को वयं में समर्पित किया जा सकता है। इस प्रकार सब सुखी हों, सब निरोगी हों, सबका कल्याण हो, किसी को दु:ख प्राप्त न हो - ऐसी पुनीत भावनायें ही मानव के आत्म उत्कर्ष का साधन बनती है।

 

इस बात को मध्य नज़र रखते हुए सजनों काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार जैसी दुर्भावनाओं का त्याग कर संतोष, धैर्य, समता, वैराग्य, निष्कामता, अनासक्ति, निर्लिप्तता, दीन-बन्धुता, परोपकारिता, नि:स्वार्थ सेवा आदि भावों से युक्त होकर, परमार्थ दृष्टि का विकास करो। इसके लिए स्वस्थ चिन्तन यानि विचार व ध्यान भी आवश्यक है क्योंकि इसके अभाव में हृदय की कोमल भूमि असिंचित रह जाती है और स्वार्थ की कड़ी धूप उसे बंजर बना डालती है। अधिकांश लोग हृदय से कोमल होते हैं, भावुक होते हैं किन्तु स्वस्थ चिन्तन के अभाव में लोभ, मोह, स्वार्थ, पक्षपात जैसे क्षुद्र भावों-विचारों के मकड़जाल में उलझकर अपनी भावुकता खो बैठते हैं। हृदय उन्हें परमार्थ अर्जन की ओर अग्रसर करता है, किन्तु स्वस्थ चिन्तन दृष्टि के अभाव में स्वार्थ-बुद्धि उन्हें उस पथ पर प्रशस्त होने से रोकती है। भावगत कोमल बुद्धि, स्वार्थ बुद्धि के कठोर अंकुश से आहत हो जाती है और मनुष्य परमार्थ दृष्टि का विकास करने से वंचित रह जाता है।

ऐसा न हो इसलिए सजनों सत् शास्त्र का अध्ययन व मनन कर उनमें वर्णित शब्द ब्रह्म विचारों को अपने आचरण व व्यवहार में ढालने का भरसक प्रयास करो। इससे विचारों में सकारात्मकता के साथ-साथ विशालता व दृढ़ता भी आएगी और सर्व हित में ही अपना व अपने परिवार का हित नजर आएगा। ऐसा होने पर लगने लगेगा कि "विश्व ही हमारा परिवार है"। इस अनुभूति के होने पर ही सर्वहित की भावना से ओत-प्रोत हो, सर्व के प्रति अपने धर्म का निष्कामता से पालन कर पाओगे और ईश्वरमय हो जाओगे। जैसा कि कहा भी गया है:-

"जो पुरुष स्वयं को विश्व रूप देखता है, वह अनन्य भाव से सर्व का हित (कल्याण) करता हुआ विश्व रूप यानि ईश्वरमय ही हो जाता है।"

 

इस संदर्भ में याद रखना कि नि:स्वार्थ सेवा विश्व कल्याण की संज्ञा है। दूसरा समझकर सच्ची सेवा नहीं होती, आत्मरूप जानकर की गई सेवा ही सच्ची सेवा कहलाती है। आत्मरूप जानकर की गई सच्ची सेवा से ही सेवक के विषय में सेव्य को प्रियत्व उत्पन्न होता है। इससे वह आलसी नहीं बनता, किन्तु सब प्रकार से पुरुषार्थी बनता है। अत: ऐसा पुरुषार्थी बन परमार्थ दृष्टि हो जाओ। मतलब यह है कि केवल अपने लिए कुछ मत चाहो, सब दूसरों के लिए करो। सदैव दूसरों की भलाई सोचो, दूसरों की भलाई करो और इस भलाई को करने में यदि प्राणों की बाजी भी लगानी पड़े तो उससे भी मत घबराओ। याद रखो इसी तरह त्याग भावना अपनाकर स्वार्थ से परमार्थ की ओर बढ़ सकते हो और समाज में प्रतिष्ठा यानि यश कीर्ति प्राप्त करने के अधिकारी सिद्ध हो सकते हो।

 

अंतत: याद रखो कि मानवीय जीवन को प्रेम और उत्सर्ग (त्याग) मार्ग पर चलाते हुए, अपने आप को तुच्छ मानकर अन्य के लिये विसर्जित (परित्याग) कर देने में जीवन का महत्त्व निरूपित होता है। कहने का आशय यह है कि "स्व"  का परित्याग व "पर" का आलिंगन करके ही यानि दूसरों की भलाई के निमित्त अपने स्वार्थ व लाभ का विसर्जन करने पर ही व्यक्ति लोकहित का साधक बन पाता है और मानव जीवन की  सार्थकता को सिद्ध कर सफलता प्राप्त कर जगतहितकारी नाम कहाता है। आप भी सजनों परमार्थ दृष्टि युक्त हो ऐसे ही लोकहितकारी बनो और अपने साथ-साथ अपने परिवार व कुल समाज का कल्याण कर अपना जीवन सफल बनाओ।