सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में वर्णित भजनों एवं कीर्तनों को समझने का सही तरीका

साडा है सजन राम, राम है कुल जहान

अर्थात् ईश्वर हमारा मित्र/प्रियतम सर्वव्यापक है, उसी को जानो, मानो व वैसे ही गुण अपनाओ।

 

शब्द है गुरु, शरीर नहीं है,

अर्थात् ज्ञानी को नहीं ज्ञान को अपनाओ और निमित्त में नहीं नित्य में श्रद्धा बढ़ाओ।

 

इस पर सुदृढ़ता से डटे रह, इस अटल सत्य पर स्थिर बने रहो:-

3म् अमर है आत्मा, आत्मा में है परमात्मा

 

बस सजनों इसी सत्य को याद रखो कि मैं आत्मा हूँ और मुझ में ही परमात्मा है। उस परमात्मा के रूप में सब कुछ मेरे ही अंतर्निहित है। अत: मुझे कुछ भी, बाहर कही से नहीं खोजना या प्राप्त करना क्योंकि मैं अपने आप में भरपूर हूँ।

 

जैसा कि सजनों आप सब सजन जानते ही हो कि सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ की महिमा महान व अपरम्पार है क्योंकि इसमें न केवल आत्मिक ज्ञान के रूप में जीवन बनाने की समस्त युक्तियों का वर्णन है अपितु मानव जीवन के हर पहलू का सद्ज्ञान अत्यन्त ही सुन्दरता व सूक्ष्मता से विधिवत् पिरोया हुआ है। इसमें विदित सत्यज्ञान नित्य है, स्थाई है, शुद्ध है, पवित्र है, श्रेष्ठ है और भौतिक न·ारता के भाव से उबार, मानव को ब्राहृ भाव में स्थित करने वाला है। जानो जब यह विशुद्ध भाव मानव के रोम-रोम, रग-रग में रम उसके मन-मस्तिष्क को अपने रंग में रंग लेता है तो स्वत: ही उसकी जिह्वा स्वतन्त्र, संकल्प स्वच्छ व दृष्टि कंचन हो जाती है और ह्मदय सचखंड यानि खालस सोना हो जाता है। यह अद्भुत घटना उस मानव के ख़्याल के सतवस्तु से जा जुड़ने का प्रतीक होती है जिसके परिणामस्वरूप इंसान की धारणा, वृत्ति, स्मृति, बुद्धि सब निर्मल हो जाती है और वह आत्मज्ञानी हो जाता है। सजनों अगर आपके दिल में भी सतवस्तु को धारण कर आत्मज्ञानी बनने की उमंग है तो नियमित रूप से इस ग्रन्थ को समझदारी से पढ़ना आरम्भ कर दो। जानो ज्यों-ज्यों इस ग्रन्थ की गहराई में उतरते जाओगे, त्यों-त्यों विचार रूपी हीरे मिलते जाएंगे और अंतरपट खुल जाएंगे। ऐसा होते ही आत्म साक्षात्कार होगा यानि अपने वास्तविक स्वरूप को जान लोगे और आत्मतुष्ट हो जाओगे। इस तरह मन को संतोष प्राप्त होने पर आप धीरता से इस ग्रन्थ में वर्णित समभाव-समदृष्टि के उसूलों पर चलते हुए सहजता से सत्य-धर्म का भक्ति भाव अपना परमार्थिक दृष्टिकोण अपना लोगे। इस प्रयत्न द्वारा आप अपने वास्तविक गुण-धर्म को पहचान अच्छे स्वभाव वाले बन जाओगे और जीवन निर्वाह के समय अपना हर कत्र्तव्य कर्म निष्काम भाव से करते हुए, निपुणता व प्रसन्नता से जीवन जीने योग्य बन जाओगे यानि तेरी-मेरी के झंझट से उबर विशेष बुद्धि हो जाओगे। फिर परोपकार कमाना ही आपकी विशेषता होगी जिसके फलस्वरूप आप परमगति को प्राप्त होंगे।  अत: सजनों याद रखो कि जीवन लक्ष्य की सिद्धि समभाव-समदृष्टि की युक्ति अनुसार गृहस्थाश्रम में रहते हुए व फ़जऱ् अदा हँस कर विवेकशीलता से निभाते हुए ही कर पाना संभव है।

 

इसी महत्ता के दृष्टिगत सजनों विगत वर्ष से अपने व सब के सुख के लिए, नित्यप्रति नियम से भावयुक्त होकर सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ का अध्ययन-पठन व गायन करने का आवाहन दिया जा रहा है ताकि आप इसमें विदित शब्द ब्राहृ विचारों को न केवल पढ़ने-सुनने की अपितु समझ कर चिंतन द्वारा विचार में लाने की आदत भी डालें और इस तरह ई·ारीय वाणी का मनन कर उसका अनुसरण करें यानि उस पर अमल फरमाए। सजनों यह क्रिया एक प्रयास है शब्द गुरु द्वारा प्रदत्त विचारों पर आपके ख़्याल व दृष्टि को खड़ा कर, आत्मपद की ओर बढ़ रहे आपके कदमों को सुदृढ़ करने का ताकि अज्ञानवश कही आप हार न खा जाओ। इस प्रयत्न को सतत् रूप से जारी रख, अपनी दिनचर्या का अभिन्न अंग बनाने वाला सजन निश्चित रूप से इस कुदरती ग्रन्थ में वर्णित आत्मिक ज्ञान को आत्मसात् कर न केवल अपने सत्य स्वरूप को जानने में सक्षम हो सकता है अपितु समभाव-समदृष्टि के सबक़ का युक्तिसंगत अनुशीलन करते हुए परस्पर सजन भाव का व्यवहार करने में भी निपुण बन सकता है। इस तरह अपने मन को "मूलमंत्र जो है आद् अक्षर" उसके अजपा जाप द्वारा संकल्प रहित अवस्था में साधे रख वह उच्च बुद्धि, उच्च ख़्याल, विचार, सत्-ज़बान, एकता व एक अवस्था में स्थिरता से बने रह, जन्म की बाज़ी जीत अपना जीवन सफ़ल बना सकता है यानि सर्गुण-निर्गुण के खेल अफुरता से खेलते हुए निर्वाण पद पा सकता है।

 

इस संदर्भ में जान लो कि एकता, एक अवस्था का अनुभव करने के लिए, सर्गुण से ऊपर उठकर, अफुरता से निर्गुण में जहाँ एकान्त होता है वहाँ आत्मानन्द की अनुभूति करते हुए स्थिर होना होता है। जो निर्गुण में स्थिर हो जाता है उसे फिर सर्गुण में सबके बीच में रहते हुए भी एकान्त में रहने की आदत पड़ जाती है। परिणामत: वहाँ भी (सर्गुण में) उसकी एकता, एक अवस्था बनी रहती है और उसे संसार में लिप्त होने का भय नहीं सताता। इस तरह जब सर्गुण-निर्गुण एक अवस्था हो जाती है तो इंसान निर्वाण पद को प्राप्त करने का अधिकारी बन जाता है। इस महत्ता के दृष्टिगत सजनों आप सब सजन भी कहीं उचित मार्गदर्शन के अभाव में उपरोक्त लाभ को प्राप्त करने से वंचित न रह जाएं इस हेतु आओ आज आपको एक भजन का भावार्थ स्पष्ट करते हुए बताते हैं कि आपको किस प्रकार सच्चेपातशाह जी की ही युक्ति अनुसार इस क्रिया को निपुणता से करते हुए उचित परिणाम प्राप्त करना है:-

नी सुरति बली जी दा ध्यान लगा, जे रघुनाथ जी दे मिलने दा चाह।

धर्म ते चलीं अधर्म न करीं, खुशी विच उमर बिता।

नी सुरति बली जी दा ध्यान लगा, जे रघुनाथ जी दे मिलने दा चाह।

संसार सागर तों महाबीर जी लंघावन, नाम दा कवच पहना।

नी सुरति बली जी दा ध्यान लगा, जे रघुनाथ जी दे मिलने दा चाह।

महाबीर जी दे चरणां विच प्रीत बढ़ावीं, रघुनाथ जी नू देसन मिला।

नी सुरति बली जी दा ध्यान लगा, जे रघुनाथ जी दे मिलने दा चाह।

सांवली सूरत नाल प्रेम बढ़ावीं, पंजां नू देवन भजा।

नी सुरति बली जी दा ध्यान लगा, जे रघुनाथ जी दे मिलने दा चाह।

सारी उमर दु:खां विच गुजारी, हुन रघुनाथ जी दे दर्शन पा।

नी सुरति बली जी दा ध्यान लगा, जे रघुनाथ जी दे मिलने दा चाह।

विषयां विच न उमर गवावीं, प्रीति हरी चरणां विच ला।

नी सुरति बली जी दा ध्यान लगा, जे रघुनाथ जी दे मिलने दा चाह।

नाम महाबीर जी दा ह्मदय विच ध्यावीं, चरण रघुनाथ जी दे देसन दिखा।

नी सुरति बली जी दा ध्यान लगा, जे रघुनाथ जी दे मिलने दा चाह।

कंडयां दे रस्ते मूल न जावीं, उमर रघुनाथ जी दे चरणां विच बिता।

नी सुरति बली जी दा ध्यान लगा, जे रघुनाथ जी दे मिलने दा चाह।

अंध कूप विचों बली जी कढेसन, हर श्वास नाम ध्या।

नी सुरति बली जी दा ध्यान लगा, जे रघुनाथ जी दे मिलने दा चाह।

वाशना नू तुसी परे हटाओ, अन्धेरा देसन हटा।

नी सुरति बली जी दा ध्यान लगा, जे रघुनाथ जी दे मिलने दा चाह।

कई सूरजां दा सूरज तू पावें, सारी उमर आनन्द दी बिता।

नी सुरति बली जी दा ध्यान लगा, जे रघुनाथ जी दे मिलने दा चाह।

मैं दासी सुरति सुरति पुकारां, हरदम चरणां विच जा।

नी सुरति बली जी दा ध्यान लगा, जे रघुनाथ जी दे मिलने दा चाह।

 

सजनों इस भजन में प्रत्येक सजन के ख़्याल को अविचारयुक्त कवलड़ा रास्ता छोड़कर विचारयुक्त सवलड़ा रास्ता अपनाने का आवाहन दिया जा रहा है। नि:सन्देह इस हेतु इसके लिए अपना ख़्याल सजन श्री शहनशाह हनुमान जी के साथ जोड़ना होगा और उन्हीं की चरण-शरण में बने रहते हुए किसी ज्ञानी को नहीं अपितु केवल आत्मज्ञान को ही महत्त्व देते हुए, आत्मसुधार कर यानि अधर्म का रास्ता छोड़, पुन: धर्म के रास्ते पर लौट आना होगा। तभी तो इस भजन में कहा गया है:- 

नी सुरति बली जी दा ध्यान लगा, जे रघुनाथ जी दे मिलने दा चाह।

क्या कोई बता सकता है कि यहाँ हर इन्सान को अपनी सुरति को इस भाव से सम्बोधित करने के लिये क्यों कहा गया है?  .......... ????

जानो सजनों, जब यह एहसास हो जाता है कि हमारा ख़्याल संसार की तरफ रुड़ रहा है यानि विषय विकारों में बह नकारात्मकता में जा रहा है तो उसको पुन: सद्मार्ग/परमार्थ के सकारात्मक रास्ते पर ला, प्रभु में लीन रखने के लिए ऐसे ही अपनी सुरति को आवाहन् देना होता है "नी सुरति बली जी दा ध्यान लगा"। याद रखो जिसका ध्यान लगाने के लिए कहा जाता है, उसके प्रति ख़्याल के ध्यान स्थिर होने पर उसकी बात व विचारों की धारणा चित्त में हो जाती है। अत: बली जी का ध्यान लगाने से तात्पर्य है सुमति के दाता, सजन श्री शहनशाह हनुमान जी के वचनों व विचारों की ओर अपने ख़्याल को एकाग्रचित्त कर उन्हीं को ध्यान से धारण कर परमार्थी विद्या प्राप्त कर वैसे ही श्रेष्ठ इंसान बनने से है। सजनों यह सजन के ख़्याल को जगत से निर्लिप्त यानि अफुर रख, सच्चे घर में स्थिर करने की व निज यथार्थ का यानि जीव, जगत व ब्राहृ के सत्य का बोध कराने की अमूल्य बात है। आगे कहा गया है:-

धर्म ते चलीं अधर्म न करीं, खुशी विच उमर बिता।

सजनों चूंकि कलुकाल में साधारण इन्सान जीवन में कुरस्ते पर चलना पसन्द करता है इसलिए उसे सजन श्री शहनशाह महाबीर जी के संग रह, अधर्म का रास्ता छोड़, धर्म के रास्ते पर चलते हुए प्रसन्नता/खुशी से जीवन जीने का निर्देश दिया जा रहा है।

संसार सागर तों महाबीर जी लंघावन, नाम दा कवच पहना।

उपरोक्त कार्य की सिद्धि हेतु यानि संसार सागर को निर्विघ्न पार करने हेतु सच्चेपातशाह जी सुरति को उस परम पिता द्वारा प्रदत्त नाम अर्थात् आत्मबोध कराने वाले शब्द का कवच पहनने के लिए कह रहे हैं। नाम का कवच पहनने से तात्पर्य नाम के अजपा जाप द्वारा अपने ह्मदय को भरपूर कर, प्रकाशमय/तेजोमय वातावरण का सृजन करने से है ताकि किसी भी कारण आत्मिक ज्ञानदृष्टि पर पर्दा न पड़ जाए और जीव सांसारिक अज्ञान धारण करने पर मजबूर न हो जाए। इस तथ्य की महत्ता के दृष्टिगत हमें भी सजनों मन में यह वि·ाास रखते हुए कि इस संसार सागर से महाबीर जी ही पार लंघा सकते हैं, उनकी युक्ति को प्रवान करने का परम पुरुषार्थ दिखाना सुनिश्चित करना होगा। याद रखो यदि एक बार ऐसा कर लिया तो उस नाम रूपी कवच को भेदकर ह्मदयगत सकारात्मक वातावरण में अर्थात् मन में कोई बुराई नहीं घर कर पाएगी। सजनों इसलिए उन द्वारा बक्षे गये नाम की महत्ता को समझो और उसे युक्तिसंगत प्रयोग/व्यवहार में लाते हुए भवसागर से पार हो जाओ।

महाबीर जी दे चरणां विच प्रीत बढ़ावीं, रघुनाथ जी नू देसन मिला।

सजनों वर्तमान दु:खों/कष्टों से उबारने हेतु वह सुरति को मिथ्या संसार संग प्रीति छोड़, महाबीर जी के चरणों में प्रीत बढ़ाने के साथ-साथ प्रीत की रीत निभा, मन में पुन: संतोष, प्रसन्नता व आनन्द प्राप्त करने का आवाहन दे रहे हैं। आगे वह सुरति को वि·ास्त कर रहे हैं कि जानो ऐसा होने पर वह पारस्परिक सच्ची मित्रता के नाते अवश्यमेव परमात्मा से मिला देंगे। इस उपलब्धि को देखते हुए सजनों हमारे लिए बनता है कि हम उनके चरणों में मजबूती से प्रीत जोड़े रखने के निर्देश को समझें और उन द्वारा दर्शाई जीवन शैली को अपनाकर इस संसार के नानाविध् प्रलोभनों व आकर्षणों के आगे कदाचित् कमजोर न पड़ें। यहाँ स्पष्ट कर दें कि चरणों से उनका तात्पर्य बैहरुनी वृत्ति में किसी को गुरु मानकर उसके चरण पकड़ने से नहीं अपितु सजन श्री शहनशाह महाबीर जी के संग बने रह, आत्मिक ज्ञान अनुसार उनकी श्रेष्ठतम विचारधारा को अमल में ला मनुष्यता में आने से है। अत: सजनों उन द्वारा प्रदत्त आचार-संहिता को अन्दरुनी वृत्ति में ग्रहण/धारण कर वर्ताव में ले आओ और इस तरह मायावी संसार के प्रति निरासक्त बने रहो। जानो ऐसा पुरुषार्थ दिखाने पर स्वत: ही जितेन्द्रिय हो जाओगे और अपने वास्तविक स्वरूप का बोध हो जायेगा।

सांवली सूरत नाल प्रेम बढ़ावीं, पंजां नू देवन भजा।

आगे ई·ार सुरत को कहते हैं कि सांवली सूरत अर्थात् पति परमे·ार संग प्रेम बढ़ा, उसी की छवि को ह्मदय में रमा, सदा सुन्दरतम अवस्था में बनी रहना। याद रख, इस प्रकार आत्मस्वरूप के दर्शन में स्थित रहने पर उनकी कृपा से, संसारी अज्ञान धारण करने के कारण मन में घर कर गये पाँचों विषय-विकार यथा काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार स्वत: ही बाहर भाग जाएंगे और ह्मदय विशुद्ध हो जाएगा। मानो ऐसा अद्भुत होने पर वृत्ति, स्मृति, बुद्धि व भाव-स्वभाव रूपी बाणा निर्मल हो जायेगा और आप निर्विकारता से इस जगत में विचर सकोगे।  

 

सारी उमर दु:खां विच गुजारी, हुन रघुनाथ जी दे दर्शन पा।

इसी सन्दर्भ में वह आधि-व्याधि के दु:खों से त्रस्त सुरत को कहते हैं कि मानव रूप में यदि बचपन से लेकर अब तक व्यतीत किए जीवनकाल पर दृष्टिपात करो तो ज्ञात होगा कि आत्मिक ज्ञान के अभाव के कारण सारा जीवन कष्ट-क्लेशों में ही व्यतीत हुआ है। अब आगे वे दु:ख पुन: न भोगने पड़ें अर्थात् मन की इस कष्टदायक अवस्था से छुटकारा पाने हेतु वह सुरत को शब्द में जुड़, उस तत्त्वज्ञान/आध्यात्मिक विद्या प्राप्त करने के लिए कह रहे हैं जिसमें प्रकृति, आत्मा-परमात्मा, जगत के नियामक धर्म और जीवन के अन्तिम लक्ष्य का निरूपण होता है। वह कहते हैं कि यदि सुनिश्चित रूप से ऐसा कर लिया तो न केवल दु:खमय अतीत से उबर कर, अपने निर्गुण, निराकारमय स्वरूप का बोध करने में सक्षम हो जाओगे अपितु ताकतवर हो सुख-दु:ख सम कर जान आजीवन एक अवस्था में बने रहोगे।

 

विषयां विच न उमर गवावीं, प्रीति हरी चरणां विच ला।

नि:सन्देह इसके लिये इन्द्रियों के विषयों यथा रूप, रस, रंग, शब्द व स्पर्श से ऊपर उठना होगा अन्यथा ये आपके ख़्याल को भौतिक पदार्थों में आसक्त कर, मिथ्या जगत में फँसा, अधर्म के मार्ग पर अग्रसर कर देंगे। ऐसी भूल न हो इस हेतु इन्द्रिय-निग्रह करके आत्मानुशासित होना होगा और अनन्य प्रीत द्वारा अपने मन को हरि में यानि सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ परमे·ार में लीन रखते हुए, उनके श्रेष्ठतम जीवन चरित्र को अंगीकार करना होगा। सजनों यह अपने ख़्याल व विचारधारा को जगतीय विषयों की तरफ से हटाकर प्रभु  संग जोड़ने की बात है। इस यत्न द्वारा इधर-उधर भटक रहा आपका मन आत्मनियंत्रित हो एकाग्रचित्त व स्थिर हो जायेगा। इस हेतु सजनों शब्द को गुरु मान, मूलमन्त्र आद् अक्षर के अजपा जाप द्वारा सर्वव्याप्त अपनी ब्राहृसत्ता को अफुरता से ग्रहण कर अपनी वास्तविक शक्ति का एहसास करना होगा। ऐसा पराक्रम दिखाने पर आपकी सोच, आपकी विचारधारा जो न·ारता के भाव में अटकी हुई है, वह पलटा खा नित्यता के भाव में आ जायेगी और आप इस "अ" "क्षर" अवस्था का बोध कर कह सकोगे कि, "मैं अजर अमर आत्मा हूँ यानि ब्राहृ हूँ"। स्पष्ट है सजनों जब आपका ख़्याल अजपा जाप द्वारा नित्य ब्राहृ में जुड़ जायेगा तो आप ब्राहृ भाव अपना कर "आत्मा में जो है परमात्मा" अर्थात परब्राहृ परमे·ार की पहचान कर रौशन हो जाओगे।   

 

नाम महाबीर जी दा ह्मदय विच ध्यावीं, चरण रघुनाथ जी दे देसन दिखा।

इसलिए सजनों सच्चेपातशाह जी कहते हैं कि सजन श्री शहनशाह हनुमान जी द्वारा बक्षे आत्मबोध कराने वाले नाम शब्द की ह्मदय में ध्यानयुक्त होकर रटन लगाओ। अगर उनका हुक्म मानकर ऐसा कर दिखाया तो वह निश्चित रूप से ध्यान दृष्टि द्वारा आपको ह्मदय में ही परमात्मा के होने का अनुभव करा देंगे। इसलिए भक्ति-भाव से महाबीर जी का नाम ह्मदय में बसा, उन्हें प्रसन्न कर लो। ऐसा होने पर ह्मदय वेद-विदित प्रकाशित हो जाएगी और ख़्याल प्रभु संग स्थिरता से जुड़ जायेगा। इस तरह सहज ही सुरति शब्द का मिलाप हो जायेगा।

 

कंडयां दे रस्ते मूल न जावीं, उमर रघुनाथ जी दे चरणां विच बिता।

ऐसा ही हो इस हेतु सजनों वह सुरति को सतर्क करते हुए कहते हैं कि कलुकालवासियों के स्वभावों में फँसकर भूलकर भी अविचारयुक्त/अधर्मयुक्त कंटक भरे मार्ग पर कदम न बढ़ाना अन्यथा जगत के मायाजाल में फँस जाओगे। इस बात को ध्यान में रखते हुए सजनों, अपने सब कत्र्तव्य कुशलता से संपादित करने के लिएनिष्काम कर्म करने के भाव को अपना कर, विचारयुक्त सौखे रास्ते पर मज़बूती से बने रहना और निज धर्म की रक्षार्थ तन-मन-धन वारने से भी मत सकुचाना। कहने का आशय यह है कि आजीवन प्रभु के चरणों मे यानि सत्य आद् ज्ञान स्त्रोत से जुड़े रह त्याग भाव से धर्म के मार्ग पर मज़बूत बने रहना।

 

अंध कूप विचों बली जी कढेसन, हर श्वास नाम ध्या।

सच्चेपातशाह जी कहते हैं कि याद रख महाबीर जी अन्धकारमय कुएँ यानि मनुराज में फँसे हुए तेरे ख़्याल को इस पतित अवस्था से उबारने में समर्थ हैं इसलिए एक सपुत्र की तरह उनका कहना मान और हर ·ाास नाम ध्याना सुनिश्चित कर और उन द्वारा मार्गदर्शन प्राप्त करने हेतु तत्पर रह। जान ले कि ऐसा करने से मन में संकल्प के रूप में कोई फुरना उदित नहीं होगा और अपने वास्तविक स्वरूप में बने रहने हेतु अफुरता से, ख़्याल को ध्यान वल व ध्यान को प्रकाश वल साधे रखना सहज हो जाएगा। फलत: आत्मज्ञान प्राप्त हो जायेगा और पूर्ण सन्तोष मिल जायेगा। कहने का तात्पर्य यह है कि आत्मतुष्ट होकर सबसे अमीर हो जाओगे और किसी प्रकार का कोई अभाव नहीं खलेगा। इस सन्दर्भ में सजनों नाम-ध्यान में स्थिर रह व परमार्थिक ज्ञान प्राप्त कर आपको इसी अमीरी की तरफ बढ़ना है व हर कामना से मुक्त हो जाना है। इस हेतु अब तक अन्दर जितना भी अज्ञान अन्धकार छा चुका है, उससे उबरना होगा ताकि कोई भी आपको आपके यथार्थ के प्रति भरमा न सके और आप समबुद्धि हो धर्मपथ पर बने रह सको। इसके लिए सजनों आपको किसी की कोई भी संसारी बात ह्मदय में धारण नहीं करनी अपितु जो भी बात एक कान से सुनो उसे दूसरे कान से बाहर निकाल देना। ऐसा करने से कोई बात अन्दर नहीं ठहरेगी और मन संकल्प रहित अवस्था को प्राप्त हो भरपूरता का अनुभव करेगा। इस तरह विचार पकड़, त्रिलोकी के मालिक बन जाओगे और जगत उद्धारक बन जीवन का वास्तविक आनन्द मान सकोगे।

 

वाशना नू तुसी परे हटाओ, अन्धेरा देसन हटा।

उपरोक्त उपलब्धि के दृष्टिगत सजनों वह कहते हैं कि वाशना अर्थान जन्म-जन्मान्तरों के प्रभाव से उत्पन्न मानसिक सुख-दु:ख की भावना यानि मिथ्या विचार या ख़्याल के चंगुल में फँस, सत्य-धर्म का निष्काम रास्ता छोड़ कुरस्ते न पड़ जाना। याद रखो यदि ऐसा उद्यम कर दिखलाया तो वह आपके मन पर जमे हुए पूर्व जन्मों के संस्कारों के प्रभाव को मिटा देंगे। परिणामस्वरूप ह्मदय के आगे छाया हुआ, अज्ञान का घोर तम् हट जायेगा और उजाला होते ही सत्य प्रकट हो जाएगा।

 

कई सूरजां दा सूरज तू पावें, सारी उमर आनन्द दी बिता।

कहने का आशय यह है कि इस प्रयत्न से ह्मदय में कई सूरजों का सूरज उदित हो जाएगा यानि आत्मा में परमात्मा का साक्षात्कार हो जाएगा। फलत: अपने वास्तविक सत्-चित्त-आनन्द स्वरूप का बोध कर आप सारी उमर आनन्द से व्यतीत कर सकोगे और इस अनमोल मानव चोले का समुचित लाभ उठा अपना जीवन सफल बना लोगे व मृतलोक पर फतह पा जन्म की बाज़ी जीत लोगे।

 

मैं दासी सुरति सुरति पुकारां, हरदम चरणां विच जा।

सजन श्री शहनशाह हनुमान जी की युक्ति की प्रवानगी द्वारा, परम पवित्र जीवन जीते हुए, इस उत्तम परिणाम को प्राप्त करने के तथ्य को दृष्टिगत रखते हुए सच्चेपातशाह जी, अस्थिर ख़्याल को आत्मे·ार में साधने के लिए, पुकार-पुकार कर हरदम अपने मूल आद् रुाोत से जुड़े रह जाग्रत अवस्था में बने रहने का निर्देश दे रहे हैं ताकि वह उसी विशुद्ध भाव पर समरस बने रहना उचित समझे और तद्नुकूल निर्मल आचार-विचार-व्यवहार धारण कर, निरासक्त व निर्विकार होकर इस जगत में निषंग, बेखौफ़ा-बेखतरा विचर सके। सजनों यह अपने आप में समभाव-समदृष्टि हो, विचार ई·ार है अपना आप के भाव अनुकूल जो प्रकाश है मन मन्दिर, उसी प्रकाश का जग अन्दर अनुभव करते हुए निष्काम भाव से जीवन जीने की बात है।

 

इस भजन के भावार्थ से सारत: सजनों स्पष्ट होता है कि आज हर इंसान कलुकाल के दुष्प्रभाववश परमार्थ का रास्ता छोड़, स्वार्थपरता के सिद्धान्त अनुसार जीवन जीने का ढंग अपना चुका है जिसके कारण उसके मन में हर पल कुछ पाने की इच्छा सताती रहती है। नि:संदेह इसी वजह से उसका ख़्याल हरदम संसार में इधर-उधर भटकता रहता है और वह अर्थपूर्ण जीवन जीने में असफल हो, अपना जन्म बरबाद कर बैठता है। इस परिप्रेक्ष्य में सजनों सजन श्री शहनशाह हनुमान जी के द्वारे पर होने के नाते हमारे लिए बनता है कि हम भी समय रहते अपने ख़्याल की अवस्था की भाल करें और उसे युक्तिसंगत सदा अपने सच्चे घर में साधे रखने के प्रति जागरूक रहें। सजनों यह अविचार युक्त कवलड़ा रास्ता छोड़ने हेतु, सजन श्री शहनशाह हनुमान जी की युक्ति प्रवान कर, विचारयुक्त सवलड़ा रास्ता अपनाने की व सही अर्थों में यथार्थता से जीवन जीने की बात है। इसी प्रयत्न से हमारी सुरत अपने सच्चे घर परमधाम पहुँच सकती है और जीवात्मा विश्राम को प्राप्त कर सकती है। ऐसा शुभ होने पर जानते हो क्या कह उठोगे:-

 

(श्री साजन जी के मुख दे शब्द)

ख़्याल जदों अपने घर विच राहवे, तदों जीव विश्राम नूं पावे।

जेहड़े इन्सान यत्न करन, यत्न करन।।

ख़्याल जदों अपने घर विच राहवे, इन्सान ध्यान इस्थर हो जावे।

संग लक्ष्मी चतुर्भुजधारी दा दर्शन पावे, कोई विरले दर्शन करन दर्शन करन।।

केहड़े रस्ते जाना सी सजनों, केहड़े रस्ते जाय चढ़े।

घर दा रस्ता भुल के ते, दूसरे शहर विच जाय वड़े जाय वड़े।।

 

सजनों यह सब सुनने समझने के पश्चात् अगर हम अपना जीवन लक्ष्य प्राप्त करने के प्रति गंभीर है तो समभाव अपना कर परस्पर सजन भाव का वर्त वर्ताव करना सुनिश्चित करना ही होगा और एकरूप हो जाना होगा।