प्रकाश (त्रिकालदर्शी-1)

साडा है सजन राम, राम है कुल जहान

अर्थात्  ईश्वर हमारा मित्र/प्रियतम सर्वव्यापक है, उसी को जानो, मानो वैसे ही गुण अपनाओ।

 

शब्द है गुरु, शरीर नहीं है,

अर्थात् ज्ञानी को नहीं ज्ञान को अपनाओ और निमित्त में नहीं नित्य में श्रद्धा बढ़ाओ।

 

इस पर सुदृढ़ता से डटे रह, इस अटल सत्य पर स्थिर बने रहो:-

3म् अमर है आत्मा, आत्मा में है परमात्मा

 

आओ सजनों आज गत सप्ताह बताई गई बात की पुनरावृत्ति करते हैं और आगे त्रिकालदर्शी के विषय में समझते हैं।

 

प्रश्न-मूलमन्त्र क्या है?

उत्तर-3म् आद् अक्षर।

 

प्रश्न-जो सजन मूलमंत्र को इक रस हो के चलावेगा उसे किस की प्राप्ति हो जाएगी?

उत्तर-युवा-अवस्था, बल शक्ति की।

 

प्रश्न-इस प्राप्ति से उसे किस सत्य की पहचान हो जाएगी?

उत्तर-यही कि जेहड़ा मन मन्दिर है जे चमत्कार, ओही असलियत है जे अपना आप।

 

प्रश्न-इस असलियत की पहचान करने पर क्या होगा?

उत्तर-इस असलियत को पहचान कर वह प्रकाश नाल प्रकाश हो जावेगा।

 

प्रश्न-जो सजन अपने असलियत प्रकाश नाल दोनों नैन मिला के दो साल परिपक्क हो जावेगा वह सजन क्या पावेगा?

उत्तर-वह विराट नगरी कुल दुनियां अन्दर अपना प्रकाश ही पावेगा अपना प्रकाश ही पावेगा।

 

प्रश्न-इस अवस्था को प्राप्त होने पर क्या होगा?

उत्तर-फिर उस सजन का अक्षर छूट जाएगा और वह "ये' को पाएगा।

 

प्रश्न-जिस सजन का "ये' इक रस चल पड़ेगा वह कहाँ स्थिर हो जाएगा?

उत्तर-वह आकाशों-आकाश, पातालों-पाताल और सप्तद्वीप भूमण्डल गगन मंडल में स्थिर हो जावेगा।

 

प्रश्न-गगनमंडल में स्थिर होने के पश्चात् सजन का कहाँ प्रवेश होगा और वह क्या जानने वाला हो जाएगा?

उत्तर-उस अन्दर प्रकाशी बाहिर प्रकाशी, बाहिर प्रकाशी मन मन्दिर प्रकाशी अर्थात् सब में समाए हुए का प्रवेश कुल दुनियां में होगा और वह अकर्ता होकर सब के दिलों की जानने वाला हो जावेगा। इस तरह वह जेहड़ी गुज़र गई जेहड़ी इस वक्त जेहड़ी आने वाली तीनों कालों की जान, त्रिकालदर्शी नाम कहावेगा।

 

प्रश्न-त्रिकालदर्शी होने पर क्या होगा?

उत्तर-फिर रूप, रंग रेखा कोई, सजनों बिन सूरजों चानणा हो जावेगा।

फिर ज्योति स्वरूप पारब्रह्म परमेश्वर नाम कहावेगा पारब्रह्म परमेश्वर नाम कहावेगा।।

 

सजनों सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ के अनुसार यह सीढ़ी-दर-सीढ़ी यानि क्रमवार जीवन-पथ पर उन्नति करते हुए त्रिकालदर्शी होने अपने घर परमधाम पहुँचने की युक्ति है। इस युक्ति को प्रवान करने पर ही जीव आत्म प्रतीति कर रूप, रंग रेखा से रहित हो जाता है और सर्व-व्यापक, सर्व-शक्तिमान सर्वज्ञ नाम कहाता है। यहाँ प्रतीति का अर्थ स्पष्ट करते हुए बता दें कि प्रतीति निश्चित विश्वास/धारणा/दृढ़-निश्चय को जनाती है। प्रतीति और बोध में अन्तर होता है। बोध ज्ञान या जानकारी प्राप्त होने का सूचक है। इस अर्थ से सजनों आत्मबोध और आत्मप्रतीति में भी अन्तर होता है। आत्म-बोध करने वाला आत्मज्ञानी होता है। आत्मप्रतीति के अभाव में ऐसे आत्मज्ञानी को अहंकार यानि "हौं-मैं" घेर लेती है और वह निष्काम पद से गिर जाता है। पर जो आत्मबोधी यह आत्म-प्रतीति कर लेता है कि "जिससे मैं जग रहा हूँ उसी से सब जग रहे हैं" और यह निश्चित धारणा, विश्वास के रूप में उसके अन्दर घर कर जाती है तो वह इन्सान सर्व कार्य ईश्वर के निमित्त सेवा निष्काम भाव से करता है यानि उस आत्मतुष्ट इन्सान में झुकाव जाता है और वह "हौं-मैं" से रहित हो, अकर्ता भाव में स्थिर हो, अफुर हो जाता है। इस महत्ता के दृष्टिगत सजनों आत्म-प्रतीति करने हेतु सर्व प्रथम आत्मबोध करो और आत्मबोध करने के पश्चात मौन हो जाओ। दो साल इसी वृत्ति में ठहरे रहो। ऐसा करने से समवृत्ति हो जाओगे और त्रिकालदर्शी नाम कहाओ।

 

अब तक सजनों हमने जाना कि जीव, ईश्वर जो सर्वशक्तिमान, सर्वव्याप्त सर्वज्ञ हैं, उन सम बन कैसे त्रिकालदर्शी बनता है। यहाँ आगे बढ़ने से पहले त्रिकालदर्शी का अर्थ जानना आवश्यक है। त्रिकालदर्शी शब्द तीन शब्दों के योग से बना है यथा त्रि काल दर्शी। यहाँ "त्रि" का अर्थ है "तीन" "काल" का अर्थ है "वह सम्बन्ध-सत्ता जिसके द्वारा भूत, भविष्य और वर्तमान आदि की काल क्रम अर्थात् समय के प्रवाह अनुसार प्रतीति होती है" तथा "दर्शी" का अर्थ है देखने या विचार करने वाला। 

 

इस अर्थ से सजनों "त्रिकालदर्शी" तीनों कालों यथा भूत, वर्तमान और भविष्य की बातों को देखने या जानने की सामर्थ्य रखता है। इसी कारण उसे हर जीव के सम्बन्ध में उसके भूत, वर्तमान और भविष्य की बातों का स्पष्टत: ज्ञान होता है अर्थात् उस जीवात्मा ने पहले क्या किया और अब क्या कर रहा है और आगे उसका क्या बनेगा, उसका नाम, रूप, देश, काल यहाँ तक कि सम्बन्धों के विषयों में भी उसे उसकी सारी जन्मपत्री की प्रतीति होती है। इस प्रतीति द्वारा सजनों त्रिकालदर्शी की बुद्धि स्मृति में काल ज्ञान व्याप्त रहता है और वह समय और परिस्थिति अनुसार उसका प्रयोग कर सकता है। इस प्रकार जब उसे समय की पहचान अर्थात् स्थिति अथवा अवस्था की जानकारी यथार्थतया प्राप्त रहती है तो वह जीवन की हर परिस्थिति अर्थात् सुख-दु: में यह विचार कर कि "जब समय आएगा तब स्वयं ही सब कुछ ठीक हो जाएगा", परम पुरुषार्थ करते हुए सदा एक अवस्था में समरस बना रहता है और समबुद्धि कहलाता है।

इसी बात को स्पष्ट करते हुए सजनों सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में कहा गया है:-

समय बीत गया, समय रिहा, समय दे मुताबिक समय आसी आसी।

बातचीत इन्सानां नूं समझन विच तां आसी, आसी।।

समय मुताबिक समय अनुसार विचार शब्द जो पासी, पासी।

जीवन उसने बना ही लिया, रौशन नाम कहासी, कहासी।।

समय अनुसार है सम सन्तोष, धैर्य दा सिंगार है साथी, साथी।

आद अन्त ओही जोत प्रकाशे, प्रकाश रही दिन राती राती।।

समय वसीला समय रसीला, समय दयालु दे राहवे साथ।

सर्गुण है सेवक स्वामी, निर्गुण जोत दा है प्रकाश प्रकाश।।

                                               

समबुद्धि होने के ही कारण सजनों वह सर्वज्ञ परमेश्वर सम शक्ति, गुण ज्ञान को रखने वाला, सहजता से इस मायावी सृष्टि रूपी ईश्वर के विराट् रूप का साक्षात्कार कर, प्रकृति, आत्मा, परमात्मा, जगत के नियामक धर्म और जीवन के अंतिम लक्ष्य आदि को जान, एक तत्वज्ञानी की तरह, इस जगत में निष्पाप विचरते हुए सबका कल्याण निष्कामता से करते हुए, सही अर्थों में परोपकारी कहलाता है। इस अतुलनीय अवस्था में सजनों स्वाभाविक ही सृष्टि यानि प्राणी मात्र की रक्षा का भाव उसके स्वभाव के अतर्गत हो जाता है और वह समभावी, काल धर्म अपना कर कभी भी अपने किसी के विनाश का कारण नहीं बनता। यही कारण है सजनों उस अजर-अमर धर्मा को कभी भी काल का ग्रास नहीं बनना पड़ता यानि वह सदा मौत के भय से निर्भय रहता है। इस तरह सजनों सजनता से भरपूर जिस जीव का जीवन लोक कल्याणार्थ परम पुरुषार्थ साथ-साथ चलता है, उसका मन संकल्प रहित अवस्था को प्राप्त रहता है और वह अकर्ता भाव से सब कुछ करने वाला निष्कामी परोपकारी कालातीत हो जाता है और जीवन का परम पुरुषार्थ सिद्ध कर लेता है।

 

इस संदर्भ में सजनों अगर हम चाहते हैं कि काल हमें चलाए और ही हम किसी कारणवश काल के ग्रास बनें तो उसके लिए हमें आत्मज्ञानी बन समभाव-समदृष्टि के सबक़ को आत्मसात् कर त्रिकालदर्शी बनना होगा। ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि त्रिकालदर्शी स्थिति में रह जो भी निर्णय लिया जाता है वह हमेशा कल्याणकारी होता है। कहने का आशय यह है कि अगर हम भी परोपकारी बन परमात्मा नाम कहलाना चाहते हैं तो हमें त्रिकालदर्शी के अर्थ को मात्र जानना ही नहीं होगा अपितु दिलचस्पी में , सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में वर्णित त्रिकालदर्शी बनने की युक्ति को भी पढ़-समझ कर अपनाना होगा।

 

इस संदर्भ में सजनों जानो कि सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में श्री साजन परमेश्वर, महाबीर जी की आज्ञा अनुसार स्पष्टत: सब सजनों को यह विचार समझा रहे है कि "स्वभावों में स्थिर होना है। खोट राहवे इस बदन में, ख़ालिस सोना होना है। तब ही हम जोत के साथ मेल खा सकते हैं। जोत के साथ मेल खाकर अनादि होना है, फिर धीरे-धीरे त्रिकालदर्शी होना है। स्वभावों में स्थिर रहकर महाराज जी की गोद में रहना है, फिर इसी ध्यान के साथ प्रभु को पाना है, फिर उसी ध्यान में जुड़े रहना है। फिर सर्गुण में परिपक्क रहना है यानि फर्ज अदा को सच्चाई धर्म से निभाना है। किसी के घेरे में इन्सानों तुसां नहीं आना और फिर तुसां त्रिकालदर्शी बनना है।

 

इसी संदर्भ में आगे कहा गया है कि तीन प्रकार के इन्सान होते हैं, एक उत्तम, दूसरा मध्यम, तीसरा मन्द अधम। जो मन्द अधम होता है वह तो सुकर्म करता ही नहीं, जो मध्यम होता है वह सुकर्म तो पकड़ लेता है मगर कष्ट-कलेश तथा दु: आने पर छोड़ देता है। उत्तम वह है जो कष्ट-कलेश दु:-सुख में स्थिर रहता है और सुकर्मों को वह नहीं छोड़ता यानि सच्चाई धर्म में स्थिर रहता है, अपने फर्ज अदा को सच्चाई धर्म से चलाता है। दुनियाँ वाले उस पर कितना ही घेरा क्यों डालें, वह किसी के घेरे में नहीं आता। हर समय महाराज की गोद में अटल रहता है और हकूमत की कुर्सी पर हमेशा स्थिर रहता है। इस तरह स्थिर हो-होकर थोड़े दिनों में जोत के साथ मेल खाकर तीनों कालों की पहिचान करके त्रिकालदर्शी हो जाता है। यही नहीं वह सच का ही वर्त-वर्ताव करता है। सुकर्मों को धारण करके फिर वह किसी से नहीं डरता है, फिर वह किस के आगे हाथ जोड़े, किस के आगे मस्तक झुकाये। जो नाम है वही शब्द गुरु है तो फिर वह भेटां किस को चढ़ाये। इस तरह तुमने भी त्रिकालदर्शी बनना है। इस अर्थ को धारण करते हुये तुम त्रिकालदर्शी बन सकते हो इसलिये तुम्हें भी चाहिये कि इस दुनियां में रहकर धर्म सच्चाई पकड़ो, यश लो अपयश लो। समदृष्टि रखो, सर्व राम रूप समझो, यश की जीत अपयश की हार, तो सजनों इन अर्थों को धारण करके त्रिकालदर्शी बनो। यश कमावो - यश कमावो।"

 

इस उपलब्धि के दृष्टिगत सजनों हमें सर्गुण के खेल खेलते हुए भी यानि अपना फ़र्ज अदा ठीक से निभाते हुए भी परस्पर एक दूसरे के सजन बन, एकता में आना होगा और निर्गुण के खेल खेलते हुए एकान्तवासी यानि फुरनों से आज़ाद बने रहने का स्वभाव अपनाना होगा। जानो एकान्त, एक अवस्था अर्थात् मन, बुद्धि की एकाग्रता में बने रहने का प्रतीक है जहाँ आत्मा का योग परमात्मा संग बना रहता है और एक ख़्याल, एक दृष्टि हो एक दर्शन में स्थित रह, इंसान एकरूप हो इस जगत में सब कुछ करता है। इस तरह वह परमपिता परमेश्वर का ज्ञान गुण धारण कर शक्तिशाली होकर उन्ही के निमित्त नि:स्वार्थता से एक तपस्वी त्यागी की तरह सेवा भाव से सब कुछ करता है और बदले में कभी किसी से मान-सम्मान या कुछ ओर प्राप्त करने की अपेक्षा नहीं करता। जानो कि ऐसे निष्काम परोपकारी सेवक पर ही प्रभु प्रसन्न होते हैं और उसे अपना सब कुछ दे इस तरह भरपूर कर देते हैं कि फिर वह जगत में जरूरतमंदों को जितना भी बाँटता है उतना ही उसका खजाना भरता जाता है। इस तरह वह अनुरागी सत्-वादी, आत्मबोध रखने वाला सब दे दिलां दियां जानन वाला बन त्रिकालदर्शी नाम कहाता है।

 

सजनों आपको भी ऐसा ही निष्कामी परोपकारी बन त्रिकालदर्शी बनना है। सब की जानकारी हेतु त्रिकालदर्शी के विषय में इससे आगे बातचीत आगामी सप्ताह करेंगे।