आत्मविजय-3

साडा है सजन राम, राम है कुल जहान

अर्थात् ईश्वार हमारा मित्र/प्रियतम सर्वव्यापक है, उसी को जानो, मानो व वैसे ही गुण अपनाओ।

 

शब्द है गुरु, शरीर नहीं है,

अर्थात् ज्ञानी को नहीं ज्ञान को अपनाओ और निमित्त में नहीं नित्य में श्रद्धा बढ़ाओ।

 

इस पर सुदृढ़ता से डटे रह, इस अटल सत्य पर स्थिर बने रहो:-

3म् अमर है आत्मा, आत्मा में है परमात्मा

 

गत सप्ताहों में सजनों हमने जाना कि पूर्ण आत्मविजय ही सबसे बड़ी विजय है जो इंसान को तभी प्राप्त होती है जब वह प्रत्येक कार्य अपने निजी अहं व कर्ता भाव को त्याग कर, ईश्वार के निमित्त, उसके हुक्मानुसार करता है। अन्य शब्दों में जो सब काम ईश्वार को हाजि़र नाजि़र जान कर, निष्काम व समर्पित भाव से शास्त्रविहित युक्ति अनुसार करता है, वह कभी नहीं हारता क्योंकि उसका सारा ध्यान विजय लक्ष्य पर केन्द्रित होता है व उसका शारीरिक-मानसिक या आत्मिक बल अथाह होता है। इस संदर्भ में सजनों आत्मविजय एक श्रेष्ठ सद्गुण है व साधना की चरम और दुर्लभ अवस्था है। इस अवस्था को प्राप्त करने के लिए उद्देश्य की स्पष्टता, दृढ़ इच्छा शक्ति, लगन, निष्ठा, साहस, युक्तिसंगत परिश्रम तो आवश्यक है ही साथ ही नैतिक बल, आत्मसंयम व एकाग्रचित्तता का होना भी अपरिहार्य है। इन साधनों के विकास हेतु ही सुसंगति, नियमित रूप से सत्-शास्त्र का अध्ययन, चिंतन, मनन, विचार, चारो पहर नाम-अक्षर का सिमरन, ध्यान व निरंतर एक गुणी इंसान की तरह निष्काम भाव से प्रयासरत रहने की महिमा है।

 

इस तथ्य के दृष्टिगत सजनों विजयी होने के लिए सदैव अपने मनोबल को ऊँचा रखो। मन-मस्तिष्क में विजय प्राप्ति के अतिरिक्त किसी विपरीत विचार के लिए कोई स्थान न हो। याद रखो मन यदि दृढ़ है तो सफलता सुनिश्चित है। इसके विपरीत इन्द्रियाँ व मन यदि चलायमान है तो व्यक्ति शीघ्र ही तन-मन-धन व सम्बन्धों के प्रभाव में आ उनसे हार जाता है, फलत: विजय प्राप्ति असंभव हो जाती है। ऐसा इसलिए भी  कह रहे हैं क्योंकि चंचल इन्द्रियाँ किसी को भी अपने वश में करने के लिए सदा उद्यत रहती है। अनेक तो सहज रूप में विषय रसों के गुलाम हो उनके वश में हो जाते हैं किंतु कुछ दृढ़ निश्चयी ऐसे भी होते हैं जो हर प्रकार के रसास्वादन से मुक्त हो उन इन्द्रियों की दिशा ही मोड़ देते हैं। समयबद्ध यत्न कर उन्हें बर्हिमुखी से अंतर्मुखी बना देते हैं और इन्द्रियजीत कहलाते हैं। आत्मविजय प्राप्त करने हेतु आप भी ऐसे ही इन्द्रियजीत बनो। याद रखो इन्द्रियों की ही भांति मन पर विजय पाना भी अति आवश्यक है। मन को जीत कर ही मनुष्य इस संसार में नि:स्वार्थ व अकर्ता भाव से कर्म करते हुए, धर्म के मार्ग पर प्रशस्त हो सकता है और सदाचारितापूर्ण सत्कर्म कर सकता है। इसके विपरीत यदि वह ऐसा नहीं करता तो बुरे कामों में फँस कुकर्म-अधर्म करने लग जाता है। अत: अपने मन और इन्द्रियों दोनों को जीतने वाले जितेन्द्रिय बनो और बड़े बड़े प्रलोभनों के माया जाल से मुक्त हो असीम संतोष को पाओ। इससे व्यक्तित्व शील (जिसमें मनुष्यत्व के सभी आवश्यक गुण सम्मलित होते हैं) और शक्ति का संगम स्थल बन जाएगा। ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि शीलवान ही होश में रहते हुए अंतर्निहित आत्मिक शक्ति का सही तरह से प्रयोग कर सकता है।   ऐसा होने पर आपकी जय आपके आचार-विचार व व्यवहार से प्रतिबिम्बित होती है और ई·ार स्वयं आगे होकर आपका अभिवादन करते हैं और आप दुर्लभ अमर पद को सहज ही प्राप्त कर लेते हो।

 

स्पष्ट है सजनों चित्त की भीतरी दुष्प्रवृत्तियों पर निरन्तर आत्मसंयम रखने का अभ्यास करने से ही आत्मविजय प्राप्त हो सकती है। नि:संदेह यह अभ्यास एक दिन की बात नहीं इसके लिए लक्ष्य का निर्धारण कर, अपनी बिखरी शक्ति को उसी निश्चित दिशा में प्रवृत्त रखने का सतत् प्रयास करना होता है। तब जाकर व्यक्ति की सोच और स्वभाव में सकारात्मक परिवर्तन आता है और ऐसे पदार्थ और व्यक्ति निरर्थक लगने लगते हैं जो लक्ष्य प्राप्ति में सहायक नहीं होते, बल्कि बाधक होते हैं। इस संदर्भ में की जाने वाली सतत् विचार प्रक्रिया ही लक्ष्य प्राप्ति में सहायक होती है और आत्मविजय प्राप्त करने का हेतु बनती है।

ऐसा आत्मविजयी बनने हेतु सजनों सही तरीके से अपना आत्मविश्लेषण करना सीखो। इस हेतु अपने अच्छे-बुरे दोनों ही पहलुओं को देखो और आप अभी जैसे हैं वैसे कैसे बने, इसका भली-भांति मूल्यांकन करो। कहने का आशय यह है कि मानसिक/बौद्धिक रूप से निश्चेष्ट/सुन्न होकर मत बैठो अपितु आपके वर्तमान भाव/स्वभावों का स्वरूप बुरा क्यों बना, मानसिक रूप से उन कारणों को जानने/समझने की क्रिया करो। फिर कह रहे हैं सजनों कि बुरे से अच्छा इन्सान बनने हेतु सही तरीके से इस आत्मविश्लेषण की क्रिया को करो। जानो इस क्रिया को ठीक तरीके से न करने के कारण ही, खुद को नहीं संभाल पा रहे हो और अंदर घर गए विकार दीमक की तरह आपके शरीर व मानस को खोखला करते जा रहे हैं। सजनों इसी खोखलेपन के कारण शास्त्र को सुनने/पढ़ने के बावजूद भी कोई भी अच्छी बात/विचार आपके ह्मदय तक पहुँचता नहीं और स्मृति में ठहरता नहीं। अत: यदि चाहते हो कि ऐसा न हो तो ध्यान से  देखो कि आपके अच्छे और बुरे गुण कौन से हैं और उन्हें आपने कैसे प्राप्त किया?

अब अंतर्निहित इन बुरे गुणों को नष्ट करने की प्रक्रिया शुरु करो। याद रखो यह दुर्गुण/बुरे स्वभाव भारी बोझे के समान है। इसी के कारण आपकी शक्ति का अपव्यय होता है और आपका मन-मस्तिष्क हमेशा  दुविधा युक्त व तनावग्रस्त रहता है। इस द्वन्द्वात्मक वातावरण में फिर बुद्धि सही निर्णय लेने में धोखा खा जाती है यानि अंतर्निहित विवेकशक्ति का इस्तेमाल कर सही-गलत, भले-बुरे की परख ठीक से नहीं कर पाती।  इस हानि के दृष्टिगत सजनों अपने स्वभाव से दुर्गुणों को निकाल फेंको और आत्मिक गुणों को एक-एक करके आत्मसात् करना शुरु करो। ऐसा करने से आपकी सहज स्वाभाविक सुंदरता अपने आप निखर कर सामने आएगी।

इस तरह फिर आप जैसे-जैसे एक-एक करके अपनी समस्त बुराईयों को पहचान कर उन्हें युक्तिसंगत उखाड़ कर फेंकते जाओगे वैसे-वैसे यह वि·ाास अन्दर जाग्रत होगा कि मैं आत्मविजयी हो सकता हूँ। इस तरह आप अधिकाधिक बलवान बनते जाओगे।

इस संदर्भ में अपनी कमजोरियों से कभी भी हतोत्साहित न होना क्योंकि ऐसा करने का अर्थ होगा कि आपने अपनी हार स्वीकार कर ली है। अत: ऐसा मत होने दो अपितु विश्लेषात्मक आत्मविश्लेषण द्वारा यानि अंतर्निहित विवेकशक्ति के प्रयोग द्वारा अपनी सहायता स्वयं करने में सक्षम बनो। याद रखो जो लोग अपनी विश्लेषात्मक बुद्धि का उपयोग नहीं करते वे हकीकत में सही से देख ही नहीं पाते। उनमें आत्मा का सहजात ज्ञान, अज्ञान से ढँक जाता है और वह अपने यथार्थ दिव्य गुणों, ज्ञान, शक्ति व स्वरूप को भूल जाते है। जानो इसी आत्मविस्मृति के कारण वे दु:ख में पड़ते हैं। इस संदर्भ में मत भूलो कि जैसे ईश्वार ने हमें अपनी पलके खोलकर प्रकाश के माध्यम से संसार को देखने की शक्ति दी है, ठीक उसी प्रकार आत्मप्रकाश द्वारा अज्ञान आवरण को हटा कर, अपने वास्तविक अलौकिक स्वरूप को प्रकट करने की शक्ति दी है। इस बात को भली-भांति समझने हेतु आँखें बंद करो। अब देखो कि क्या आपको कुछ निगाह आ रहा है?

नि:संदेह आप कुछ भी नहीं देख पा रहे क्योंकि प्रकाश का अभाव है।

अब पलके खोलो और देखो क्या सब निगाह आ रहा है?

जानो ख़्याल व ध्यान दोनों के ही प्रकाश वल होने के कारण व्याप्त प्रकाश तथा प्रकाश में पड़ी हुई समस्त वस्तुएँ ठीक से नज़र आती हैं और उनका यथार्थ बोध हो पाता है।

इसी तरह अन्दरूनी वृत्ति में होता है। अन्दरूनी वृत्ति में भी ख़्याल व ध्यान दोनों जब आत्मप्रकाश की तरफ हो जाता है तो  उस आत्मा में व्याप्त परमात्मा निगाह आ जाता है।

अत: सजनों यदि चाहते हो कि मस्तक की यह ताकी खुले और आत्मस्वरूप प्रकट हो तो प्रतिदिन नियम से रात्रि में सोने से पूर्व सही तरीके से अपना आत्मनिरीक्षण करो और पाई मानसिक कमजोरियों को युक्तिसंगत दूर करने का प्रयास करो।

पूर्ण विजय प्राप्ति के लिए केवल रात्रि में ही नहीं अपितु दिनचर्या के दौरान भी यदा-कदा एक मिनट के लिए स्थिर होकर क्या कर रहे हो, क्या सोच रहे हो इसका विश्लेषण करो यानि ख़्याल, वाणी व कर्म तीनों पर निगाहबानी रखो।

याद रखो जो अपना आत्मविश्लेषण नहीं करते वह कभी नहीं बदलते। वे न बढ़ते है न घटते हैं बस जहाँ है उन्हीं स्वभावों में अटक कर रह जाते हैं और जीवन हार जाते हैं। यह अस्तित्व की अत्यन्त कठिन व खतरनाक अवस्था है। इस खतरनाक अवस्था से शीघ्रतातिशीघ्र उबरो।

इस तथ्य के दृष्टिगत सजनो दिन-रात, चारो पहर सदैव सचेत रहो और देखो कि हमारे अन्तस्तल/हृदयपटल पर क्या घट रहा है। इस तरह जो मानव धर्म के विरूद्ध हो व जिसे नहीं करना चाहिए उस ओर जब मन आकृष्ट होता प्रतीत हो तो उसे प्रयासपूर्वक रोको यानि वैसा न करने दो। ऐसा करने से आकर्षणों की ओर जाने के लिए मन सहज रूप से रुक जाएगा। इसके विपरीत यदि ऐसा न किया तो समुचित नैतिक अंकुश के अभाव में समस्त इन्द्रियाँ विद्रोही हो जाएगी और मन बुद्धि पर हावी हो सब कुछ अस्त-व्यस्त कर देगा। ऐसा न हो इस हेतु सजनों कदम-कदम पर विचार को पकड़ने की आदत डालो। इस संदर्भ में सजनों सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ के अनुसार याद रखो कि विचार पर चलने वालों की ही सदा जीत जीत और फतह फतह होती है। ऐसा मानव ही आत्मविजय प्राप्त कर सकता है।

 

मत भूलो कि आप इस जगत में अपने आप को खोने नहीं अपितु अपने सच्चे स्वरूप को ढूँढने के लिए आए हैं। ईश्वार ने आपको अपने जीवन पर विजय प्राप्त करने के लिए अपना एक सैनिक बना कर यहाँ भेजा है। अत: आपका सर्वोच्च कर्तव्य है अपने अहं पर विजय प्राप्त करके, अपने घर लौट जाना। कदाचित् आप अपने इस सर्वोच्च कर्तव्य को भूलने की या उसके निर्वहन में लापरवाही वर्त कर टालमटोल करने की पाप समान भूल नहीं कर सकते। इस भूल से बचने हेतु समय रहते ही अपने आप को संभालो और अंतर्निहित अपने सच्चे स्वरूप को ढूँढ निकालो। इस हेतु ईश्वार को एक क्षण भी न भूलो। स्मरण रखो ईश्वार को भूलकर समय व्यर्थ गँवाना बहुत आसान है। इससे निरर्थक तुच्छ बातों में ही समय व्यतीत हो जाता है और भगवान के बारे में सोचने हेतु  कोई समय ही नहीं बचता। अत: जीवन बनाने हेतु व्यर्थ की बातों की कचहरी बंद कर दो और सम, संतोष, धैर्य, सच्चाई, धर्म की कचहरी लगा सदा आत्मस्वरूप के विषय में ही सकारात्मक चिंतन व मनन करो।

 

ऐसा करते समय रास्ते में आनेवाली परेशानियों व परिस्थितियों से घबराओ नहीं अपितु याद रखो कि जितनी अधिक यह समस्याएँ आपके सामने आएगी, उतना ही अधिक अवसर प्रभु को यह दिखाने के लिए आपको प्राप्त होगा कि आप भी एक सच्चे आध्यात्मिक आत्मविजेता हो। अंतत: याद रखो प्रत्येक मनुष्य को अपनी विजय आप प्राप्त करनी है। अत: यदि आप भी अपने मन में ठान लो कि आप सर्वोच्च आत्मविजय को प्राप्त करके ही रहोगे तो आप उसे प्राप्त भी कर सकते हो। इस हेतु न आपको किसी तीर-तलवार की और न ही किसी सेना की आवश्यकता है। जरूरत है तो केवल दृढ़ संकल्प की यह ही  आपको जीवन संग्राम में जिता सकता है। अतैव इस उपलब्धि के दृष्टिगत अपने मन को उपशम करख़्याल प्रभु संग जोड़ लो और ध्यान इस्थर हो जाओ। इस प्रकार जीवन बनाने हेतु सफलता अपने आप प्राप्त हो जाएगी।