हुक्म की महानता व महत्ता-1

साडा है सजन राम, राम है कुल जहान

अर्थात् ईश्वर हमारा मित्र/प्रियतम सर्वव्यापक है, उसी को जानो, मानो व वैसे ही गुण अपनाओ।

 

शब्द है गुरु, शरीर नहीं है,

अर्थात् ज्ञानी को नहीं ज्ञान को अपनाओ और निमित्त में नहीं नित्य में श्रद्धा बढ़ाओ।

 

इस पर सुदृढ़ता से डटे रह, इस अटल सत्य पर स्थिर बने रहो:-

ओ3म् अमर है आत्मा, आत्मा में है परमात्मा

 

सजनों हर समय इस सत्य का अनुभव करते रहो। यकीन मानो यदि ऐसा कर लिया तो ताकतवर व बुद्धिमान बन जाओगे व सब पर निर्भरता समाप्त हो जाएगी।

 

सजनों सतवस्तु का कुदरती ग्रन्थ कहता है:-

हुकम बड़ा बलवान सब कुछ हुकम करदा, हुकम बड़ा महान, सब कुछ हुकम करदा।।

हाँ हाँ सब कुछ हुकम करदा, वाह वाह सब कुछ हुकम करदा।

हुकम बड़ा बलवान सब कुछ हुकम करदा, हुकम बड़ा महान, सब कुछ हुकम करदा।।

हुकम सुजाने हुकम पछाने, हुक्म बड़ा प्रधान, सब कुछ हुकम करदा।

ओ3म हुकम बड़ा प्रधान ए, हुकम बड़ा प्रधान, सब कुछ हुकम करदा।।

 

उपरोक्त पंक्तियों का भावार्थ भली-भांति समझने हेतु सजनों आज समझते हैं कि हुकम से क्या तात्पर्य है:-

 

इस संदर्भ में जानो कि हुकम का अर्थ है उस ईश्वर की आज्ञा, अनुमति या आदेश जिसने हमें किसी विशिष्ट प्रयोजन की सिद्धि के निमित्त इस मृतलोक में भेजा है।

 

जैसा कि यह सत्य तो सर्वविदित है कि इस सृष्टि का रचनाकार, परब्रह्म परमेश्वर है तथा यह सृष्टि युगों-युगांतरों से उसकी ही ब्रह्म शक्ति अर्थात् ब्रह्मसत्ता से क्रियाशील है। इससे स्पष्ट होता है कि इस सृष्टि का वास्तविक शासक व कर्त्ता- धर्त्ता वह निराकार परब्रह्म परमेश्वर ही है और वह ही अपनी इस अद्भुत रचना की रमज जानता है कि उसने क्योंकर और किस प्रयोजन की सिद्धि के निमित्त यह सृष्टि उपजाई है।  इस परिप्रेक्ष्य में हम, आप, सब उसकी प्रजा हैं। इस नाते सजनों सृष्टि चक्र को उचित ढंग से चलायमान रखने के लिए हम सब प्रजावासियों का कर्त्तव्य बनता है कि हमारा शासक कुदरत के विधान अनुसार जो भी हमें अधिकारपूर्वक आज्ञा देता है, हम एक आज्ञाकारी निष्काम सेवक की भांति  "जो हुकम" कहकर, समर्पित भाव से, धर्म शास्त्र आदि में बताई विधि अनुसार, उन आज्ञाओं का नीति संगत समयबद्ध पालन करें। यहाँ "जो हुकम" का अर्थ है "आपकी जैसी आज्ञा है वैसा ही होगा"। याद रखो इस प्रकार हुकम पालन करने वाला आज्ञाकारी सुपुत्र ही उस ईश्वर का संग-साथ प्राप्त कर उसके हुकम की रमज़ जान व समझ सकता है।

 

उपरोक्त आशय से सजनों स्पष्ट होता है कि सारी सृष्टि एक ईश्वर के "हुकम" से चल रही है यानि हुकम के अंतर्गत ही सब उत्पन्न हो रहे हैं और हुकम से ही सभी प्रकार के क्रियाकलाप सम्पन्न हो रहे हैं। पवन, पानी, अग्नि, धरती, आकाश, सूर्य-चाँद, तारे-नक्षत्र, आदि सब उस ईश्वरीय हुकम के अधीन हैं और ईश्वरीय रज़ा के अनुकूल अनुशासनबद्ध होकर निष्काम भाव से अपना कार्य कर रहे हैं यानि सृष्टिकर्त्ता के हुकम से बाहर कुछ भी नहीं है।

 

अन्य शब्दों में सर्गुण में जो कुछ दृश्य, श्रव्य और तत्त्व रूप में सभी आकारों और प्रकारों में व्यावहारिक रूप से दृष्टिगोचर हो रहा है, वह ईश्वर के हुकम से ही हो रहा है। तभी तो समस्त वेद-पुराण, धर्म-ग्रन्थ व शास्त्र, कुदरती नैतिक संविधान व आचार-संहिता के रूप में उसी के हुकम का ही जि़क्र कर रहे हैं जिससे स्पष्ट होता है कि यह हुकम समस्त जीवों के कल्याण के निमित्त है और इसीलिए विवेकसम्पन्न मानव के लिए सत्य-धर्म पर स्थित रहने हेतु इसकी यथा पालना करना अनिवार्य है।

 

जानो ईश्वर का हुकम गहन, अगाध एवं दुर्बोध होने के साथ-साथ सदा सत्य व अटल है तथा इसे वह परमेश्वर ही देख व समझ सकता है। इस संदर्भ में याद रखो कि परमात्मा के हुकम की कोई व्याख्या नहीं कर सकता क्योंकि परम की इच्छा की कोई शाब्दिक अभिव्यक्ति नहीं हो सकती। तभी तो सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में भी कहा गया है:-

कैसी है शोभा आपदी, किसे न लखी जाय, जुर्ररत है किसदी वर्णन  करे ओ कलम न लिखने पाये।

 

इस संदर्भ में नानक जी भी कहते हैं कि "हुकम" का वर्णन वास्तव में असंभव है।

इस प्रकार सजनों "हुक्म" -- सर्वश्रेष्ठ आज्ञा यानि प्रभु का आदेश है। यह आदेश हर स्थिति में उचित और समाज सम्मत है। अत: इनका पालन किया जाना व्यक्ति और समाज दोनों के लिए हितकर है तथा इसी के अनुकूल व्यवहार करने से घर, परिवार व समाज की रक्षा और सुख-शांति में वृद्धि हो सकती है तथा लोक-परलोक में उत्तम गति प्राप्त हो सकती है। सारत: हम कह सकते हैं कि जो ताकत ईश्वरीय वचनों  में हैं वह किसी और समझौते में नहीं। जैसे कि "श्री जपुजी साहब" में भी गया है:-

 

विश्व का प्रत्येक कार्य व्यापार और व्यवहार परमात्मा के हुकुम में बँधा है, उससे बाहर कुछ भी नहीं। यदि जीवात्मा इस तथ्य को सही परिप्रेक्ष्य में पहचान ले और सब दशा में ईश्वर का हुकम बिना मनमत लगाए सिर-माथे पर धारण करे तो वह अहंकार के परिवेश (मैं करता हूँ, मैं करूँगा आदि) से मुक्त हो जाता है।

 

अन्य शब्दों में "हुकम" ईश्वर की आज्ञा के साथ सामंजस्य स्थापित कर, आंतरिक शांति प्राप्त करने के लक्ष्य का प्रतिनिधित्व करता है। यही नहीं, चौरासी काटने के लिए व जन्म-मरण के चक्कर से छूटने के लिए भी ईश्वर के वचनों यानि हुकम की पालना करना अनिवार्य है।

 

इस संदर्भ में यह भी जानो कि ईश्वरीय आज्ञा का पालन करने वाला आज्ञाकारी सुपुत्र कहलाता है। वह मननकार बगैर किसी दबाव के यानि अपनी खुशी से व निष्काम भाव से अपने आप को ईश्वरीय आज्ञा के पालन के निमित्त समर्पित करता है। आज्ञापालन की यह प्रवृत्ति आज्ञाकारिता कहलाती है। आज्ञापालक कर्त्तव्यबोध से प्रेरित होकर अपने कर्त्तव्य के पालन हेतु स्वेच्छा से अपने स्वार्थ, सांसारिक सुखों, मनोकामनाओं, अहंकार, प्रतिष्ठा, मान-अपमान, राग-द्वेष, वैर-विरोध, ज्ञान-अज्ञान इत्यादि मनोभावों का त्याग कर, ईश्वर के हुकम को सर्वोपरि मान, उसको एक सच्चे सेवक की भांति अंगीकार करता है तथा उस पर कोई तर्क-वितर्क, वाद-विवाद नहीं करता। इस प्रकार वह हर हाल में ईश्वरीय हुकम को धारण कर उसकी पालना हेतु विपरीतता/विषमता और प्राणों की परवाह किए बिना अपना तन-मन-धन सब वार देता है यानि अपने प्राण तक निछावर करने से नहीं सकुचाता। तभी तो वह आत्मसमर्पण द्वारा अपने मन पर अधिकार रखने वाला बन यानि मनमत से ऊपर उठ आत्मज्ञान द्वारा आत्मा में लीन होने का सुख अनुभव कर परमशांति पाता है। इसी तथ्य के दृष्टिगत सजनों सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में कहा गया है:-

ब्रह्म शब्द वचन प्रवान करो, ब्रह्म शब्द बड़ा महाने।

आवागमन ओहदा मिट गया, उस पा लिया आत्मिक ज्ञाने।।

 

इस संदर्भ में सजन श्री शहनशाह हनुमान जी का हुक्म/आज्ञापालन हम सबके सम्मुख आदर्श स्वरूप है जिन्होंने हर स्थिति में अपने इष्ट के हुकम को सर्वश्रेष्ठ माना व उसकी पालना करने हेतु कठिनाईयों व बाधाओं की परवाह किए बगैर, अनेकों बार अपने प्राण संकट में डाल दिए। परिणामत: परमेश्वर की कृपा व भक्ति-शक्ति की ताकत से उन्होंने सर्वोच्च पद प्राप्त किया और उनके द्वारा प्रतिपादित आचार-विचार व व्यवहार की शैली, श्रेष्ठतम मार्गदर्शन के रूप में सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ के माध्यम से हमारे सम्मुख है। इसलिए तो सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में कहा गया है:-

हो हो हो हनुमान जी दे वचनां दी पालना करो।

हो हो हो ओन्हां दी बात फड़ो पकड़ो इक इक गल।

ओ दाता है शहनशाहवां दा शाह, हम बालक ओन्हां दे हैं निर्बल--हम बालक ओन्हां दे हैं निर्बल।

 

इससे सजनों स्पष्ट होता है कि आज्ञापालन करने वाले व्यक्ति में आज्ञापालन करने की इच्छा व सामर्थ्य दोनों होनी चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि जब तक उसकी इच्छा नहीं होती तब तक वह स्वयं को आदेशित क्रिया में प्रवृत्त नहीं कर पाता। जितनी इच्छा तीव्र होती है उतनी ही क्रिया की गति और गुणवत्ता होती है। इसी तरह सामर्थ्य का महत्त्व भी आज्ञापालन में इच्छा के समानांतर ही होता है। यदि आज्ञापालक में आज्ञापालन की सामर्थ्य ही नहीं होती तो वह इच्छा होते हुए भी आज्ञा का पालन नहीं कर पाता। इसके अतिरिक्त सजनों  आज्ञापालन की मर्यादा लोक कल्याण की अपेक्षा करती है। इस मर्यादा को ध्यान में रखते हुए, ईश्वर की आज्ञा के अधीन रह, अपने जीवन का हर कार्य करने वाला ही, श्रेष्ठ मानव माना जाता है। यह बात युग पुरूषों के जीवन चरित्र से भी साक्षात् परिलक्षित होती है।

 

इसके विपरीत ईश्वर की आज्ञा का पालन न करना सदा नुकसानदायक/हानिकारक साबित होता है। रावण व दुर्योधन के संदर्भ में यह कथन शत्-प्रतिशत् सही सिद्ध होता है। चूंकि उन्होंने सत्य-नियम के सिद्धान्त अनुसार निर्धारित ईश्वरीय हुकम यानि नीति-नियमों की अवज्ञा की इसलिए उनका विनाश हुआ। यही हाल वर्तमान कलियुग में अधिकतर मनुष्यों का भी है। वे भी ईश्वर की आज्ञा या नीति के विरुद्ध, विचार का सवलड़ा रास्ता छोड़, अविचारयुक्त कवलड़े रास्ते पर प्रशस्त हो रहे हैं यानि गुरुमत के स्थान पर मनमत का अनुगमन करते हुए कुकर्म-अधर्म कमा रहे हैं। परिणामस्वरूप अपार कष्ट-क्लेश व दु:ख भोगते हुए पतनोन्मुख हो रहे हैं। जैसा कि सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में कहा भी गया है:-

इंसान दुनियां विच आए के इस जन्म दी कदर न जाती।

छल-कपट द्रोह करके, अपने जन्म नाल कीती गुस्ताखी।।

 

यदि ध्यान से देखा जाए तो अपने को पूर्ण मानने वाले, ऐसे अहंकारी, मनमत के अधीन हो, दुराचार, भ्रष्टाचार, अत्याचार व व्यभिचार जैसा दानवीय चलन दर्शाते हैं। परिणामत: मनुष्य कहलाने के काबिल ही नहीं रहते। इस तथ्य के दृष्टिगत सजनों जानो कि जिसका भी मन मनमानी करता है वह पतन के पाताल में गिरता ही गिरता है। उसकी प्रवृत्ति स्वयमेव अधोगामिनी हो जाती है क्योंकि वह विवेकहीन करणीय-अकरणीय का निर्णय नहीं कर पाता और उसकी बुद्धि विनाश को प्राप्त हो जाती है। इसके विपरीत जो हँस कर अपनी मनमत त्याग, गुरुमत यानि ईश्वर के हुकम अनुसार, उसकी आज्ञा का पालन करता है, वह अपने इस अनमोल मानव जीवन के लक्ष्य का संधान यानि पता लगा पाता है यानि वह जान जाता है कि परमात्मा का प्रत्येक निर्देश एक दिशा है जो उसे अपने वास्तविक घर परमधाम की ओर ले जा रहा है। अत: वह आत्मोथान का आकांक्षी उस पर पूरा ध्यान देता है जिससे उसकी चेतना ऊर्ध्वमुखी हो जाती है, वृत्ति-स्मृति निर्मल हो जाती है व बुद्धि विवेकशील हो जाती है यानि सत्य-असत्य, भले-बुरे का बोध करने में सक्षम हो जाती है। इस प्रकार वह विचारशील अपने मन को एकाग्र, चित्त को शांत कर जीवन के सत्य को खोज, उसे प्राप्त कर लेता है और सत्-वादी बन, यश-कीर्ति का अधिकारी बनता है। इस संदर्भ में जैसा कि कहा भी गया है कि:-

 

जीव जब तक इस हुकम की सत्यता, अटलता को नहीं समझता और मनमत अनुसार चलता है तब तक वह दु:खी रहता है परन्तु जिस समय वह ईश्वर की परम कृपा से उसके हुकम की पहचान करने में समर्थ हो जाता है तत्क्षण ही वह परम सुख का अनुभव करना आरम्भ कर देता है। हुकम की पहचान मानव हृदय से अहम् का नाश कर देती है। इस महत्ता के दृष्टिगत सजनों सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में वर्णित इस संदेश को मान लो:-

मनमत ते सजनों न चलना, गुरुमत दा संग असां करना।।

 

इस तथ्य के दृष्टिगत सजनों हमारे लिए बनता है कि हम सर्वोत्तम ब्रह्माज्ञा का पालन करें। ब्रह्माज्ञा कहती है कि हम ब्रह्म हैं यानि उसी का ही अंश हैं। हमारा उससे सम्बन्ध समुद्र-वीचि यानि लहर का है। लहर उठी, समुद्र में मिल गई, क्षणिक भेद है। यह भेद अपने अस्तित्व के सत्य को स्वीकारने और ईश्वरीय आज्ञा का पालन करने से ही मिट सकता है। अत: ब्रह्माज्ञा की सर्वश्रेष्ठता पर चिंतन कर, उसके आदेशों, निर्देशों को अपने आचार-व्यवहार में लाना यानि पूरी निष्ठा से उसका पालन करना सुनिश्चित करो। यही कल्याण और श्रेय यानि उन्नति का मार्ग है। इसी से व्यक्तित्व का विकास हो सकता है और अनुशासित ढंग से जीना आ सकता है। इसी से अहंकार का विसर्जन हो सकता है और आज्ञादाता यानि ईश्वर के प्रति विनय-समर्पण का भाव जाग्रत हो सकता है जिससे सुनिश्चित रूप से जीवन लक्ष्य प्राप्ति में सफलता मिलती है। इस महान सफलता को प्राप्त करने के योग्य बनने हेतु सजनों  हुकम के विषय में इससे आगे बातचीत आगामी सप्ताह करेंगे।