वृत्ति/स्मृति/बुद्धि-2

साडा है सजन राम, राम है कुल जहान

अर्थात् ईश्वर हमारा मित्र/प्रियतम सर्वव्यापक है, उसी को जानो, मानो व वैसे ही गुण अपनाओ।

 

शब्द है गुरु, शरीर नहीं है,

अर्थात् ज्ञानी को नहीं ज्ञान को अपनाओ और निमित्त में नहीं नित्य में श्रद्धा बढ़ाओ।

 

इस पर सुदृढ़ता से डटे रह, इस अटल सत्य पर स्थिर बने रहो:-

ओ3म् अमर है आत्मा, आत्मा में है परमात्मा

 

सजनों गत सप्ताह हमें अन्दरूनी व बैहरूनी दोनों प्रकार की वृत्तियों की शुद्धि द्वारा  अन्त:करण/मानसिक, शारीरिक एवं व्यावहारिक शुद्धि एवं निर्मलता बनाए रखने  के लिए कहा गया। इस संदर्भ में सजनों जानो कि अन्दरूनी वृत्ति की निर्मलता जहाँ हमें मानसिक रूप से स्वस्थ व स्वच्छ रखने के साथ-साथ, हमारे व्यक्तित्व व चरित्र को निखारती है तथा सज्जन व श्रेष्ठ पुरुष बनने में हमारी सहायक सिद्ध होती है वहीं बैहरूनी वृत्ति की शुद्धता हमें शारीरिक रूप से स्वस्थ व स्वच्छ बनाने के साथ-साथ हमारे आचरण व व्यवहार को उत्तम बनाकर हमें सुन्दर, स्पष्ट, मधुर व सदाचारी बनाती है। यद्यपि जीवनयापन हेतु दोनों प्रकार की वृत्तियों की शुद्धता परम आवश्यक है तथापि आत्मशुद्धि के निमित्त, शारीरिक पवित्रता से अधिक चित्त-वृत्तियों की पवित्रता तथा वासनादि के क्षय का महत्त्व है। ऐसा करने पर ही हम अपने व्यक्तित्व का पूर्ण रूपेण विकास कर प्रत्येक कार्य करने में दक्ष हो सकते हैं और आत्मविश्वासी व स्वावलंबी बन सकते हैं। इस संदर्भ में जानो अन्दरूनी वृत्ति की निर्मलता यानि आन्तरिक शुद्धि के लिए अपने अंत:करण को स्वच्छ दर्पण सा पारदर्शी बनाना होगा। इसके दर्पण होने की कल्पना तभी साकार होगी, जब उसमें परमात्मा का प्रतिबिम्ब पूर्ण रूप से स्पष्टतया दिखाई देने लगेगा। सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में सजनों इस प्रतिबिम्ब के लिए सुरत शब्द का इस्तेमाल हुआ है, आओ आज जाने कि सुरत क्या है और इसको कैसे देखना है?

 

"सुरत क्या है", इस विषय में सजनों सतवस्तु का कुदरती ग्रन्थ कह रहा है, "सुरत है अन्दर का ख्याल,  अपना प्रतिबिम्ब"। यह सुरत स्त्री भाव में नज़र आती है। सुरत के दृष्टिगोचर होते ही अपने मन में उत्पन्न होने वाले विचार या प्रवृत्ति की स्वच्छता के प्रति परख करनी होती है ताकि किसी विध् भी ख़्याल के नकारात्मक हो जाने पर सुरत की कंचनता भंग न हो जाए। जानो ऐसा सुनिश्चित करने पर ही इंसान का हृदय आत्मप्रकाश से दीप्तिमान रहता है और इस वातावरण में ख़्याल इस तरह प्रभामय हो जाता है कि फिर किसी भी जगतीय वस्तु या बात या किसी क्रिया द्वारा होने वाला परिणाम उसके अंत:करण को किसी ओर प्रवृत्त नहीं कर पाता। इस प्रकार जब इंसान मिथ्या जगत में विचरते हुए भी दॄढ़ता व धीरता से कामनामुक्त अवस्था में स्थिर बने रहने की कला जान जाता है तो उसके लिए आत्मभाव अपनाना सहज हो जाता है और शब्द ब्रह्म विचार ही उसके परमार्थिक धन होते हैं जिनको धारण करने के उपरांत वह अमीरों का भी अमीर हो, जगदाता नाम कहाता है।

 

सजनों हम भी यही युक्ति अपना कर अमीरों के भी अमीर बनने मे सफल हो पाएँ, आओ उसके लिए समझते हैं कि सुरत को कैसे देखना है? यह अति गंभीरता से विचारणीय बात है क्योंकि इस क्रिया द्वारा ही हम अपने ख़्याल पर ध्यान रख सकते हैं जिससे वह बिगड़ने या इधर उधर भटकने न पाए। इसी प्रकार हम अंतर्मुखी बने रह अपने मन को विषय विकारों यानि बुरी वासनाओं से और चित्त को दोषों से मुक्त रखते हुए, अंत:करण में स्थित होकर प्रेरणा देने वाले अंतर्यामी के संग जुड़े रह सदा चैतन्य अवस्था को प्राप्त रह सकते हैं और अपनी वृत्ति-स्मृति व बुद्धि समेत अपने स्वभावों को निर्मल रख सकते हैं।

 

जानो इस अवस्था में इंसान को शरीर की जड़ता और आत्मा की नित्य चेतन अवस्था का ज्ञान हो जाता है और उस चेतनायुक्त सुरत वाले के लिए सावधानी से जगत में विचरते हुए, सत्य-धर्म के निष्काम रास्ते पर स्थिर बने रह परोपकारी नाम कहाना सहज हो जाता है। याद रखो सजनों चैतन्य अवस्था को प्राप्त होना परमात्मा का साक्षात्कार होने जैसी कल्याणकारी बात होती है क्योंकि रूप, रंग, रेखा रहित, ज्योति-स्वरूप, परब्रह्म परमेश्वर जब सुरत के समक्ष प्रत्यक्ष होते हैं तो जीवात्मा का आत्म ज्योति स्वरूप स्वत: ही साकार हो उठता है और उसका प्रतिबिंब होने के नाते जीव को यह ज्ञान हो जाता है अर्थात् यह प्रमाणित हो जाता है कि उसकी सुरत ही महाराज जी को देख रही है। ऐसा होने पर सहसा ही सुरत कह उठती है:-

"ज्योति स्वरूप है अपना आप हम तो हैं ओही प्रकाश।"

 

फिर यह सत्य जब दृढ़ता से उसकी स्मृति में बैठ जाता है तो वह आनन्द विभोर हो हर्षा उठती है और परमपद प्राप्त करने हेतु महाराज जी के साथ बातें करती है व सर्गुण निर्गुण की खेलें खेलते हुए, उन को कई तरीकों से रिझाती है। ऐसा करते समय याद रखो शरीर का कोई सवाल नहीं होता यानि शरीर सुन्न होता है। इस प्रकार महाराज जी को देखते-देखते, उनसे बातें करते-करते जब सुरत रूपा स्त्री, अपने व शब्द की वास्तविकता से परिचित हो जाती है तो वह अटल सुहागिन की तरह त्रिलोकी के महाराजा यानि अपने पति परमेश्वर सम शोभायुक्त होने के लिए उनके श्रृंगार (ज्ञान, गुण व शक्ति) को देखती है यानि निहारती है और इसके प्रति जहाँ-जहाँ भी वह खुद को कमजोर पाती है उसमें अविलम्ब आवश्यक सुधार कर घाटा पूरा कर लेती है अर्थात् जो कमी पेशी होती है उसे पूरा कर हर प्रकार की हानि से बच जाती है। इस तथ्य के दृष्टिगत ही सजनों सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में कहा गया है:-

"जैसे जैसे अपने स्वभावों को पकड़ते जावेंगे वैसे वैसे सुरत कंचन होती जावेगी। तब आपका घाटा पूरा होगा और आप कामयाब हो सकेंगे। वरना यत्न करने पर भी आप कामयाब नहीं हो सकेंगे।"

इस तरह अपने स्वभावों पर फ़तह पाने का अदम्य पुरुषार्थ दिखा सुरत चेतन अवस्था में बनी रह दिन-प्रतिदिन चमकती जाती है। सजनों जानो जैसे-जैसे सुरत चमकती गई वैसे-वैसे इंसान धैर्य का श्रृंगार पहन लेता है। इस तरह उसका धैर्य का सवाल हल हो जाता है। इस संदर्भ में सजनों सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में कहा गया है:-

स्वभावां वल्लों जित्त पा लवो सजनों, स्वभावां वल्लों जित्त पा लवो

फिर धैर्य दा पा लिया सिंगार, सुरत हो गई कंचन

फिर सुरत महाराज जी दे संग ओ जाके टापु टापु में जा के ओ चमक दिखावे

शब्द इस तरीके नाल चलया फिर, सजन धैर्य वल्लों फतह पा गया।

धैर्य वल्लों जित पा गया सजन ओ, धैर्य वल्लों जित पा गया।।

 

आगे सजनों जानो कि सत्य चानणा है और हम संतोष-धैर्य का श्रृंगार पहन कर ही, सत्-वादी बन अपने शरीर को सचखंड बना सकते हैं। ऐसा पराक्रम दिखाने पर ही हम अपने हृदय को सत्य से भरपूर करके इसकी सुगंधि से देवलोक की सुगंधि को भी मात कर सकते हैं। जैसे कि कहा भी गया है:-

 

फिर सच होवे जबान, सच होवे हृदय, सच होवे वर्त-वर्ताओ।

फिर शरीर रूपि मकान नूं सचखंड बनाओ।।

सच खंड बना लओ सजनों, सचखंड बनाओ।।

फिर फैले सुगन्धि ओ सजनों तुहाडी देश देशान्तर।

इस तरीके नाल देवलोक नूं हषाओ।।

देवलोक नूं हर्षा लवो सजनों, देवलोक नूं हर्षाओ।

फिर सजन सच्चाई वल्लों फ़तह पा गया ओ सजन सच्चाई वल्लों फ़तह पा गया।।

 

आगे सजनों श्री साजन परमेश्वर कहते हैं धर्म दे सवाल ते किस तरह फतह पानी जे सो सुनो:-

धर्म नूं जो जितना चाहवो, महाराज जी दे नैनां नाल नैन मिला के।

फिर जो मन मन्दिर सोई जग अन्दर, मुकम्मल एहो दृष्टि सजनों दिखाओ।

सम दा कोई सवाल नहीं फिर दिव्य दृष्टि दा शब्द लै के अपना जीवन बनाओ।।

 

स्पष्ट है सजनों सत्य को धारण करने के उपरांत हमें धर्म के रास्ते पर सीधा विचरना सुनिश्चित करना है। इस तप द्वारा जो प्रकाश त्रिलोकी के महाराजा का मन मन्दिर में देखा है वही प्रकाश जगत में देखने पर हमारी एक निगाह एक दृष्टि हो जाएगी और हम सतवस्तु में इंसान बन सकेंगे। परिणामस्वरूप हमारी सुरत रानी बनकर अन्दर महाराज जी के साथ-साथ, टापू-टापू में विचरती हुई सर्गुण में पहुँच जावेगी और महाराज जी के साथ रहते हुए पटरानी बनकर उनकी चालें पकड़ेगी और प्रभु से मेल खा जाएगी। सजनों इस तरह एकरूप हो जाने पर आवागमन का चक्कर मिट जाएगा।

 

उपरोक्त विवेचना से सजनों स्पष्ट हो जाता है कि आत्मा के विषय में सम्पूर्ण जानकारी रखने वाला आत्मयुक्त,  आत्मबुद्धि इंसान ही आत्मा का यथार्थ स्वरूप जानने वाला होता है और उसे शरीर के स्थान पर शरीरस्थ आत्मा से प्रेम होता है। तभी तो वह आत्मज्ञानी अपना व सबका कल्याण करने में समर्थ हो पाता है व आजीवन उमंग व उत्साह के साथ निष्काम भाव से परमार्थ के रास्ते पर स्थिर बने रहने हेतु, अपने ही ज्ञान, गुण व शक्ति द्वारा खुद को कामनायुक्त रास्ता अपनाने से रक्षित रख जितेन्द्रिय बन पाता है।

 

अन्य शब्दों में आत्मज्ञान द्वारा ही इंसान को संतोष व आत्मा को आनन्द प्राप्त रहता है। ऐसा आत्मतुष्ट इंसान ही परोपकार की भावना से ओत-प्रोत हो, अपने लाभ की ओर ध्यान न देते हुए दूसरों की भलाई के निमित्त अपने स्वार्थ का सहर्ष त्याग कर सकता है अर्थात् अपने सर्वस्व को अपने इष्ट देव को समर्पित कर सकता है।

 

अत: सजनों इस उपलब्धि के दृष्टिगत अपने मन में खुद को जानने की व तदुपरांत ब्रह्म नाल ब्रह्म होने की रुचि पैदा करो। इस तरह निज स्वरूप का भली-भांति ज्ञान प्राप्त कर आत्मज्ञानी बनो व ब्रह्म नाल ब्रह्म हो जाओ। ऐसा होने पर आत्मसंयम द्वारा अपनी चित्त वृत्ति को वश में रखना व अपने मन को रोकना सहज हो जाएगा यानि आत्मसंस्कारों से युक्त हो अपना सुधार आप कर पाओगे और चित्त पूर्णत: शुद्ध व मन पवित्र हो जाएगा। इस तरह आत्मभाव में स्थित हो व तद्नुरूप वृत्ति तथा गुण अपनाकर आत्मसिद्धि कर लोगे यानि मुक्ति प्राप्त कर अपना जीवन सफल बना लोगे।

 

 

अंतत: सजनों यकीन मानो यदि मात्र इतना कर लिया तो फिर संसारी स्वभाव या कनरस नहीं भाएंगे अपितु परमार्थ का रास्ता अच्छा लगने लगेगा। यह अपने आप में बुराई से अच्छाई की ओर बढ़, सजन पुरुष बनने की बात होगी। इसके सद्प्रभाव से मुखमंडल पर ऐसा आभा-वृत्त बनेगा जिसकी ओर आकर्षित हो, हर प्राणी के अन्दर  आप जैसा सजन-पुरुष बनने की उमंग व प्रेरणा जाग्रत होगी। इस प्रकार आप द्वारा सद्-वृत्ति अपनाने से, आपके सहित कईयों का कल्याण हो जाएगा।

 

सबकी जानकारी हेतु वृत्ति से स्मृति की निर्मलता कैसे जुड़ी हुई है, आगामी सप्ताह हम इस विषय में जानेंगे।