प्रकाश-2

साडा है सजन राम, राम है कुल जहान

अर्थात् ईश्वर हमारा मित्र/प्रियतम सर्वव्यापक है, उसी को जानो, मानो वैसे ही गुण अपनाओ।

शब्द है गुरु, शरीर नहीं है,

अर्थात् ज्ञानी को नहीं ज्ञान को अपनाओ और निमित्त में नहीं नित्य में श्रद्धा बढ़ाओ।

इस पर सुदृढ़ता से डटे रह, इस अटल सत्य पर स्थिर बने रहो:-

ओ3म् अमर है आत्मा, आत्मा में है परमात्मा

सजनों ईश्वर क्या है?

ईश्वर केवल प्रकाश ही प्रकाश है और कुछ भी नहीं। उसी प्रकाश को अंत: व ब्रह्म दृष्टि द्वारा ग्रहण कर व उसी में अपने ख़्याल व ध्यान को स्थिर कर हम अंन्दरूनी व बैहरूनी जगत को देख-समझ कर उसमें कुशलता से विचरते हुए परोपकार कमा सकते हैं। याद रखो जब सजन इस क्रिया को निपुणता से करने में सक्षम हो जाता है तो फिर किसी भी वस्तु/तत्त्व का यथार्थ गुप्ट नहीं रहता यानि सब प्रत्यक्ष प्रकाशित हो जाता है और उसकी वास्तविकता समझ आ जाती है। आपने भी सजनों ऐसा ही योग्य सजन बनना है ताकि सहजता से समभाव नज़रों में कर समदृष्टि हो जाओ और अपने प्रकाश को पाओ ।

सजनों गत सप्ताह हमने जाना कि जो प्रकाश या स्वरूप मैंने अपने मन-मन्दिर में देखा है यानि जिस स्वरूप के साथ मेरा प्यार है (श्री राम, रहीम, श्री कृष्ण करीम या दस पातशाह जी के साथ) वही स्वरूप मेरा बाहर हर एक में है और वही मेरी असलियत है। यह सारा प्रतिबिम्ब मेरा ही है। इसी प्रतिबिम्ब को हर एक में देखना है, जनचर-बनचर में वही है, जड़-चेतन में उसी का प्रकाश है। यही असलियत मेरा ब्रह्म स्वरूप है।

इस संदर्भ में सजनों हम आशा करते हैं कि आपने पिछली कक्षा में हुई इस बात को यथा अपनी वृत्ति-स्मृति में उतार कर धारण कर लिया होगा। ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि सतवस्तु का कुदरती ग्रन्थ कह रहा है:-

"वृत्ति है जे एहो कमाल वृत्ति है जे एहो विशाल

एहो कोई मुश्किल फड़दा विरला कोई धारण करदा।

जेहड़ा देखो सजनों मन मन्दिर प्रकाश ओही ब्रह्म स्वरूप है अपना आप।

सजनों हम मान सकते हैं कि सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ से उद्धृत इन विचारों को अमल में ला इनका अभ्यास करने पर आपके मन में अब वास्तविक रूप से ज्ञानवान, गुणवान व शक्तिवान बन यथार्थता से जीवन जी पाने की उमंग व उत्साह भी अवश्यमेव पैदा हो गई होगी। सजनों अगर ऐसा ही है तो आओ फिर अपने वास्तविक स्वरूप को जानने के प्रति अपने उत्साह व उमंग को और प्रबलता देने के लिए पूरी दिलचस्पी में आकर सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ से उद्धृत कीर्तन "जेहड़ा प्रकाश देखो मन मन्दिर, ओही प्रकाश देखो जग अन्दर" को अनुभव करते हुए बोलते हैं  व इस तरह इस कीर्तन में विदित विचारों को धारण का आत्म प्रकाश की सर्वव्यापता के सत्य को समझते हुए समभाव-समदृष्टि को नज़रों में करने का समझदारी से प्रयास करते हैं। सजनों यही एक विचारशील इन्सान की तरह परिपूर्ण जीवन जीते हुए श्रेष्ठ पद को प्राप्त करने की बात है। आओ अब पूरे प्रेम से बोलें:-

(श्री साजन जी के मुख के शब्द)

जेहड़ा प्रकाश देखो मन मन्दिर, ओही प्रकाश देखो जग अन्दर।

ओही ओही, आहा आहा आहा, आहा आहा आहा आहा हा हा।।

ओही प्रकाश देखो रग रग में, ओही प्रकाश देखो सारे जग में।

ओही ओही ओही ओही ओही।

ओही प्रकाश देखो रग रग में, ओही प्रकाश देखो सारे जग में।।

 

ओही प्रकाश जनचर बनचर, ओही प्रकाश हुआ जड़ चेतन।

ओही ओही, आहा आहा आहा, आहा आहा आहा आहा हा हा।।

ओही प्रकाश है हद हद में, ओही प्रकाश है सारे जग में।

ओही ओही ओही ओही ओही।

ओही प्रकाश है हद हद में, ओही प्रकाश है सारे जग में।।

ओही प्रकाश सप्तद्वीप गगन मण्डल, ओही प्रकाश हुआ भू मण्डल।

ओही ओही, आहा आहा आहा, आहा आहा आहा आहा हा हा।।

ओही प्रकाश है पग पग में, ओही प्रकाश है सारे जग में।

ओही ओही ओही ओही ओही।

ओही प्रकाश है पग पग में, ओही प्रकाश है सारे जग में।

ओही प्रकाश हुआ आद अन्त, ओही प्रकाश हुआ सूरज चन्द।

ओही ओही, आहा आहा आहा, आहा आहा आहा आहा हा हा।।

ओही प्रकाश है सर्व सर्वज्ञ में, ओही प्रकाश है सारे जग में।

ओही ओही ओही ओही ओही।

ओही प्रकाश है सर्व सर्वज्ञ में, ओही प्रकाश है सारे जग में।।

ओही प्रकाश हुआ निर्वाण दे अन्दर, ओही प्रकाश हुआ जगत जितेन्द्र।

ओही ओही, आहा आहा आहा, आहा आहा आहा आहा हा हा।।

ओही प्रकाश है घट घट में, ओही प्रकाश है सारे जग में।

ओही ओही ओही ओही ओही।

ओही प्रकाश है घट घट में, ओही प्रकाश है सारे जग में।।

सजनों यह अपने आप में परिपूर्ण यथार्थ का बोध रखते हुए अर्थात् सदा चेतनता से अपने अविनाशी नित्य स्वरूप में बने रहते हुए, एक आत्मतुष्ट इंसान की तरह जगत में बेखौफा-बेखतरा होकर निष्काम भाव से विचरने की व कर्मफलों से मुक्त रहने की बात है। इसी अवस्था में एकरस स्थिर बने रहने पर जीवन जीने का वास्तविक आनन्द प्राप्त हो सकता है। सजनों यदि हम चाहते हैं कि हम भी इस आनन्द प्राप्ति के योग्य अधिकारी बनें तो इस हेतु हमें अपना ख़्याल ध्यान वल व ध्यान प्रकाश वल स्थिर रखना होगा ताकि हम किसी विध् भी इस जगत रूपी मायाजाल में भ्रमित न हो सकें।

इस परिप्रेक्ष्य में जानो कि सर्व कल्याण की भावना से ओत-प्रोत हो, जब किसी भी शरीरधारी जीवात्मा का अपने जीवन का परम प्रयोजन सिद्ध करने हेतु परमात्मा से मिलन बना रहता है तो उसके ललाट के मध्य प्रकाशित, उस ज्योति स्वरूप परमात्मा के प्रकाशमय बिन्दु के प्रकाश से, जीव व जगत का रहस्य हृदय में प्रकाशित रहता है। इस दिव्य अवस्था में उस विवेकबुद्धि इंसान के लिए ख़्याल को ध्यान स्थिर कर, आत्मानुभूति करना यानि अपना यथार्थ जानना सहज हो जाता है। इस आत्मानुभूति के पश्चात् उसे लगने लगता है कि जो स्वरूप मैंने अपने मन-मन्दिर में देखा है, वही स्वरूप मेरा बाहर हर एक में है और वही मेरी असलियत भी है। अत: वह समस्त द्वि-द्वेष मिटाकर इस सकल ब्रह्माण्ड को ब्रह्ममय जानने लगता है। धीरे-धीरे यह विश्वास उसके मन में अटलता धारण करने लगता है और उसकी सुरत जगत के समस्त कार्यव्यवहार प्रभु के निमित्त करते हुए भी नि:संकोच होकर समर्पित भाव से उसी एकरस अवस्था में समभाव से स्थिर सधी रहती है। फलत: उस इंसान ने संसार में आने के पश्चात् जितने भी शारीरिक स्वभाव अपनाए होते हैं वह उस तेजोमय प्रकाश बिन्दु के प्रभाव से भस्म होने लगते हैं और धीरे-धीरे स्वत: ही उसका वास्तविक दिव्य स्वरूप प्रकट हो जाता है अर्थात् आत्मदर्शन हो जाता है। सजनों इस परिणाम के दृष्टिगत आत्मिक ज्ञान प्राप्त करने का परम पुरुषार्थ करो और यथार्थ अवस्था में बने रहने हेतु अपने अन्दर ऐसा मजबूत मादा उत्पन्न करो कि इस प्राप्ति हेतु अपना तन-मन-धन, सम्बन्ध व समय सहित कुछ भी वारने से न सकुचाओ। इस तरह आलौकिक धन प्राप्त कर मालोमाल हो जाओ यानि अमीरों के भी अमीर कहलाओ।

इस संदर्भ में जानो कि सजन श्री शहनशाह हनुमान जी के द्वारे पर होने के नाते हमें उन कलुकालवासियों की तरह बनना शोभा नहीं देता जो संकल्पों-विकल्पों, विघ्नों और कर्मों के चक्रव्यूह में उलझ ऐसा पुरुषार्थ दिखाने में अपने आप को असमर्थ पाते हैं या फिर जिन मनमत पर चलने वालो के मन में नित्यप्रति सत्संग में आने-जाने व सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में विदित शब्द ब्रह्म विचारों को पढ़ने-सुनने के पश्चात् भी जगतीय विषयों के प्रति वैराग्य तथा त्याग भावना जाग्रत नहीं होती। सजनों जानो इस कष्टप्रद अवस्था से न उबर पाने के कारण ही उन्हें जन्म-मरण के चक्रव्यूह में पड, दु:ख-सुख भोगना पड़ता है।

आप-हम सबके साथ ऐसा न हो इस हेतु सजनों हमारे लिए बनता है कि हम अपने आप को दुनियां के समस्त अन्य इंसानों से विलग व सौभाग्यशाली समझें और किसी के भी प्रभाव में आकर, हम अपनी किसी भी मत को पारमार्थिक उन्नति के पथ की बाधा न बनने दें। इस तरह निर्विघ्न व निर्भय होकर अपनी मंजि़ल की ओर बढ़ते जाएं। इस हेतु सजनों हम ऐसे समझदार इन्सान बनें कि हमारा नि:स्वार्थ होकर सत्य-धर्म के राह पर यथा बने रहने के तप का परिणाम आत्मा और परमात्मा का मिलन यानि संगम हो और हमारी सुरत परमेश्वर की पटरानी बन अटल सुहागन हो परमेश्वर के साथ एक रूप हो जाए और अटल राज का परमानन्द प्राप्त कर परमधाम में विश्राम पाएं।

प्रकाश के विषय में आगे बातचीत आगामी सप्ताह करेंगे। तब तक प्रकाश के विषय में अब तक पढ़ाए गए दोनों सबक़ों के विषय में मजबूती ले लेना ताकि अंत परिणाम सुखकारी निकले।