अमरपद प्राप्ति हेतु विनती

साडा है सजन राम, राम है कुल जहान

अर्थात्ईश्वर हमारा मित्र/प्रियतम सर्वव्यापक है, उसी को जानो, मानो व वैसे ही गुण अपनाओ।

 

शब्द है गुरु, शरीर नहीं है,

अर्थात् ज्ञानी को नहीं ज्ञान को अपनाओ और निमित्त में नहीं नित्य में श्रद्धा बढ़ाओ।

 

इस पर सुदृढ़ता से डटे रह, इस अटल सत्य पर स्थिर बने रहो:-

ओ3म् अमर है आत्मा, आत्मा में है परमात्मा

सजनों जैसा कि गत सप्ताह हमने जाना कि अमरपद की प्रतीति करने हेतु दिल से सजन श्री शहनशाह हनुमान जी का संग करना अनिवार्य है। इसी सन्दर्भ में आओ आज इस संसार रूपी भवसागर से पार उतरने हेतु, अपने दोषों को स्वीकार, सजन श्री शहनशाह हनुमान जी के आगे करबद्ध होकर, ठीक उसी प्रकार समर्पित भाव से विनती करें जिस विशुद्ध भाव से सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ से उद्धृत इस भजन में सच्चेपातशाह जी ने की और उन द्वारा प्रदत्त युक्ति का अनुशीलन कर समदृष्टि हो गए:-

 

सुन लौ मेरी बेनती तारो महाबीर जी, तारो ते पार उतारो महाबीर जी।

काम क्रोध हैं दुश्मन भारी, इनको मार मुकाओ महाबीर जी।

शिव ब्राहृा तुहाडा ध्यान लगावे, नारद जी वी बीन बजावे महाबीर जी।

शेष गणेष तुहाडा हर जस गावे, इन्द्र वी दिल विच हर्षावे महाबीर जी।

तुलसी दास तुहाडा ध्यान लगावे, विभीषण नूं अमर बनाया महाबीर जी।

लंका जीत अयोध्या नूं आवन, भरत नूं राम मिलाया महाबीर जी।

दिन रात भैणों तुसी नाम ध्यावो, गदा महाबीर जी दा ह्मदय विच वसाओ।

दुष्टां नूं मार मुकाया महाबीर जी, सुन लौ मेरी बेनती तारो महाबीर जी।

मैं दासी नूं समदृष्टि कर देओ, भवसागर से पार उतारो महाबीर जी।

सुन लौ मेरी बेनती तारो महाबीर जी, तारो ते पार उतारो महाबीर जी।

 

भावार्थ

सजनों इस भजन के अंतर्गत अध्यात्मिकता से भटका हुआ यानि अपने आत्मस्वरूप को न जानने वाला, जन्म-मरण के चक्रव्यूह में फँसा हुआ कलियुगी जीव, सजन श्री शहनशाह हनुमान जी को अपनी दशा बताते हुए कहता है कि मैं माया रूपी अविद्या के कारण भौतिक सुखों को ही जीवन का सुख समझ ऐसी दुर्भाग्य पूर्ण स्थिति को प्राप्त हो चुका हूँ कि अब ऐ·ार्य के समस्त साधन उपलब्ध होते हुए भी मुझे यह संसार दु:खमय और सूना लगने लगा है। संसार के साथ जुड़ने के कारण मुझे संसार की हवा लग गई है  जिसके दुष्प्रभाव से मैं स्वार्थी यानि छली हो गया हूँ। इस संसार में मैं अब जो भी बनाता हूँ, इसी मायारूपी अविद्या नामक शक्ति के आश्रय से ही बनाता हूँ। इससे मेरे मन की शांति भंग हो गई है और मेरे मन में काम, क्रोध रूपी दुश्मन यानि मनोविकार घर कर गए हैं। इन्हीं काम-क्रोध के दुष्प्रभावों से मैं विषय-वासना के प्रति इस प्रकार आकर्षित हो चुका हूँ कि मेरे मन-मस्तिष्क पर मनोरथ सिद्धि की इच्छा हावी हो गई है और मैं जैसे-तैसे अपनी इच्छाओं की पूर्ति के स्वभाव में फँस स्वार्थी हो गया हूँ। वह कहता है कि हे महाबीर जी !

काम भावना के कारण होने वाली व्यथा यानि पीड़ा मुझसे सहन नहीं होती व मैं निरंतर इस काम अग्नि में जलता रहता हूँ। काम प्रवृत्ति यानि सुख चाहने की इसी मानसिक वृत्ति ने मुझे कामनायुक्त बना दिया है इसीलिए तो मैं विवेकहीन हो व्यभिचार यानि कुकर्म-अधर्म करने लगा हूँ और पतित होता जा रहा हूँ। यद्यपि मैं जानता हूँ कि यह अपराध है तथापि मैं कामनाओं की पूर्ति का इतना विषयी हो चुका हूँ कि अब मेरी रुचि कामवासना बढ़ाने वाले भावों, दृश्यों, बातचीत, साहित्य आदि में ही पनपती है। इस तरह इस काम वासना की प्रबलता के कारण मुझे भले-बुरे का ज्ञान तक नहीं रहा है और निष्काम कर्म करने की बजाय अब मेरी कर्म फल में आसक्ति हो गई है। इसीलिए तो अब मैं जो भी करता हूँ, कर्म फल प्राप्त करने हेतु ही करता हूँ। हर क्रिया के पीछे मेरा मकसद किसी तरह से अपना काम निकालना यानि अपना स्वार्थ सिद्ध करना होता है यानि यही स्वार्थ ही अब मेरे व्यवहार व उपयोग का हेतु है। स्वार्थ सिद्धि के अतिरिक्त अब अन्य किसी बात से मेरा सम्बन्ध नहीं। इसलिए तो मैं मनमत पर चलने वाला स्वेच्छाचारी इंसान बन गया हूँ।

आगे अपनी हालत बताते हुए वह जीव कहता है कि हे महाबीर जी ! कामना पूर्त्ति न होने के कारण मेरे अन्दर क्रोध रूपी तीक्ष्ण मनोविकार उत्पन्न हो गया है। इसीलिए मेरे मन में किसी के अनुचित व्यवहार या काम से, उसके कत्र्ता या किसी अन्याय पूर्ण करूर अपमान जनक स्थिति के प्रति, तीव्र भाव उत्पन्न होते हैं। इसके वशीभूत होकर ही मैं किसी से नाराज़ हो, ऊँचे क्रोध भरे स्वर में बोलता हूँ और कभी खुद आवेश से व्याकुल हो एक अंधे व्यक्ति जैसा आचरण कर बैठता हूँ। स्पष्ट है कि उस समय मैं उचित-अनुचित को नहीं समझ पाता। इस तरह यह क्रोध का स्वभाव मेरे स्वभाव के अंतर्गत हो गया है। तभी तो मुझे अब बिना विशेष बात के यानि अकारण ही क्रोध आ जाता है और कभी-कभी क्रोध का भयानक दौरा भी पड़ता है। इन्हीं कारणों से मैं दयाहीन हो हिंसापूर्ण, भयानक व नीच कार्य करने से भी नहीं सकुचाता यानि मेरे स्वभाव में ही दुष्टता भर गई है। वह जीव कहता है कि चूँकि इस तरह मेरा मन काम, क्रोध और लोभ के वश में हो चुका है इसी कारण मेरे मन में अब किसी के भी प्रति अनुराग सहजता से पनप जाता है और मैं उस विषय-वस्तु के साथ जुड़, मोह बंधन में फँस जाता हूँ। फलत: मैं  "ब्राहृ हूँ " के भाव से भटक  "अहं भाव " का अविचारी चलन अपना चुका हूँ।

आगे वह जीव कहता है कि हे महाबीर जी ! यद्यपि मैं जानता हूँ कि यह संसार न·ार है व निरन्तर रूप बदलता रहता है यानि कामना योग्य नहीं तथापि अज्ञानवश इससे जुड़ कर मैं आत्महत्या करने के समान दुष्कृत्य कर रहा हूँ। अत: हे महाबीर जी ! मैं कहीं इस संसार सागर में भटक न जाऊँ इसलिए मेरी आप से प्रार्थना है कि इन काम-क्रोध रूपी दुश्मनों को मार मुकाओ ताकि मुझे अब से यह द्वि-द्वैत, ईष्र्या-द्वेष, तेरी-मेरी, वैर-विरोध, मान-अपमान, अपना-पराया, संयोग-वियोग आदि न सताए और मैं सहजता से इस भवसागर को पार कर अपने जीवन लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त कर सकूँ ।

इस सन्दर्भ में वह आगे इस कीर्तन के अंतर्गत सजन श्री शहनशाह हनुमान जी की उपमा, विशेष बल व बुद्धि की उपमा करते हुए कहता है कि हे महाबीर जी ! आप सबसे श्रेष्ठ, सबसे विद्वान, सबसे गुणवान, सबसे बलवान, सबसे धनवान, सबसे बुद्धिमान व सारी दुनियां विचों ज्ञानवान हो इसीलिए तो शिव-ब्राहृा भी आपका ध्यान लगाते हैं। नारद-शारद, शेष-गणेश आप का यश गाते हैं। यहाँ तक कि देवताओं का राजा इन्द्र भी आपका दर्शन कर दिल में हर्षाता है। यही नहीं महाबीर जी ! तुलसीदास जी ने तो आपका ध्यान लगा कर "रामचरित्रमानस" जैसे महान ग्रन्थ की रचना ही कर दी व राक्षसी कुल में जन्मे विभीषण ने आप द्वारा प्रदत्त मंत्र प्राप्त कर अमर पद प्राप्त किया। इसी तरह रावण की लंका पर विजय प्राप्ति के उपरान्त आपने भरत और राम का पुन: मिलन करा दिया।

अत: हे बलधारी ! जिस तरह आप ने विभिन्न युगों में सबकी बिगड़ी सँवारी उसी तरह अब मेरी डूबती नैय्या को भी इस भवसागर से पार उतारने हेतु मेरे ख्याल को इधर-उधर भटकने से बचा लो। इस तरह काम-क्रोध रूपी दुष्टों को मार मुका कर, महाबीर जी ! मेरे मन को एकाग्रचित कर दो ताकि मैं दिन-रात आप द्वारा प्रदत्त नाम-ध्यान की युक्ति प्रवान कर, अपने असलियत स्वरूप में जुड़े रह, स्वयं को परिपूर्ण पाऊँ। हे महाबीर जी ! इस प्रकार मेरे ह्मदय को शांति-शक्ति से भरपूर कर, समदृष्टि का सबक़ प्रदान करो। ताकि मेरे अन्दर समदृष्टि होने का भाव पनपे और मैं सबको समान समझ सकूँ। हे महाबीर जी ! मुझे सब को समान दृष्टि से देखने योग्य बना दो ताकि मैं किसी से किसी प्रकार का भेद भाव न रखूँ व इस तरह राग-द्वेष रहित हो जाऊँ। मैं सबका हो जाऊँ और सब मेरे हो जाएं। इस तरह मैं स्वार्थपर अविचार चलन से हट, पुन: परमार्थ के रास्ते पर बने रहने के योग्य बन जाऊँ। हे महाबीर  जी ! मेरी यह बेनती स्वीकार करो जी और इस तरह मुझे इस भवसागर से पार उतारो जी।

सजनों क्या यह सब सुनने के पश्चात् आपके अन्दर भी भवसागर से पार उतरने की तीव्र इच्छा पैदा हुई है?

हाँ जी।

तो फिर अहंता-ममता छोड़कर इस शरीर, इन्द्रियों, मन व बुद्धि से ऊपर उठो और अपने वास्तविक आत्म स्वरूप की पहचान कर, निष्काम कर्म करने वाले सच्चे योगी बनो। इस हेतु खुद को समझाओ कि सुख भोगने के लिए स्वर्ग है तथा दु:ख भोगने के लिए नरक है और सुख-दु:ख इन दोनों से ऊपर उठकर महान आनन्द व अमर पद प्राप्त करने यानि अपने सच्चे घर परमधाम में पहुँच विश्राम पाने के लिए ही मैं इस मनुष्यलोक में आया हूँ। अत: जब तक मैं इन्द्रिय-विषयों में लिप्त हो इस संसार के नाशवान सुख भोगता रहूँगा तब तक अविनाशी परमानंद की प्राप्ति नहीं कर सकूँगा यानि जब तक नाशवान वस्तुओं में सत्यता दिखती रहेगी तब तक आत्मबोध नहीं कर पाऊँगा। आत्मबोध करने हेतु तो मुझे राग-द्वैष, वैर-विरोध, मान-अपमान, तेरी-मेरी युक्त असत्य-भावों को त्याग कर, पूर्ण निष्ठा, लगन व सत्यता से समभाव व सजन भाव अपनाना होगा। इस तरह आचार-विचार व व्यवहार की शुचिता सुनिश्चित करते हुए, मन को प्रभु में लीन रखना होगा और निरासक्त, निर्विकारी जीवन जीना सुनिश्चित करना होगा। ऐसा होने पर ही यकीन मानो हकीकत में इस मानव चोले का प्रयोजन सिद्ध कर जीवन का वास्तविक आनन्द उठा पाओगे।

सजनों आप सब ऐसा करने में कामयाब हो इस हेतु यकीनन आपको सजन श्री शहनशाह महाबीर जी के गुणों को आत्मसात् कर, उन जैसा उत्कृष्ट जीवन चरित्र बनाना होगा। आपकी जानकारी हेतु आगामी सप्ताह हम सजन श्री शहनशाह महाबीर जी के गुणों से परिचित हो, इसी विषय में बातचीत करेंगे।