परमार्थ दृष्टि-1

साडा है सजन राम, राम है कुल जहान

अर्थात् ईश्वर हमारा मित्र/प्रियतम सर्वव्यापक है, उसी को जानो, मानो व वैसे ही गुण अपनाओ।

 

शब्द है गुरु, शरीर नहीं है,

अर्थात् ज्ञानी को नहीं ज्ञान को अपनाओ और निमित्त में नहीं नित्य में श्रद्धा बढ़ाओ।

 

इस पर सुदृढ़ता से डटे रह, इस अटल सत्य पर स्थिर बने रहो:-

ओ3म् अमर है आत्मा, आत्मा में है परमात्मा

 

सजनों भौतिक दृष्टि जिसके द्वारा आप इस परिवर्तनशील जगत को देखते हो उसके विषय में तो आप सब जानते ही हैं परन्तु आज हम निष्कंटक परमार्थ के रास्ते पर सहजता से चलते हुए, मंजिल तक पहुँचने के लिए जिस दृष्टिकोण की आवश्यकता है उस परमार्थी दृष्टि के विषय में जानेंगे। कृपया ध्यान स्थिर होकर सुनो व समझो।

 

सजनों हम सब जानते हैं कि परिवर्तन सृष्टि का नियम है। जैविक, भौतिक तथा सामाजिक तीनों जगत में यह परिवर्तन दिखाई देता है। क्षण-प्रतिक्षण व्यतीत होते हुए समय का बदलना, दिन के बाद रात का आना, ऋतुओं का बदलना, जीवन अवस्थाओं का बदलना, क्रमवार युगों का बदलना, जीवन घटनाओं व परिस्थितियों का बदलना, मानव की आंतरिक स्थिति और व्यक्तित्व का बदलना, बार-बार उपजना-बिनसना आदि सब कुदरत के इस अटल परिवर्तन के नियम को दर्शाते हैं और जतलाते हैं कि इस जगत में कुछ भी अपरिवर्तनशील व स्थिर नहीं अपितु सब कुछ नश्वर और क्षणभंगुर है। परन्तु समझने की बात यह है कि जो इस परिवर्तनशील सत्ता के पीछे विद्यमान अपरिवर्तनशील चिरंतन सत्ता की धारणा को अपना यथार्थ मानते हुए उस सत्य के आलोक में  विकसित विचारधारा अनुरूप अपना समभाव से विकास करता है यानि इस अनित्य देह के द्वारा इस परिवर्तनशील जगत में प्रविष्ट कर, अपनी आत्मा/परमात्मा की शाश्वत अजर-अमर व अटल अवस्था को स्वीकार, तद्नुकूल अपनी मनोवृत्ति, दृष्टिकोण और स्वभाव ढाल लेता है, वह ही इस क्षणभंगुर संसार की निस्सारता को जान, समय अनुसार स्वयं में आपेक्षित स्वाभाविक परिवर्तन लाने में कामयाब हो पाता है। इस प्रकार सत्य का व्यवहारिक व क्रियाशील वाहक बन वह उस ईश्वर की सर्वोत्कृष्ठ कृति होने का सत्य जग जाहिर कर परोपकारी नाम कहाता है।

 

इस संदर्भ में सजनों यदि हम युग परिवर्तन के इस महत्त्वपूर्ण संक्रमण काल को लें तो मानव जीवन के परम लक्ष्य अर्थात् श्रेष्ठतम परम पद को इसी जीवन काल में प्राप्त करने हेतु, सतवस्तु का कुदरती ग्रन्थ जो यथा समय हमें आगामी स्वर्णिम युग की विशेष प्रवृत्ति यानि युग चेतना को धारण कर, तद्नुरूप अपनी चाल या व्यवहार ढाल कर युगधर्मी बनने का संदेश दे रहा है, उस बात को समझते हुए हमें अपनी वृत्ति, स्मृति व बुद्धि को निर्मल रखते हुए ग्रन्थ में विदित नियमानुसार अपने स्वभावों का ताना-बाना बुनना सुनिश्चित करना होगा। कहने का तात्पर्य यह है कि हमें तत्क्षण ही कलुकाल के कलुषित भाव-स्वभाव छोड़, अविलम्ब सतवस्तु के उच्च व पावन भाव-स्वभाव व आचार-संहिता को अपनाने के लिए तत्पर होना होगा और ए विध् उच्च बुद्धि, उच्च ख़्याल हो एकता, एक अवस्था में आना होगा। ऐसा इसलिए भी कह रहे हैं क्योंकि यही समय की माँग भी है। इस माँग को समझते हुए अपने व अपने परिवार के बचाव हेतु स्थिर बुद्धि द्वारा, इस कुदरती ग्रन्थ में विदित, समभाव-समदृष्टि की युक्ति अनुकूल संतोष, धैर्य का श्रृंगार पहन, सच्चाई-धर्म की राह पर निष्काम भाव से चलते हुए, समाज को, राष्ट्र को व कुल विश्व को जीर्ण करने वाली मान्यताओं को समाप्त या सुसंस्कृत कर आगामी युग सतयुग की नवीन मान्यताओं को स्थापित करने वाले महापुरुष यानि नव युग के निर्माता बनो। मानो इसी में हम सबका कल्याण है और इस शुभ परिवर्तन के आने पर ही समस्त मानव जाति मनमत अनुरूप स्वार्थपरता का अविचार युक्त व द्वि-द्वेष पूर्ण, दु:ख भरा चलन छोड़, परमार्थ दृष्टि अनुरूप विचारयुक्त चलन अपना पाएगी और अपने आचार-विचार व व्यवहार को ब्रह्म विचारों अनुसार अलंकृत कर, अपना जीवन सफल बनाने के साथ साथ पुन: सत्य-धर्म का परचम बुलंद कर, अखंड यश-कीर्ति को प्राप्त कर पाएगी।

 

इस महत्ता के दृष्टिगत सजनों सर्वकल्याणकारी इस शुभ परिवर्तन को लाने के प्रति अपने मन में उमंग व उत्साह जाग्रत करो और इस हेतु सर्वप्रथम समझो कि परमार्थ दृष्टि होती क्या है?

 

इस परिप्रेक्ष्य में जानो कि परमार्थ का अर्थ है सर्वोच्च या सर्वोत्कृष्ट सत्य, नाम, रूप आदि से परे यथार्थ तत्त्व, वास्तविक सत्ता, ब्रह्म, सत्य आत्मज्ञान, दु:ख का सर्वथा अभावरूप सुख, सार वस्तु।

तथा

दृष्टि से तात्पर्य देखने की वृत्ति या शक्ति से है जिसे आँख की ज्योति, ध्यान, नजर व अवलोकन भी कहते हैं।

 

इस आशय से परमार्थ दृष्टि से तात्पर्य नाम, रूप आदि से परे सर्वोच्च या सर्वोत्कृष्ट सत्य/वास्तविक ब्रह्म सत्ता का बोध कर आत्मज्ञान प्राप्त करने वाली ध्यान दृष्टि से है। चूंकि यह दृष्टि ही विभिन्न रूप, रंगों वाले  प्राणियों व जीवन की परिस्थितियों के मध्य विचरते समय ध्यान द्वारा यथार्थ स्वरूप में ठहरी रह सकती है और किसी विध् भी संसार से अपना सम्बन्ध नहीं जोड़ती इसलिए इसे अभेद दृष्टि, ज्ञान दृष्टि या समदृष्टि भी कहते हैं। इस संदर्भ में किसी ने कहा भी है:-

जो मनुष्य परस्पर भिन्न दिखाई पड़ते हुए समस्त चराचर प्राणियों में एक अव्यय (परमात्म) भाव की दृष्टि रखता है वही सच्चा सात्विक ज्ञान प्राप्त कर पाता है।

 

परमार्थ दृष्टि से युक्त मानव सर्वव्यापक भगवान का बोध होने के कारण, सबको भेदभाव रहित होकर समान दृष्टि से देखता है। कहने का आशय यह है कि संसारी मनुष्यों को बाह्यकरण अर्थात् चक्षु आदि पाँचों ज्ञानेन्द्रियों तथा मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार रूप अंत:करण: चतुष्टय के द्वारा जिस जगत में विभिन्नता, विचित्रता और विविधता दिखाई देती है, परमार्थी मनुष्य सम्यक् और पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने हेतु उस असमन्वित अनेकता के बीच एकत्व की अवधारणा को अपनाता है और इस जगत को ब्रह्ममय जानता है। जैसा कि कहा भी गया है:-

जो व्यक्ति सभी नष्ट होते हुए चराचर प्राणियों में अविनाशी और समरूप से विराजमान परमेश्वर को देखता है वही सचमुच देखता है।

 

इस तथ्य से स्पष्ट है कि इस संसार में देखते सब हैं, पर सम्यक् रूपेण देखने वाले कम ही होते हैं। अधिकांश बाहर से देखते हैं। कुछ पारखी भीतर तक देख लेते हैं। जो बाहर से देखते हैं, वे उनमें भेद बुद्धि कर लेते हैं। पर जो  द्वि-द्वेष व छल-कपट होने के कारण भीतर से निरखते हैं, उन्हें सबके भीतर एक चेतन का ही परिदर्शन होता है। उनकी नजरों में समभाव यानि दृष्टि में समत्व होता है। ऐसे देखने को ही समदर्शिता या परमार्थ दृष्टि कहते हैं। ऐसा व्यक्ति "एक ही आत्मतत्व सर्वत्र व्याप्त है"  इस अवधारणा को आत्मसात् कर, अनेक नामरूपात्मक इस जगत के प्राणियों में किसी भी प्रकार का भेद अनुभव न करते हुए सबको एक ही नज़र से देखता है और सहज ही आत्मीयता के भाव से विचर पाता है। तभी तो इससे परिवार, समाज व राष्ट्र में अपनेपन का प्रसार होता है और मानव औरों के सुख-दु:ख को अपना अनुभव करता है। परिणामस्वरूप दूसरों का सुख बढ़ता है और दु:ख घटता है। एकता व एक अवस्था पनपती है और अपना अपकार करने वाले वैरी-दुश्मन के प्रति भी आंतरिक रूप से कोई द्वेष या खेद उत्पन्न नहीं होता यानि सब अपने व सजन मित्र प्रतीत होते हैं। ऐसा ही मानव सहृदय और उदार माना जाता है जिसका अंतर्मन इस प्रकार व्यापक और निष्कलुष हो जाता है।

 

इस संदर्भ में सजनों हम सब जानते हैं कि संसार निजत्व मोह और पर भेद से पीडि़त है। इसलिए सब लड़-मर रहे हैं और उन्हें लगता है कि अपना, अपना है, पराया, पराया है। यह सोच और यह दृष्टि सांसारिक है। जो औसत से ऊपर उठे मानव हैं, वे अपने जैसा ही दूसरों को देखते हैं। अपने जैसा समस्त लोक को मानो अर्थात दूसरे का सुख-दु:ख अपना ही सुख-दु:ख समझो, तो यह आदर्श परमार्थ दृष्टि कहलाती है। यह मेरा है, यह दूसरे का है यह विचार लघु यानि संकुचित कमजोर चेतना वालों का होता है। परन्तु उदारचरित महापुरुष वे होते हैं, जो अपनी सहजात स्वार्थ वृत्ति को दबा कर अर्जित परमार्थ वृत्ति या संस्कारगत परोपकार वृत्ति के कारण, समस्त वसुधा को अपना कुटुम्ब मानते हुए सबके प्रति लोकहित की भावना रखते हैं और उन्हें एक जैसा मानते हैं। इसीलिए तो सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में भी कहा गया है:-

समभाव नज़रों में कर, सजन वृत्ति फडि़यो

सजन भाव नज़रों में कर, सजन भाव प्रकृति में लियाइयो

 

इस प्रकार परमार्थ दृष्टि से संकुचित स्वार्थ-दृष्टि परिष्कृत होती है और इससे उत्तरोतर अन्तर्मन भी परिष्कृत हो जाता है। तब व्यक्ति का व्यक्तित्त्व सामाजिक, राष्ट्रीय और निखिल मानवता के कल्याण की कामना में निरत हो, परमपिता परमेश्वर के चरणों में निछावर हो जाता है और आत्म-सत्ता परसत्ता के प्रति पूर्ण समर्पित हो जाती है। यह होता है परमार्थ दृष्टि का कमाल।

 

इस महत्ता के दृष्टिगत सजनों मानो कि वह परमतत्त्व विभागरहित, एकरूप होकर भी (ऊपरी दृष्टि से जगदाकार होकर) विभिन्न नाम-रूपों में विभक्त हुआ सा स्थित है। उसकी इस एकता में अनेकता और अनेकता में एकता के रहस्य को समझने हेतु स्वार्थ की संकीर्ण परिधि से ऊपर उठकर उदार और व्यापक परमार्थ दृष्टि से इस जगत को देखो और ए विध् लघुता से प्रभुता की ओर बढ़ते हुए यानि सर्व राम रूप देखते हुए, परमेश्वर के हुक्म अनुसार, निष्काम व त्याग भाव से प्राणी मात्र की सेवा करने में ही अपने जीवन का कल्याण मानो। अंतत: ऐसा सुनिश्चित करने के प्रति पुरुषार्थी बनो और अदम्य उद्यम दिखा अपने जीवन की यथार्थ महत्ता को जान आनन्दस्वरूप हो जाओ।

 

सबकी जानकारी हेतु परमार्थ दृष्टि के विषय में इससे आगे बातचीत आगामी सप्ताह करेंगे। तब तक अपने अन्दर भरपूर उमंग और उत्साह पैदा करो और संकीर्ण मानसिकता को त्याग उदारता में आ जाओ।