सेवा-1

साडा है सजन राम, राम है कुल जहान

अर्थात् ईश्वर हमारा मित्र/प्रियतम सर्वव्यापक है, उसी को जानो, मानो व वैसे ही गुण अपनाओ।

 

शब्द है गुरु, शरीर नहीं है,

अर्थात् ज्ञानी को नहीं ज्ञान को अपनाओ और निमित्त में नहीं नित्य में श्रद्धा बढ़ाओ।

 

इस पर सुदृढ़ता से डटे रह, इस अटल सत्य पर स्थिर बने रहो:-

ओ3म् अमर है आत्मा, आत्मा में है परमात्मा

 

सजनों जैसा कि हम सब जानते हैं कि परमधाम पहुँचना हमारे जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है जिसके लिए पहले निष्कामी और फिर ब्रह्मज्ञानी बनना आवश्यक है। ऐसा करने पर ही सजनों हम जोत से मेल खा सकते हैं और कई जन्मों की हारी हुई बाजी जीत सकते हैं। इस संदर्भ में इसी निष्काम भाव पर मजबूत करने के लिए सजनो सच्चेपातशाह जी ने सेवा का विधान रखा है और उसे भली-भांति संपादित करने हेतु कुछ नीति-नियम रखे हैं। याद रखो जो आडम्बर मुक्त इन नीति-नियमों पर खरा उतरता है उसी निष्कामी की सेवा यानि भक्ति स्वीकार्य होती है और वह पहले निष्काम व फिर ब्रह्मपद को प्राप्त कर परमधाम पहुँच विश्राम को पा सकता है। इस तथ्य के दृष्टिगत सजनों हमें भी निष्काम भाव से सेवा करने के महत्त्व को समझना है। आओ आज इसी विषय में जानकरी प्राप्त करते हैं।

 

साधारण भाषा में सेवा से तात्पर्य किसी पूज्य/आदरणीय व्यक्ति अथवा स्वामी को सुख या आराम पहुँचाने के लिए किए जाने वाले काम से लिया जाता है या फिर किसी की उन्नति या भलाई या पालन-पोषण आदि के लिए किया जाने वाला कार्य भी सेवा कहलाता है परन्तु धार्मिक विचार से ईश्वर की उपासना/आराधना/नाम जपना/पूजा-पाठ या किसी लोक उपयोगी वस्तु, विषय, कार्य आदि में रूचि होने के कारण उसके हित उन्नति, आदि के लिए किए जाने वाला काम सेवा कहलाता है। यहाँ स्पष्ट कर दें कि ईश्वर कोई भौतिक रुपाकार नहीं है, इसलिये परिचर्या स्तर पर उसकी सेवा सम्भव नहीं। अत: मन से उसके प्रति समर्पण और शरणागति को ईश्वर सेवा माना जाता है। इसलिए सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में कहा गया है:-

दिन रात मैं सेवा दे विच राहवां, संसार दे विच न फँस जावां।।

इसके अतिरिक्त कोई-कोई नौकरी को भी सेवा मानता है। यद्यपि नौकरी के बदले हमें वेतन प्राप्त होता है तथापि यदि मनुष्य कर्म करता हुआ अपना कर्त्तव्य नेक-नीयत तथा ईमानदारी से पूरा करता है तो वह सेवा में शामिल होता है। पूजा, आश्रय, शरण, रक्षा, परिचर्या, खि़दमद, नौकरी, शरण, कर्त्तव्य, जीविका, विनम्रता पूर्वक कार्य करना आदि सब सेवा के पर्यायवाची हैं।

 

स्पष्ट है सजनों बिना किसी भेदभाव व मान-अपमान के प्राणी मात्र का उपकार करने, उसकी पीड़ा हरने व उसे सुख पहुँचाने के लिये किया गया नि:स्वार्थ कार्य, सेवा कहलाता है। सेवा की मुख्य रूप से दो दिशाएँ हैं - सकाम सेवा और निष्काम सेवा। इसे सप्रयोजन और निष्प्रयोजन सेवा भी कह सकते हैं। सकाम सेवा कोई कामना या वासना की पूर्ति हेतु फल की इच्छा से की जाती है और निष्काम सेवा बिना किसी कामना या इच्छा के यानि फल की भावना से रहित होकर व परोपकार की भावना से ओत-प्रोत होकर अकर्त्ता भाव से की जाती है। वस्तुत: निष्प्रयोजन और निष्काम सेवा ही सेवा की सही दिशा है। इस आशय से संसार में बिना किसी उपलब्धि की आशा से लोगों का हित करना तथा अपना स्वार्थ त्याग कर व उसके निमित्त दु:ख सहकर भी दूसरे को सुखद बनाने का प्रयत्न करना सेवा कहलाता है। मूल रूप में इसी सेवा का महत्त्व है और इसी के द्वारा यश-कीर्ति की प्राप्ति होती है।

 

इस संदर्भ में सजनों युगो-युगान्तरों में सत्य-धर्म के प्रतीक, अजर-अमर सजन श्री शहनशाह हनुमान जी के निष्काम व अनन्य सेवा भाव का साक्षात् उदाहरण हमारे प्रत्यक्ष ही है। उनके जीवन चरित्र से प्रेरणा ले सजनों हमें भी निष्कामता से प्रभु की चरण-शरण में जाकर, तन-मन-धन से उनके प्रति समर्पित हो जाना है और कर्त्तव्यपरायणता से उनकी आज्ञाओं का सत्यता से धर्मसंगत पालन करते हुए उस प्रभु को रिझाना है। इस तरह प्रभु की समीपता प्राप्त कर व उनके प्रिय बन उनकी चालें पकड़नी हैं व ब्रह्म व ब्रह्मांड का ज्ञान प्राप्त कर, ब्रह्मज्ञानी अर्थात् परमेश्वर सम बन अमर पद को पाना है। नि:संदेह सजनों परमेश्वर सम बनने हेतु हमें "विचार ईश्वर आप नूं मान", समभाव नजरों में करना है और सजन वृत्ति पकड़ परस्पर समदर्शिता अनुरूप सजनता का व्यवहार करते हुए, नितोनित अपना आत्मनिरीक्षण करते जाना है। इस तरह भाव-स्वभावों की तरफ से अपने आप को ठीक वैसे ही अर्थात् प्रभु सम श्रृंगारित करने का अदम्य पुरुषार्थ दिखाना है अर्थात् अपनाए हुए स्वार्थपर चलन का त्याग कर वैसी ही रहणी-बैहणी अपना तेजोमय हो जाना है और अपने वास्तविक स्वरूप को प्रकाशित करने के लिए, समभाव-समदृष्टि का सबक़ अपना सजनता का प्रतीक बन  जाना है। सेवा के इसी प्रारूप को स्पष्ट करते हुए सजनों सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में भी सच्चेपातशाह जी कहते हैं:-

हरदम ध्यान मैं लावां तेरा, हटी विसूचिका मिट गया अंधेरा,

दिन रात करा मैं तेरी सेवा, चरणां विच प्रेम बढ़ावां,

जी मैं एहो वर्ताव दिखाचां, जी मैं ऊपर फुल बरसावां।।

 

इस महत्ता के दृष्टिगत सजनों सेवा निष्कामता/नि:स्वार्थ भाव से निष्पक्ष होकर प्रसन्नता से की जानी चाहिये, रो-झुखकर नहीं। इस संदर्भ में याद रखो सेवा कभी सशर्त या सशुल्क नहीं होती।  सच्ची सेवा मनुष्य की जाति, गोत्र, धर्म, देश, सम्पत्ति आदि का विचार नहीं करती। वह तो सेव्य की आवश्यकता मात्र पर दृष्टिपात करती है और उसके अभाव को दूर करने, पीड़ा हरने के लिये तत्काल तत्पर हो जाती है। इस संदर्भ में याद रखो सेवा में प्रति-प्राप्ति या मान प्राप्ति की इच्छा की अपेक्षा निष्कामता की पावन भावना रखने से, मन में एक ऊँचा संकल्प काम करता है तथा मनुष्य तन, मन या धन जैसे भी सम्भव हो, दूसरे के दु:ख क्लेश को काटने या घटाने का प्रयास करता है, इस प्रकार की भावना से उत्प्रेरित कार्य ही वास्तव में सेवा कहलाता है।

 

सेवा की इसी महत्ता के दृष्टिगत धार्मिक ग्रन्थों में सेवा को धर्म बताकर इसका बहुत गुणगान हुआ है यानि निष्काम सेवा को सर्वोच्च मानवीय धर्म माना गया है। गुरुमत के अनुसार मन के विषय-विकारों को संयमित करना तथा परमात्मा की रजा में राजी रहते हुए सदा संतुलित रहना सबसे बड़ी मानसिक सेवा है। अन्य शब्दों में शब्द गुरु अर्थात् अंतर आत्मा की आवाज़ जो मार्ग सुझाए, उसपर विवेकशीलता से अग्रसर रहना और मन को प्रभु में लीन रखते हुए यानि संकल्प रहित व शांत रखने हेतु, लोक कल्याणार्थ तन-मन-धन से जुटना ही सच्ची-सेवा है।

 

इस तथ्य से सजनों ज्ञात होता है कि सेवा मनुष्य की स्वाभाविक वृत्ति है अर्थात मनुष्य का एक ऐसा स्वभाव सेवा है जो शारीरिक, सामाजिक अथवा आर्थिक स्तर पर निरंतर किसी न किसी रूप में तल्लीन रहता है। इस तरह सेवा चरम मानवीय मूल्य है। इसमें केवल वही जुट पाता है, जो निराभिमान हो, जिसका हृदय संवेदनशील व उदार हो, चित्त में करुणा, सहानुभूति, दया, सहयोग व परोपकार आदि का भाव हो व जो, पर-दु:खकातर यानि लोक-कल्याण हेतु सेवा परायण हो व अपनी पूजा-मानता न कराता हो। याद रखो मानव मात्र के प्रति मनुष्य में जितनी इन सद्गुणों की प्रधानता होती है, वह उतना ही सेवा-भाव प्रवण होता है। इसके विपरीत संकीर्ण हृदय, ओछा, निर्दयी, कठोर व्यक्ति या अहंकारी सेवा नहीं कर सकता। अन्य शब्दों में व्यक्तिगत अहं व स्वार्थ भावना से ऊपर उठने पर ही मानव- परिवार, समाज और सकल मानवता की सेवा में यथा अवसर तन-मन-धन से जुट पाता है, और उसमें उदारता, व्यापकता बढ़ पाती है। इस का चरम रूप तब देखने को मिलता है जब वह पीडि़त मानवता के अतिरिक्त पशु-पक्षियों तक की पीड़ा मुक्ति में लग जाता है। सेवा का यह चराचर व्यापी विस्तार जिसके मूल में मानवीय करुणा होती है, ही सेवा भाव कहलाता है।

 

सेवा मन, वचन, कर्म और धन सभी प्रकार से की जा सकती है। तन की सेवा में संकोच-त्याग, मन की सेवा में संकीर्णता-त्याग और धन की सेवा के लिये लोभ-त्याग की आवश्यकता रहती है। इसके अतिरिक्त भक्ति भाव में निष्काम सेवा का विशेष स्थान है। हकीकत में निष्कामता से शारीरिक, मानसिक व आत्मिक रूप से पीडि़त दु:खी मानवों की निष्काम सेवा ही परमात्मा की सेवा है। तभी तो सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में लिखा हुआ है:-

निष्कामी तेरा भगत कहावे, किस नूं पूजा ते किस नूं न पूजा

 

याद रखो परमात्मा कोई पात्र नहीं, जिसके पाँव तथा टाँगें दबाकर हम शारीरिक सेवा (परिचर्या) कर सकें। धन भी उसे नहीं चाहिये। इस दिशा में नि:स्वार्थ भाव से उसकी सृष्टि के जरुरतमन्द प्राणियों की सेवा ही परमात्मा की सेवा कहलाती है। इस संदर्भ में जैसा कि कहा भी गया है कि परमात्मा ने प्राणी जगत को अपने ही रूप में बनाया है अर्थात् परमात्मा स्वयं चराचर जीवों में भासता है। इसका यही अर्थ निकलता है कि परमात्मा की सेवा करने के लिये निष्काम भाव से प्राणी जगत की सेवा करनी चाहिये। परमात्मा के बनाये जीव-जन्तु, प्रकृति एवं मूल तत्त्व, सबकी रक्षा का प्रयत्न, उनके दु:खों को दूर करने के प्रयास, सब परमात्मा की सेवा में शामिल हैं। परमात्मा ने अपने बनाये जीवों को जीवन देने के लिये जल, वायु, सूर्य, चाँद तथा अन्न उपजाने को धरती प्रदान की है। इन सबके प्रति संयम, सुरक्षा और प्रेम भावना भी परमात्मा की सेवा है।

 

श्रमशीलता, उदारता और सहिष्णुता सेवा को विकसित करने के मुख्य साधन हैं। सेवा में श्रम की विशेष आवश्यकता होती है। जो सहनशील व श्रमशील नहीं है, वह किसी की सेवा नहीं कर सकता क्योंकि सेवा करने में जिस श्रम की आवश्यकता होती है उस श्रम को करने की इच्छा और साहस का अभाव श्रमहीन में सदा बना रहता है। उदार हृदय वाले मनुष्य किसी भी दीन-दु:खी या असहाय व्यक्ति को देखकर उसकी पीड़ा या अभाव का निवारण करने के लिये तत्काल तत्पर हो जाते हैं। जबकि कठोर हृदय वाले अनुदार व अहंकारी लोग किसी की भी सेवा करने को तैयार नहीं होते। आत्म-गौरव नष्ट न होने देना सेवा की प्रथम सीमा है। निष्काम सेवा में आत्म-गौरव नष्ट नहीं होता किन्तु किसी लाभ की आशा में की गई सकाम सेवा आत्म-गौरव को नष्ट कर देती है। सेवा की एक अन्य सीमा उसका प्रदर्शन न करना भी है यानि सेवा करो पर उसका विज्ञापन न करो। जिसकी सेवा की है उसपर बोझ मत डालो नहीं तो आपकी सेवा पुन: स्वीकार करने में उसे संकोच होगा और पिछली सेवा के लिये जो उसने स्वीकार की थी, उसके मन में पछतावा होगा। 

 

स्वार्थपरता सेवा के पथ की सबसे बड़ी बाधा है। स्वार्थी मनुष्य कभी किसी की सेवा नहीं करता क्योंकि वह केवल अपने स्वार्थ की पूर्ति में लिप्त रहता है। इससे सेवा-पथ बाधित होता है। इसके अतिरिक्त यह भी जान लो कि सेवा कार्य करने में सेवक को निश्चित रूप से कष्ट उठाना पड़ता है। सब लोग यह कष्ट उठाने को तैयार नहीं होते। अत: एक निष्काम सेवक को लक्ष्य में व्यवधान उत्पन्न करने वाली इन कठिन व कष्टप्रद विविध बाधाओं से नहीं घबराना चाहिए अपितु आत्मविश्वास, धैर्य व शांति-शक्ति से इन सबका सामना करते हुए तथा अकर्त्ता भाव में स्थिर रहते हुए हर मुश्किल से उबर जाना चाहिए।

 

उपरोक्त विवेचना से सजनों स्पष्ट होता है कि वास्तव में सेवा वह मानवीय कार्य है जो बिना किसी निजि स्वार्थ के आत्मतुष्टि और परतुष्टि के लिये किया जाता है। यह बड़ी ऊँची भावना है। इस ऊँचाई तक पहुँचने वाला नि:स्वार्थी, निराभिमानी तथा नि:संकोची होता है। इसलिए वह लोक-लाज या व्यक्तिगत स्वार्थ अथवा लोभ को कभी नहीं अपनाता। उसका लक्ष्य यानि निशाना प्राणी मात्र के कष्टों को हर कर उनका दु:ख निवारण करना है तथा उद्देश्य होता है परमात्मा की शरण। इसीलिये सच्चे मन से मनुष्यता की सेवा करने वाला जीवन परमात्मा की समीपता का अधिकारी होता है। याद रखो सेव्य के प्रति निष्ठा और व्यापक दृष्टि सेवा में अनिवार्य है। इस संदर्भ में भगवान के प्रति जितनी निष्ठा गहरी होती है, इंसान उतना ही अधिक मन लगाकर उसकी रचाई हुई इस सृष्टि की निष्काम भाव से सेवा करता है। इस प्रकार सेवा का क्षेत्र जितना व्यापक होता है, वह उतनी ही महान समझी जाती है, क्योंकि सेवा के इस उदार परिसर में मनुष्य ही नहीं अपितु जीव मात्र भी सम्मिलित होते हैं। हकीकत में ऐसी निष्काम सेवा से ही हृदय शुद्ध होता है, अहं-भाव दूर होता है, मन-चित्त एकाग्र होता है, बुद्धि विवेकशील बनती है तथा सर्वस्व परमात्मा का दर्शन करने का आभास  होने से बहुत शान्ति प्राप्त होती है। इस प्रकार सच्चा आनन्द, सच्ची शान्ति केवल अटल सेवाव्रत से ही प्राप्त होती है। यही नहीं सेवा मनुष्य को विश्वसनीय बनाती है और सत्य-धर्म के निष्काम मार्ग पर अग्रसर रह, समाज में सेवा के महत्त्व को प्रतिष्ठित करती है। 

 

सारत: सजनों याद रखो सेवामार्ग भक्ति मार्ग से भी ऊँचा है। अत: लोक कल्याणार्थ सेवा-भाव रखो और स्वार्थ सिद्धि को त्याग कर अपने को यानि अपनी इच्छाओं व तन-मन-धन को परमार्थ की वेदी पर बलि चढ़ाने का मादा अपने अन्दर उत्पन्न करो। इस संदर्भ में याद रखो सेवा में पैसे की जरूरत नहीं होती, जरूरत है अपनी संकुचित सोच, अपने अहंकार को त्याग कर प्राणी मात्र से एकरूप होने की यानि जितनी वृत्ति निरहंकार रहेगी, उतनी सेवा की कीमत बढ़ेगी। इस तरह जब मनुष्य संपूर्ण रूपेण निरहंकार होकर अपने को श्री भगवान के यंत्र रूप में अनुभव करता है और एकमात्र भगवत् सत्ता ही विराजित है ---इस प्रकार का बोध रखता है, केवल तभी वह यथार्थ रूप में सेवा और कल्याण कर्म में अपने को लगा पाने का योग्य अधिकारी बन पाता है और निष्कामी कहलाता है।             

सबकी जानकारी हेतु सेवा के विषय में इससे आगे बातचीत आगामी सप्ताह करेंगे।