सत्-शास्त्र के अध्ययन की महत्ता

साडा है सजन राम, राम है कुल जहान

अर्थात् ईश्वर हमारा मित्र/प्रियतम सर्वव्यापक है, उसी को जानो, मानो व वैसे ही गुण अपनाओ।

शब्द है गुरु, शरीर नहीं है,

अर्थात् ज्ञानी को नहीं ज्ञान को अपनाओ और निमित्त में नहीं नित्य में श्रद्धा बढ़ाओ।

इस पर सुदृढ़ता से डटे रह, इस अटल सत्य पर स्थिर बने रहो:-

ओ3म् अमर है आत्मा, आत्मा में है परमात्मा

सजनों अभी तक हम जान चुके हैं कि मन को वशीभूत कर इंद्रियों का निग्रह करने से, सम, संतोष, धैर्य, सच्चाई, धर्म जैसे गुण अपनाकर एक शक्तिशाली व सर्वगुण सम्पन्न इंसान की तरह राग-द्वेष पर विजय प्राप्त कर समभाव पर स्थित रहने से और प्राणिमात्र के प्रति निष्काम भाव से परोपकारी प्रवृत्ति अपनाने से कोई भी साधक अमर पद प्राप्त कर सकता है। आशय है कि निरंतर स्थिरता से अपने परम लक्ष्य यानि अमर पद की ओर बढ़ते रहने हेतु, हमारे लिए एक ही परमसत्ता में विश्वास रखते हुए अद्वैतवाद का सिद्धान्त अपनाना व तद्नुसार यह संसार मिथ्या है तथा ब्रह्म से ही सकल विश्व की उत्पत्ति हुई है, इस सत्य को मानना नितांत आवश्यक है। इस सत्य को मानने वाला ही ब्रह्म तथा जीव की ऐक्यता को स्वीकार कर, विचार, सत्-ज़बान, एक दृष्टि, एकता और एक अवस्था में बना रह सकता है।

इस संदर्भ में सजनों हम इस आत्मीयता से परिपूर्ण विचार से हटकर कोई अन्य विचारधारा अपना कर अपनी वास्तविकता से गिर विनाश को प्राप्त न हो जाएँ, इस हेतु हमें सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ के नियमित अध्ययन का महत्त्व समझना है और पाप व अधर्म की प्रतीक अधम अवस्था से उबर सचेतनता से अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ते रहने के लिए उसमें विदित शब्द ब्रह्म विचारों को धार अमल में लाने के लिए सतत् रूप से प्रयत्नशील बने रहना है ताकि वे विचार हमारे स्वभाव के अंतर्गत हो जाएं और हम बुराई का रास्ता छोड़ सदाचार का रास्ता अपना जीवन की बाजी जीत लें। इस संदर्भ में सजनों सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में विदित इन शब्दों को स्मरण रखो:-

चार वेद छ: शास्त्र गुरु, इस बाग दा मालक ईश्वर जान।

इन्हां विचों शब्द पकड़ लवो, सजनों अपना आप लवो पहचान

नि:संदेह सजनों सत्-शास्त्र के अध्ययन और मनन के बिना अपने आप की पहचान संभव नहीं। यहाँ सजनों सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ के अध्ययन की महत्ता को और स्पष्ट करते हुए हम बताना चाहते हैं कि मस्तिष्क को इस प्रकार के सद्-अध्ययन की उतनी ही आवश्यकता है, जितनी शरीर को आहार व व्यायाम की। आशय यह है कि जिस प्रकार शारीरिक तन्दुरुस्ती के लिए सात्विक आहार का सेवन व शारीरिक व्यायाम करना जरूरी है, उसी प्रकार मानसिक तन्दुरुस्ती के लिए सद्-ग्रन्थों के अध्ययन द्वारा सात्विक विचारों का सेवन करना अत्यन्त आवश्यक है ताकि हमारी बुद्धि अर्थात् सोचने-समझने की शक्ति सदा निर्मल व विवेकशील बनी रहने के साथ-साथ निश्चयात्मक भी बने और किसी प्रकार की भी भोग कामना हमारे मन में जाग्रत न हो। इसलिए तो सतवस्तु का कुदरती ग्रन्थ कह रहा है:-

वेद पुरान कुरान, इन्सान इको जान

गुरु ग्रन्थ गुरु वाणी इन्सानों सारे ग्रन्थ इसे नूं जान,

मानो हीरे रत्नां दी है खान।।

इसके विपरीत सजनों यदि मस्तिष्क अस्वस्थ है तो शरीर का भी समुचित ढंग से संचालन नहीं हो पाता और यह भी रोगी होकर भोगी हो जाता है। परिणामस्वरूप नकारात्मक सोच पनपती है और इंसान झुखता-रोता है। ऐसा न हो इसलिए कह रहे है कि सद्-ग्रन्थों के अध्ययन व मनन द्वारा सात्विक आहार व विचारो का सेवन कर, शारीरिक-मानसिक स्वस्थता व स्थिरता साधने वाले योगी बनो। याद रखो सद्-ग्रन्थों के अध्ययन की यह क्रिया सहज मानवीय संवेदनाओं को गहराई से स्पर्श करती है और पाश्विक वृत्तियों के नाश व सद्-वृत्तियों के विकास द्वारा व्यक्ति को उदारचित्त यानि महान बना, सुख-दु:ख आदि में समचित्त बने रह, लोक कल्याण के लिए प्रेरित करती है। इस तरह अध्ययन द्वारा मानव शब्द ब्रह्म विचार धारण करता है और अपनी जैविक आवश्यकताओं यथा आहार, निद्रा और मैथुन के आगे बढ़कर कुछ और उत्तमोत्तम प्राप्त करता है, अपनी सोचने-समझने की शक्ति में वृद्धि करता है, सत्य-असत्य का पारखी बन उचित निर्णय लेने की सामथ्र्य का विकास करता है और मनुष्यता में ढल चिर स्थाई आनन्द प्राप्त करता है। कहने का आशय यह है कि सद्-ग्रन्थों का अध्ययन व्यक्ति  को उच्च बुद्धि, उच्च ख़्याल बनने हेतु चिन्तन व मनन करने के लिए प्रेरित करता है, जिसके द्वारा सब बुरी चिंताएँ मिट जाती हैं, संशय-भ्रम रूपी पिशाच भाग जाते हैं, रोग-सोग-भोग मिट जाते हैं और मन में सद्‌भाव के जाग्रत होने से परम शांति प्राप्त होती है। याद रखो जहाँ परम शांति है वहाँ परम आनन्द हैं। जहाँ परम आनन्द हैं वहाँ सुरत का परमधाम में वास है। ऐसा होने पर इंसान जगत का होकर नहीं विचरता अपितु सब कार्यव्यवहार करते हुए भी उनसे निर्लिप्त रहता है और अपने मूल स्थान परमधाम में स्थित रहता है। इसी महत्ता के दृष्टिगत सजनों सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में कहा गया है:-

चार वेद छ: शास्त्रां दा कर लिया जैं इशनान

अपना आप पहचान लिया, फिर पा लिया आत्मिक ज्ञान।।

स्पष्ट है सजनों यह सद्-ग्रन्थों के अध्ययन का ही प्रभाव है कि मनुष्य की मेधा यानि बात को स्मरण रखने और समझने की मानसिक धारणा शक्ति, शांति और आनंद की खोज में सतत् व्यस्त है। नि:संदेह सद्-अध्ययन द्वारा, मन-मस्तिष्क को आत्मिक ज्ञान रूपी अमृत रस प्राप्त रहने पर, इन दोनों तत्वों यथा शांति और आनन्द की प्राप्ति सहज संभव है। तभी तो कहा जाता है कि सद्ग्रन्थों का अध्ययन मानव के विवेक को जाग्रत करता है, उसे औचित्यपरायण बनाता है, दिव्य आनंद प्रदान कर सरस व सह्मदय बनाता है और व्यक्तित्व के आकर्षण को बढ़ा, मानव कहलाने के योग्य बनाता है। ऐसे अध्ययन के प्रति प्रेम, जीवन में आने वाले दु:खद क्लेशपूर्ण  क्षणों को आनंद और प्रसन्नता के क्षणों में परिवर्तित करने की क्षमता तो रखता ही है साथ ही इसका मूल संदेश लोक कल्याण उन्मुखी होता है जो व्यापक स्तर पर मानवीय हित के चिंतन का कार्य करता है और विश्व समुदाय को सही दिशा देता है।

इस महत्ता के दृष्टिगत सजनों कलुकाल के स्वभाव छोड़ सतवस्तु की चाल अपनाने हेतु, सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ का ध्यानपूर्वक व गंभीरता से अध्ययन करो व तदुपरांत, उसमें लिखित तथ्यों, विचारों का एकांत मन से,  मनन एवं चिंतन करो क्योंकि सतवस्तु का कुदरती ग्रन्थ कह रहा है:-

सतवस्तु दी सजनों चाल चलो। सतवस्तु दे वचन इस्तेमाल करो।।

सतवस्तु दे असूलां नू फड़ो सजनो। सत सत वचनां नाल प्यार करो।।

उपरोक्त कथन के अनुसार सजनों जीवन की विभिन्न परिस्थितियों में उनकी उपयोगिता पर विवेकपूर्वक विचार करते हुए सत्य अन्वेषण का प्रयत्न करो। इससे मन के विचार तो गूढ़ होंगे ही साथ ही बुद्धि भी प्रखर हो, सत्कर्मों की ओर प्रवृत्त होगी और व्यक्तित्व का सर्वांगीण उन्नयन हो सकेगा। इसके विपरीत आलस्य वश इसके अध्ययन में लापरवाही वर्तने से या फिर किसी कारण व्यवधान पड़ने से, वर्णित भावों-विचारों की एकसूत्रता छिन्न-भिन्न हो जाएगी जिससे अध्ययन के अनन्तर सही निष्कर्ष प्राप्त करने में बाधा उत्पन्न होगी। परिणास्वरूप लक्ष्यहीन हो, परमार्थ का रास्ता छोड़ स्वार्थपरता का दुष्कर मार्ग अपना बैठोगे और माया डंगनी की पीड़ा से त्रासित हो अपनी होश-हवाश गँवा बैठोगे। 

ऐसा न हो, इस हेतु सजनों जानो कि प्रमाद सत्-शास्त्र के अध्ययन-पथ की सबसे बड़ी बाधा है। यह प्रमाद आलस्य का एक रूप है। अन्य शब्दों में सद्-अध्ययन के दौरान मनुष्य को जो अन्य इन्द्रिय सुख त्यागने होते हैं, उन्हें न त्यागने की इच्छा ही प्रमाद है। यहाँ प्रश्न यह उठता है कि सत्-शास्त्र के महत्त्व से भली-भांति परिचित होने के बावजूद भी इंसान इस उत्तम कार्य के प्रति प्रमाद क्यों दर्शाता है? इस संदर्भ में सजनों जानो कि जहाँ अन्य कार्यों के करने से मनुष्य को तत्काल इन्द्रिय सुख पा, अन्य लाभ प्रत्यक्षत: प्राप्त होता है वहाँ सद्-अध्ययन से वैसी प्रत्यक्ष उपलब्धि नहीं होती। अत: इसके संदर्भ में मनुष्य प्राय: प्रमाद करता है। यही कारण है कि बचपन और किशोर अवस्था में भी सत्-शास्त्र के अध्ययन की अपेक्षा सोना, घूमना, खेलना अधिक सुखप्रद प्रतीत होता है। लेकिन हकीकत में सत्-शास्त्र के अध्ययन के समक्ष इन समस्त क्रियाओं का महत्त्व गौण है। ऐसा इसलिए क्योंकि जहाँ अन्य क्रियाएं शारीरिक स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य है, वहाँ सत्-शास्त्र का अध्ययन मानसिक स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य है। दोनों का अपना-अपना महत्त्व है। अत: बुद्धि को विभ्रमित व भ्रष्ट होने से बचा, एक सुमतिवान इंसान की तरह वास्तविक सुख प्राप्ति हेतु, जीवन में अन्य क्रियाओं के साथ-साथ सत्-शास्त्र के अध्ययन का संतुलन भी अवश्य बनाओ। ऐसा करने से न केवल दैनिक क्रियाओं का शांत चित्त व एकाग्रता से निर्वहन कर अपना घर सतयुग बना सकोगे अपितु चिंतामुक्त हो अपने जीवन के परम प्रयोजन यथा परमात्मा का साक्षात्कार कर परमानंद भी प्राप्त कर लोगे।

इस महत्ता के दृष्टिगत सजनों हर प्रकार का आलस्य त्याग कर, इस सद्-अध्ययन में बाधक सभी कर्मों को छोड़ दो और पूरी लगन व सत्य-निष्ठा से सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ का अध्ययन कर उसमें वर्णित शब्द ब्राहृ विचारों को ग्रहण कर, धारण करने की उत्तम आदत विकसित करो। इस संदर्भ में जानो कि अभ्यास इस आदत के विकास का सर्वोत्तम उपाय है। यदि बाल्य अवस्था से ही जैसे समझाया है वैसी आदतों का विकास हो जाए तो भविष्य में सारा जीवन लाभ मिल सकता है। अत: अपने बच्चों के अन्दर बचपन से ही सत्-शास्त्र के अध्ययन के प्रति रुचि विकसित करो और उन्हें समझाओ कि सत् शास्त्र का अध्ययन मनुष्य की सर्वोत्तम उपलब्धि है क्योंकि जो यहाँ से प्राप्त हो सकता है वह कही से भी प्राप्त नहीं हो सकता। अन्य शब्दों में यह वह मानवीय क्रिया है जो मनुष्य को आत्मबोध कराती है और वह आत्मज्ञानी बन आत्मतुष्टता से आत्मविश्वास के साथ अपने आत्मिक बल का समुचित प्रयोग करते हुए आत्मविजयी हो जाता है। जानो इस अध्ययन रूपी क्रिया द्वारा ए विध् आत्मविकास करना, मनुष्य के अतिरिक्त सृष्टि के किसी अन्य जीव-जन्तु द्वारा कदापि संभव नहीं। इस बात को समझते हुए सजनों सत्-शास्त्र का विचार करो क्योंकि सतवस्तु का कुदरती ग्रन्थ कह रहा है:-

शास्त्र नूं विचार, हुन दरख़त नूं सँवार।

हुण कदे न खासें हार, जयकार सदा जयकार।।

उपरोक्त के संदर्भ में सजनों हम तो यही कहेंगे कि नकारात्मक स्वभावों में बने रहने का हठ छोड़कर शास्त्र की बात मान लो और अपने शरीर रूपी दरखत को सँवार लो। सारत: हम कह सकते हैं कि मानव का सच्चा जीवन साथी इन ग्रन्थों व सत्-शास्त्रों में वर्णित आध्यात्मिक विद्या/आत्मिक ज्ञान है। ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि इस जीवन काल में समस्त झूठे रिश्ते-नाते यानि भाई-बहन, माता-पिता, सगे-सम्बन्धी, दोस्त-यार सब साथ छोड़ सकते हैं और धोखा दे सकते हैं परन्तु यह कभी न बदलने वाला शाश्वत आत्मिक ज्ञान आत्मा का साथ नहीं छोड़ सकता। अत: इस विद्या/ज्ञान को अर्जित कर जीवन व्यवहार के दौरान इसका प्रयोग करने वाले श्रेष्ठ मानव बन सर्वरूपेण सुखी रहो। इसलिए बार-बार कह रहे हैं कि सत्-शास्त्र का नियमित रूप से अध्ययन अवश्य करो और उस संग अपने मानस को जोड़ दो। यहाँ याद रखना है कि इस अध्ययन द्वारा अर्जित विद्या का प्रयोग खंडन और असत्य सिद्ध करने के लिए नहीं करना, न ही विश्वास करके मान लेने के लिए करना है व न ही बातचीत और वाद-विवाद करने के लिए करना है, बल्कि मनन और परिशीलन यानि खूब सोचते समझते हुए अनुसरण करने के लिए करना है। यदि यह सावधानी ले ली तो सद्-अध्ययन द्वारा शब्द ब्रह्म विचार प्राप्त कर उनको अमल में लाने के प्रति रुचि निर्मित होगी और शीघ्र ही आदत के रूप में विकसित हो आपकी प्रकृति का अभिन्न अंग बन जाएगी। प्रकृति का सहज अंग बन गई तो इस क्रिया द्वारा अर्जित सद्-ज्ञान/सद्-विचार जीवन व्यवहार के दौरान प्रयोग में आएंगे और जीवन को दिव्य गुणों से अलंकृत कर, अपार सन्तुष्टि प्रदान करेंगे। फिर अध्ययन द्वारा ठीक वैसा ही आनन्द प्राप्त होगा जैसा खिलाड़ी को खेल में, योगी को समाधि-साधना में और संगीतकार को संगीत-साधना में मिलता है यानि यह क्रिया आपकी आवश्यकता बन जाएगी और इसके बिना आपको अपनी दिनचर्या पूर्ण नहीं लगेगी।

अंतत: सजनों सच्चेपातशाह जी के वचनानुसार जान लो कि:-

शब्द है हमारी पढ़ाई, ग्रन्थ है हमारी सफ़ाई। सजनों जो ग्रन्थ है उससे है हमारे अन्दर की सफ़ाई। इसके सुनने से मन्दी चीज़ें छोड़नी है और अच्छी चीज़ें धारण करनी हैं।

अत: सच्चाई धारण करो और सच का वर्त-वर्ताव करो क्योंकि सतयुग आ रहा है।

अतैव श्रेष्ठता को प्राप्त करने हेतु इस क्रिया द्वारा सजनों इस बदन से खोट निकाल, खालस सोना होने की आवश्यकता को समझो। याद रखो ऐसा करने पर ही सत्य के प्रतीक बन अमर पद पा सकोगे और माला- माल हो जाओगे।

सबकी जानकारी हेतु आगामी कक्षा में हम सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में वर्णित भजनों/कीर्तनों को समझने का सही तरीका बताएंगे। तब तक आज की बात पर अमल फरमाना और अपना जीवन सफल बनाने हेतु तत्पर हो जाना।