प्रकाश-6

साडा है सजन राम, राम है कुल जहान

                   अर्थात् ईश्वर हमारा मित्र/प्रियतम सर्वव्यापक है, उसी को जानो, मानो व वैसे ही गुण अपनाओ।

 

शब्द है गुरु, शरीर नहीं है,

अर्थात् ज्ञानी को नहीं ज्ञान को अपनाओ और निमित्त में नहीं नित्य में श्रद्धा बढ़ाओ।

 

इस पर सुदृढ़ता से डटे रह, इस अटल सत्य पर स्थिर बने रहो:-

3म् अमर है आत्मा, आत्मा में है परमात्मा

 

सजनों विस्तारपूर्वक प्रकाश की महिमा समझने के पश्चात् अब जो सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में वर्णित वीरवार के बोर्डों के माध्यम से श्री साजन परमेश्वर कामयाब होने की युक्ति हमें बता रहे हैं अर्थात् आत्मप्रकाश द्वारा मन में छाया अज्ञान का अंधेरा हटा व अपनी वृत्ति, स्मृति, बुद्धि व स्वभावों का ताना बाणा निर्मल रखते हुए, उच्च बुद्धि, उच्च ख़्याल हो परमधाम का नज़ारा देखने का तरीका यानि अपने आप की पहचान करने की युक्ति समझा रहे हैं उसे ध्यानपूर्वक सुनों, धारण करो व व्यवहार में लाने का पुरुषार्थ दिखा अपने जीवन का अर्थ सिद्ध करो। आपकी पुनरावृत्ति के लिए यह सारी क्रिया सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ के अनुसार युक्तिसंगत कैसे करनी है आओ प्रश्नोत्तर के माध्यम से उसे एक बार फिर से जान व समझ लेते हैं:-

 

प्रश्न-परमधाम का नज़ारा यानि बिन सूरजों प्रकाश चमत्कार का बोध करने के लिए क्या करना होगा?

उत्तर-यत्न करना होगा कि सारा दिन हमारा संकल्प प्रभु को लोचे।

 

प्रश्न-जब संकल्प प्रभु को लोचेगा तब क्या होगा?

उत्तर-दृष्टि प्रभु की तरफ हो जाएगी।

 

प्रश्न-इस हेतु क्या करना होगा?

उत्तर-अलफ़ को ठीक से चलाना होगा।

 

प्रश्न-अलफ़ क्या है?

उत्तर- अक्षर।

 

प्रश्न-अक्षर को पकड़ कर फिर किस को पाना है?

उत्तर- अक्षर को पकड़ कर फिर "ये' को पाना है

 

प्रश्न- "ये' को पाकर एक रस होने पर हम क्या जानने वाले हो जाएँगे?

उत्तर- सर्व सर्व की जानने वाले हो जाएँगे।

 

प्रश्न- अलफ की रटन लगाने से क्या होता है?

उत्तर- प्रकाश हो जाता है।

 

प्रश्न-जब प्रकाश हो जावे तो क्या करना है ?

उत्तर-जब प्रकाश हो जावे तो उस प्रकाश को खड़ा कर लेना है यानि उसमें मज़बूत हो जाना है।

 

प्रश्न-उस प्रकाश पर मज़बूती से खड़े होने के लिए क्या करना है?

उत्तर-विचार करना है कि जो प्रकाश हमने देखा है वही प्रकाश या चमत्कार असलियत मेरा अपना आप है। इस तरह अपनी भूल को सुधारना है और कार व्यवहार करते हुए निगाह उस चमत्कार के साथ हमेशा के लिए जोड़ लेनी है। इस तरह जुड़ कर उस असलियत को पूरी तरह स्थिर कर लेना है।

 

प्रश्न-इंसान अपनी असलियत प्रकाश में कितने समय के अन्दर स्थिर हो जाता है?

उत्तर-दो साल उस चमत्कार को पूरी तरह देखते रहने से इन्सान पूरी तरह स्थिर हो जाता है।

 

प्रश्न-अलफ में खड़े होकर परिपक्क होने पर किस की प्राप्ति हो जाती है?

उत्तर-अनादि जोत की प्राप्ति हो जाती है।

 

प्रश्न-जिन सजनों को प्रकाश नहीं होता वे क्या करें?

उत्तर-जिन सजनों को प्रकाश नहीं होता वह यत्न करें उनका संकल्प महाराज जी को लोचे। हर समय महाराज जी  का ध्यान लगाने से उनको भी प्रकाश हो जाएगा और उसके बाद वह भी उस चमत्कार में खड़े हो जाएँगे।

 

प्रश्न-अलफ पक्का हो जाने पर कौन सी अवस्था आ जाती है?

उत्तर-युवा-अवस्था ।

 

प्रश्न-युवा-अवस्था आ जाने पर किसकी प्राप्ति होती है?

उत्तर-युवा-अवस्था आ जाने पर बल की प्राप्ति होती है और शक्ति ताकतवर हो जाती है।

 

प्रश्न-शक्ति ताकतवर होने से जो सजन अपने असली स्वरूप पर खड़ा हो गया फिर उससे किसकी प्राप्ति होती है?

उत्तर-शक्ति ताकतवर होने से जो सजन अपने असली स्वरूप पर खड़ा हो गया फिर उससे "ये' की प्राप्ति होती है।

 

प्रश्न-"ये' की प्राप्ति होने पर क्या होता है ?

उत्तर-अलफ छूट जाता है और इंसान "ये' के एक फुरने में खड़ा हो जाता है। दूसरे ख्यालों का नामोनिशान नहीं रहता।

 

प्रश्न-अलफ जब छूट गया और "ये' मिल गया फिर इन्सान कहाँ स्थिर हो जाता है?

उत्तर-अलफ जब छूट गया और "ये' मिल गया फिर इन्सान आकाशों-आकाश, पातालों-पाताल, सप्तद्वीप-भूमण्डल में प्रवेश करता हुआ गगन मण्डल में स्थिर हो जाता है।

 

प्रश्न-जब इन्सान गगन मण्डल में स्थिर हो गया तो फिर वह सजन किस अवस्था को प्राप्त कर लेता है?

उत्तर-फिर वह सजन प्रमादि सर्व-सर्व की जानने वाला हो जाता है यानि उसकी किरणें सब संसार में फैलती

हैं तो वह तीनों कालों की जानने वाला हो जाता है यानि जो गुज़र गई जो इस वक्त जेहड़ी आने वाली तीनों कालों की पहचान कर लेता है। फिर वह कर्ता भी है और अकर्ता भी। संसार में विचरता भी है और नहीं भी विचरता।

 

प्रश्न-सर्गुण-निर्गुण के खेल कौन देख व खेल सकता है?

उत्तर-जिन की जोत निर्वाण में जगती है।                

 

प्रश्न-निर्वाण में क्या है?

उत्तर-चमत्कार ।

 

प्रश्न-वह चमत्कार क्या है?

उत्तर-बिन सूरजों प्रकाश, हर जगह अपना आप।

 

प्रश्न-इस चमत्कार को सजन हर जगह कैसे देखता है?

उत्तर-कभी सर्गुण के खेल में तो कभी निर्गुण के खेल में।

 

प्रश्न-निर्गुण में क्या है?

उत्तर-जोत-बिन सूरजों रोशनाई।

 

प्रश्न-वह रोशनी कहाँ कहाँ फैली हुई है?

उत्तर-सर्व-सबाई।

 

प्रश्न-इस चमत्कार की अर्थात् बिन सूरजों प्रकाश की हर जगह पहचान कर सजन कहाँ पहुँच जाता है?

उत्तर-परमधाम।

 

प्रश्न-परमधाम में क्या है?

उत्तर-बिन सूरजों प्रकाश ही प्रकाश।

 

प्रश्न-परमधाम में पहुँच कर क्या समाप्त हो जाता है?

उत्तर-रूप रंग रेखा ।

 

प्रश्न-रूप रंग रेखा मिट जाने से किस की समाप्ति हो जाती है?

उत्तर-तीनों तापों के टैम्परेचर की।

प्रश्न-अलफ के मिलने से पहले इन्सान क्या होता है?

उत्तर-कठिन यानि उसको संसारी कन रस होता है।

 

प्रश्न-अलफ के मिलने के बाद वह क्या हो जाता है?

उत्तर-नर्म यानि उसको शास्त्र का कन रस पड़ जाता है।

 

प्रश्न-फिर "ये' के मिलने पर उसकी क्या अवस्था आ जाती है?

उत्तर-वज्र यानि उस पर र्इंट रोड़ा कोई प्रहार नहीं कर सकता।

 

प्रश्न-जब न अलफ़ रहता है न 'ये' तो कौन सी अवस्था आ जाती है?

उत्तर-अफुर अवस्था।

 

प्रश्न-अफुर अवस्था आने पर क्या होता है?

उत्तर-अफुर अवस्था आने पर सजन, गगन मण्डल में जहां रूप रंग रेखा नहीं महाराज जी के साथ मेल खा जाता है।

 

प्रश्न-महाराज जी से मेल खाने का क्या अर्थ है?

उत्तर-बिन औखियाइयों बिन खेचलों, बिन तकलीफों जन्म की बाज़ी को जीत लेना। इस अवस्था में तीनों तापों का टैम्परेचर जो घटता बढ़ता रहता है वह समाप्त हो जाता है।

 

प्रश्न-तीनों तापों के टैम्परेचर के घटने-बढ़ने से क्या अभिप्राय है?

उत्तर-जैसे बुखार घटता-बढ़ता रहता है, उसी तरह हमारे स्वभावों का टैम्परेचर भी घटता बढ़ता रहता है। अगर हम संतोष पर काबू पाते हैं तो धैर्य छूट जाता है। धैर्य पर काबू पाते हैं तो सच्चाई-धर्म छूट जाता है। इसे ही तीनों तापों का घटता-बढ़ता टैम्परेचर कहते हैं।

 

प्रश्न-किस युक्ति पर चलने से तीनों तापों का रोग मिट जाता है और हमारे सब सवाल हल हो जाते हैं?

उत्तर-उपरोक्त बताई गई समभाव-समदृष्टि की युक्ति पर चलने से तीनों तापों का रोग मिट जाता है और हमारे सब सवाल हल हो जाते हैं।

 

प्रश्न-जब तीनों तापों का रोग मिट गया और हमारे सब सवाल हो गए तो किसकी प्राप्ति हो जाएगी?

उत्तर-फिर समभाव जो एक निगाह एक दृष्टि देखनी होती है बिना यत्न के उसकी प्राप्ति हो जाएगी।

 

प्रश्न-एक निगाह एक दृष्टि होने का क्या अर्थ है?

उत्तर-जन्म की बाजी को जीत लेना।

 

प्रश्न-इस युक्ति की प्रवानगी द्वारा सजन अर्जुन ने संसारी व परमार्थी दोनों राज्य कैसे प्राप्त कर लिए?

उत्तर-इस संदर्भ में जब अर्जुन ने सजन कृष्ण महाराज जी को बताया कि मैंने आज चतुर्भुजधार का चमत्कार देखा है तो महाराज जी ने कहा कि अर्जुन यह प्रकाश तेरी असलियत अपना आप प्रकाश है। यही प्रकाश कुल दुनियां है। इस पर खड़े हो जाओ। सजन अर्जुन ने वचन प्रवान किए उस चमत्कार के साथ निगाह जोड़ ली और संसारी व परमार्थी दोनों राज्य प्राप्त कर लिए।

उपरोक्त तथ्य के दृष्टिगत सजनों हमारे लिए भी बनता है कि हम भी सजन श्री शहनशाह हनुमान जी पर दृढ़ विश्वास रखते हुए व उनकी नीतियों पर स्थिरता से चलते हुए, युक्ति को प्रवान कर, सजन अर्जुन जैसा अदम्य पुरुषार्थ दिखाएं। ए विध् सर्वश्रेष्ठ पद को प्राप्त करना सुनिश्चित करें और परब्रह्म परमेश्वर नाम कहाए। इस हेतु सजनों अब जब भी वीरवार के बोर्ड पढ़ो तो इसी तरह से समझते हुए पढ़ना और संभल-संभल के विचारपूर्वक सब जानते समझते हुए आगे कदम बढ़ाना। ऐसा करने से मजबूती आएगी और आत्मविश्वास भी बढ़ेगा। यदि चाहते हो सजनों ऐसा ही तो इस हेतु आओ अब प्रभु के आगे सच्चे दिल से बल, बुद्धि और ज्ञान प्राप्ति की याचना करते हैं:-

 

हे प्रभु बल बुद्धि और हमको ऐसा ज्ञान दो।

जो भी जीवन में करें , वह हर कर्म निष्काम हो।।

 

धैर्य धर कर धीर हों, निर्भय बन हम वीर हों।

ख्याल निर्विकार हो और स्वस्थ अपने शरीर हों।।

हे प्रभु बल बुद्धि और ................................

 

जो भी सोचें सत्य हो, सत्य निहित हर बात हो।

जो कर्म भी हम करें, वह सत्य के प्रतीक हों।।

हे प्रभु बल बुद्धि और ................................

 

मन में हो न लोभ मोह, इतना सुदृढ संतोष हो।

प्रसन्नता हो हर हाल में, दु:ख-सुख में चिंता मुक्त हो।।

हे प्रभु बल बुद्धि और  ................................

 

धर्म में निष्ठा हमारी, ·ारीय गुण अनुकूल हों।

सदाचारी ऐसे बने की भूल कर भी न भूल हो।।

हे प्रभु बल बुद्धि और .................................

 

पढ़ लिख जो भी बनें, मन में  न अभिमान हो।

त्याग और दया का भाव, हम में सदा प्रधान हो।।

हे प्रभु बल बुद्धि और .................................

 

इस सदंर्भ में सजनों जानो कि जब मन में भी सत्य होता है, वचन में भी सत्य होता है और कर्म में भी  सत्य होता है तो इंसान सत्य स्वरूप होकर परमात्म स्वरूप हो जाता है। अत: मन-वचन व कर्म में एकमतता व एकरसता चाहिए होती है। यहाँ प्रश्न यह उठता है कि इनकी पारस्परिक एकमतता व एकरसता भंग कैसे हो जाती है यानि ऐसा क्यों कर होता है कि मन कुछ बोलता है, वचन से कुछ बोलते हैं और कर्म द्वारा कुछ होता है? क्योंकर इनकी एकमत रहने की महत्ता को समझते हुए भी पढ़ा-लिखा इंसान भी इनकी एकरसता साधे रखने के प्रति कमजोर हो जाता है?

मौन।

याद रखो स्वार्थपरता के अन्दर घर कर जाने पर ही इनकी एकमतता व एकरसता भंग हो जाती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि स्वार्थपरता के कारण इंसान की विवेकशक्ति कमजोर हो जाती है और इंसान सत्य-असत्य, भले-बुरे की परख करने में कमजोर पड़ जाता है। परिणामस्वरुप शरीर की सारी संचालन प्रक्रिया ही बिगड़ जाती है और पढ़ा-लिखा इंसान भी हार जाता है। ऐसा न हो इसलिए सजनों सच्चेपातशाह जी ने निष्काम रास्ता पकड़ने का आवाहन दिया है। याद रखो निष्काम रास्ता पकड़ने वाला ही मानवता के सिद्धान्त पर डटा रह सकता है।

इस महत्ता के दृष्टिगत सजनों ईश्वर के हुक्म अनुसार, सृष्टि को सँवारने के कार्य में, निष्कामता व सेवा भाव से अपना भरपूर सहयोग दो और बदले में किसी चीज़ की इच्छा या अपेक्षा न रखो। याद रखो कि इस नेक कार्य की सिद्धि हेतु आत्मा रूप में अंतर्विद्यमान शक्ति स्वरूप परमात्मा स्वयं हमारे सहायक है। वह कहते हैं कि मेरी शक्ति को धारण कर सहजता से अपना कारज सिद्ध करो। इस प्रकार "मैं-भाव" से रहित हो कर, ईश्वर के निमित्त समस्त कार्य अकत्र्ता भाव से करने पर ही, परमे·ार के आज्ञाकारी सपुत्र कहला सकोगे और ब्रह्मज्ञानी नाम कहाओगे।