आत्मविजय-2

साडा है सजन राम, राम है कुल जहान

अर्थात् ईश्वार हमारा मित्र/प्रियतम सर्वव्यापक है, उसी को जानो, मानो व वैसे ही गुण अपनाओ।

 

शब्द है गुरु, शरीर नहीं है,

अर्थात् ज्ञानी को नहीं ज्ञान को अपनाओ और निमित्त में नहीं नित्य में श्रद्धा बढ़ाओ।

 

इस पर सुदृढ़ता से डटे रह, इस अटल सत्य पर स्थिर बने रहो:-

3म् अमर है आत्मा, आत्मा में है परमात्मा

 

सजनों मनुष्य में जीने की इच्छा बड़ी प्रबल है। इसी इच्छा की प्रबलता के कारण उसमें जयेषणा जागती है यानि वह दूसरों पर विजय पाना चाहता है। उन्हें अपना वशवर्ती बनाना चाहता है। दूसरों पर जयेषणा की सिद्धि के दो पथ हैं - भौतिक और आत्मिक। भौतिक पथ पर मनुष्य दैहिक-बल से, सैन्य-बल से, शस्त्र-बल आदि से दूसरों को अपनी बात मानने पर विवश कर देता है और आत्मिक-पथ पर अपने सद्गुणों के प्रभाव से, प्यार से उन्हें अपना वशवर्ती बना लेता है। इस संदर्भ में चयन हर इंसान का व्यक्तिगत स्तर पर अपना होता है।

 

कहने का आशय यह है कि जहाँ स्वार्थपरता के सिद्धान्त अनुसार युद्ध, विवाद आदि में विपक्षियों पर जीत प्राप्त कर उन्हें अपने अधिकार में लिया जाता है और उनकी यह जय उनकी विजय का द्योतक बन, जीतने वाले के मन में हर्ष व अहं भाव उत्पन्न करती है, वही परमार्थ में जब कोई स्थिर बुद्धि इंसान अपने मन व इन्द्रियों को वश में रखते हुए, मित्रवत् भाव से उन का यथोचित उपयोग करते हुए, अपने जीवन के कर्तव्य परस्पर समभाव व सजन भाव से सही ढंग से निभा पाने में समर्थ हो जाता है तो उसका निर्भयता व अखंडता से सत्य-धर्म के निष्काम रास्ते पर निर्बाध बने रहना उसकी विजय प्राप्ति का यानि ब्राहृमय हो जाने का द्योतक होता है।

 

इससे सजनों स्पष्ट होता है कि भौतिक-पथ से आत्मिक-पथ श्रेष्ठ है, क्योंकि यह रचनात्मक है। इस पर ध्वंस नहीं, सृजन है; संघर्ष नही समर्पण है, किन्तु इस पथ का निर्माण समर्पण भाव से विचार को धारण कर व वर्ताव में ला आत्मविजय प्राप्ति से होता है, बारुदी धूल से नहीं। अत: अपनी जीने की इच्छा की पुष्टि और जयेषणा की तृप्ति के लिए आत्मविजय प्राप्त करना अति आवश्यक है। इसे प्राप्त किए बिना किसी पर विजय नहीं पाई जा सकती। तभी तो वेद-शास्त्रों में कहा गया है कि "जो एक को (स्वयं को) जीत लेता है वह समग्र संसार को जीत लेता है। यहाँ स्वयं से तात्पर्य इन्द्रियों व मन को जीतने से है। याद रखो जो इनको जीत लेता है वह जगत को जीत लेता है। इसलिए तो सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में भी कहा गया है:-

"पंज ज्ञान इन्द्रियाँ पंज कर्म इन्द्रियाँ जित के ते, मन जितियां जग जितिया जान सजनों।

जीत लिया उस कुल जहान सारा उन्हां दा दुनियां ते हो गया नाम सजनों।।

 

जानो ऐसा अक्लमंद व ताकतवर इंसान ही परमेश्वर के पास रहने के योग्य होता है और उनके पार्षद अथवा सेवक के नाम से जाना जाता है। ऐसे समर्पित उपासक का ही ख़्याल अर्थात् सुरत जगत में विचरते समय दु:ख-सुख सम कर जान, स्थाई रूप से अपने पवित्र सच्चे घर में निवास करती है और बराबर परमेश्वर संग बने रह नियमित रूप से उन द्वारा प्रदत्त शब्द ब्रह्म विचारों अनुसार व्यवहार करते हुए, अटलता से सेवारत रहती है। इस तरह वह दासी भाव से अपने घर में स्थित बने रह, इस जगत का हर कार्य परमेश्वर/स्वामी को सुख पहुँचाने के निमित्त निष्कामता से करने हेतु सदा तत्पर रहती है और दाता भाव से इस जगत में विचरती है। सजनों ऐसा सुनिश्चित करने के कारण ही उसके लिए ध्यान स्थिर होकर परमार्थ मार्ग पर उन्नति करना सहज हो पाता है। इसीलिए तो सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में भी कहा गया है:-

ख़्याल जदों अपने घर विच राहवे, इंसान ध्यान इस्थर हो जावे।

अर्थात् जब ख़्याल अपने घर में स्थिर रहता है तो इंसान ध्यान स्थिर हो जाता है। जानों कि ध्यान स्थिर होना अपने आप में मस्तक की ताकी खुलने की बात होती है यानि आत्मबोध द्वारा आत्मतुष्ट होकर जगत में सदा संकल्प रहित अवस्था में बने रहने की बात होती है। इस उत्तम अवस्था में जीव स्वत: ही प्रभु के संरक्षण में रहते हुए, सरलता व सहजता से अपने यथार्थ गुणों व ज्ञान से परिचित हो, स्वतन्त्र रूप से उन विचारों को यथा व्यवहार में लाने में दक्ष हो जाता है और इस तरह श्रेष्ठता को प्राप्त हो, बेखोफ़ा-बेख़तरा वहाँ की व्यवस्था यहाँ पर कायम करने के योग्य बन जाता है। ऐसा होने पर उसे जगत नहीं भरमा पाता। तभी तो वह सेवा वृत्ति से परमेश्वर की आराधना करते हुए, उन द्वारा प्रदत्त सेवा का एक कर्तव्यपरायण सुपुत्र की तरह भार सहजता से उठा, धर्मज्ञ पुरुष कहलाता है और जितेन्द्रिय बन आत्मविजयी हो आनन्दमय जीवन व्यतीत करता है। इस तथ्य से सजनों सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में विदित दासी/दास भाव में बने रहने की महत्ता स्पष्टतया समझ में आती है।

इस उपलब्धि के दृष्टिगत सजनों हमारे लिए भी बनता है कि हम भी ख़ुद को सही तरीके से स्पष्टत: जानने के लिए अपने अन्दर जगत विजयी होने की अभिलाषा उत्पन्न करें ताकि हमें यह कोई न कह सके कि हम अपने जीवन का लक्ष्य परमपद पाने में असमर्थ हैं। यहाँ जानो कि इसके प्रति जरा सी भी कमजोरी या लापरवाही हमें मानवीय चलन के विपरीत, सांसारिक चलन अपनाने हेतु मजबूर कर सकती है और हमें  दोगलेपन, तरह-तरह के ऊट-पटांग द्वैष-पूर्ण, निंदनीय वार्तालाप व व्यवहार में फँसा, जरजरी भूत बना सकती है। सजनों जानो हमारे साथ ऐसा दुर्भाग्यपूर्ण होना, संसार के साथ ख़्याल का योग होने की व परमेश्वर से वियोग होने की यानि दु:खमय अवस्था को प्राप्त हो जीवन हारने की बात होगी।

सजनों हमारे साथ ऐसा न हो इस हेतु हमारे लिए बनता है कि हम सहर्ष समभाव-समदृष्टि की युक्ति अपना परस्पर सजन-भाव का वर्त-वर्ताव, निष्काम-भाव से करते हुए कामनामुक्त अवस्था में स्थिरता से बने रहें और जीवन विजयी होने के आनन्द की अनुभूति करते हुए, विजय सूचक धर्म की विजय पताका जगत में बुलंद रखने के योग्य बनें। यकीन मानो सजनों अगर ऐसा कमाल कर दिखाया तो आप विचारयुक्त अर्थपूर्ण जीवन जीने का पुरुषार्थ दिखा, अपना जीवन चरित्र सुंदर एवं परम पवित्र बनाने में अवश्यमेव कामयाब हो जाओगे।

इस संदर्भ में जानो कि जैसे सौन्दर्य अपनी ओर सबको सहज ही आकर्षित कर लेता है वैसे ही सद्गुण से भरपूर सुन्दर जीवन चरित्र भी सब पर सकारात्मक स्थायी प्रभाव डालता है। अत: इस उपलब्धि के दृष्टिगत दुर्गुणों से मुक्त और सद्गुणों से समृद्ध होकर, आदर्श जीवन चरित्र दर्शाने का पुरुषार्थ दिखाओ। ऐसा करने पर ही पूर्णतया आत्मविजयी कहलाओगे और आप सबके व सब आपके सजन व प्रिय बन एकता के प्रतीक बन जाएंगे। इस विषय में वेद-शास्त्रों में भी कहा गया है:-

"जिसने अपने आप को जीत लिया, वह स्वयं अपना व सबका बन्धु है। परन्तु जिसने स्वयं को नहीं जीता वह स्वयं अपने शत्रुत्व में सबसे शत्रुवत् व्यवहार करता है"।

अत: याद रखो सजनों मनुष्य युद्ध में सहस्रों पर विजय पा सकता है परन्तु जो समभाव-समदृष्टि की युक्ति के अनुशीलन द्वारा हर्ष-विषाद, राग-द्वैष, सुख-दु:ख, जय-पराजय आदि समस्त द्वन्द्वों से ऊपर उठ स्वयं पर विजय पा लेता है, वही सबसे बड़ा विजयी है। इसलिए आत्मविजय को अनेक आत्मोत्सर्गों से श्रेष्ठ माना गया है और कहा गया है ऐसे आत्मविजयी की ही आत्मा का वरण स्वयं आप परमात्मा करते हैं।

 

इससे सजनों स्पष्ट होता है कि व्यक्ति के उदात्तीकरण का सीधा सम्बन्ध उसकी आत्मा से होता है न कि भौतिक शरीर से। आत्मविजय के लिए सत्-शास्त्र में वर्णित शब्द ब्रह्म विचारों को धारण कर, अभ्यास द्वारा व्यवहार में उतारना व इस तरह आत्मानुशासन द्वारा आध्यात्मिक परिपक्वता प्राप्त कर तत्त्वज्ञानी बनना अति आवश्यक है। यही सब प्रकार से अपने को वश में रखते हुए, सरलता व सहजता से स्वयं पर विजय पाने यानि आत्मविजय प्राप्त करने का द्योतक है और अमृत-जीवन का द्वार है।

सबकी जानकारी हेतु आत्मविजय के विषय में अब पुरुषार्थ कैसे करना है, उसके विषय में अगले सप्ताह जानकारी प्राप्त करेंगे।