वितृष्णा

साडा है सजन राम, राम है कुल जहान

अर्थात् ईश्वर हमारा मित्र/प्रियतम सर्वव्यापक है, उसी को जानो, मानो व वैसे ही गुण अपनाओ।

 

शब्द है गुरु, शरीर नहीं है,

अर्थात् ज्ञानी को नहीं ज्ञान को अपनाओ और निमित्त में नहीं नित्य में श्रद्धा बढ़ाओ।

 

इस पर सुदृढ़ता से डटे रह, इस अटल सत्य पर स्थिर बने रहो:-

ओ3म् अमर है आत्मा, आत्मा में है परमात्मा

 

गत सप्ताह सजनों हमने जाना कि आशा-तृष्णा किसी लौकिक अथवा सांसारिक विषय-वासनाओं के रूप में इन्द्रिय सुख-भोग के बारे में होने वाली तीव्र अभिलाषा है। यह तीव्र अभिलाषा ऐसी होती है, जो कभी तृप्त नहीं होती। बल्कि वास्तविकता यह है कि तीव्र अभिलाषा के आंशिक रूप से सिद्ध होने के साथ-साथ यह भी आगे बढ़ती चली जाती है। इसके अधीन हो जो निजी तृष्णा को बढ़ाते हैं वे उपाधि को बढ़ाते हैं। जो उपाधि को बढ़ाते हैं वे दु:ख को बढ़ाते हैं यानि अपने लिये आप दु:ख खरीद करते हैं। इसी कारण आशा-तृष्णा के जंजाल में फँसा प्राणी अविचारी और विक्षिप्त हो जाता है। इस संदर्भ में अधिकांशत: मनुष्य की मनोवृत्ति यह रहती है कि उसे जिस बात अथवा विषय की तृष्णा होती है, उसे प्राप्त करने के लिये सद्-असद् आदि मूलभूत विचार को छोड़ देता है और एक विवेकहीन इंसान की तरह उस तृष्णा की पूर्ति के लिये विकार वृत्ति अपना, अपनी सारी शक्ति जुटा देता है। इसी कारण तृष्णा प्राणियों को सबसे अधिक विकल करती है। तभी तो सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में कहा गया है:-

आशा तृष्णा दा रोग लगा है, बली आप मिटासन दु:ख भारी।

 

इसी के साथ सजनों हमने यह भी जाना कि जन्म-मरण के वृत्त में घूमते प्राणी, सब संसारी जीव तृष्णामय हैं, राग बद्ध हैं, आसक्त हैं। यह इनकी सहजात वासना है जो कभी समाप्त नहीं होती। इससे छूट पाना सहज नहीं क्योंकि संसार की आसक्ति बार-बार मन को खींच कर भोगों की ओर ले जाती है और विषयों के चिंतन में रत प्राणी संसार-चक्र से कभी निवृत्त नहीं हो पाता। परन्तु जब इंसान की बुद्धि शब्द ब्रह्म विचार धारण कर स्थिर हो जाती है तो संसारासक्ति छूट कर विराग प्राप्त हो जाता है यानि व्यक्ति संतोष का भाव अपनाकर वितृष्ण हो जाता है और पूर्णता परमार्थ में संलग्न होना आसान हो जाता है। आओ आशा-तृष्णा से छुटकारा पाने हेतु आज इसी वितृष्णा के बारे में जानते हैं:-

 

वितृष्णा

"वितृष्णा" शब्द से तात्पर्य मन से किसी बात की तृष्णा न रह जाने या तृष्णा का अभाव हो जाने से है। यह इच्छा से मुक्त यानि विरक्त मनोभाव का द्योतक है जिसके अंतर्गत सांसारिक विषय-वासनाओं रूपी इन्द्रिय सुखभोग तथा भौतिक आवश्यकताओं के प्रति प्रबल तथा विकट अनिच्छा का भाव मुख्य रहता है। यह मनोभाव अधिकतर किसी दूषित अथवा निन्दनीय या बुरी चीज/बात देखने पर उत्पन्न होता है। इस प्रकार वितृष्णा अरुचिकर-प्रतिकूल विषयों से दूर ले जाती है और मनुष्य को सही अर्थों में मनुष्य बना अखंड शांति की प्रतीति कराती है। ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि इच्छाओं से अभिभूत मनुष्य को अपने जीवन में शान्ति यानि तृप्ति नहीं मिल पाती। इन्द्रिय सुखभोग परायण वृत्तियाँ मानव को गर्त में धकेलती हैं जबकि वितृष्णा मनुष्य को काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद-मत्सर और अहंकार के निवारण का मार्ग दिखा आत्मतुष्ट बनाती है व नकारात्मकता से मुक्ति दिलाती है।।

 

वितृष्णा का विषय तृष्णा है। तृष्णा से संतप्त अन्त:करण को यह जगत दावानल स्वरूप प्रतीत होता है। सब प्राणियों के जो अन्दर होता है, वही बाहर जगत में दिखाई देता है। इस तरह तृष्णा से संतप्त मनुष्य का अन्त:करण उसे अनुचित कार्यों में प्रेरित करता है। इच्छाओं से अभिभूत होकर मनुष्य तृष्णा में नित्य उद्वेग करता है। विषय-चिन्तन और विषय-भोग उसकी तृष्णा को बढ़ाता है जबकि वितृष्णा से विषय-चिन्तन से मुक्ति और भोग-इच्छा को दबाने से शान्ति मिलती है।

 

इस प्रकार वितृष्णा पूर्ण सन्तुष्टि; विरक्ति की स्थिति है जो विवेक से अन्दर उत्पन्न व विकसित होती है। विवेक अर्थात् भले-बुरे, सही-गलत का भेद करने वाली शक्ति। जानो मनुष्य की विवेक रूपी बौद्धिक शक्ति ही उसकी सृष्टि के अनन्य प्राणियों से पृथकता स्थापित करती है। विवेक के आधार पर ही मनुष्य वितृष्ण विषयों के औचित्य-अनौचित्य को निर्धारित करता है व सद्-असद् का ज्ञान प्राप्त करता है। इस प्रकार इस विवेचना द्वारा मनुष्य निष्कर्ष ग्रहण करता है। इस संदर्भ में प्रज्ञावान-विवेकवान व्यक्ति इस निष्कर्ष के आधार पर तृष्णा को काट, मानव मात्र के कल्याण से विमुखित विषयों के प्रति वितृष्णा लाता है और मानवीय सद्गुणों का विकास कर, सामाजिक उद्-विकास में सहायक सिद्ध होता है व परोपकारी नाम कहाता है।

 

कहने का आशय यह है कि जीवन की सार्थकता एवं सफलता को समझने के प्रयत्न में जब व्यक्ति विवेक से काम लेता है तो उसे वास्तविक सत्य का बोध होने लगता है और ऐसी स्थिति में क्षणिक प्रसन्नता देने वाली वस्तुओं एवं कार्यों के प्रति उसे स्वत: वितृष्णा होने लगती है। इस तरह वितृष्णा मनुष्य को निवृत्ति की ओर उन्मुख करती है और वह शांत शीतल भाव की स्थिति में आ सुख का अनुभव करता है। हम कह सकते हैं कि वितृष्णा से मनुष्य में विचारशीलता आती है और यह मनुष्य में सन्तोष-भाव लाती है, जिससे चित्त शीतल बना रहता है और मनुष्य को हृदय में आनन्द का अनुभव होता है। परिणामत: जीवन सफल हो जाता है।

 

इस महत्ता के दृष्टिगत सजनों विचार करो और अपनी विवेकशक्ति से यह निर्णय लो कि कौन सी वस्तु त्याज्य है कौन सी ग्राह्य, क्या दु:ख स्वरूप है और क्या सुख स्वरूप, कौन अनित्य है और कौन नित्य, किससे जीवन में छूटना है और किसको पाना है? विवेक द्वारा जब भली-भांति यह जान लोगे कि इहलोक और परलोक के सब सुख भोग अनित्य और असत्य होने के कारण दु:ख स्वरूप व त्याज्य हैं व केवल सत्यमेव आनन्द स्वरूप नित्य परमात्मा ही ग्राह्य है और उसी का संग प्राप्त कर ही पूर्णता को प्राप्त किया जा सकता है व अपने स्थान को पाया जा सकता है। तो निश्चित ही परमात्मा के प्रति चित्त अनुरक्त हो जाएगा। ऐसा होने पर अपने आप ही विषयों के प्रति वैराग्य व काम, क्रोध, लोभ, मोह एवं अहंकार के प्रति वितृष्णा उत्पन्न हो जाएगी और सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ अनुसार कह उठोगे:-

भैणां आशा तृष्णा दी काली सर्पणी, बैठी ए कुण्डल मार।

जे इस काली तो बचना चाहो, भज लवो राम बलधार।।

 

ऐसा होने पर स्वत: ही मन व इन्द्रियाँ नियन्त्रित हो अंतर्मुखी हो जाएगी और आप सहज ही इच्छाओं/कामनाओं और आवश्यकताओं के मध्य में जो महीन अंतर है उसे परख, किसी बात की अपेक्षा, चिंता व इच्छा न करते हुए, सदा अपनी हैसियत में ही संतुष्ट बने रह सकोगे। आत्मसंतुष्टि से आत्मिक ज्ञान उत्पन्न होगा और उपरति यानि भोगों के सामने पड़े होने पर भी उनमें निरासक्ति हो जाएगी। यह निरासक्ति चित्त को सुदृढ़ता व स्थिरता यानि धीरता प्रदान करेगी और आप समस्त संशय-भौ-भ्रमों से रहित होकर, सच्चाई-धर्म के रास्ते पर निष्कामता से अग्रसर हो अपने आत्मस्वरूप का साक्षात्कार कर सकोगे। अत: सजनों सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ के अनुसार:-

आशा तृष्णा नूं छोड़ के, प्रीति महाबीर जी दे चरणां नाल लाओ।

ओ दीन पर दयाल होसन, मौत दा भय मिटाओ।।

सजनों इसी प्रयोजन सिद्धि के निमित्त यानि तृष्णा की धधकती हुई ज्वाला से आहत् हृदय के उपचारार्थ, सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में महाबीर जी द्वारा औषध रूप में प्रदत्त नाम-अक्षर को समयानुसार युक्ति संगत अफुर अवस्था में चलाने का निर्देश दिया गया है ताकि नाम जाप की वृष्टि से मन उपशम व चित्त शीतल हो जाए और तमाम वासनाओं का नाश होने पर अखंड शांति प्राप्त हो। जैसा कि इस पावन ग्रन्थ में कहा भी गया है:-

आशा तृष्णा दी काली सर्पणी, ए दरख़त दिता हाई जला।

महाबीर जी ने मेहर कीती, औषधि दित्ती ए पिला।।

उपरोक्त विवेचना से सजनों ज्ञात होता है कि इन्द्रियों से मनुष्य को कभी तृप्ति नहीं मिलती। इसलिए सीमा-विहीन भोग परायण वृत्ति मनुष्य को भ्रष्ट कर देती है जबकि भोग इच्छा पर नियंत्रण रखने के रूप में  वितृष्णा व्यक्ति में सद्-गुणों का विकास करने के साथ-साथ इस जगत की नश्वरता का बोध भी कराती है।

 

स्वस्थ समाज के निर्माण में भी वितृष्णा का विशेष महत्त्व है। धन, पद, प्रतिष्ठा आदि के प्रति लालसा प्राय: मानव का विवेक हर लेती है, अत: वह उचित-अनुचित सभी साधनों से इसे प्राप्त करने का यत्न करता है लेकिन ज्यों-ज्यों वास्तविकता को समझकर व्यक्ति में इनके प्रति वितृष्णा होती है, त्यों-त्यों वह विवेक का आश्रय लेकर उचित साधनों पर आधारित जीवन व्यतीत करने का प्रयत्न करता है। इस प्रकार स्वस्थ समाज के निर्माण में भी इसकी उपयोगिता स्पष्ट है। यही नहीं वितृष्णा का भाव शान्त है। वितृष्णा के भाव से मनुष्य में कदाचित उग्र उद्वेग नहीं होता। उदाहरणस्वरूप खून-खराबा, आतंक फैलाना, बलात्कार आदि सभी विषय सभ्य मनुष्यों के मानसिक स्तर पर वितृष्णा के कारण बनते हैं लेकिन वितृष्णा में वह क्रिया उत्पादिनि शक्ति नहीं होती कि व्यक्ति वितृष्णा के विषय को हानि पहुँचाने की ओर प्रवृत्त हो जाये। इस तरह वितृष्णा शांति का मार्ग दिखाती है।

 

अंत में सजनों हम तो यही कहेंगे कि "वितृष्णा" का क्षेत्र उतना ही व्यापक है, जितना कि यह कामनाओं/तृष्णा से रचा, बसा आकर्षक विश्व है। पंच भूतों से मिलकर यह भौतिक जगत दृश्यरूप होता है। भौतिक तत्त्वों से निर्मित्त इस शरीर के प्रति आसक्ति अथवा प्रेम का होना अत्यन्त स्वाभाविक है। संसार में जिस भी प्राणी का जन्म होता है वह समय के साथ-साथ कुछ विशेष वस्तुओं के प्रति आसक्ति की भावना से ग्रस्त होने लगता है। संसार की प्रत्येक वस्तु जो मनुष्य को रुचिकर या आकर्षक लगती है, वह उसे पाने के लिये एड़ी-चोटी का जोर लगा देता है, किन्तु संसार से कूच करते समय जो सत्य-तत्त्व उसके हाथ लगता है, वह यह कि "जब शरीर नष्ट ही होना था तब इसको प्रसन्न रखने के लिये इतने उपक्रम करने का क्या कोई अर्थ था? कामनाओं के पीछे इस प्रकार भागने से अच्छा तो यह था कि कामनाओं के इस मोहपाश में ही न पड़ता"। तब जाकर समझ आती है कि कामनाओं का कोई अन्त नहीं, इसलिए जितना हो सके इनसे बचने का उपाय करो। इसी से आत्मिक-शान्ति प्राप्त होगी।

 

इस बात को समझते हुए सजनों मान लो कि यह भौतिक संसार नश्वर है और इस मृगमरीचिका से दूर रहने में ही सुख है। इसके स्थान पर आत्मस्वरूप की पहचान को यथोचित्त महत्त्व दो यानि आत्मा जो परमात्मा का ही अंश है, उस अंश को अंशी से मिलाना अपने जीवन का उद्देश्य मानो तथा उद्देश्य में बाधक, भौतिक संसार की प्रत्येक वस्तु को नि:संकोच होकर त्याग दो। यही नहीं प्रयोजन सिद्धि हेतु निकट परिवेश एवं समाज में

क्या कुछ घटित हो रहा है, उससे भी निर्द्वन्द्व रहना सीखो। इस प्रकार जब स्वयं को सृष्टिकर्त्ता परमेश्वर का एक अंग मानकर पुन: उसमें मिल जाने की व्याकुलता का अनुभव करोगे तो स्वत: ही इस संसार के अन्य सुख व्यर्थ प्रतीत होने लगेंगे और आप संसार की परिवर्तनशीलता तथा भौतिक भोगों की नश्वरता का ज्ञान प्राप्त कर, स्वेच्छा से उनका त्याग करने में समर्थ हो जाओगे और वितृष्ण हो परम आनन्द पाओगे।

 

सजनों यही हमारा मकसद है। इस मकसद की सिद्धि के निमित्त एक सदाचारी इन्सान की तरह वितॄष्ण हो पवित्रता भरा जीवन जीना सुनिश्चित करो। इस तरह निष्काम-भाव से परोपकार कमाते हुए सब की सेवा करो - सेवा करो - सेवा करो और परमेश्वर के सपुत्र कहलाओ। याद रखो जो वास्तविक रूप से परमेश्वर का सपुत्र बन जाता है वह परमेश्वर सहज ही उसको आप राज सौंप देते हैं। आप भी उस राज को प्राप्त करने के अधिकारी बनो इस हेतु हमारी शुभकामनाएँ आपके साथ हैं।