वृत्ति/स्मृति/बुद्धि-1

साडा है सजन राम, राम है कुल जहान

अर्थात् ईश्वर हमारा मित्र/प्रियतम सर्वव्यापक है, उसी को जानो, मानो वैसे ही गुण अपनाओ।

 

शब्द है गुरु, शरीर नहीं है,

अर्थात् ज्ञानी को नहीं ज्ञान को अपनाओ और निमित्त में नहीं नित्य में श्रद्धा बढ़ाओ।

 

इस पर सुदृढ़ता से डटे रह, इस अटल सत्य पर स्थिर बने रहो:-

3म् अमर है आत्मा, आत्मा में है परमात्मा

 

जैसा कि सजनों सर्वविदित ही है कि जीव वास्तव में ईश्वर का प्रतिबिंब मात्र है। इसी बात को सजनों सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में इस प्रकार कहा गया है "सुरत है अन्दर का ख़्याल, अपना प्रतिबिम्ब"। इस तथ्य के दृष्टिगत सजनों सुरत के लिए आवश्यक होता है कि वह अपनी आत्म अवस्था में यथा बने रहने के लिए ईश्वर को ध्यान में ला अपने वास्तविक स्वरूप को समझें व "विचार ईश्वर है अपना आप" के भाव को अपनाकर, सदा ईश्वर की कृपादृष्टि प्राप्त कर, उन सम बने रहने के योग्य बनी रहे।

 

ऐसा सुनिश्चित करना सजनों इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यदि ईश्वर के प्रति ध्यान अस्थिरता के कारण ईश्वर ख़्याल से उतर जाता है तो यह सुरत के आत्मविस्मृत यानि अपने वास्तविक स्वरूप, ज्ञान, गुण व शक्ति  को भूल असंतोष को प्राप्त होने की बात होती है। इसके विषय में सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में इस प्रकार कहा गया है:-

असली स्वरूप नूं भुलया मन कई जूनां विच भटकावे।

बुद्धि होई करुर तेरी, कई वेरी जम्मे ते मरदा राहवे।।

 

जीव की सुरत की इस दुर्भाग्यपूर्ण अचेतन अवस्था में छवि बिगड़ने लगती है अर्थात् कंचनता के स्थान पर उसका रूप, रंग आदि खराब होने लगता है और रेखा तंग करने लगती है। जीव की इस दयनीय स्थिति को  देखकर परमेश्वर उसको कहते हैं:-

अपना आप तूं भुल गइयें, जग विच आके तूं रूल गइयें।

ऐसा होने पर सजनों इंसान शरीरस्थ पाँच तत्व, जीव के ऊपर हावी हो जाते है। जैसा कि कहा भी गया है:-

पंजा तत्तां घबराया, जीव होया कमज़ोर।

असली धन डाकू लुट चले, साडे पकड़ो महाबीर चोर।।

इस तरह सजनों जीव के कमजोर हो जाने पर मन चंचल हो विकारग्रस्त हो जाता है, बुद्धि जड़ता को प्राप्त हो जाती है और इंसान अपनी सुध-बुद्ध खो जगत के मायावी भ्रम जाल में फँस जाता है। नतीजा उसका ध्यान अस्थिर हो जाता है और मन में संकल्प-विकल्प की तरंगे जब उठती है तो वह सत्य को परख नहीं पाता। परिणामत: उसका आत्मविश्वास टूटता है व स्मरण शक्ति क्षीण हो जाती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि इस अवस्था में चित्त में विस्मय का भाव उत्पन्न हो जाता है और इंसान संदेही व शक्की मिज़ाज हो मिथ्या अभिमान अपना बैठता है। उसके चित्त की प्रसन्नता लुप्त हो जाती है और मन के अंदर ऐसा विस्फोट होता है जिसके प्रभाव से उसके लिए हर परिस्थिति में अपने स्वभावों को सम रखना मुश्किल हो जाता है। परिणामस्वरूप उसके स्वभावों का टैम्प्रेचर घटना बढ़ना शुरू हो जाता है और इसको इस दु:खद परिस्थिति से उबरने के लिए कोई उपाय नहीं सूझता। इसी कारण वह सत्य धर्म पर स्थिर नहीं रह पाता और उसका ख़्याल सदा नकारात्मकता को प्राप्त रहता है यानि वह सब कुछ नकारा ही सोचता है, बोलता है व करता है। इस परिस्थिति के दृष्टिगत ही सजनों सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में कहा गया है:-

भजन बन्दगी इन्सान भुल के ते भुल गये स्वरूप हमारा।

सच्चाई धर्म दे दो मन्त्र भुल गए डिट्ठा प्रतिबिम्ब दा नजारा।।

स्पष्ट है सजनों किसी भी कारण सुरत की कंचनता का भंग होना हम विवेकशील इंसानों के लिए सबसे बड़ी अपमानजनक बात होती है जिसके दंड रूप में ही हमें नाना प्रकार के दु:ख भोगते हुए आवागमन में भटकना पड़ता है। परन्तु इस संदर्भ में सजनों हम सजन तो अत्यन्त भाग्यशाली है क्योंकि हम अपनी यथार्थता से भटकी हुई सुरतों पर सजन श्री शहनशाह हनुमान जी मेहरबान हैं और हमारे जगत में इधर-उधर भटके हुए व उलझे हुए ख़्याल को  ध्यान स्थिरता द्वारा परमेश्वर संग जोड़ पुन: अपनी वास्तविक अवस्था को प्राप्त करने की सहज व सरल युक्ति बता रहे हैं। अत: हमारे लिए बनता है कि हम उनके प्रति असीम श्रद्धा व विश्वास रखते हुए उनकी चरण-शरण में बने रह, उनकी हर बात को आदर दें और अपने जीवन का बिगड़ता खेल संवार लें क्योंकि सतवस्तु का कुदरती ग्रन्थ भी कह रहा है:-

पुरानी यादाशत है, दुनियां दे फन्दे विच आके यादाश्त भुलावीं तूं।

तूं ईश्वर नाल प्रेम बढ़ा के, श्री राम नाम दी माला हृदय विच चलांदा राहवीं तूं।।

उस ईश्वर नूं याद कर लै उस दे चरणां नूं तूं फड लै, उस चरणां नूं भुल जावीं तूं।

कर्मानुसार चौरासी भुगत के आया, वक्त है सम्भल जा फिर पछोतांवी तूं।।

सजनों परमेश्वर के वचनानुसार हम भी वक्त रहते संभल जाए और समय बीत जाने के पश्चात् हमें पछताना न  पड़े इस हेतु हमें तत्क्षण सावधान होना होगा और सर्वप्रथम अपनी कमजोरियों को दूर कर अपनी वृत्ति, स्मृति, बुद्धि व भाव स्वभाव रूपी बाणे को निर्मल बनाना होगा।

जानो सजनों चित्त की विविध् अवस्थाएँ होती है और इन अवस्थाओं को ही वृत्तियाँ कहते हैं। याद रखो चित्त की वृत्तियों द्वारा हम स्थूलता की और जाते हैं अर्थात बहिर्मुख होते हैं जबकि आत्मस्वरूप का बोध करने हेतु हमें स्थूलता से सूक्ष्मता की और जाना होता है अर्थात् बाहर से अन्तर्मुख होना होता है। इस संदर्भ में सजनों जानो कि जब शरीरधारी जीव अपना प्रयोजन सिद्ध करने हेतु जगत में मानव रूप धर कर आता है तो उसको अनेकानेक प्रकार के स्वभाव वालों के घेरे में रहते हुए उसका विधिवत् कार्य कैसे सिद्ध हो सकता है उसके लिए एक निश्चित आचरण/स्वभाव का चयन करता होता है। यही चयन की हुई वृत्ति ही उसकी जीवन कथा व चरित्र के रूप का आधार होती है क्योंकि इसी गोपनीय वृत्ति में उस द्वारा अपने कार्य की सिद्धि हेतु अपनाए जाने वाले मूल सिद्धान्त, प्रतिक्रिया आदि का संक्षिप्त विधान अर्थात् फार्मूला/अर्थ निहित होता है। इसलिए कहते हैं कि वृत्ति अत्यन्त संक्षिप्त होती है और उचित पालना के अभाव के कारण "हौं-मैं" में उलझा हुआ  इंसान जब उसके अस्तित्व की यथार्थता समझ नहीं पाता तो भ्रमित हो उसके वास्तविक अर्थ को स्मृति में नहीं ले पाता और तद्नुरूप ही उसे कार्यरूप देने के लिए स्वभाव के अंतर्गत करने की भूल कर बैठता है। इस प्रकार उसके लिए शास्त्र द्वारा अनुमोदित विधान/पद्धति पर स्थिर बने रह अपने जीवन का प्रयोजन सिद्ध करना कठिन हो जाता है फलत: वह अपना जीवन वृत्तांत बिगाड़ बैठता है। इन्सान की इसी हालत को देखकर सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में कहा गया है:-

जो पैदा हुआ इन्सान सजनों हां हां हां हां, ईश्वर नूं क्यों भुला बैठा।

माता पिता दा संग हुआ तां अपना जीवन गँवा बैठा।।

माता पिता दा संग हुआ, हां हां हां हां, फिर परिवार क्यों संगी बना बैठा।

छड मित्रताई उस ईश्वर दी, इन्सान जीवन अपना भुला बैठा।।

स्पष्ट है सजनों वृत्ति की निर्मलता भंग होने पर इंसान का ख़्याल परमात्मा में ध्यान स्थिर नहीं रह पाता और आत्मविस्मृति के कारण समभाव उसकी नजरो से छूट जाता है और वह परस्पर सजन भाव का व्यवहार करने के स्थान पर द्वि-द्वेष अपना बैठता है जिसका अर्थ होता है उस विवेकहीन इंसान द्वारा परमार्थ का रास्ता छोड़ स्वार्थ का रास्ता अपनाना। इसलिए वह वर्तमान में प्रसन्नता का अनुभव करते हुए जीने के स्थान पर बीते हुए जीवन की घटनाओं, चरित्र आदि का बार-बार चिंतन करते हुए दु:खों को प्राप्त होता है। कहने का अर्थ है कि वह अपनी कलुषित मलीन वृति के अनुसार ही सोचता है, बोलता है व सब कुछ करते हुए उसी में ही लीन रहता है और वृत्तहीन हो चरित्रहीन कहलाता है।

 

इसके विपरीत सजनों निर्मल वृत्ति वाला वृत्तवान् इंसान, अपने ज्ञान स्वरूप में स्थित रहते हुए, सजन श्री शहनशाह हनुमान जी के वचनों की पालना करते हुए शास्त्र विहित् कर्म करता है और अच्छा आचरण करने वाला सदाचारी इंसान कहलाता है। इस तरह वह ऊँचे स्तर पर मानसिक प्रयत्न करने वाला उच्च बुद्धि, उच्च ख़्याल हो, परम पुरूषार्थ की सिद्धि कर लेता है। स्पष्ट है सजनों केवल निर्मल वृत्ति ही अपने जीवन का प्रयोजन सिद्ध कर परमार्थी धन प्राप्त कर संतोष का भाव अपना सकता है। इस महत्ता के दृष्टिगत सजनों इस संसार के पालन कर्ता यानि सर्व श्रेष्ठ वृत्ति सुमतिवान दाता के सम बन, जगत का उद्धार करने हेतु आत्मवृत्ति अपनाओ और इस प्रकार अंधकारमय असुरी वृत्तियाँ अपनाने से बचे रह, प्रकाशमय अवस्था को प्राप्त हो अपना जीवन बनाओ।

 

सजनो हम सब ऐसा करने में कामयाब हो सकें इस हेतु सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ के अंतर्गत सजन श्री शहनशाह हनुमान जी ने हम सजनों के लिए दो वृत्तियाँ बताई हैं। एक बैहरूनी वृत्ति और दूसरी अन्दरूनी वृत्ति। बैहरूनी-वृत्ति से तात्पर्य अपने शरीर, परिधान (वस्त्र), खुराक, आसपास के वातावरण व व्यवहार यानि रैहनी-बैहनी की स्वच्छता/निर्मलता बनाए रखते हुए अपने गृहस्थ आश्रम को ठीक चलाने से है। अत: इस हेतु:-

1 अपने रिहायशी मकान को साफ सुथरा रखो यानि हर एक चीज घर में तरीके से पड़ी हो और घर चमकता हुआ नज़र आए।

2 अपने शरीर रूपी मकान को साफ सुथरा रखो यानि अपनी हैसीयत के अनुसार जो कपड़ा भी पहनो वह साफ सुथरा और उजला हो।

3 अपनी हैसीयत के अनुसार खुराक खाओ ताकि सेहत ठीक रहे क्योंकि सेहत के बिना हमारी भजन बंदगी नहीं हो सकती।

4 अपने बाल बच्चों को साफ-सुथरा रखो और उनको जी करके बुलाओ ताकि उनके संस्कार अच्छे हो जाए और वह भी इसी तरह से बोलें।

5 बच्चों के अन्दर यह बात बिठाओ कि हमारा रास्ता सच्चाई-धर्म का है और वह भी इसी रास्ते पर चलें। इस तरह वह सीधे रास्ते पर चलेंगे और कुरस्ते से बच जावेंगे।

6 बच्चों को प्यार से समझौता दो। मारो नहीं बल्कि कड़ी निगाह से समझाओ।

 

स्पष्ट है सजनों बैहरूनी वृत्ति की निर्मलता सुनिश्चित करने हेतु शरीर, मन व घर को साफ सुथरा रखते हुए व सात्विक आहार का सेवन सुनिश्चित करते हुए, कर्त्तव्यपरायणता से सबके प्रति अपने कर्त्तव्यों का समुचित तरीके से संपादन करते हुए, सत्य-धर्म के निष्काम रास्ते पर चलने का तरीका बताया गया है। सजनों जानों बैहरूनी वृत्ति में इन स्वभावों को धारण करते हुए और अपने गृहस्थ आश्रम को ठीक चलाते हुए हमने  अन्दरुनी वृत्ति को पकड़ना है। यहाँ अन्दरुनी वृत्ति को पकड़ने से तात्पर्य अपने शारीरिक स्वभावों की सफाई हेतु अंतर्गत दोषों, भूलों आदि को ढूँढ निकाल अपनी सुरत को कंचन करने से है।

 

आओ अब इस विषय में जानते हैं कि अन्दरूनी वृत्ति की निर्मलता हमने कैसे बनाए रखनी है। इस हेतु सजनों:-

1 पहले जिह्वा को स्वतन्त्र करना है अर्थात् उस द्वारा कटु शब्दो व अपशब्दों जैसे गाली-गलौच, निंदा चुगली  आदि का प्रयोग न करके, सदैव जी-जी व सजनता सूचक मधुर शब्दों का उच्चारण करना है।

2 फिर यह याद रखते हुए कि "हमारा और कोई भी कुसंगी नहीं है, संकल्प ही हमारा कुसंग है", अपने संकल्प यानि इरादे को स्वच्छ रखना है और उसको सजन और संगी बनाना है।

3 संकल्प को सजन और संगी बनाने हेतु "जो मन मन्दिर, सो ही महाराज का रूप सारे जग अन्दर, जनचर-बनचर, जड़-चेतन एक ही रूप", इस सत्य को आत्मसात् करना है।

4 इस प्रकारा संकल्प के स्वच्छ व पूर्ण रूप से सजन हो जाने पर घर भी सजन, परिवार भी सजन और कुल संसार भी सजन हो जाएगा। फिर हमारा झुखना बंद हो जाएगा। झुखने का अर्थ है रोना।

5 यही नहीं संकल्प के सजन हो जाने पर हमारी दृष्टि भी अपने आप ठीक हो जाएगी और इस तरह हमारा संतोष का सवाल हल हो जाएगा।

 

सजनों संतोष का सवाल जब हल हो गया तो अपनी सुरत को देखना है। सुरत क्या है और इसको कैसे देखना है, सजनों इस विषय में हम आगामी सप्ताह बात करेंगे ताकि हम बाकी के तीनों सवालों यथा धैर्य, सच्चाई, धर्म को हल कर सम अवस्था में बने रह सकें। तब तक अपनी बैहरूनी व अन्दरूनी वृति की निर्मलता सुनिश्चित कर लेना।