प्रकाश-1

साडा है सजन राम, राम है कुल जहान

अर्थात् ईश्वर हमारा मित्र/प्रियतम सर्वव्यापक है, उसी को जानो, मानो वैसे ही गुण अपनाओ।

शब्द है गुरु, शरीर नहीं है,

अर्थात् ज्ञानी को नहीं ज्ञान को अपनाओ और निमित्त में नहीं नित्य में श्रद्धा बढ़ाओ।

इस पर सुदृढ़ता से डटे रह, इस अटल सत्य पर स्थिर बने रहो:-

ओ3म् अमर है आत्मा, आत्मा में है परमात्मा

सजनों सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में श्री साजन परमेश्वर कह रहे हैं:-

परमधाम है घर हमारा, असां परमधाम में रैहंदे हां।

परमधाम है चानणा, ज्यों सूरज चढ़े हज़ार।

एहो ही हम बतलाते हैं, एहो ही हम कहते हैं, एहो ही हम कहते हैं।।

परमधाम है हमारी रौशनाई, है सर्व सबाई।

सर्व सर्व प्रकाश हमारा, प्रकाशित ही कहलाते हैं।

प्रकाश ही हम दिखलाते हैं, प्रकाश ही हम दिखलाते हैं।।

श्री साजन जी के मुख के इन शब्दों से सजनों स्पष्टत: ज्ञात होता है कि परमधाम अपने में बिन सूरजों  प्रकाशमान है जैसे असंख्य सूरज चढ़े हुए हों। यही इलाही प्रकाश ही आद् अंत, अनंत व बेअन्त है जिसकी रोशनी सर्व-सबाई है। नि:संदेह सजनों यह जानने के पश्चात् आपके अन्दर भी इस प्रकाश को देखने की उमंग जाग्रत हो रही होगी। क्या ऐसा ही है जी?

हाँ जी।

तो जानो यह प्रकाश स्थूल दृष्टि से नहीं दिखता। इसके लिए तो अपना ख़्याल ध्यान वल रखते हुए, ह्मदय में आत्मप्रकाश का अनुभव करना होता है। फिर सजनों ज्यों-ज्यों यह अनुभूति बढ़ती जाती है, त्यों-त्यों अपने ह्मदय सहित, रोम-रोम, रग-रग में इसी प्रकाश के व्याप्त होने का एहसास होने लगता है। इस तरह इस प्रयास द्वारा जब ख़्याल परमधाम में ध्यान स्थित हो जाता है तो इंसान के अंदर यह भाव उत्पन्न होता है कि "मैं आत्मा" अपने घर में हूँ। तब वह आत्मा रूप में अन्य आत्माओं से भी बात कर पाता है। यह स्थिति जीव की आत्मतुष्ट अवस्था कहलाती है। इसके अंतर्गत उसे  मन-मन्दिर में व्याप्त अपने असलीयत ज्योति स्वरूप प्रकाश के सारे जग में व्याप्त होने का एहसास होने लगता है अर्थात् उसे लगने लगता है कि जो प्रकाश है मन मन्दिर, वही प्रकाश है जग अन्दर। इस तरह  वह सर्व-सर्व अपने ही प्रकाश का अनुभव कर जान जाता है कि यही प्रकाश चारों तरफ फैला हुआ है। यहाँ उसे समझ आ जाती है कि यह जो सारा संसार है यानि आप, हम जो सब हैं उनका आधार यह प्रकाश ही है। इसलिए इस प्रकाश के मूल रुाोत अर्थात् जगत के रचनाकार परमेश्वर सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ  व सर्वव्यापक कहलाते हैं।

ऐसा होने पर सजनों जीव को यह समझ आ जाती है कि अगर यह प्रकाश नहीं तो शून्य के अतिरिक्त कुछ भी नहीं। इसलिए वह इस प्रकाश को ग्रहण करने का अदम्य पुरूषार्थ दिखाते हुए वही से ज्ञान, गुण व शक्ति धारण कर शांति से जगत के सारे कार्यव्यवहार करते हुए अर्थात् अपने समस्त कत्र्तव्य धर्मंसंगत कुशलता से निभाते हुए अपने प्रकाशित स्वरूप में बना रहता है और बुद्धिमान कहलाता है। कहने का आशय यह है कि  आत्मिक ज्ञान, गुण व शक्ति के प्राप्त होने के पश्चात् वह किसी विध् भी जगतीय पदार्थों के साथ नहीं जुड़ता और न ही किसी कारण जगतीय परिस्थितियों के आगे कमजोर पड़ता है यानि वह सदा एक अवस्था में स्थिर बना रहता है।

स्पष्ट है सजनों वह स्थिर बुद्धि एकाग्र होकर इस जगत में निर्लिप्तता से विचरने हेतु जब इस लाईट से प्राप्त होने वाले ज्ञान व शक्ति को पहचान जाता है तो उसके अन्दर अपना ख़्याल ध्यान स्थिरता से आत्मप्रकाश वल जोड़े रखने की प्रबल उमंग पैदा होती है और वह इस हेतु तड़फ उठता है। तभी तो वह अंतर्मुखी हो अपने गुण व शक्ति का वर्धन करते हुए सबसे ज्ञानवान, गुणवान व शक्तिवान बनने हेतु, ह्मदयगत प्रकाश का अनुभव कर, अक्षर के अजपा जाप की क्रिया को आनन्ददायक व हितकारी समझते हुए और बढ़ाता है व अन्यों को भी वैसा करने के लिए प्रेरित करता है। तात्पर्य यह है कि ज्ञान, गुण व शक्ति ग्रहण करने की क्रिया में खुद आगे बढ़ने के साथ-साथ वह अन्य संगी-साथियों को भी यह सत्य जनाने का यत्न करता है कि आत्मप्रकाश ही सारे जगत में व्याप्त है और इसी अदृश्य व अव्यक्त शक्ति से ही जगत के सारे कार्यव्यवहार चल रहे हैं।

सजनों ऐसा पुरुषार्थ दिखाने के पश्चात् उस इंसान की बुद्धि तेजोमय हो जाती है और वह दिव्य गुणों के हीरे रत्न जड़ित स्वाभाविक श्रृंगार को पहन कर, समभाव-समदृष्टि की युक्ति अनुसार अकत्र्ता भाव से परस्पर सजनता का वर्त-वर्ताव करने में निपुण हो जाता है। इस संदर्भ में सजनों जानो कि तेजोमय बुद्धि ही निश्चयात्मक बुद्धि होती है जिसके उचित प्रयोग द्वारा इंसान के मन से समस्त विकार यानि काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार इत्यादि नष्ट हो जाते हैं और मन स्वत: ही उपशम व शांत हो शीतल हो जाता है। यह शीतलता इंसान को वास्तविक आनन्द का अर्थात् उसके सत्-चित्त-आनन्द स्वरूप का बोध कराती है और ऐसा प्रत्येक कार्य सर्वहित के निमित्त निष्काम भाव से करने में सक्षम हो जाता है।

 

इस उपलब्धि के दृष्टिगत सजनों हमें मानना है कि ब्राहृ सत्ता को ग्रहण किए बगैर हम अपने वर्तमान कलुषित स्वभावों में कदापि परिवर्तन नहीं ला सकते यानि सतवस्तु में आने के लिए जिस प्रकार के श्रेष्ठ स्वभाव अपनाने की आवश्यकता है, तमाम कोशिशों के बावजूद भी उन्हें नहीं अपना सकते। ऐसा इसलिए कह रहे हैं  क्योंकि जब तक ख़्याल (जगत से हट) ध्यान स्थिर हो प्रकाश वल नहीं रहता तब तक हमारे अंतर्मन में मिथ्या ज्ञान, गुण व शक्तियों को अपनाने के कारण छाया हुआ अज्ञानमय अंधकार नहीं छँट सकता और हम अपने जीवन का परम पुरुषार्थ सिद्ध करने में सफल नहीं हो सकते। अत: इस तथ्य को मानो कि आत्मप्रकाश ही हमें परमात्म स्वरूप ज्ञान, गुण व शक्तियों से भरपूर कर इतना शक्तिशाली बना सकता है कि उस अपरंपार प्राप्ति से सम्पन्न हो हम मौत के भय से भी आजाद हो सकते हैं और इस जगत का हर प्रकार से कल्याण करने में समर्थ हो परमात्मा नाम कहा सकते हैं। इसलिए सदा श्रेष्ठता में बने रहने की खातिर सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में विदित विचारों के अध्ययन व मनन द्वारा अपने आत्मस्वरूप को पहचानो व शक्तिशाली होकर एक आत्मज्ञानी की तरह इस जगत में निर्विकारता से विचरो व ए विध् जगत से आजाद हो जाओ।

अंतत: सजनों जानो कि ए विध् परमार्थ के रास्ते पर आगे बढ़ने से ही हम इस नीरस जगत में विचरते समय उससे किसी प्रकार से भी बंधनमान नहीं हो सकते और नीरव यानि गहन मौन की अवस्था को धारण कर शब्दातीत हो सकते हैं यानि अपने वास्तविक स्थान परमधाम पहुँच विश्राम को पा सकते हैं। तो क्या सजनों आप भी अपने सच्चे घर परमधाम पहुँच विश्राम पाना चाहते हो?

हाँ जी।

तो आओ इस हेतु अभ्यास करते हैं:-

1 सभी सजन आँखें बंद कर लो और अपने प्रकाशमय रूप, रंग, रेखा, रहित ब्राहृ स्वरूप का एकाग्रचित्त  होकर अनुभव करो।

2 अब अपने मन में अफुरता से अक्षर चलाना आरम्भ कर दो ताकि आपके लिए अपने ब्राहृ स्वरूप का अनुभव करना सहज हो जाए।

3 तत्पश्चात् सुनिश्चित रूप से अपने ब्राहृ स्वरूप का अनुभव करने हेतु, परमेश्वर की इस सत्य बात को कि "ब्राहृ स्वरूप है अपना आप" सह्मदयता से स्वीकारते हुए, अक्षर चलाने की क्रिया में ऐसी समरसता लाओ कि इस मिथ्या जगत का कोई भी फुरना आपको न सताए यानि सफलता प्राप्ति में बाधक साबित न हो।

4 अब इसी अवस्था में यथा बने रह ख़्याल ध्यान वल और ध्यान ह्मदयगत प्रकाश वल साधो और उसे उस प्रकाश की गहराई में तब तक उतारते जाओ जब तक आपको यह बोध नहीं हो जाता कि "हम तो है ओही प्रकाश"।

5 अब पहले मानो कि "जेहड़ा प्रकाश है मन मन्दिर" और फिर देखो व जानो कि "ओही प्रकाश है जग अन्दर"।

6 इस अवस्था में आने के पश्चात् जो प्रकाश मन मन्दिर व जग अन्दर देखा है उसी प्रकाश का प्रत्यक्ष अपने रग-रग में यानि सारे शरीर में करो।

7 ऐसा प्रत्यक्ष होने पर यह सत्य स्वीकारो कि हर जनचर, बनचर व जड़-चेतन उसी प्रकाश से अस्तित्व में है।

8 अब समझदारी से काम लेते हुए यह मानो कि इसी प्रकाश का विस्तार हद-हद में भी है यानि इस ब्राहृांड के पहले छोर से लेकर आखिरी छोर तक है। फिर प्रकाश के इसी मर्यादित नियम को दृष्टिगत रखते हुए और यह सत्य तहे-दिल से स्वीकारते हुए कि "यही प्रकाश है सारे जग में", अपने ह्मदय को एकरस प्रकाशमय अवस्था मे साधे रखने के व्यावहारिक नियम को सदाचारिता से निभाना सुनिश्चित करो।

9 ऐसा अनुभव करने पर इस सत्य से परिचित हो जाओगे कि जो प्रकाश मन मन्दिर में है वही प्रकाश सारे जग में अर्थात् सप्तद्वीप, गगनमंडल और भूमंडल में भी विद्यमान है। वही पग-पग पर अर्थात् हर स्थान पर है इसलिए मानो यही प्रकाश आद-अंत अर्थात् कालातीत है और इसी प्रकाश से आकाश में चमकने वाले सूरज चाँद देदीप्यमान हैं और प्रकाश के धर्म अनुसार प्रकाश के योग से जगत की हर वस्तु को सब जीवों के दृष्टिगोचर कर उसका विकास करते हैं।

10 अब यह सत्य मानो कि जो मन मन्दिर प्रकाश है, वही सर्व-सर्वत्र है। इसलिए कोई भी जीव उस प्रकाश के धर्म अनुसार या धर्मविरुद्ध आचार-व्यवहार अपना कर, अपने जीवन काल में जो कुछ भी चाहे लुक के करे चाहे छुप के करे, वह सब उन समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाले परमेश्वर को ज्ञात रहता है। पर इस बात का पता तब चलता है जब इंसान के जीवन की करनी का अंतिम परिणाम अच्छे या बुरे रूप में सामने आता है। इस संदर्भ में जान लो कि वह सर्वव्यापक भगवान अच्छा परिणाम प्राप्त करने वाले जीवों के लिए स्वत: ही मोक्ष का द्वार खोल देते हैं और बुरा परिणाम प्राप्त करने वाले अपराधियों को जन्म-मरण के चक्रव्यूह में डाल बंधनमान कर देते हैं।

11 अंतत: सजनों जो प्रकाश निर्वाण के अन्दर है, उस को अपने ह्मदय में धारण कर, शांत शून्य अवस्था में एकरस बने रहो। इस तरह उस प्रकाश के भाव पर अर्थात् ब्राहृ भाव पर स्थिर बने रह जगत जितेन्द्र बन जाओ और समवृत्ति हो रौशन नाम कहाओ। याद रखो सजनों ऐसा पराक्रम दिखाने हेतु ही तो बार-बार कहा जाता है कि हर शरीरधारी जीव का घट उसी प्रकाश से प्रकाशित है जिस प्रकाश से यह समस्त संसार/जगत प्रकाशित है। इस तथ्य के दृष्टिगत सजनों हमें यह मानने में कदाचित् संकोच नहीं करना चाहिए:-

हम एक है, हम एक हैं, सजनों हम एक हैं,

एक दा है प्रवेश सजनों हम एक हैं, हम एक हैं,

एक ही है विशेष सजनों हम एक हैं।

इस सत्य को स्वीकार सजनों सदा एकता, एक अवस्था में प्रसन्नता से बने रहो।

 

सबकी जानकारी हेतु इसके आगे हम आगामी सप्ताह जानेंगे। तब तक इसी अवस्था में स्थिर बने रहना।