Benevolence - परोपकार

Human being is an intellectual creature. Even animals can figure out what is good or bad for them but humanity in a human being is justified if he keeps his prudence awakened and is not only concerned about personal gains. Therefore, understand that whoever is weak, needy and innocent, it is the duty of the human beings to serve them.

The touchstone of benevolence is selfless service and sacrifice. Even if one has to sacrifice oneself for benevolence, this is righteousness. Lack of selfishness is the real criterion of public good.

मानव बुद्धिसम्पन्न प्राणी है। अपना भला-बुरा तो पशु भी भली-भांति जान लेता है परन्तु मनुष्य की मनुष्यता तो इस बात में है कि वह अपने विवेक को जाग्रत रखे और केवल निजी लाभ की बात न करे। अतः समझो कि जो निर्बल हैं, जरूरतमंद हैं और निरीह हैं उनकी सेवा करना मनुष्यमात्र का धर्म है। परोपकार की कसौटी निःस्वार्थ सेवा या त्यागवृत्ति है।

आत्मोत्सर्ग करके भी परोपकार किया जाए, यही धर्म है। स्वार्थ भाव का अभाव लोक कल्याण की सच्ची कसौटी है।