ईर्ष्या द्वेष मत अपनाओ

दिल को सदा ईर्ष्या-द्वेष और आपस की फूट से पृथक रखना चाहिए क्योंकि आध्यात्मिक और व्यवहारिक शिक्षा प्राप्त करने के लिए हृदय की शुद्धता अति उत्तम साधन है।

हृदय को दर्पण की तुलना देते हैं। यदि दर्पण निर्मल हो तो उसमें जो देखें वही नजर आता है। यदि इस पर थोड़ा सा ही दाग हो तो साफ किये बिना नज़र नहीं आता, ऐसा हाल दिल का भी है। यह दिल ही भले-बुरे की पहचान करता है। इस में जो विचार या इच्छा निश्चित की जायें सो ही पक्की हो जाती हैं।

चाहे वह अच्छी हों या बुरी, इसे जिधर लगाओ लग जाता है। इसलिए आयु की घडि़यों को मुश्किल जान इसे शुभ कर्मों में लगावें और बुरी बातों से बचें, ऐसे सजनों के मेल मिलाप से सदा बचें जिन के अन्दर और बाहर कुछ और हो। ऐसे सजनों की संगत नहीं करनी चाहिये, ऐसे सजनों की संगत का फल बुरा निकलेगा।