ईमानदारी

जीवन में किसी भी पुरुषार्थ की सिद्धि के लिए ईमानदार होना अति आवश्यक है। कहा जाता है कि जिसके पास ईमान है, वही ईमानदार है। ईमान शब्द से तात्पर्य ईश्वर में विश्वास और जीवन में सदाचार अपनाने से है।

यह सर्वोच्च आध्यात्मिक, नैतिक और सामाजिक मूल्य है। ईमानदारी का उदय अंतर हृदय में होता है। अपने प्रति ईमानदार होना इसकी पहली शर्त है। तात्पर्य यह है कि अपने को जानते-समझते हुए हम जो भी कहें अत्यन्त सोच-विचार कर कहें और कहकर फिर उसे करें यानि कथनी-करनी में सामंजस्य होना अति आवश्यक है।

इससे मन-वचन-कर्म की एकता बनती है और इनके सामंजस्य से व्यक्ति निर्धारित उद्देश्य की प्राप्ति हेतु उचित दिशा में समुचित तरीके से प्रयत्न कर पाता है और उसकी सिद्धि हेतु किसी भी कठिनाई का सामना करने व बलिदान देने से नहीं सकुचाता।