सेवा-2

सेवा-2

गत सप्ताह सजनों हमने जाना कि हक़ीकत में सेवा क्या है? सेवा कितने प्रकार की होती है? हमें किस भाव से सेवा करनी चाहिए तथा उससे क्या प्राप्ति है…

सेवा-1

सेवा-1

सजनों जैसा कि हम सब जानते हैं कि परमधाम पहुँचना हमारे जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है जिसके लिए पहले निष्कामी और फिर ब्रह्मज्ञानी बनना आवश्यक है।…….

वृत्ति/स्मृति/बुद्धि-5

वृत्ति/स्मृति/बुद्धि-5

गत सप्ताहों में सजनों हमने वृत्ति-स्मृति व बुद्धि की निर्मलता का महत्त्व जाना। आओ सजनों आज इसी बात को सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में विदित कीर्तन "राम रटन ओथे लग रही" के माध्यम से जानते हैं….

वृत्ति/स्मृति/बुद्धि-4

वृत्ति/स्मृति/बुद्धि-4

सजनों वृति-स्मृति की निर्मलता के विषय में जानने के पश्चात् आओ आज बुद्धि की निर्मलता के बारे में जानते हैं। सजनों जैसा कि हम सब जानते ही हैं कि बुद्धि ही सोचने-समझने और निश्चय करने की शक्ति है।….

वृत्ति/स्मृति/बुद्धि-3

वृत्ति/स्मृति/बुद्धि-3

गत सप्ताह सजनों हमने जाना कि समुचित ढंग से सारे कार्य सम्पन्न करने हेतु एक इंसान की वृत्ति, स्मृति व बुद्धि सब निर्मल होनी चाहिए। इस विषय में अभी ….

वृत्ति/स्मृति/बुद्धि-2

वृत्ति/स्मृति/बुद्धि-2

सजनों गत सप्ताह हमें अन्दरूनी व बैहरूनी दोनों प्रकार की वृत्तियों की शुद्धि द्वारा  अन्त:करण/मानसिक, शारीरिक एवं व्यावहारिक शुद्धि एवं निर्मलता बनाए रखने  के लिए कहा गया…..

वृत्ति/स्मृति/बुद्धि-1

वृत्ति/स्मृति/बुद्धि-1

जैसा कि सजनों सर्वविदित ही है कि जीव वास्तव में ईश्वर का प्रतिबिंब मात्र है। इसी बात को सजनों सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में इस प्रकार कहा गया है "सुरत है अन्दर का ख़्याल, अपना प्रतिबिम्ब"….…….

प्रकाश

प्रकाश

सजनों सतवस्तु का कुदरती ग्रन्थ शरीरधारी जीव को अपने वास्तविक ज्योति स्वरूप को जान-पहचान व उसी में स्थिरता से स्थित बने रह, अपने ओज व तेज प्रताप का नीतिसंगत प्रयोग करते हुए………

प्रकाश (त्रिकालदर्शी-2)

प्रकाश  (त्रिकालदर्शी-2)

सजनों गत सप्ताह हमने जाना कि त्रिकालदर्शी बनने या त्रिकालदर्शी की समीपता प्राप्त करने के लिए हमें अनथक परिश्रम करते हुए जाग्रति में आना होगा ताकि हमारा हृदय सदा आद्-जुगाद-प्रमाद के सत्य से एकरस प्रकाशित रहे……….

प्रकाश-6

प्रकाश-6

सजनों विस्तारपूर्वक प्रकाश की महिमा समझने के पश्चात् अब जो सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में वर्णित वीरवार के बोर्डों के माध्यम से श्री साजन परमेश्वर कामयाब होने की युक्ति हमें बता रहे हैं अर्थात् आत्मप्रकाश द्वारा मन में छाया अज्ञान का अंधेरा हटा व अपनी वृत्ति, स्मृति, बुद्धि व स्वभावों ……..

प्रकाश-5

प्रकाश-5

आओ सजनों आज समझते हैं कि हमने परमधाम पहुँच और अपने प्रकाश को पा किस तरह परमेश्वर नाम कहाना है। इस संदर्भ में इस महान प्राप्ति के लिए जो युक्ति सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में विदित है आओ उसको अब हर पहलू से समझते हैं।……..

प्रकाश-4

प्रकाश-4

सजनों कैसी विडम्बना है कि सजन श्री शहनशाह हनुमान जी द्वारा बताए हुए नीति-नियमों से परिचित होते हुए भी, हम सब स्वभाववश या परिस्थितियों के वशीभूत हो उन पर स्थिरता/परिपक्वता से बने रहने में अपने आप को असमर्थ पाते हैं। …….

प्रकाश-3

प्रकाश-3

सजनों हम सब सजन परमानन्द प्राप्त कर परमधाम में विश्राम पाएं उसके लिए श्री साजन परमे·ार हम कलुकालवासियो पर अपनी विशेष कृपा दृष्टि रखते हुए अपने यथार्थ से व जीव, जगत व ब्राहृ के खेल से परिचित कराने हेतु क्या कहते हैं, ……

प्रकाश-2

प्रकाश-2

सजनों ईश्वर क्या है? ईश्वर केवल प्रकाश ही प्रकाश है और कुछ भी नहीं। उसी प्रकाश को अंत: व बाह्र दृष्टि द्वारा ग्रहण कर व उसी में अपने ख़्याल व ध्यान को स्थिर कर हम अंन्दरूनी व बैहरूनी जगत को देख-समझ कर उसमें कुशलता से विचरते हुए परोपकार कमा सकते हैं।……..

प्रकाश-1

प्रकाश-1

सजनों सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में श्री साजन परमेश्वर कह रहे हैं:- परमधाम है घर हमारा, असां परमधाम में रैहंदे हां। परमधाम है चानणा, ज्यों सूरज चढ़े हज़ार। एहो ही हम बतलाते हैं, एहो ही हम कहते हैं, एहो ही हम कहते हैं।।……….

आत्मविजय-5

आत्मविजय-5

गत सप्ताह के संदर्भ में सजनों आओ आज सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ से उद्धृत इस भजन के माध्यम से जानते हैं कि किस प्रकार सच्चेपातशाह जी ने अपने चंचल, बली व हठी मन को उपशम कर, उस पर पूर्ण विजय प्राप्त करने का अदम्य साहस दिखाया। …

आत्मविजय

आत्मविजय

कहते हैं सजनों मन ही बंधन का कारण है और मन ही मुक्ति का कारण है यानि यह मन नियन्त्रित रहने पर आपको अच्छा भी बना सकता है और अनियन्त्रित होने पर बुरा भी बना सकता है। यह बुद्धि को सचेत रहने में सहयोग भी दे सकता है और मनमानी का स्वभाव अपना अचेत भी बना सकता है। ……..

आत्मविजय-3

आत्मविजय-3

गत सप्ताहों में सजनों हमने जाना कि पूर्ण आत्मविजय ही सबसे बड़ी विजय है जो इंसान को तभी प्राप्त होती है जब वह प्रत्येक कार्य अपने निजी अहं व कर्ता भाव को त्याग कर, ईश्वार के निमित्त, उसके हुक्मानुसार करता है………..

आत्मविजय-2

आत्मविजय-2

सजनों मनुष्य में जीने की इच्छा बड़ी प्रबल है। इसी इच्छा की प्रबलता के कारण उसमें जयेषणा जागती है यानि वह दूसरों पर विजय पाना चाहता है। उन्हें अपना वशवर्ती बनाना चाहता है। दूसरों पर जयेषणा की सिद्धि के दो पथ हैं - भौतिक और आत्मिक। ……………